अनोखी है हमारी पृथ्वी (पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) पर विशेष)

अनोखी पृथ्वीहिमाच्छादित पर्वत शिखर, हरे-भरे घने जंगल, तपते सूखे रेगिस्तान, मन-मोहक मैदान, लहलहाती शस्य-श्यामला फसलें, पहाड़ों से उतर कर मैदानों की धरती को सींचती-बहती सदानीरा नदियां, कल-कल निनाद करते झरने और तट से टकराती विशाल सागर की लहरों का गर्जन! सारी धरती पर जीवन का स्पंदन। धरती को गरमाती, जीवन जगाती सूरज की किरणें, नीले आसमान में अचानक घिर कर रिमझिम बरसते बादल…आः कितनी सुंदर है यह पृथ्वी, यह धरती मां! सोच कर मेरा मन गुनगुना उठता है:
कहीं घने हरे जंगल, कहीं भरे गहरे दलदल
तीन तरफ सागर का जल, हर तरफ जीवन की हलचल
कहीं पंछी कलरव करते, कहीं गुनगुन भौंरों का गुंजन
कहीं हिरन कुलांचें भरते, हर तरफ जीवन की धड़कन
जीवन है बस एक, रूप हैं अनेक
जीवन तेरे रूप अनेक! जीवन तेरे रूप अनेक!

प्रकृति में इतना कुछ! लेकिन, सच बताइए- आपने पिछली बार कब सुनी थी किसी सदानीरा नदी की कल-कल , झरनों की झर-झर और हरे-भरे पेड़ों से आती हवा की सांय-सांय की आवाज़? कब देखी थी आपने फूलों पर मंडराती मासूम तितली, कब सुनी थी आपने फूलों पर मंडराते भौंरों की गुनगुन? कब चहकी थी आपकी मंुडेर पर गौरेया और कब अमराई में कूकी थी कोयल? उत्तर देना शायद कठिन होगा, है ना? पर, यह सब इसी पृथ्वी पर है। हमारी इसी अनोखी धरती पर।
विशाल ब्रह्मांड के खरबों सितारों और ग्रह-उपग्रहों के बीच अनंत आकाश में अपने सूर्य की परिक्रमा करती हमारी यह अनोखी पृथ्वी! सितारांे की दुनिया का एक ऐसा अकेला और अनोखा ग्रह जिसमें जीवन का दीया टिमटिमा रहा है। यह धरती मां, जिसकी कोख में करोड़ों जीव-जातियां पनप रही हैं, जो इन सभी जीव जातियों को पाल पोस रही है। उन पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर रही है। कवि तभी तो चकित होकर पूछता हैः ”यह धरती कितना देती है/ धरती माता, कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को!“ (सुमित्रानंदन पंत)
कभी सोचा आपने कि कहां से आया हमारा यह अनोखा ग्रह? असंख्य सितारों के सूखे रेगिस्तान में जीवन से लहलहाता यह अकेला नखलिस्तान! इस पर कैसे पनपा जीवन?
