करूण कथा कदंब की

kadamba

4 दिसंबर 2011

करूण कथा कदंब की

बीस दिन पहले कहां पता था कि कदंब के एक पेड़ का बलिदान इस तरह पर्यावरण बचाओ की मुहिम बन जाएगा और इतने सारे लोग उससे जुड़ जाएंगे। फेस बुक पर कदंब की करूण-कथा एक आंदोलन बन गई।

आज फेसबुक पर उस कदंब की याद में आयोजित एक वृक्षारोपण कार्यक्रम का फोटो लगा है जिसे कवयित्री विपिन चौधरी, कथाकार रमेश उपाध्याय व एस. आर. हरनोट और लेखक जयप्रकाश मानस सहित बड़ी संख्या में लोग पसंद कर चुके हैं। कई लोगों ने इस घटना क्रम को याद करके राहत की सांस लेकर अपनी टिप्पणियां लिखी हैं। मैंने भी लिख दिया है, ‘सुख मिला यह देख कर कि अपनी जड़ों पर एक और पेड़ खड़ा हो गया।’ दलबीर सिंह दहिया के सवाल के जवाब में देश निर्मोही ने फोटो के बारे में लिखा है, ‘कदंब के पेड़ की याद में राजकीय महिला महाविद्यालय, बोरियांकला, फतेहाबाद में प्राचार्य आर. के शर्मा ने पौधे लगाए। लोगों ने देश निर्मोही को वृक्षारोपण की बधाई दी है। बीस दिन पहले पंचकूला में उन्हीं का लगाया कदंब का हरा-भरा पेड़ काट दिया गया था। 14 नवंबर को।

