पत्नी बीमार है

1 दिसंबर 2010

पत्नी बीमार है

मेदांत, द मेडिसिटी, गुड़गांव से लौट आए हैं। पत्नी लक्ष्मी बीमार है। मेदांत में तीन दिन रह चुकी हैं। डा. सुशीला कटारिया ने आज फिर जांच की। ऐक्स-रे लिया गया। उसे देख डाक्टर ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा, “ओ.के.”! अब आप ठीक हैं। फेफडे़ के दाहिने लोब पर यहां इंफैक्शन शुरू हुआ था। वह ठीक हो गया है। दवा लिख देती हूं और घर पर आराम कीजिए। सादा और पौष्टिक आहार लीजिए।

ठंड और नमी से बचिए। ठीक है?

हम ‘हां’ कह कर और डाक्टर की हिदायम लेकर अस्पताल से बाहर आए। दो-तीन माह से चल रहा मानसिक तनाव कम हुआ। दो-तीन पहले तक तो काया निरोग थी। हम लोग निरोग रहने के लिए स्वच्छता और संतुलित भोजन पर जोर देते हैं। फिर, शरीर की भी तो रोगाणुओं से लड़ने की चाक-चौबंद व्यवस्था है। अगर आंख रोगाणु शरीर में जाना चाहें तो आंसू के रसायन उसे नष्ट कर देते हैं। नाक से जाना चाहें तो म्यूकस यानी श्लेष्मा  की परत उन्हें रोक देती है। मुख से रोगाणु भीतर जाना चाहें तो थूक के रसायन उन्हें नष्ट कर देते हैं। फिर भी अड़ियल रोगाणु भीतर पहुंच गए तो आमाशय की थैली में पाचक रस उन्हें पचा देते हैं। इस कारण बहुत कम रोगाणु आंतों तक पहुंच पाते हैं।

लेकिन अगर कट-फट से या काटने से रोगाणु सीधे खून में पहुंच गए तो? तो, बढ़ते-बढ़ते उनकी तादाद हजारों-लाखों तक पहुंच सकती है।  इसीलिए हमारे शरीर का सुरक्षा तंत्र सतर्क हो जाता है। दुश्मन रोगाणुओं पर एंटिबाडी के लेबल लगा दिए जाते हैं। तब हमारे खून में मौजूद ‘ल्यूकोसाइट’ यानी श्वेत रक्त कोशिकाएं और उनसे भी बड़ी ‘मैक्रोफेज’ कोशिकाएं लेबल लगे दुश्मन रोगाणुओं को आसानी से पहचान कर, उन पर हमला बोल देती हैं। उन्हें हड़पने लगती है। दुश्मन की संख्या बहुत अधिक होने या ठीक-ठाक पहचान न होने पर उस पर विजय पाना मुश्किल हो जाता है। तब डाक्टर आवश्यक जांच करके दवाइयां देते हैं या सुई लगा कर फौरन खून में दवा पहुंचाते हैं। दवा के रसायन दुश्मन का खात्मा करने में जुट जाते हैं।

हां, तो इतनी चौक-चौबंद व्यवस्था के बावजूद पत्नी बीमार क्यों पड़ गई?

कारण, वही नामाकूल मच्छर। देश की राजधानी भी इनसे सुरक्षित नहीं है। वर्षा ऋतु शुरू होते ही इनकी फौज का हमला शुरू हो जाता है। सौ-पचास नहीं, ये हजारों की तादात में हमला बोलते हैं। हर प्रजाति अलग-अलग रोगाणु लेकर घूमती है। कोई मुंह में मलेरिया के परजीवी लिए घूमता है तो कोई डेंगू और चिकनगुनिया के वायरस। खून चूसते हैं और बदले में खून में रोगाणु छोड़ देते हैं। ऐनोफ्लीज मच्छर की मादा खून में मलेरिया के परजीवी पहुंचा देती है जो एडीज प्रजाति के मच्छर डेंगू के वायरस पहुंचा देते हैं। ये रोगाणु  यानी बैक्टीरिया, परजीवी और वायरस खून में पौराणिक कथाओं के राक्षसों की तरह बेहिसाब संख्या में बढ़ कर हमें बीमार बना देते हैं। यही हुआ। पत्नी को मच्छर ने काट लिया। दो-एक दिन तेज बुखार और गले की जलन झेली। 29 सितंबर को पास में ही डा. अहमद को दिखाया। उन्होंने खून की जांच के लिए कहा। 2 अक्टूबर को खून की जांच कराने पर पता लगा कि प्लेटलेट संख्या 1,65,000 है। स्वस्थ शरीर में 1.50 लाख से 4 लाख तक प्लेटलेट होती हैं। 7 अक्टूबर को जांच से पता लगा प्लेटलेट संख्या केवल 70,000 है। दो दिन बाद 9 अक्टूबर को यह 1,69,000 हो गई। हमें संदेह हुआ, दो दिन में इतना अंतर क्यों? इसलिए उसी दिन गुड़गांव जाकर डा. अभि के क्लिनिक में पुनः खून की जांच कराई। पिछले साल उन्होंने मेरा इलाज किया था। जांच से पता लगा लक्ष्मी को डेंगू है। डा. अभि की सलाह लेकर लौट आए।

बुखार कुछ कम हुआ लेकिन जोड़ों में सूजन के साथ दर्द बना रहा। बाहर प्रायः कुछ नहीं खाते लेकिन स्वास्थ्य लाभ के जोश में तीन-चार बार बाहर दूकानों पर फलों का ‘ज्यूस’ पी लिया। हालांकि डरते थे कि एक ही बाल्टी में दिन भर जूठे गिलास खंगाले जाते हैं। सफाई नहीं रहती।

हमारा डर सही निकला। 18 अक्टूबर कंपकंपी के साथ तेज बुखार आ गया। रजाई-कंबल से भी ठंड व कंपकंपी कम नहीं हुई। बुखार में तपते हुए ही किसी तरह डा. अहमद के पास गए। उन्होंने एक बार फिर खून की जांच के प्लेटलेट के साथ ही विडाल टेस्ट भी कराने की राय दी। जांच कराई। रिपोर्ट देखते ही बोले, “मेरा शक सही निकला। टाइफाॅइड है।” रिपोर्ट के अनुसार ‘टाइफी ‘ओ’ 1: 160, टाइफी ‘एच’ 1: 180 और प्लेटलेट 1.45 लाख थीं। दवा और हिदायतें लेकर लौटे।

पहले डेंगू, अब टाइफाइड? यानी आंत्र-ज्वर।

घर आकर पत्नी खांसी, सिर दर्द और तपते बुखार में बिस्तर पर पड़ गई। मैं किताबों और इंटरनेट में टाइफाइड की जानकारी खोज रहा हूं। देखूं तो सही यह क्या रोग है।

 

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