विज्ञान की जमीन पर अंकुरित होंगे शब्द

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शब्दों में अक्सर समय ही दर्ज होता है। अपने समय में रचनाकार के इस हस्तक्षेप का आकलन आलोचना के स्तर पर होता भी है। पर, यह ‘कला संवाद’ की नई पहल है- रचनाकार की नजर से शब्द और समय के तालमेल को तौलने की कोशिश… समय-शब्द संवाद की श्रृंखला में इस हफ्ते पढ़िए साहित्य में विज्ञान के बढ़ते दखल की उपेक्षा पर फिक्र जताती वरिष्ठ साहित्यकार देवेंद्र मेवाड़ी की टिप्पणी:

समय का चेहरा पहचानने की समझ आई तो पहली बार उससे रू-ब-रू हुआ था, और तब उस चेहरे में मौजूद थी मेरे आसपास की मेरी दुनिया, मेरी धरती, मेरा आकाश, यानी पूरी कायनात। मेरी उस दुनिया में मेरे गांव के लोग थे, हमारे साथ अटूट रिश्ता बनाए हुए हमारे पालतू जानवर थे, चहचहाते रंग-बिरंगे पक्षी और घने वनों में विचरते वन्य पशु थे, खेतों में अपने हाथों उगाए और पाले-पोसे हवा में डोलते हरे-भरे पेड़-पौधे थे। ऊपर आसमान में लाखों तारे टिमटिमाते थे और आसमान के आर-पार आकाशगंगा फैली रहती थी। रोज सूरज उगता था। रातों को दूर-दूर तक पहाड़ों पर दूधिया चांदनी बिखर जाती थी। समय का चेहरा मेरे लिए जैसे एक विशाल कैनवस की तरह था तब।

उस कैनवस पर चित्रित मेरा वह संसार मन में कुछ इस कदर बैठ गया कि जब चाहे मन में जीवंत हो उठता था। इसलिए अपने उस संसार को, समय को पहचानने के उस शुरुआती कालखंड को मन की गहराइयों में लिए-लिए मैं समय की लंबी यात्रा पर निकला और जब चाहा किसी कालयात्री की तरह अपने अतीत में पहुंच जाता। गरज यह कि वह समय मेरे साथ बना रहा और लगभग छियासठ वसंत बीत जाने के बाद शब्दों की शक्ल में मेरी कलम से होकर कागज पर उतरा। मेरी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ समय के उसी चेहरे का अक्स है। इसे पढ़ना उसी कालखंड की यात्रा करना है।

लेकिन, समय की इस लंबी यात्रा में तो अब सत्तर वसंत बीत चुके हैं। इन तमाम वर्षों की काल यात्रा में मैं समय के चेहरे को निरंतर बदलते देखता रहा हूं। गांव में उस अतीत को आज खोजता हूं तो बस यहां-वहां उसके भग्नावशेष भर मिलते हैं। उस पीढ़ी के चंद बचे-खुचे लोग आज जीवित जीवाश्म लगते हैं जो कुरेदने पर नि:श्वास लेते हुए केवल इतना बुदबुदाते हैं कि ‘द, कहां रहा अब वह समय!’

