साक्षात्कार

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                                   विज्ञान के लिए समर्पित बाल साहित्यकार देवेंद्र मेवाड़ी

                                                              डा. शकुंतला कालरा

बाल साहित्यकारों के बारे में लिखते हुए मुझे एक नाम बार-बार याद आता रहा- देवेंद्र मेवाड़ी। इसलिए कि एक अरसे से इनकी रचनाएं पढ़ती आ रही हूं और जिस बात ने मेरा ध्यान इनके लेखन की ओर आकर्षित किया, वह है बच्चों के लिए इनका विज्ञान लेखन। हिंदी में बच्चों के लिए सरल-सहज भाषा और रोचक शैली में विज्ञान लिखने वाले लोग बहुत कम हैं। यह बाल साहित्य का एक विशेष क्षेत्र है और मैं समझती हूं कि बच्चों के लिए विज्ञान जैसे जटिल विषय पर वे ही कलम चला सकते हैं जिन्हें विज्ञान के साथ-साथ बालमन की समझ हो और उस जानकारी को देने के लिए जिनके पास बच्चों के समझने लायक भाषा हो। देवेंद्र मेवाड़ी की रचनाएं मुझे इसलिए आकर्षित करती रही हैं क्योंकि उनमें विज्ञान होते हुए भी वे कथा-कहानी जैसा आनंद देती हैं। मैंने यह भी अनुभव किया कि श्री मेवाड़ी विज्ञान को किस्सागोई के अंदाज में बताने के साथ-साथ अन्य शैलियों में भी लिखते रहे हैं।

मन में सवाल उठा कि यह एक बाल साहित्यकार आखिर वर्षों से बच्चों के लिए केवल विज्ञान ही क्यों लिखता आ रहा है? क्या अपने बाल साहित्य लेखन के लिए इन्होंने यही क्षेत्र चुना है? जिज्ञासा भी हुई कि आखिर विज्ञान की ओर इनका रुझान क्यों और कैसे हुआ होगा? और, क्यों इन्होंने बच्चों को विज्ञान की बातें बताने का निश्चय किया होगा? स्वयं इन्हें विज्ञान की प्रेरणा कहां से मिली होगी? क्या बचपन से ही इनका विज्ञान-मन रहा होगा?

यही सब सोच कर मैं वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी से मिली और उनके बाल विज्ञान लेखन पर विस्तार से बातें कीं।

शकुंतला कालराः मेवाड़ी जी, मैं काफी समय से आपकी रचनाएं पढ़ रही हूं। मैंने देखा है कि आप बच्चों के लिए विज्ञान से संबंधित विषयों पर लिखते रहते हैं। विज्ञान का संबंध प्रत्यक्षता प्रकृति से है इसलिए सबसे पहले तो यही जानना चाहती हूं कि क्या विज्ञान में आपकी रुचि बचपन से ही थी? क्या घर-परिवार का माहौल विज्ञान का था? निश्चय ही आपका बचपन प्रकृति की गोद में बीता होगा। कृपया आप अपने बचपन के बारे में बताएंगे जहां आपके लेखन की प्रेरणा विद्यमान थी?

देवेंद्र मेवाड़ीः (हंसते हुए) शकुंतला जी, असल में मेरा जन्म ‘प्रकृति की प्रयोगशाला’ में हुआ। उत्तराखंड में नैनीताल शहर से बहुत दूर एक ऊंचे पहाड़ पर बसे गांव-कालाआगर में। प्रकृति  की गोद में बसा था मेरा गांव और जब मैंने आंखें खोलीं और होश संभाला तो देखा मेरे चारों ओर प्रकृति की प्रयोगशाला फैली हुई है। गांव के सिरहाने शिखर पर फैला बांज, बुरांश, रंयाज, काफलों का वह घना जंगल और ऐन सामने सुदूर सुंदर हिमालय की वे पर्वत श्रंखलाएं। वे लोग, वे खेत, वे पशु-पक्षी, वे पेड़-पौधे। प्राइमरी स्कूल के प्रांगण में चटाइयों पर पहाड़े रटते बच्चे-दो एकम दो, दो दूनी चार, दो तियां छै! वह पाटी, दवात और नरकुल की कलम……

हमारी क्यारियों में, खेतों में नन्हे बीज उगते। वे मिट्टी से सिर बाहर निकालते, नन्हीं पत्तियों की हथेलियां हवा में हिलाते, फिर बढ़ते-बढ़ते जड़ों के पैरों पर खड़े हो जाते। बेलें अपनी पतली अंगुलियों से किसी टहनी का सहारा पकड़ कर उठ खड़ी होतीं और चारों ओर की दुनिया को देखतीं।

और हां, हम बादलों को घिरते, गरजते और बरसते देखा करते थे। ओस की बूंदों को छुआ करते थे। हम आसमान से झरती बर्फ की पंखुड़ियां देखते, सफेदी की चादर की तरह फैली तुषार को देखते और घाटियों से उठ कर भाग कर हमसे मिलने आते कोहरे को देखते। फूलों का मधुरस व पराग लाती मधुमक्खियों को देखते थे।

शकुंतला कालराः मैं समझ गई मेवाड़ी जी, आप तो सचमुच प्रकृति की प्रयोगशाला में पैदा हुए। इतनी जिज्ञासा ने आपको जरूर प्रकृति को जानने, समझने की दृष्टि दी होगी। घर-परिवार ने भी प्रेरणा दी होगी?