मुझे उनके फोन से पता लगा। पटना पुस्तक मेले में जाते हुए उन्होंने ट्रेन से मुझे फोन पर बताया ‘मन बहुत उदास है। ग्यारह साल पहले कदंब का एक पेड़ लगाया था। मेरे लाख कहने के बावजूद एक आदमी ने उसे कटवा दिया। रात भर सो नहीं पाया। पटना जा तो रहा हूं लेकिन बहुत दुःखी हूं….फेसबुक पर देखिएगा मेरी टिप्पणी।’
टिप्पणी देखीः ‘पेड़ों का कटना कितना दर्दनाक होता है, इसकी पीड़ा महसूस कर रहा हूं। मानो आपके शरीर को किसी ने आरी से छलनी कर दिया हो। 11 साल पहले अपनी सोसायटी के प्रांगण में कदंब का पेड़ अपने हाथों से लगाया था। तभी से वह मेरे सुख-दुख का साथी था। पेड़ पर चहकने वाले पक्षी, गिलहरी सभी मेरे अपने थे…आज उसे जड़ सहित काट फेंका गया। शाम से रोने के अलावा कुछ नहीं कर पाया। दोस्त वैभव भी पेड़ को कटा देख कर रो पड़े। रोने-कलपने के अलावा क्या किया जा सकता है, कोई तो सामाजिक व कानूनी हल होगा?
यह पोस्ट कई लोग देख चुके थे। उन्होंने लिखाः
नवंबर, 15, 2011, फेसबुक पर
दर्शी डाबरः बेहद दुखद…
देवेन मेवाड़ीः इस दर्द में आपके साथ मैं भी हूं। कदंब की हत्या का दृश्य मेरे मस्तिष्क में उभरा और गला भर आया। मैं जब चंडीगढ़ के सैक्टर ‘सतारां’ में पीएनबी भवन की दूसरी मंजिल पर बैठता था तो कई बार बगल के कमरे में साथी अमिताभ मैत्रो के साथ चाय पीते-पीते खिड़की के सामने खड़े कदंब के वृक्षों के बारे में बातें करता था। बारिश में नहाते कदंब को देख कर विद्यापति याद आते, ‘नंदक नंद कदंबक तरु तर, धिरे-धिरे मुरली बजाव!’ मैं मैत्रो जी को कदंब कथा सुनाता।….हमारे सामने की सोसायटी में एल्स्टोनिया के हरे-भरे पेड़ों को सोसायटी के ‘कसाई’ ने काट-काट कर ठूंठ बना दिया है।…. रोज उन ठूंठों पर नजर पड़ती है। गला भर आता है, आंखें भीग जाती हैं, लेकिन क्या करूं, वही कसाई वहां पेड़-पौधों का रखवाला है। माली ही जब बाग को उजाड़ने लगे तो फिर किस पर भरोसा करें।
सुरिंदर पाल सिंहः मैं भी आहत महसूस कर रहा हूं। हम कुछ मित्र जो ऐसे मुद्दों पर संवेदनशील हैं, कल सुबह 7 बजे मौके पर जाकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करेंगे।
रामेंद्र बाबूः मानव अपनी गलतियों से कभी नहीं सीखेगा। प्रकृति अपना हिसाब लेगी एक दिन।
एस आर हरनोटः किसी पेड़ को इस तरह काटना तो सीधा हत्या का जैसा मामला है। इसके लिए तो कानून बने हैं और इसके विरूद्ध सीधी एफ आइ आर दर्ज होनी चाहिए।
दीप सांखलाः दुखद
षिवानी चोपड़ाः किसी भी पेड़ का कटना दुखद है। यह देख कर हैरानी होती है और गुस्सा आता है कि लोगों को अभी तक समझ में नहीं आया कि पेड़ कटने से क्या नुकसान होगा। और, यही लोग प्रकृति देखने के लिए अपनी गाड़ियों में बार-बार हिमाचल, शिमला की सैर करने भागते हैं।….बढ़ती गाड़ियों के कारण कई सौ पेड़ कट चुके हैं, विरोध हुए, पर कोई कानूनी दखल नहीं हुई। जवाबदेही के लिए भी कोई सामने नहीं आया….देश जी, अच्छा होगा हम मिल कर चार पेड़ लगा दें…
सुरिंदर पाल सिंहः कृपया कल सुबह 7 बजे हमारा साथ दें।
राजबीर देशवालः बहुत खूब। मैंने एक बार ‘द ट्रिब्यून’ के लिए लिखा था- ‘द स्पीकिंग ट्री’।….(देशवाल जी ने फेसबुक पर अंग्रेजी में छपा वह लेख डाला था जिसमें उन्होंने कुछ इस तरह की बातें लिखी थींः कड़ी जाॅगिंग के बाद टाउन पार्क में जब मैं पीपल के एक बुजुर्ग पेड़ के नीचे खड़ा हुआ तो वह बोला, ‘अरे, तुम मानव भी अजीब प्राणी हो। रोज यहां आते हो पर एक-दूसरे का स्वागत नहीं करते, किनारा करके निकल जाते हो…एक-दूसरे के लिए न तुम्हारी आंखों में खुशी दिखती है न चेहरे पर मुस्कान, जैसे कोई मतलब ही नहीं।’ बोलने वाला वृक्ष पार्क की सैर पर आने वाले लोगों की बेरूखी के बारे में बोल रहा था। मैं चुप था कि तभी पीपल ने हिकारत के साथ कहा, ‘जरा उन तीनों को देखो। एक आदमी, दो औरतें। उस जाली पर फैली घनी हरी बेलों की छांव से होकर नहीं जाएंगे, किनारे से निकल जाएंगे। क्या वह हरी-भरी, हवादार जगह आनंददायक नहीं है?’ मैंने देखा, वही हुआ जो पीपल ने कहा था। इससे पहले कि बुजुर्ग वृक्ष पार्क में आने वालों की कूड़ा फैलाने, थूकने और पार्क को कुचलने की बातें करे, मैंने उससे कुछ अच्छा और सुकून देने वाली बातें बताने को कहा। वह बोला, ‘मुझे तो केवल पसीने और मेहनत की बातें याद हैं।’….‘पसीना और मेहनत?’ मैंने पूछा तो उसने कहा, ‘इस जमीन में किसान जुताई करता था, पसीना बहाता था- अन्न पैदा करता था, अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी। लेकिन, अब तुम जैसे लोग यहां पसीना बहा रहे हैं- अपना ब्लड प्रैशर, शुगर और कोलेस्ट्राॅल वगैरह का स्तर ठीक रखने के लिए।…फिर भी तुम भले आदमी लगते हो’, उसने कहा तो मैंने पूछा, ‘क्यों?’ वह बोला, ‘इसलिए कि तुम मेरी बातें तो सुन रहे हो, बाकी लोग तो मेरी ओर ध्यान भी नहीं देते।’…
एस. आर. हरनोटः अगर अभी भी बुरे काम करने वालों को कोई श्राप या बद्दुआएं लगती हों तो इस पेड़ का श्राप और बददुआएं दोनों इन्हें और उन तमाम असंवेदनशील लोगों को लगें जो ‘ईश्वर’ की हत्या करते हैं। पेड़ से बड़ा ‘ईश्वर’ आखिर कौन हो सकता है?
धीरज सैनीः शायद वह नरेश सक्सेना की कविता है…‘देखो गिरा, कट कर गिरा, मेरे आंगन का पेड़’…पेड़ों की पूजा का ढोंग खूब होता है और नेचर की चिंता का स्नाॅब भी लेकिन नेचर से सच्चा रिश्ता गायब है। आसपास का पेड़ जीवन का हिस्सा बन जाता है। उसका कटना…? शायद ‘नसीम’ फिल्म है जिसमें एक मुस्लिम बुजुर्ग अपने बेटे के पूछने पर पाकिस्तान न जाने का कारण घर के बाहर का पेड़ बताते हैं।
अतुल यादवः सामाजिकीकरण की जरूरत है।
नवंबर 16, 2011, फेसबुक पर आज सुबह-सुबह देश का फोन आया कि अभी पटना पहुंचा हूं, पुस्तक मेले में भाग लेने के लिए। बताया, कदंब का पेड़ कटने की दुखद घटना के बाद आज सुबह कुछ लोग पंचकूला में मौके पर पहुंचे। उन्होंने पेड़ की हत्या पर दुःख जताया।….
सुभाष चंदरः बचपन में परिवार में किसी बात पर रूठ कर दोबारा घर न जाने या अपने-आप को खत्म कर देने का निश्चय करके खेतों की ओर निकल जाते थे। वहां पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ देर रो लेते थे और फिर से जीवन में लौट आते थे। जीवन फिर अपनी गति से चलने लगता था। बाद में पता चला कि जब इंसान आहत महसूस करता है तो प्रकृति-जंगल की शरण मेें जाता है। अरण्यरोदन का अर्थ संकुचित हो गया है जिस कारण इसे निरर्थक कार्य माना जाता है। असल में यह शक्ति प्राप्त करने के अर्थ में रहा होगा। जो पेड़ काट रहे हैं, वे रोना भूल गए हैं, उनके दिल पत्थर हो गए हैं। ज्यों-ज्यों पेड़ कटते जाएंगे, लोग चिकने पत्थर होते जाएंगे।…
सुरिंदर पाल सिंहः सामाजिक रुझान वाले हम छह मित्र काटे गए वृक्ष की अस्थियां देखने व अपनी संवदेना प्रकट करने के इरादे से गए…
वैभव सिंहः डटे रहिए। यह वृक्ष और इंसान के रिश्तों को बचाने का संघर्ष है। उन कुल्हाड़ियों को रोकना होगा जो छोटे-छोटे लालच के लिए धरती और जंगल पर बर्बरता से बरस रही हंै।
(इस बीच स्थानीय अखबारों ने भी इस संबंध में प्रमुखता से खबरें छापीं, लोगों के स्टेटमेंट छापे और पेड़ों व पर्यावरण की ओर आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया। पटना पुस्तक मेले से देश ने कई बार फोन किया। बताया कि मन अशांत है। कदंब का बिछुड़ना किसी बेहद करीबी के बिछुड़ने का अहसास छोड़ गया है। इसलिए, निश्चय किया है कि तेरहवें दिन साथियों के साथ कदंब को श्रद्धांजलि अर्पित करूं। मैंने साहस बंधाया। पेड़ों के बारे में बातें कीं और बताया कि पेड़ हमारे प्राण हैं, हमारा जीवन हैं। आधार प्रकाशन से ही प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘विज्ञान प्रसंग’ में ‘पेड़ हमारे प्राण’ पढ़ने की राय दी। देश पटना से पंचकूला लौटे। कदंब के कटने की खबर लगातार चर्चा में थी। कुछ गैर सरकारी संगठनों ने भी मामले में रुचि ली। कुछ लोगों ने हरियाणा वन विभाग से पेड़ों को काटने, न काटने की सरकारी नीति के बारे में पूछताछ शुरू की और यह जान कर हैरान हुए कि पेड़ों को कटने के अपराध पर वहां कोई स्पष्ट नीति ही नहीं है। इसी हलचल के चलते तेरह दिन हो गए। )

