टाइफाइड है आंतों का ज्वर

4 दिसंबर 2010

टाइफाइड है आंतों का ज्वर

कुछ जानकारी मिल गई है। उसके अनुसार यह आम रोग है और दूषित पानी या भोजन से फैलता है। यह साल्मोनेला इंटेरिका इंटेरिका नामक बैक्टीरिया यानी जीवाणु से फैलता है। ये जीवाणु आंत की दीवार में घुस जाते हैं और उसे कमजोर बना देते हैं। समझ में आया कि डाक्टर ने शायद इसीलिए कहा था कि बिलकुल सादा और सुपाच्य भोजन करें। मिर्च, मसाले और कड़े भोजन से बचें। डाक्टर ने सुबह-शाम शरीर का तापमान भी नोट करने के लिए कहा था। जानकारी से पता लगा, टाइफाइड का जीवाणु 37 डिग्री सेंल्सियस (99 डिग्री फारनेहाइट) पर खूब पनपता है। इस जीवाणु के कारण 104 डिग्री फारनेहाइट तक तेज बुखार आता है, पेट में पीड़ा और मरोड़ होती है। दस्त लग जाते हैं। सिर दर्द और खांसी हो जाती है। बदन पर गुलाबी रंग के ददोरे या धब्बे (रैशेज) निकल आते हैं। लक्ष्मी के पेट और उससे ऊपर ऐसे तमाम धब्बे उभर आए। बुखार से बहुत बैचेनी और सन्निपात की हालत हो जाती।

पता लगा, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस रोग की रोकथाम के लिए दो टीकों की सिफारिश की है। इसके उपचार के लिए ऐंटिबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं।

और हां, यह भी पता लगा कि 430-424 ई.पू. एथेंस में भी इस रोग का प्रकोप हुआ था। और, यह भी कि आजकल विश्व में हर साल लगभग 1.6 से 3.3 करोड़ लोगों को टाइफाइड होता है।

पिछली सदी की शुरूआत में मेरी मैलन नामक महिला ‘टाइफाइड मेरी’ के नाम से प्रसिद्ध हो गई थी। 1907 में उसे तीन वर्ष के लिए क्वारेंटाइन में रखा गया ताकि अन्य लोगों से उसका संपर्क न हो सके और टाइफाइड न फैले। 1915 से 1938 तक उसे फिर क्वारंटाइन में रखा गया। मेरी मैलन से 53 लोगों में टाइफाइड फैला। उसे रसोइए की नौकरी करती थी, छोड़नी पड़ी। और हां, हवाई जहाज का आविष्कार करने वाले दोनों राइट बंधुओं में से एक विल्बर राइट भी टाइफाइड का शिकार हो गया था। प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन जब 1835 में बीगल जहाज में चिली की यात्रा कर रहे थे तो उन पर भी टाइफाइड के जीवाणु ने आक्रमण कर दिया था।

हम भी बहुत घबराए हुए थे। लेकिन डा. अहमद ने शत्रु को पहचान लिया था और उनकी सलाह से हम उस पर एंटिबायोटिक्स से वार करते रहे। सोचते रहे, अब ठीक हुईं कि अब ठीक हुईं।

लेकिन, नहीं। कहते हैं न कि परेशानी अकेले नहीं आतीं। बुखार चढ़ता, उतरता रहा। पूरे बदन में खुजलाहट होने लगी। लाल ददोरे उभरते रहे। दवाइयां चलती रहीं। एक बार फिर खून की जांच कराई। प्लेटलेट संख्या 1,70,000 और रक्तदाब (बी पी) 136/78 था। प्लेटलेट संख्या देख कर इतनी राहत तो मिली कि डेंगू शायद अब नहीं है। लक्ष्मी टाइफाइड की दवाइयां लेती रहीं और सुपाच्य, सादा भोजन ही लिया जाता रहा, इस इंतजार में कि अब तबीयत ठीक हो जाएगी।