देवेंद्र मेवाड़ीः हां, शकुंतला जी। सच को जानने की कोशिश ही तो विज्ञान है। जहां तक घर के माहौल की बात है तो हम ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े। माता-पिता और सबसे बड़े भाई व भाभी किसान व पशुपालक थे। मुझसे बड़े भाई साहब हमारे गांव के ऐन सामने के एक और ऊंचे पहाड़ पर बसे गांव ओखलकांडा के इंटरकालेज में शिक्षक थे। मेरे शिक्षक बड़े भाई साहब को पढ़ने का खूब शौक था। उनके पास कई किताबें और पत्रिकाएं होती थीं। कालेज के पुस्तकालय में भी काफी किताबें थीं। वहीं पढ़ाई के दौरान मुझे अपनी पाठ्यपुस्तकों के अलावा दूसरी पुस्तकें पढ़ने का चस्का लगा। कहानियां और कविताएं मेरे मन-मस्तिष्क में छा जातीं। मैं उनके बारे में सोचता रहता। कहानियां पढ़ते-पढ़ते मेरा मन भी कहानी लिखने को मचलने लगा।

इस तरह किताबों का साथ बढ़ता गया। किताबों की कहानियां मन की बात कहतीं। जैसे मां गांव के कई किस्से-कहानियां सुनाती थीं वैसे ही किताबें भी तमाम कहानियां कहतीं। हिंदी के शिक्षक ऐड़ी जी इतने भाव-विह्वल होकर कहानियां और लेख सुनाते-समझाते कि सुन कर मन न जाने कहां-कहां जो खो जाता था।

प्रेमचंद की कहानियां मन को छू लेती थीं। ‘बूढी काकी’ पढ़ कर हम बहुत उदास हो जाते थे। ‘पूस की रात’ का भौंकता-जबरा याद आता रहता था। ‘आत्माराम’ का महादेव सोनार और उसका मिट्ठू याद आता। दूसरे लेखकों की कहानियां भी अच्छी लगती थीं। अपनी कापी में कुछ कहानियों पर हाथ आजमाने के बाद मैंने भी अपनी पहली कहानी लिखी।

शकुंतला कालराः विज्ञान की बातें पढ़ने और लिखने का मन कब और कैसे हुआ?

देवेंद्र मेवाड़ीः हाईस्कूल के दिन थे। पुस्तकालय में एक दिन एक सुंदर-सी नई पत्रिका को देखा तो देखता ही रह गया। नाम था- ‘विज्ञान लोक’। उसमें विज्ञान के एक से एक मजेदार लेख थे। ‘विज्ञान लोक’ का ‘विज्ञान क्लब’ भी था। तमाम बच्चे उसके सदस्य थे। वे विज्ञान के प्रश्न पूछ सकते थे। मैंने क्लब की सदस्यता के कूपन में अपना नाम लिखा- देवेंद्र सिंह मेवाड़ी ‘अन्वेषक’ और मुश्किल से अपना पहला फोटो खिंचवा कर उसे पत्रिका को भेज दिया। मुझे सदस्य बना लिया गया। मेरे प्रश्नों में एक प्रश्न बांज के पेड़ों पर पलने वाले पौधे ‘बांदा’ के बारे में भी था। ‘विज्ञान लोक’ में उत्तर छपा था कि बांदा परजीवी पौधा है और ऐसे पौधे जिस पेड़ पर उगते हैं उसी से भोजन भी लेते हैं। क्लब की संचालिका कृष्णा दीदी ने मेरे पत्र के उत्तर में लिखा था- ‘तुम्हारी अन्वेषक प्रवृत्ति सराहनीय है। मेरा मन झूम उठा था।’