नवंबर 26, 2011, फेसबुक पर
देश  निर्मोहीः कदंब के काटे जाने का आज तेरहवां दिन है। जिस दिन पेड़ कटा था मन में शोक था। तेरह दिन के अरसे में वह एक कदंब 151 नए पेड़ों की शक्ल में, पुनः अवतरित होने के संकल्प की तरह, हमारे बीच मौजूद है। मृत्यु जीवन का विस्तार बन गई है।….शोक की जगह अब निर्वाण दिवस का उत्सव मनाना जरूरी लगता है। याद आती है एक पंक्ति….‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले…’ मेरा यही प्रयास रहेगा कि हर वर्ष इसी तरह इस कटे हुए पेड़ की स्मृति में हम दर्जनों या सैकड़ों पेड़ों को लगाने की मुहिम चलाने में कामयाब हों। आप सब को इस उत्सव का भागीदार पाते हुए आज में स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूं।
(रमेश उपाध्याय, मनोज पटेल आदि अनेक लोगों ने इसे तत्काल पसंद किया।)
सुखदेव करुणः धन्यवाद निर्मोही जी।
वैभव सिंहः सरकारी विभाग वृक्षों के नाम पर करोड़ों खर्च करते हैं…ऐसी व्यवस्था में कदंब के पेड़ कट जाएं, सरकारी अफसर सोते रहें तो क्या आश्चर्य। प्रकृति इस दौर में सबसे अधिक डिसपेंसेबल चीज बनती जा रही है।
रमन सैनीः बचपन में पढ़ी एक कविता याद आ रही है, ‘मां अगर यह पेड़ कदंब का होता जमुना तीरे, मैं भी चढ़ जाता शाख पर मां धीरे-धीरे…।’ ढंूढते रह जाते हैं अब यमुना के तीर और कदंब की तस्वीर….
मोहन श्रोत्रियः बधाई।
सुरिंदर पाल सिंहः यह भी एक नायाब तरीका हो सकता है रोष प्रकट करने, दुःख जताने, अफसोस जाहिर करने का। …इस सबके बावजूद एक सवाल दिमाग में बार-बार कौंध रहा है कि प्रशासन या हुडा ऐसे मुद्दों से चुपचाप मुंह कैसे फेर सकता है।
नंद भारद्वाजः जान कर अफसोस हुआ देश जी कि आप जिस मूल (कदंब) को बचा लेना चाहते थे, वह आपकी सारी सद्भावना और तमाम कोशिशों के बावजूद बचाया नहीं जा सका। उस भावनात्मक पूर्ति के लिए नए दरख्त लगाने का संकल्प अपने-आप में अच्छा है, लेकिन उस क्षति का कोई विकल्प नहीं। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
एस. आर. हरनोटः मुझे लगता है, इस तरह के विरोध का या कहूं कि सकारात्मक विरोध का यह मेरी जानकारी में पहला उदाहरण है। देश जी इसके लिए बधाई के पात्र हैं और उनके साथ ही वे तमाम बंधुवर भी जो पेड़ लगाने की इस मुहिम में शामिल हैं। मैं इस उदाहरण को बहुत बड़े पैमाने पर सुरक्षित रखने की बात सोच रहा हूं। लेकिन, आप मुझे कदंब के पेड़ के बारे में जानकारी उपलब्ध करा दें तो आभारी रहूंगा। हमारे यहां यह पेड़ बहुत कम होता है। इसका संास्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व क्या है, या कोई दूसरी जानकारी।
पीयूष अवस्थीः पेड़ कटने की घटना को सकारात्मक और सर्जनात्मक रूप देने के लिए देश निर्मोही को बधाई। इसी कारण हम भी अपने आसपास वृक्षारोपण कर रहे हैं, लोगों को बुला रहे हैं।