इस बारे में हमारे पुरखों ने सोचा। उन्होंने सोचा कि ऊपर झिलमिलाते तारों भरे आसमान में शायद स्वर्ग लोक है। उसमें सूरज, चांद, सितारे हैं। नीचे भूलोक यानी हमारी पृथ्वी है। सूरज, चांद, सितारे इसके चारों ओर घूम रहे हैं। उन्होंने समझा पृथ्वी चपटी है। उस पर कहीं पहाड़ बन गए हैं, कहीं घाटियां और कहीं मैदान। सोचा, स्वर्ग लोक में देवता रहते होंगे। पृथ्वी शायद मृत्यु लोक है। यहां जीव जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। यहां तक कि उन्होंने पृथ्वी के नीचे पाताल लोक की भी कल्पना कर ली! पृथ्वी के बारे में हमारे पूर्वजों ने और भी कई तरह की कल्पनाएं कीं। उन्होंने सोचा कि पृथ्वी को कछुए की पीठ पर खड़े हाथियों ने अपने सिर पर संभाला हुआ है। जब कछुआ हिलता-डुलता है तो भूकंप आ जाते हैं! किसी ने कहा पृथ्वी शेषनाग के सिर पर टिकी हुई है।
दुनिया के दूसरे देशों के निवासियों ने भी प्राचीनकाल में पृथ्वी के बारे में कई कल्पनाएं कीं। दक्षिण अमेरिका में मय सभ्यता के लोग मानते थे कि विश्व का सृजन और विनाश होता रहता है। वे भी स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की कल्पना करते थे। वे सोचते थे, पृथ्वी एक विशाल मगरमच्छ की पीठ पर टिकी है। ईसाई और यहूदी लोग यह मानते रहे हैं कि परम पिता ने स्वर्ग और पृथ्वी की रचना की। उसने कहा ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश पैदा हो गया। उसने आदम बनाया। फिर हौवा बनाई। उनकी संतानें पृथ्वी पर फैल गईं।
तब हमारे पुरखों को पता नहीं था कि पृथ्वी कैसे बनी। इसलिए उन्होंने अपने-अपने अनुमान लगाए। आज से लगभग पांच हजार वर्ष पहले वैदिक युग में हमारे ऋषियों को लगा कि हमारी पृथ्वी विश्व के बीच में है। वह गोल और निराधार है। लेकिन, सूरज, चांद, सितारों को घूमता हुआ देख कर उन्हें भी लगा कि वे पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं। ईसा से लगभग 300 वर्ष पहले यूनान के महान दार्शनिक अरस्तू ने भी कह दिया था कि सूर्य, चंद्रमा और तारे पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं। उसने कहा कि आसमान में 55 बड़े-बड़े पारदर्शी गोले हैं। उनमें सूरज, चांद, तारे जड़े हैैं। वे घूमते हैं तो चांद-तारे भी घूमते हैं। अरस्तू को लगा, जिसने भी ब्रह्मांड बनाया उसने आकाश में घूमने वाले गोले भी बना दिए। लेकिन, बाद में यूनान के ही खगोलविज्ञानी अरिस्टार्कस ने कहा कि अरस्तू की बात गलत है। सूर्य, चंद्रमा और तारे पृथ्वी के चारों ओर नहीं बल्कि पृथ्वी, चंद्रमा और ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। मगर उसकी बात पर लोगों ने अधिक ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सोचा, अगर पृथ्वी घूमती तो भला हमें पता नहीं लगता? वे तब यह भी नहीं जानते थे कि पृथ्वी भी अपनी धुरी पर घूमती है।
लेकिन, भारत के महान खगोलविज्ञानी आर्यभट ने पांचवीं सदी में इस रहस्य का पता लगा लिया। उसने कहा, नक्षत्र अपने स्थान पर अचल रहते हैं, पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। आर्यभट को यह भी पता लग गया था कि पृथ्वी गोल है। भारत के एक और खगोलविज्ञानी वराहमिहिर ने छठी शताब्दी में पता लगा लिया था कि जैसे चुंबक के बीच लोहे का टुकड़ा बिना किसी आधार के लटका रहता है, वैसे ही अंतरिक्ष में पृथ्वी का गोला भी निराधार है।