चारों ओर प्रकृति थी। मेरा अन्वेषक मन ‘क्यों और कैसे’ की खोज में लग गया। गर्मियां आतीं और चीड़ के पेड़ों से अबीर-गुलाल की तरह पीला पराग झरने लगता। इतना पराग, आखिर क्यों? फूलों पर भटकती मधुमक्खियां। चमकते जुगनू और जुगनुओं की तरह जगमगाती घास की जड़ें? यह सब क्यों होता है? मैंने यूकलिप्टस की टहनियों में धागे के सिरों पर माचिस की डिबिया बांध कर भौंरों और मधुमक्खियों का गुंजन गुंजाने की कोशिशें कीं। पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों के निकट संबंधों पर नजर गड़ाए रहता। रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में प्रयोग के लिए रसायन और यौगिक मिलने लगे तो कक्षा के बाद परखनलियों में उनके कई जोड़-तोड़ों पर प्रयोग करने लगा जो एक-दो बार के विस्फोटों से ही रुके। विज्ञान की पढ़ाई से ‘क्यों और कैसे’ के कई उत्तर मिलने लगे। विज्ञान के रोचक रहस्यों का पता लगने लगा। उन्हें दूसरों को बताने की चाह ने लेख लिखने के लिए प्रेरित किया। किस्से-कहानियों ने अपने आसपास के पात्रों को लेकर कहानियां लिखने की प्रेरणा दी।

गांव की छोटी-सी चाय की दूकान पर बूढ़े खड़कदा चाय बेचते थे। पास में उन्हीं के साथ बुढ़ाती एक बूढ़ी कुतिया बैठी रहती। वे दोनों दूकान के स्थाई पात्र थे। दोनों एक-दूसरे को देखते, एक-दूसरे के दर्द को समझते, एक-दूसरे की भाषा समझते। कुतिया को फटकारने का मतलब था खड़कदा को फटकारना। इसलिए दोनों सहयात्रियों की तरह जी रहे थे। मैंने एक शब्द चित्र लिखा- ‘खड़कदा’।

शकुंतला कालराः तो, आपने बच्चों के लिए विज्ञान के विषयों पर लिखना कब शुरू किया?

देवेंद्र मेवाड़ीः पहली बात तो यह कि जब विज्ञान से संबंधित मेरे लेख ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’ आदि देश की प्रमुख पत्रिकाओं में छप रहे थे तो लगा मैंने बच्चों को तो विज्ञान की बातें बताई ही नहीं हैं जबकि सबसे अधिक जिज्ञासा उन्हीं में होती है। इसलिए तय किया कि बच्चों को बच्चों की भाषा में विज्ञान बताऊंगा। तब मैंने विज्ञान के तमाम विषयों पर बच्चों के लिए रोचक और ज्ञानवर्द्धक लेख लिखे।

बच्चों के लिए मेरी पहली पुस्तक थी – ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’। आप जानती हैं, जीव-जंतुओं की अपनी एक अलग दुनिया है। सच पूछिए तो पूरी दुनिया ही एक चिड़ियाघर है जिसमें हजारों-लाखों तरह के प्राणी रहते हैं। हम भी उन्हीं में से एक हैं। हम सबके अपने-अपने पुरखे थे। सभी पशु अपने-अपने घरों में रहते हैं, परिवार पालते हैं, खाते-पीते-सोते हैं, उनके भी शादी-ब्याह होते हैं, बच्चों का बचपन होता है, वे जंगल की पाठशाला में पढ़ते हैं, उनके भी खेलकूद होते हैं, उनमें खेलकूद के चैंपियन होते हैं। पशुओं की अपनी पोशाक होती है, वे भी नहाते-धोते हैं, बातें करते हैं और सैर-सपाटे पर जाते हैं। वे हमारे रक्षक भी हैं और उन्हीं ने हमें अंतरिक्ष की राह दिखाई। अंतरिक्ष में पहले वे गए, फिर हम। कथा-कहानी से भी रोचक मेरी यह लेखमाला ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में अगस्त से अक्टूबर 1978 तक प्रकाशित हुई। बाल पाठकों ने इसे बहुत पसंद किया था। फिर मैंने इस लेखमाला को पुस्तक रूप दिया और वह ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’ के नाम से ‘राजकमल प्रकाशन’, दिल्ली से सन् 1979 में छपी।

जब मैं लखनऊ में था, तब दैनिक ‘अमृत प्रभात’ के रविवारी संस्करण में बच्चों के लिए ‘विज्ञान वाटिका’ स्तंभ भी लिखा। उसमें विज्ञान की छोटी-छोटी बातें बच्चों को बताता था जैसे ‘जुगनू कुछ कहता है’, ‘तारों की टिमटिम’, ‘हमारी सांसों के कारखाने’ आदि। उनके लिए 6 वर्ष की मेरी बेटी मानसी चित्र बनाती थी। इसी तरह हमने ‘जनसत्ता’ और ‘नवभारत टाइम्स’ के लिए भी सचित्र बालोपयोगी लेख लिखे।