नवंबर 27, 2011, फेसबुक पर
अमित मनोजः निर्मोही जी ने अच्छा काम किया कि पेड़ कटने की बात सब को बताई। इस बहाने इतने पेड़ लगे जो इस धरती के लिए भले ही नाकाफी हैं लेकिन बहुत जरूरी हैं। इतने पेड़ किसी न किसी बहाने लगते रहें तो कितने सुकून की बात होगी।….मुझे पेड़ कटने का पता लगा…फोन से निर्मोही जी को सूचित कर दिया कि पांच पेड़ मेरे खाते में।…अगले दिन स्कूल में बच्चों को मैंने सारा प्रसंग बताया तो बच्चे बोले- ऐसी बात है तो पांच नहीं पचास पेड़ लगाएंगे। मैंने समझाया- पहले हम पांचों को बड़ा करेंगे, फिर और लगाएंगे। सच, इस तरह पेड़ लगा कर कितना अच्छा लगा है, यह मैं ही जानता हूं।

नवंबर 27, 2011, फेसबुक पर
उस कदंब की स्मृति में….
देवेन मेवाड़ीः कदंब को गए हुए तेरह दिन बीते और वृक्ष की बिरादरी के 151 वृक्ष अपनी जड़ों पर आ खड़े हो गए। जिन मित्रों ने इन एक सौ इक्यावन हरे साथियों को सहारा देकर धरती में उनकी जड़ों पर खड़ा किया, उन्हें मेरा विनम्र नमन।
कटता हुआ कदंब आखिरी सांस तक नहीं समझ पाया होगा कि आखिर उसे किस बात की सजा मिल रही है? सोचा होगा, आदमी के ही दो हाथ उसे नर्सरी के पालने से लाए और घर की छांव में उन्हीं हाथों ने उसे रोपा, पाला-पोसा। वह वहीं पला, बढ़ा। उसे उसी आंगन की बगिया से खुराक मिली, सूरज की रोशनी और हवा-पानी ने उसे हुलराया-दुलराया। उसने उन्मुक्त होकर अपनी लंबी, पतली शाखों की बांहें हवा में फैला दीं। पत्तियों की हजार हथेलियां हवा से अठखेलियां करने लगीं। सोचा होगा, मेरा बहुत पुराना रिश्ता है आदमी से। बढ़ूंगा और अपनी छांव दूंगा उन्हें। अपने गोल, गेंद जैसे फूलों-फलों से उनका मन मोहूंगा। उन्हें उनकी सांसों के लिए प्राण वायु दूंगा।
सोचा होगा, विगत आठ वर्षों में हरा-भरा होकर न जाने कितनी तितलियों, भौरों और मधुमक्खियों, छोटे-बड़े रंग-बिरंगे कीटों को आश्रय दिया। कितनी चिड़ियां शाखों पर खेलने-चहकने के लिए आने लगी थीं। कभी-कभी गिलहरियां भी लुका-छिपी खेलने आ जाती थीं।….
लेकिन, आज ये कौन से हाथ आ गए कुल्हाड़ी लेकर? आखिरी सांस तक सोचा होगा- आखिर मैंने क्या किया? मैंने हरियाली दी, सांसे दीं, शीतल छांव दी। फिर, मेरे ही पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों? अंतिम सांस तक नहीं समझ पाया होगा वह कदंब। वही क्या, हम भी नहीं समझ पाए हैं कदंब की वह करुण-कथा।
हमारी यादों में सदा झूमता रहेगा वह हरा-भरा कदंब। वहीं खिलेगा और फलेगा। उसकी घनी पत्तियों की हरियाली और कंदुक सम फूलों की पीताभ छटा हमारी यादों के कैनवस में रंग भरेगी।
अलविदा दोस्त कदंब। हमारे सभी साथियों की यादों के आंगन में पलते-बढ़ते और खिलते रहना, वर्ष-दर-वर्ष। अलविदा!