जीवन में बढ़ता विज्ञान का दखल

याद करता हूं, कितनी जिज्ञासाएं थीं मन में, कि यह ऐसा क्यों है/ वह वैसा क्यों है/ ऐसा कैसे, क्यों और किसलिए होता है/ जानने की इस ललक ने किताबें पढ़ना सिखाया। जो जाना, समझा, उसे दूसरों को बताने के लिए लिखना सीखा। फिर शब्दों में संजो कर अपने समय और समाज का हाल लिखने लगा। शुरुआत साहित्य से की। कहानियां लिखीं, उनमें उस दौर का समय दर्ज किया। अप ने आस-पास की दुनिया की जिज्ञासाओं और देश-दुनिया में घटती वैज्ञानिक घटनाओं ने विज्ञान की बातें लिखने की प्रेरणा दी। और तब, मैंने साहित्य की कलम से विज्ञान लिखना शुरू किया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कदम जिस तेजी से बढ़ते गए, उतनी ही तेजी से ये हमारे जीवन और समाज में दखल देने लगे। विज्ञान की उपस्थिति एक ओर अगर जिंदगी जीना आसान बना रही थी, तो दूसरी और खुद हमारे जीवन और धरती के अस्तित्व के लिए भारी खतरे के बीज भी बो रही थी। हिरोशिमा-नागासाकी में दुनिया विनाश का मंजर देख चुकी थी जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया था। लेकिन, दूसरी ओर मशीनें आदमी को हजार हाथों की ताकत सौंप रही थीं, कम्प्यूटर पलक झपकते अकूत गणनाएं करने लगे, वैज्ञानिक सागर की अतल गहराइयों और अनंत आकाश की असीम ऊंचाइयों को नापने लगे। साठ के दशक की शुरुआत तक भला कौन सोच सकता था कि शरीर से बाहर परखनली में शिशु जन्म लेगा/ और, कौन जानता था कि आदमी कविताओं और किस्से-कहानियों के चांद पर जा खड़ा होगा/ लेकिन ऐसा हुआ, साठ और सत्तर के दशक में यह संभव हो गया। कल्पनाओं का आकाश हकीकत बनता गया और हमारे ही समय में मानव ने चांद पर विजय पा ली। इतना ही नहीं, उसके अंतरिक्ष यान सौरमंडल के ग्रहों-उपग्रहों को टटोलने लगे, अंतरिक्ष में निराधार तैरती उसकी दूरबीनें सौरमंडल की सीमा के पार ब्रह्मांड में नए, अनजाने ग्रहों को तलाशने लगीं। मानव ने अन्य लोकों में जीवन की, नई सभ्यताओं की खोज शुरू कर दी। क्या कहीं होगी कोई सभ्यता/ पता नहीं, लेकिन मैंने अपनी विज्ञान-कथाओं में इन कल्पनाओं को हकीकत में बदलने की कोशिश की कि क्यों नहीं, अगर विशाल ब्रह्मांड में इस बालू के कण बराबर पृथ्वी पर जीवन का दीया टिमटिमा सकता है, तो ब्रह्मांड के लाखों-लाख ग्रहों में कहीं और भी जीवन पनप सकता है। आसन्न विज्ञान की कई दूसरी संभावनाओं को भी अपनी विज्ञान-कथाओं में शब्दों में उतारा। मेरे समय के हस्ताक्षर मौजूद हैं मेरी उन कहानियों में। अपने समय के विज्ञान को शब्दों में सिलसिलेवार दर्ज करने के लिए मैंने डायरी शैली का सहारा लेकर ‘मेरी विज्ञान डायरी’ पुस्तक-क्रम की रचना की है।

आज जिस कदर विज्ञान हमारे जीवन में दखल दे रहा है, उसी ताब के साथ वह शायद वर्तमान साहित्य में नहीं आ पा रहा है। विज्ञान के दखल से बदलते जैविक रिश्तों पर वरिष्ठ उपन्यासकार संजीव का उपन्यास ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ इसका अपवाद है और वैश्विक स्तर पर चल रहे अविवेकपूर्ण जीव वैज्ञानिक प्रयोगों की परिणति का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है

 