शकुंतला कालराः क्या आपने बच्चों के लिए वैज्ञानिकों की जीवनियां भी लिखी हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः जी हां, लिखी हैं। जनवरी 1991 में मैंने ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी लिखना शुरू किया जिन्होंने कठिनाइयों का सामना करते हुए सच की खोज जारी रखी। सच की खोज में अपना जीवन होम कर दिया। उन्होंने झूठी मान्यताओं का विरोध किया और कई वैज्ञानिक तो विज्ञान के लिए बलिदान भी हो गए। वे लेख महज जीवनी नहीं बल्कि जीवन की संघर्ष गाथाएं थीं। लेखमाला का उद्देश्य बाल और किशोर पाठकों के मन में यह प्रेरणा जगाना रहा कि उन हालात में अगर उन्होंने यह कर दिखाया तो हम क्यों नहीं कर सकते? ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’, लेखमाला को लिखने की प्रेरणा मुझे मंगलेश (डबराल) जी से मिली। लेखमाला ‘विज्ञान प्रगति’ में जनवरी 1991 से दिसंबर 1991 तक प्रकाशित हुई। इस लेखमाला को बच्चों ने बड़ी रूचि के साथ पढ़ा। लेखमाला की एक-दो किस्तों के बाद ही दूर ग्रामीण क्षेत्र की एक छात्रा मुझे लगातार पत्र लिखती रही कि मैं खगोल विज्ञानी जियोर्दानो ब्रूनो की जीवनी जरूर लिखूं जिसे धर्मांधों ने जिदा जला दिया था। मैंने ब्रूनो की भी जीवनी लिखी। उसी छात्रा ने मेरी पुस्तक के लिए वैज्ञानिकों के चित्र बनाए। इस तरह बाल पाठक मेरे लेखन और मेरी रचनाओं से जुड़ते रहे हैं।

शकुंतला कालराः आपकी पुस्तक ‘सौरमंडल की सैर’ और पत्रिकाओं में प्रकाशित आपकी रचनाओं को देख कर मुझे लगता है, प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ-साथ अंतरिक्ष भी आपका प्रिय विषय है?

देवेंद्र मेवाड़ीः जी हां, बचपन से ही आकाश मुझे सम्मोहित करता रहा है। रात में तारों भरे आसमान को देख कर मैं कल्पनालोक में खो जाता था। सोचता था- न जाने क्या होगा वहां। मां कहती थी मरने के बाद लोग तारे बन जाते हैं। वह भी एक दिन तारा बन जाएगी। पूछती थी- कैसे पहचानेगा तू मुझे? छठे दर्जे में पढ़ रहा था कि मां चल बसी। मैं वर्षों तक तारों में मां का तारा खोजने की कोशिश करता रहा लेकिन उन असंख्य तारों में उस तारे को पहचानना कठिन था। चांद और सूरज का उगना और अस्त होना भी चकित कर देता था। सोचता रहता, कहां से आते हैं ये और कहां चले जाते हैं? धीरे-धीरे किताबों ने मुझे बताया कि कौन हैं ये चांद, तारे और सूरज। आज मैं जब बच्चों को इनके बारे में बताना चाहता हूं तो उसी जिज्ञासा के साथ बताना चाहता हूं जिस जिज्ञासा के साथ बचपन में मैं इनके बारे में जानना चाहता था।

यहां एक बात याद आ रही है शकुंतला जी। सन् 1990 के आसपास महाबलीपुरम, तमिलनाडु में एक सेमीनार में मेरी भेंट प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी डा. पी. राधाकृष्णन से हुई थी। मुझे रेडियो धारावाहिक ‘मानव का विकास’ के अंतरिक्ष खंड के लिए पटकथा लिखनी थी। मैंने उनसे पूछा था- शुरूआत कहां से करूं? तो, उन्होंने जवाब दिया – उसी जिज्ञासा से जो तारों भरे आसमान को देख कर किसी बच्चे के मन में जगती है। ठीक वही जिज्ञासा आदि- मानव के मन में भी जगी होगी। मुझे राह मिल गई। मैं अपने बचपन में लौटा और अपने सहपाठियों के सुर में सुर  मिला कर स्कूल की दीदी के साथ गाया- ‘नीले आसमान के गांव में/जगमग तारों की छांव में/नहीं कहीं  घर होता अपना/किसी पेड़ की छांव में !…..

शकुंतला कालराः आपकी एक पुस्तक भी तो है ‘सूरज के आंगन में’?