स्वर्ग और पाताल लोक की कल्पनाओं को सबसे बड़ा धक्का तब लगा जब सन् 1543 में पोलेंड के खगोलविज्ञानी कोपर्निकस की किताब छपी ‘डी रिवोल्यूशनिबस’। उस किताब में उसने लिखा कि केंद्र में सूर्य है और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह-उपग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं। उसने सदियों से चली आ रही इस मान्यता को बदल दिया कि केन्द्र में पृथ्वी है। लेकिन, धर्माचार्य तो यही मानते थे। इसलिए वे नाराज हो गए। उन्होंने कोपर्निकस की बात को धर्म के खिलाफ मान लिया। इटली के दार्शनिक जिओर्दानो ब्रूनो ने कोपर्निकस के विचारों का समर्थन किया और कहा आकाश अनंत है। धर्मांध लोगों ने सन् 1600 में उसे जिंदा जला दिया।
जर्मन खगोलविज्ञानी केपलर ने भी कोपर्निकस को सही बताया। उसने कहा, ग्रह सूर्य के चारों ओर गोलाकार नहीं बल्कि अंडाकार कक्षा में घूमते हैं। उसने ‘एस्ट्रोनोमिया नोवा’ नामक पुस्तक लिखी जो सन् 1609 में छपी। उसी वर्ष इटली के खगोल वैज्ञानिक गैलीलियो गैलेली ने अपनी दूरबीन से चंद्रमा और आकाशगंगा को देखा तो यह देख कर हैरान रह गया कि चंद्रमा पर भी पृथ्वी की तरह पहाड़ थे! गैलीलियो ने भी कोपर्निकस के विचारों का समर्थन किया। उसने स्वर्ग और मृत्युलोक की कल्पना के खिलाफ पृथ्वी और आकाश के पिंडों की सच्चाई सामने रखी, लेकिन धर्माचार्या गैलीलियो से सख्त नाराज हो गए। उस पर मुकदमा चला और सजा के तौर पर उसे नजरबंद कर दिया गया।
लेकिन, आखिर पृथ्वी बनी कैसे? आइए, अतीत में झांकते हैं, खरबों वर्ष पहले। सुदूर अंतरिक्ष में गैसों के एक विशाल बादल का जन्म हुआ। लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले किसी विशाल तारे के विस्फोट ने उसमें भारी हलचल मचा दी और वह तेजी से घूमने लगा। घूमते-घूमते वह बादल विशाल गोला बन गया। उसके भीतर गुरुत्वाकर्षण से अकूत दबाव पैदा हो गया जिसके कारण गोले के गर्भ का तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। वह धधक उठा, धधक कर जैसे परमाणु भट्टी बन गया।
आग का वह धधकता गोला हमारा तारा यानी हमारा सूर्य बन गया। उसके चारों ओर का पदार्थ चट्टानों में बदल गया। उन चट्टानों और धूल के कणों से ग्रहों के गोले बन गए और सूरज के परिवार यानी सौरमंडल में शामिल हो गए- पथरीले ग्रह बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल। बृहस्पति, यूरेनस, नेपच्यून विशाल गैसों के गोले ही रह गए। सौरमंडल के सीमांत पर प्लूटो और कुछ अन्य ठोस बौने ग्रह बन गए।
लेकिन, जीवन का वरदान मिला सूरज के परिवार के इस तीसरे ग्रह यानी हमारी पृथ्वी को। सौरमंडल के बाकी ग्रहों में तो न कोई तितली उड़ती है, न कोयल कूकती है।
सूर्य से सही दूरी पर घूम रही तपती आदि पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी हुई। सुदूर, ठंडे, अंधेरे अंतरिक्ष से आने वाले उल्का पिंड और धूमकेतु धरती पर बर्फ लाए। पृथ्वी के चारों ओर वायुमंडल की परत बन गई। तब उसमें नाइट्रोजन ही ज्यादा थी। आज की तरह आॅक्सीजन नहीं थी। फिर उल्काओं, धूमकेतुओं के साथ आई बर्फ पिघली। ऊबड़-खाबड़ धरती में सागर और झीलें बन गईं। सूरज की गर्मी से धरती का पानी भाप बन कर उड़ता। आसमान में पहंुचता। बादल बनते। गरजते-बरसते बादल धरती पर वर्षा की झड़ी लगा देते। धरती ने पानी सोखा। नदी-नाले बन गए। नदियां पानी लेकर सागरों में समाईं। पृथ्वी की छिलके जैसी मोटी परत टूट कर सात विशाल महाद्वीपों में बदल गई। पांच महासागर बन गए।
वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस तो थी ही, मीथेन और शायद अमोनिया गैस भी रही होगी। बहुत कम मात्रा में शायद दूसरी गैसें भी रही होंगी। उनके मिलने से कार्बनिक रसायन बने होंगे। वे वर्षा और बहते पानी के साथ सागरों में पहुंचे। वहां उनके अणु आपस में जुड़े होंगे। कई बड़े अणु बने और टूटे होंगे। और, फिर कभी संयोग से कोई ऐसा अणु बन गया होगा जिसने कुछ दूसरे छोटे अणुओं को अपने-आप में जोड़ लिया होगा। वह महा अणु टूटा होगा तो उसके टुकड़ों में भी वही विशेषता आ गई होगी- दूसरे अणुओं से जुड़ कर अपनी तरह के अणुओं को जन्म देना। इस तरह पृथ्वी पर जीवन पैदा हो गया। पहले एक कोशिका वाले जीव बने। आगे चल कर अनेक कोशिकाओं वाले जीव बने। किसी कोशिका में हरे रंग के कण बन गए। उससे वनस्पतियों का विकास हुआ। पृथ्वी पर जीवन की बगिया लहलहा उठी। हम भाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म इस अनोखी धरती पर हुआ। इसीलिए यह धरती मां कहलाती है।
कितनी अनोखी है हमारी प्यारी पृथ्वी? सूर्य से यह लगभग 14 करोड़ 86 लाख किलोमीटर दूर है। इसकेे गोले का व्यास करीब 12,756 किलोमीटर है। अपनी धुरी पर यह थोड़ा तिरछी खड़ी है जिसके कारण इस पर ऋतुएं होती हैं। आज भी बाहर से ऊबड़-खाबड़ और कठोर दिखाई देने वाली हमारी पृथ्वी भीतर से बहुत गर्म और गुंधे आटे की तरह पिलपिली है। बाहर से कड़ी परत है, उसके नीचे मोटी, पिलपिली मेंटल परत, उसके भीतर कोर या क्रोड़। पृथ्वी के गोले के बिलकुल भीतर गुठली की तरह धातुओं की कठोर परत। कोर या क्रोड़ का तापमान 5,000 से 7,000 डिग्री सेल्सियस तक आंका गया है।
हम ठोस धरती पर रहते हैं मगर सच्चाई यह है कि इसकी 71 प्रतिशत सतह पानी से ढकी हुई है। अंतरिक्ष से कभी कोई एलियन आया तो वह इसे पानी का ग्रह समझेगा! इसमें से 97 प्रतिशत पानी सागरों में भरा हुआ है। 2.2 प्रतिशत पानी ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है। केवल एक प्रतिशत से भी कम पीने लायक पानी है।

आसमान में सूरज। दो-तिहाई पृथ्वी में सागरों का लहराता पानी। नदियां, झील, तालाब। और, मां प्रकृति की हरी-भरी गोद। सबके लिए। बस इसी में जीना, इसी में मरना। सभी जीव कार्बन यौगिकों से बने हैं। मर-खप कर ये फिर प्रकृति में मिल जाते हैं। इसी में नए जीवन का जन्म होता है। चर-अचर सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही है प्रकृति में जीवन का गठबंधन। यही है हमारा पर्यावरण।
इसी मेें पेड़-पौधों की लगभग 3,50,000 जातियां जी रही हैं। इसी में करीब एक करोड़ 10 लाख प्राणियों व सूक्ष्मजीवों का जीवन पनप रहा है। प्रकृति की पूंजी है- धूप, धरती, हवा, पानी और भोजन। प्रकृति सभी जीवों को जीने के लिए यही देती है। अगर कोई जीव अपने हिस्से से ज्यादा लेता है या प्रकृति की पूंजी का दुरूपयोग करता है तो दूसरे जीवों को उसे भुगतना पड़ता है। मनुष्य ने यही किया है। जंगल काट कर लाखों जीवों का घर उजाड़ दिया है। उनका जीवन संकट में डाल दिया है।
हमारे कई हमसफर पृथ्वी से विदा होकर अब केवल किताबों में रह गए हैं। जरा सोचिए, हमारा चीता कहां है? माॅरीशस का सीधा-सादा पक्षी ‘डोडो’ केवल अंग्रेजी के ‘डेड एज डोडो’ मुहावरे में शेष रह गया है। शेर, बाघ, हाथी, गेंडे और बड़ी संख्या में दुर्लभ जीव-जातियां संकट में हैं। पृथ्वी पर जीवन की हलचल को बनाए रखने के लिए हमें इन जीवों की रक्षा करनी होगी तभी यह प्यारी और निराली धरती कहलाएगी।