शब्दों में अनुपस्थित विज्ञान समय

मैं शिद्दत से अनुभव करता हूं कि आज जिस कदर विज्ञान हमारे जीवन में दखल दे रहा है, उसी ताब के साथ वह शायद वर्तमान साहित्य में नहीं आ पा रहा है। विज्ञान के दखल से बदलते जैविक रिश्तों पर वरिष्ठ उपन्यासकार संजीव का उपन्यास ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ इसका अपवाद है और वैश्विक स्तर पर चल रहे अविवेकपूर्ण जीव वैज्ञानिक प्रयोगों की परिणति का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। साठ के दशक में राशेल कार्सन की अकेली कृति ‘द साइलेंट स्प्रिंग’ ने विनाशकारी कीटनाशकों के खिलाफ जिस तरह वैश्विक स्तर पर एक आंदोलन खड़ा कर दिया था, आनुवंशिक हेरा-फेरी से रचे जा रहे नए अनजान जीवों और जी एम फसलों के सकारात्मक या नकारात्मक पहलुओं पर अभी इस स्तर पर कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ है। जीन रूपांतरित कपास की खेती ने लाखों किसानों के जीवन में कैसा कहर ढाया है, यह किसी नए ‘गोदान’ में आना अभी बाकी है। परखनली तकनीक ने पत्नी की कोख से जन्म लेने वाले शिशु को किसी भी सरोगेट मां की कोख से जन्म दिला देने की सहूलियत आदमी को मुहैया कर दी है, तो एक्स-वाई क्रोमोजोमों को पहचानने की तकनीक ने जन्म से पहले ही गर्भ में लड़का या लड़की को पहचान लेने का खतरनाक हथियार आदमी को सौंप दिया है। पहली तकनीक जहां लाखों निस्संतान दंपतियों के घर-आंगन में शिशुओं की किलकारी भर रही है, वहीं दूसरी तकनीक मादा भ्रूणों की हत्या का हथियार साबित हुई है। समय की साक्ष्य पहली तकनीक का एक मानवीय पहलू मेरी कथा रचना ‘कोख’ में मुखर हुआ है। देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर मादा भ्रूणों की हत्या से जैविक असंतुलन पैदा हो रहा है। कल इसके भयानक नतीजे सामने आएंगे। वर्तमान समय का यह खौफनाक चेहरा भी रचनाओं में सामने आना चाहिए।

विज्ञान का सरोकार सिर्फ वैज्ञानिकों, विज्ञान के विद्यार्थियों और विज्ञान लेखकों से नहीं है, बल्कि इससे समग्र समाज प्रभावित हो रहा है। साहित्यकार भी इसी समाज का हिस्सा हैं। इसलिए वे भी इसके सकारात्मक या नकारात्मक प्रभावों से अछूते नहीं रह सकते। उन्हें अपने समय का यह चेहरा अपनी रचनाओं में बांधना होगा। हाल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर और बंकिम चटर्जी की पुस्तकें देख कर आत्मिक सुख मिला कि किस तरह उन्होंने अपने समय के विज्ञान का चेहरा अपने लेखन में शामिल किया है। टैगोर ने अपनी ‘विश्व परिचय’ पुस्तक में परमाणु लोक, नक्षत्र लोक, सौर जगत, ग्रह लोक और भूलोक के बारे में लिखा। हाल ही में प्रकाशित ‘ठाकुरबाड़ीर बिज्ञान’ के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि उनके घर-परिवार का विज्ञान से कितना गहरा सरोकार था। बंकिमचंद्र चटर्जी की कृति ‘बिज्ञान रहस्य’ तत्कालीन समय के विज्ञान से साक्षात्कार कराती है। भाषाई साहित्य की लड़ियों में भी अपने समय के विज्ञान को गूंथा जा रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दखल तथा इनकी आशाओं-आशंकाओं के ताने-बाने से बंगला, मराठी, असमी और तमिल भाषा में विपुल विज्ञान कथा-साहित्य रचा जा रहा है।

मुझे लगता है, कल की कथाएं विज्ञान-कथाएं होंगी,क्योंकि जीवन के हर क्षेत्र में विज्ञान इस कदर हावी हो चुका होगा, वह मानवीय संबंधों को इतना झकझोर चुका होगा और आदमी को वर्चुअल दुनिया और वर्चुअल रिश्तों से जोड़ कर इतना अकेलापन दे चुका होगा कि वे कथाएं विज्ञान की जमीन पर अंकुरित होंगी। आने वाली पीढ़ियां उनमें मानव जीवन में प्रवेश करते विज्ञान समय का चेहरा पढ़ सकेंगीं।

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