देवेंद्र मेवाड़ीः आप ठीक कह रही हैं। जनवरी 1992 में मेरी एक लेखमाला ‘सूरज के आंगन में’ प्रकाशित हुई ‘विज्ञान प्रगति’ में। मैंने बच्चों को सौरमंडल की नवीनतम जानकारी देने के विचार से वह लेखमाला लिखी। तब तक सौरमंडल के बारे में अनेक नए तथ्यों का पता लग चुका था लेकिन बच्चों की अपनी किताबों में पुरानी ही जानकारी थी। इसलिए मैंने सौरमंडल की नई तस्वीर बच्चों को दिखाने के बारे में विचार किया। उस लेखमाला में एक नई शैली अपनाई ताकि बच्चों से सीधी बातचीत की जा सके। मैंने एक केंद्रीय चरित्र ‘देवीदा’ की रचना की जो वैज्ञानिक नहीं हैं लेकिन विज्ञान की पुस्तकें पढ़ कर, वैज्ञानिकों से मिल कर, प्रयोगशालाओं और वेधशालाओं में जाकर विज्ञान की जानकारी लेते हैं और उसे बच्चों की भाषा में बच्चों को बताते हैं। वे बालमन को समझते हैं और बच्चों के दोस्त हैं। बच्चे उनसे कुछ भी पूछ लेते हैं। लेखमाला छपने पर बच्चों को देवीदा बहुत अच्छे लगे और बड़ी संख्या में मुझे उनके पत्र मिलने लगे। ‘सूरज के आंगन में’ लेखमाला 12 अंकों में छपी और उसमें मैंने कितना बड़ा आकाश से लेकर हमारा तारा सूरज, बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेप्च्यून, प्लूटो, क्षुद्रग्रहों, धूमकेतुओं आदि की नवीनतम जानकारी दी। उस लेखमाला में कुछ और सामग्री जोड़़ कर मैंने पुस्तक तैयार की जो ‘निस्केयर’ (तब निस्काम) से छपी। और, हां इस पुस्तक के लिए मुझे वर्ष 1994-99 की अवधि के भारतेंदु बाल साहित्य प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इन लेखमालाओं के अतिरिक्त मैं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमति रूप से विज्ञान विषयक लेख लिखता रहा हूं। ‘बाल भारती’, ‘बाल हंस’, ‘बालवाटिका’ के अलावा जनसत्ता, सहारा समय, स्वतंत्र भारत, अमृत प्रभात, नवभारत टाइम्स, विज्ञान प्रगति, विज्ञान डाइजेस्ट आदि समाचार पत्र-पत्रिकाओं में मेरे बाल विज्ञान विषयक लेख प्रकाशित होते रहे हैं।

शकुंतला कालराः आपने कुछ देर पहले बताया कि आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं। बच्चों को विज्ञान की जानकारी देने के लिए आप क्या इस विधा को अन्य विधाओं से बेहतर मानते हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः शकुंतला जी, हर विधा और हर शैली का अपना महत्व है। कौन-सी जानकारी किस विधा में दी जाए, यह लेखक ने तय करना है। लेखक ही यह महसूस कर सकता है कि किस विधा या शैली से वह बालपाठकों को अधिक लुभा सकता है। लेकिन, विज्ञान गल्प या विज्ञान कथाओं के बारे में मेरा सोच कुछ अलग है। मैं नहीं मानता कि विज्ञान कथाओं का मुख्य उद्देश्य पाठकों तक विज्ञान की जानकारी पहुंचाना है। वह कथा साहित्य है और उसे शुद्ध कथा साहित्य के रूप में ही लिखा जाना चाहिए। विज्ञान कथा पाठक को सोचने, कल्पना करने का मौका देती है। वह पाठक को बताती है कि हमारे जीवन और समाज में विज्ञान क्या-कुछ कर रहा है, मानव जीवन और समाज पर उसका क्या असर पड़ रहा है और भविष्य में क्या असर पड़ेगा। लेकिन, यह बात शुद्ध कहानी के रूप में कही जानी चाहिए। मतलब यह कि विज्ञान कथाकार को पहले कहानी कहने और लिखने की कला आनी चाहिए। फिर वह जीवन और समाज पर पड़ रहे विज्ञान के प्रभाव को कहानी में चित्रित करे। विज्ञान कथा में कहानी को अगर टार्च मान लें तो उसकी बैटरी विज्ञान है। विज्ञान की बैटरी के बिना विज्ञान कथा की टार्च नहीं जल सकती, कहानी का प्रकाश नहीं फैला सकती। जब तक यह बात अनुभव नहीं कर ली जाएगी, तब तक पृथ्वी की कहानी, कोयले की कहानी, मानव की कहानी, मैं गेहूं हूं, जैसे कथा शैली में लिखे गए लेख ‘विज्ञान कथा’ घोषित किए जाते रहेंगे।

शकुंतला कालराः मेवाड़ी जी, जैसा कि हम सब जानते हैं कि मेरी डब्लू शैली कृत ‘फ्रेंक स्टाइन’ प्रथम विज्ञान गल्प माना जाता है। शैली के बाद सुदीर्घ अवधि तक विज्ञान गल्प का अधिक उल्लेख नहीं मिलता। फ्रांसीसी लेखक जूल्स वर्न ने रोमांचक यात्राओं के रूप में विज्ञान कथा साहित्य रचा। उन्होंने ‘फाइव वीक्स इन अ बैलून’, ‘जर्नी टु द सेंटर आफ अर्थ’ जैसे उपन्यास लिखे। उसके बाद ब्रितानी लेखक एच. जी. वेल्स ने ‘टाइम मशीन’ और ‘इनविजिबल मैन’ जैसे उपन्यास लिखे। भावी विज्ञान कथाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आज अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का रहस्योद्घाटन हो चुका है। आज भी विज्ञान कथाकारों का अनुमान के आधार पर विज्ञान गल्प लिखना कितना सही है?