बताइए पक्षी कहां जाएं? जंगल के जीव कहां रहें? हमारी सभ्यता के विकास के साथ-साथ जंगल कटते गए। शहर बढ़ते गए। जीवों के घर उजड़ते गए। कल-कारखानों, फैक्ट्रियों, मोटर-कारों ने हवा में जहरीला धुआं उगल कर उसे दूषित कर दिया है। शहरों में हवा सांस लेने लायक नहीं रही। हवा में हर रोज लाखों टन विषैला धुआं घुल रहा है। विषैली गैस कार्बन डाइआक्साइड के बढ़ने से गर्मी बढ़ती जा रही है क्योंकि इसकी परत आसमान से गर्मी को पृथ्वी की ओर वापस भेज देती है। यही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ यानी वैश्विक तपन है। इस कारण कल ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी। नदियों में बाढ़ आएगी। सागरों में पानी बढ़ेगा और सागरतटों के शहर डूब जाएंगे।
घरों और कल-कारखानों से निकली गंदगी और कीटनाशकों ने पानी को पीने लायक नहीं रहने दिया है। पानी में ज़हर घुल रहा है। मछलियों और पानी में रहने वाले लाखों जीवों का जीवन संकट में पड़ गया है। स्वयं आदमी के लिए पीने के पानी की भारी कमी हो गई है।
आदमी की अपनी करतूतों ने प्रकृति के कारोबार को बुरी तरह बिगाड़ दिया है। स्वयं हमारे लिए और हमारे लाखों साथी जीवों के लिए पृथ्वी पर जीना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है। अगर अब भी हम पेड़ों से प्यार नहीं करेंगे, जंगलों की हरियाली नहीं बढ़ाएंगे, हवा में धुएं का, धरती और पानी में विषैले रसायनों का जहर घोलना बंद नहीं करेंगे तो तमाम जीव नष्ट हो जाएंगे। तब यह पृथ्वी रहने लायक नहीं रहेगी।
जब यह पृथ्वी ही रहने लायक नहीं रहेगी तो कल हम और बाकी जीव कहां रहेंगे? दूसरे किसी ग्रह में तो जीने लायक वातावरण है नहीं। इसलिए हमें प्रकृति का साथ देना चाहिए तभी प्रकृति हमें भी जीने देगी। यह पृथ्वी आने वाले बच्चों की तमाम पीढ़ियों की अमानत है।
कवि राजेश जोशी की कविता ‘बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता’ की पंक्तियां याद आती हैं जिसमें बच्चों ने नीले आसमान बनाए। सूरज, चांद, सितारे बनाए। पहाड़, नदियां, झरने, मकान, सड़कें, पुल, बसें, स्कूटर, कारें बनाईं। साइकिल चलाते और पैदल चलते लोग भी बनाए। और, तब संवेदनशील कवि कहता है:

चीजों को बनाते चले जाने के उत्साह में
इतना ज्यादा भर गया चित्र
कि गेंद को रखने की कोई जगह ही
नहीं बची चित्र में
तब समझ आया उन्हें
कि बड़ों ने कैसी-कैसी गलतियां की हैं
इस दुनिया को बनाने में!
(राजेश जोशी)

सचमुच यही हुआ है हमारी इस धरती के साथ। कविता में बच्चे अपने चित्रों में प्रकारांतर से वही सब चित्रित कर रहे हैं जो हमने इस धरती के साथ किया है। विकास के नाम पर हमने इसका चप्पा-चप्पा अपने निर्माणों से भर दिया है और धीरे-धीरे अब इसमें कुछ बनाने, रखने की जगह ही नहीं बचेगी। विकास के नाम पर धरती पर विनाश हो रहा है। हम पृथ्वी मां के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। फिर भी अगर आज हम इसमें रह रहे हैं तो दुनिया में कुछ लोग हैं जिनके कारण यह पृथ्वी बची हुई है। कवि भगवत रावत के शब्दों में:
इस पृथ्वी पर कहीं न कहीं कुछ न कुछ लोग हैं जरूर
जो इस पृथ्वी को अपनी पीठ पर
कच्छपों की तरह धारण किए हुए हैं
बचाए हुए हैं उसे
अपने ही नरक में डूबने से
(भगवत रावत)

 

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