सुरिंदर पाल सिंहः उनकी इनायतें हैं कि दुनिया बदल गई, वरना वही जमीं और वही आसमान है।
(देश का फोन आया कि हरनोट जी कदंब के पेड़ से जुड़े इस घटनाक्रम से प्रेरित होकर एक कहानी लिखना चाहते हैं। उन्हें कदंब पर कुछ जानकारी भेजूं। मैंने हरनोट जी को ‘कौन कदंब’ पोस्ट के जरिए यह जानकारी दी। )

कौन कदंब
वही, जो हमारे प्राचीन साहित्य में श्रीकृष्ण का प्रिय वृक्ष माना गया है। और? आज हमारे वनस्पति विज्ञानियों की भाषा में ‘ऐंथोसिफेलस कदंबा’ कहलाता है। संस्कृत हो या हिंदी, बंगला हो या गुजराती और मराठी, इन सभी भाषाओं में यह कदंब ही कहलाता है। इतना ही नहीं, तमिल भाषी भी इसे कदंबा या वैल्लाइ और तेलगु भाषी कदंबामु बोलते हैं।
कहते हैं लगभग 2000 वर्ष पहले मथुरा और भरतपुर के बीच वृंदावन क्षेत्र में कदंब के विशाल वन थे। आज भी उस क्षेत्र में यहां-वहां कदंब के पेड़ उन सघन वनों की याद दिलाते हैं।
कदंब का पौधा रोपने के बाद 6 से 80 साल तक तेजी से बढ़ता है। फिर धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इसके पेड़ 30 फुट तक ऊंचे और तने की मोटाई 5 से 7 फुट तक हो सकती है। कदंब की शाखाएं नीचे को झुकी हुई होती हैं। पत्तियां पांच-सात इंच लंबी होती है। वर्षा ऋतु में शाखाओं के सिरों पर गोल गेंदनुमा सुनहरे फूल खिल उठते हैं जो महिलाओं के जूड़े की भी शोभा बढ़ाते हैं। कदंब के फूलों से भीनी-भीनी सुगंध निकलती है जिससे वे परागण के लिए कीट -पतंगों को मौन निमंत्रण देते हैं।
कदंब के वृक्ष में कीट-पतंगों से लेकर चिड़ियों और गिलहरियों तक का संसार बसता है। कभी इसके तने पर पीठ टिका कर इसकी छांव में तो बैठ कर देखिए। देखिए, अपनी शीतल छांव में यह आपको कितना सुकून देता है।
नवंबर 28, 2011, फेसबुक पर
देश  निर्मोहीः कदंब के बारे में इतनी जानकारी देकर आपने हमें उपहार दिया है।
एस. आर. हरनोटः धन्यवाद मेवाड़ी जी, बहुत-बहुत।
नवंबर 30, 2011, फेसबुक पर
देवेन मेवाड़ीः आपको जानकारी अच्छी लगी हरनोट जी, आभारी हूं। यों कदंब पर कहने के लिए तो और भी बहुत-कुछ है, समय-समय पर चर्चा करते रहेंगे।
(बहुत खुश हूं आज यह जानकर कि कई साथी और संगठन उस कदंब की याद में पेड़ लगा रहे हैं। यह कदंब की करुण नहीं बल्कि क्रांति कथा बन गई है।)
इन सभी टिप्पणियों के लिए सभी संबंधित टिप्पणीकारों और फेसबुक के प्रति आभार।

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