देवेंद्र मेवाड़ीः यह तो अनुमान पर आधारित कहानियां लिखने की ही विधा है शकुंतला जी। मानव जीवन और समाज पर विज्ञान के प्रभाव और प्रौद्योगिकी के बढ़ते कदमों की आहटें सुन कर विज्ञान कथाकार विज्ञान कथाएं लिखते हैं। ये संभावनाओं की कहानियां हैं जो पाठकों को बताती हैं कि विज्ञान के कारण ऐसा हो रहा है या ऐसा हो सकता है। विज्ञान कथाकार अपनी कल्पना से कितना सही अनुमान लगाता है, यह भविष्य में दिखाई देता है। प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार आइजक असिमोव का कहना था कि सन् 1940-50 के दौरान जो विज्ञान कथाएं लिखी जा रही थीं, उनमें की गई कल्पनाएं सन् 1970 के दशक में साकार हो गईं। और हां, आपने जूल्स वर्न और एच.जी. वेल्स का नाम लिया। इन दोनों महान कथाकारों को आज विज्ञान कथा विधा का जनक माना जाता है, हालंाकि उन्हें भी तब यह पता नहीं था कि वे साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथाएं लिख रहे हैं! कहानी की इस विधा का यह नाम तो सन् 1926-1930 के आसपास अमेरिका में प्रचलित हुआ।

शकुंतला कालराः एक अच्छी बाल विज्ञान कथा की विशेषताएं क्या हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः पहली विशेषता तो यह है कि उसे ‘कहानी’ होना चाहिए। एक ऐसी कहानी जो पाठक की संवेदना जगाए। उसमें कहानी के मुख्य तत्व जरूर होने चाहिए यानी कथानक, चरित्र-चित्रण, देशकाल अर्थात् वातावरण, संवाद भाषा-शैली और संदेश। सिद्धहस्त कथाकार इनमें से कुछ तत्वों के बिना भी अमूर्त कहानी रच सकता है। विज्ञान कथा अतीत, वर्तमान और भविष्य में भी झांक सकती है। इस तरह मनुष्य के जीवन और उसके समाज पर विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के प्रभाव का चित्रण करके पाठकों की संवदेना को जगा सकती है। बाल विज्ञान कथा में यदि कहानी और विज्ञान का समरस मेल नहीं होगा तो वह तिलिस्म, परीकथा, अद्भुत कथा या मात्र जासूसी कहानी बन जाएगी। या, फिर कथा शैली में लिखा लेख बन जाएगा।

शकुंतला कालराः कुछ लोग कहते हैं, हमारे पौराणिक आख्यानों में भी ‘साइंस फिक्शन’ है। उनमें भी उड़नखटोले हैं, पुष्पक विमान है, अग्नि वाण हैं, देवता पशु-पक्षियों में बैठ कर उड़ रहे हैं, मनुष्य तथा पशुओं के मिले-जुले रूप वाले देवता हैं। क्या यह साइंस फिक्शन या विज्ञान गल्प है?

देवेंद्र मेवाड़ीः नहीं, मैं इसे साइंस फिक्शन नहीं मानता। ये हमारे पुरखों की उर्वर कल्पनाएं हैं। विश्व की कई अन्य सभ्यताओं ने भी ऐसे सपने देखे। उनमें से कई कल्पनाएं , कई सपने आज साकार हो गए हैं। विज्ञान ने उन्हें सच कर दिखाया है। इसलिए आज के बाल विज्ञान कथाकार को अपनी कहानियों में ऐसी कल्पनाएं करनीं चाहिए जो आज के बच्चों को भविष्य की दुनिया का सपना साकार करने की प्रेरणा दे सकें। कोई नहीं जानता कि उड़नखटोले कैसे, किस तकनीक से उड़ते थे, अग्नि या वर्षा वाणों में कौन-सा ईंधन या विस्फोटक इस्तेमाल होता था या मनुष्य शरीर पर पशु शरीर कैसे जोड़ दिया जाता था, या फिर यह कि हाथी, घोड़ों, गरूड़ और मोर पर सवार होकर देवता किस तरह उड़ते थे? आज का बच्चा यह सब जानना चाहता है। हमें उसे तर्क और तथ्यों के साथ उत्तर देना होता है। बाल साहित्यकारों को आज के इन्हीं बाल पाठकों के लिए बाल विज्ञान कथाएं लिखनी हैं जो बेहद जिज्ञासु हैं। हम उन्हें भूत-प्रेतों की और असंभव तिलिस्मी कहानियों से बहला नहीं सकते। अगर आज हम कहानी में परियों को बुलाएंगे तो वे हवा रहित अंतरिक्ष में पंखों से उड़ कर नहीं आ पाएंगीं जबकि एलियन और रोबोट अपने अंतरिक्ष यानों या कह लीजिए उड़नतश्तरियों में आ सकते हैं। बच्चे उन पर अधिक विश्वास करेंगे क्योंकि ऐसा हो सकता है।