15 नवंबर को गले में जलन बढ़ गई। कफ बनने लगा। छाती और हाथ-पैरों में काफी दर्द होने लगा। रक्तदाब 140/78 था। छाती में भी दर्द होने लगा। डाक्टर ने फिर दवाइयां दीं और कुछ दिन तक लेने की हिदायत दी। लकिन, 23 नवंबर को हालत बिगड़ गई। तेज कंपकंपी के साथ बुखार चढ़ गया। कफ की तकलीफ बढ़ गई और उल्टियां हो गईं। डाक्टर के पास भागे। उहोंने जांच कर देखाः नाड़ी दर 92 प्रति मिनट, तापमन 38.5 डिग्री से., रक्तदाब केवल 96/66 और गला अवरुद्ध, कफ तथा खांसी।

हमें लगा समस्या काफी बढ़ गई है। चार-पांच माह की अस्वस्थता ने शरीर को काफी कमजोर बना दिया था। हमने जांच के लिए तुरंत किसी बड़े अस्पताल में जाने का निश्चय किया और बेटे के साथ मेदांता, द मेडिसिटी, गुड़गांव से संपर्क किया। वहां डा. सुशीला कटारिया ने जांच करके कई प्रकार के टेस्ट कराए। श्वेत रक्त कोशिकाएं 39,900! प्लेटलेट संख्या 3,61,000 थी। रक्तदाब 110/60, नाड़ी 88 प्रति मिनट, तापमान 98.0 । पेट का अल्ट्रा साउंड कराया। एक्स-रे लिया गया। रक्त दाब 110/60 था। अगले दिन रिपोर्ट मिली। डाक्टर ने देखीं। फेफडे का ऐक्स-रे की प्लेट देखते ही वे बोलीं “इन्हें, न्यूमोनिया हो गया है। ब्लड प्रेशर बहुत कम और डब्लू. बी.सी. बहुत अधिक हैं।” हम हैरान। पहले डेंगू, फिर टाइफाइड और अब निमोनिया। डाक्टर ने राय दी, “तीन दिन भरती हो जाएंगीं तो मैं यहां इलाज कर सकूंगी।” हमने तुरंत हामी भरी और पत्नी मेदांता अस्पताल में भरती हो गईं। तत्काल इलाज शुरु हो गया।

तीन दिन अस्पताल के बेड पर डाक्टर और नर्सों की देखरेख में रहीं। वे इंट्रावीनस एंटिबायोटिक्स और तरल पदार्थ देते रहे। मैंने इस बीच अटेंडेंट की भूमिका निभाई। 26 नवंबर को डाक्टर ने वार्ड में आकर रिपोर्टें देखीं। मरीज की जांच की। ऐक्स-रे प्लेट देखी और खुश होकर कहा, “अब आप ठीक हैं। घर जा सकती हैं। इवाइयां लिख रही हूं। उन्हें समय पर लीजिए, दो-तीन हफ्ते आराम कीजिए, भाप लेते रहिए और ठंडे-गरम के एक्सपोजर से बचिए। अब 2 दिसंबर को आकर एक बार फिर दिखा दें।” हम डाक्टर को हार्दिक धन्यवाद देकर घर लौट आए।

डाक्टर की हिदायत के अनुसार दवाइयां लीं। अन्य सावधानियां बरतीं और 2 दिसंबर को फिर उनसे मिले। एक बार फिर ऐक्स-रे कराया गया। डाक्टर कटारिया ने देखा और हमें दिखा कर बोलीं, “देखिए, फेफड़े के दाएं लोब पर यहां इंफैक्शन शुरु हुआ था। अब ठीक हो गया है। आप ठीक हैं।”

हमारे मन से भारी  बोझ उतरा। तनाव कम हुआ। बैठे-बिठाए कैसे तीन-तीन बीमारियों ने जकड़ लिया। हद है! लेकिन निमोनिया? निमोनिया क्या है? मैं फिर किताबें टटोल रहा हूं। इंटरनेट खंगाल रहा हूं।

 

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