शकुंतला कालराः आपका मतलब है, परीकथाओं की तरह विज्ञान कथाएं भी बच्चों की कल्पना को जगाने का काम करती हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः बिल्कुल करती हैं। कल्पना को जगाने का ही नहीं बल्कि उसे तर्कसंगत दिशा में उन्मुक्त उड़ान भरने का मौका भी देती हैं। बच्चा ‘ऐसा भी हो सकता है’ सोचते-सोचते मन में कल की नई तस्वीरें संजो सकता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनमें से कई कल्पनाओं को साकार होते देख सकता है या स्वयं वैज्ञानिक बन कर अपनी किसी कल्पना को साकार करने की कोशिश कर सकता है। इसलिए, सच पूछिए तो मैं विज्ञान  कथाओं को कोरी कल्पना नहीं मानता। मैं उन्हें कल का सच मानता हूं। और, यह सच हम देखते आ रहे हैं। अच्छा, आप ही बताइए शकुंतला जी, क्या आज से मात्र पच्चीस साल पहले आपने रंगीन टेलीविजन की कल्पना की थी? मोबाइल के बारे में सोचा था कभी? क्या आपने सोचा था कभी कि चंद्रयान चंद्रमा तक पहुंच कर उसकी जांच-पड़ताल करेगा? हमारा मंगलयान मंगल ग्रह की यात्रा करेगा? चलिए, और पीछे चलते हैं……किसी ने सोचा था कभी कि मनुष्य हवाई जहाज बना कर हवा में उड़ने लगेगा? पनडुब्बियों में सागरों की अतल गहराइयों को नापेगा? घरों-कारखानों में रोबोट काम करेंगे? परखनली शिशु पैदा करके निःसंतान महिलाओं की कोख भरेगा? लेकिन, विज्ञान कथाकारों ने यह सब पहले ही सोच लिया था। ये तमाम सपने विज्ञान कथाओं से पहले साकार हुए, बाद में असलियत बने। इसलिए हमें अपने बच्चों को विज्ञान कथाएं पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इनसे उनकी अन्वेषक प्रवृत्ति जाग्रत होगी, उनकी कल्पना को पंख मिलेंगे। मगर दुख की बात यही है कि हिंदी में इस विधा की कहानियां बहुत कम लिखी जा रही हैं।

शकुंतला कालराः मेवाड़ी जी, क्या आपने कभी कविता या गीतों से भी बच्चों को विज्ञान की बात समझाने की कोशिश की है?

देवेंद्र मेवाड़ीः की है शकुंतला जी, लेकिन कम की है। मैं आख्यान या कथा शैली का प्रयोग अधिक करता हूं। नाटक की शैली में भी बच्चों के लिए विज्ञान लिखा है। आपने कविता की बात पूछी। देखिए, मैंने इन पंक्तियों में बायो डायवर्सिटी यानी जैव विविधता की बात समझाने की कोशिश की है। गाकर सुना दूं?

शकुंतला कालराः अरे वाह, जरूर सुनाइए।

देवेंद्र मेवाड़ीः कहीं घने हरे जंगल/कहीं भरे गहरे दलदल/

तीन तरफ सागर का जल/हर तरफ जीवन की हलचल!

जीवन है बस एक, रूप हैं अनेक

                        जीवन तेरे रूप अनेक।। जीवन…………

                        कहीं पंछी कलरव करते/कहीं गुन-गुन भौंरों का गुंजन/

                        कहीं हिरन कुलांचें भरते/हर तरफ जीवन की धड़कन!

                        जीवन है बस एक, रूप हैं अनेक

                        जीवन तेरे रूप अनेक।। जीवन………..

(हंसते हुए) मुझे लगता है शकुंतला जी कि एक रौ में लिखते-लिखते मेरा गद्य गुनगुनाने लगता है और उसमें से कविता या गीत की लय सुनाई देने लगती है। (फिर गंभीर होकर) मुझे लगता है ऐसा। अगर ऐसा नहीं है, तब भी मैं चाहता हूं कि मेरा गद्य गुनगुनाए। मैं लगातार इस बात की कोशिश कर रहा हूं और करता रहूंगा।

शकुंतला कालराः क्या आपने विज्ञान कथाओं पर भी नाटक लिखे हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः लिखे हैं। मैंने विज्ञान कथाओं को नाटकों में ढाला है। बच्चों के लिए आकाशवाणी से प्रसारित अनेक विज्ञान धारावाहिकों के लिए नाटक लिखता रहा हूं। इनमें से कुछ विज्ञान धारावाहिक हैंः ‘मानव का विकास’, ‘छूमंतर’, ‘जीवन एक रूप अनेक’, ‘राही ये मतवाले’, ‘अंकों के खिलाड़ी’ आदि।

शकुंतला कालराः पिछले दिनों मैंने आपकी लिखी दो लोक कथाएं भी पढ़ीं। क्या आप लोक कथाएं भी लिख रहे हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः मैं उत्तराखंड की लोक कथाओं का पुनरलेखन कर रहा हूं ताकि आज शहरों में रह रही नई पीढ़ी के बच्चे भी उन लोक कथाओं को पढ़ और सुन सकें। उनसे शिक्षा ले सकें। मैंने स्कूली बच्चों को भी ये लोक कथाएं सुनाई हैं। जयपुर के ‘स्टेप बाइ स्टेप हाईस्कूल’ में मैंने बच्चों से खचाखच भरे हाल में जब ‘चल तुमड़ी बाटै बाट’, ‘बकरा-बकरी’ और ‘काफल पाक्को’ लोकथाएं सुनाईं तो बच्चे बहुत खुश हुए।

शकुंतला कालराः मेवाड़ी जी, इस महानगर में रहते हुए भी क्या कभी आपको अपने बचपन के दिन याद आते हैं? क्या आप अपने बचपन में लौटते हैं कभी?

देवेंद्र मेवाड़ीः अक्सर ही लौटता रहता हूं शकुंतला जी। जब भी बच्चों के लिए लिखता हूं तो यह याद रखता हूं कि बचपन में मैं इसे किस तरह पढ़ता, इसमें कितनी रूचि लेता। मेरे भीतर का बच्चा मेरी आज लिखी रचना को साथ-साथ पढ़ता रहता है। और, जहां तक बचपन में लौटने या बचपन को याद करने की बात है, मैंने अपने बचपन में लौट कर अपनी आत्म संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी है- ‘मेरी यादों का पहाड़’ जिसे नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने प्रकाशित किया है। इसे पाठकों का बहुत प्यार मिल रहा है। इसे पढ़ कर बड़ी संख्या में पाठक अपने बचपन में लौट रहे हैं। आप भी पढ़िएगा इसे।

शकुंतला कालराः मैंने इसे पढ़ लिया है मेवाड़ी जी। और, सच बताऊं, इसे पढ़ते-पढ़ते मैं भी अपने बचपन में लौट गई। आपके और मेरे बचपन का समय लगभग एक ही था इसलिए उस समय की अनेक बातें मुझे भी याद आईं। मैं भी लकड़ी की तख्ती में बांस की कलम से लिखती थी और मेरी दवात लोहे की होती थी। मुझे लगता है, ‘मेरी यादों का पहाड़’ हर पाठक को उसके बचपन में वापस ले जाने में समर्थ है।

शकुंतला कालराः आप तो निरंतर लिख रहे हैं। अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में भी कुछ बताइए?

देवेंद्र मेवाड़ीः  बच्चों और बड़ों के लिए अभी बहुत कुछ लिखना है मुझे। ‘मेरी विज्ञान डायरी’ सीरीज की मेरी किताबें बच्चों और बड़ों, दोनों को ही कथा-कहानी, संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत आदि शैलियों में विज्ञान की जानकारी दे रही हैं। विश्व पुस्तक मेले में मुझे डाल्टनगंज, झारखंड से आए हिंदी के शिक्षक रवींद्र कुमार पाठक मिले जो बड़े मन से ‘मेरी विज्ञान डायरी’ का दूसरा भाग खरीद रहे थे। पहला भाग वे पिछले मेले में खरीद कर पढ़ चुके थे। मैं बच्चों के लिए समय और कलैंडर पर भी एक किताब लिख रहा हूं। विज्ञान की कई अन्य किताबें लिखने की योजना है। विज्ञान कथाएं भी लिखनी हैं। बहुत काम करना है शकुंतला जी। आपने मेरे बाल विज्ञान लेखन पर लंबी और गंभीर चर्चा की, इसके लिए बहुत आभारी हूं अन्यथा विज्ञान लेखन और विज्ञान लेखकों की ओर भला कौन ध्यान देता है?

शकुंतला कालराः आभारी तो मैं हूं मेवाड़ी जी कि आपने इस लंबी बातचीत के लिए अपना बहुमूल्य समय दिया। नमस्कार।

 

(शकुंतला कालरा)                                         (देवेंद्र मेवाड़ी)

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