हरियल आ गए

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रसोई की खिड़की के सामने नई-नवेली पत्तियों से ढके कुसिम के पेड़ पर आज फिर पीले पैरों वाले हरियल आ बैठे। हरे, लजीले, शरमीले हरियल। कुछ दिन पहले पीछे लान के किनारे जामुन और हरसिंगार की पत्तियों की छांव में बैठे थे। सार्थक और शिशिर भाग कर आए और पूछा, ‘नाना जी, नाना जी, हमने बाहर पेड़ में हरे कबूतर देखे!’

हरियल हारिल, हारीत या हारीतक भी कहलाते हैं। ये कबूतर जैसे दिखाई देते हैं क्योंकि कबूतरों और फाख्ताओं के बिरादर हैं। अक्सर झुंड में रहते हैं और प्रायः पेड़ों पर ही निवास करते हैं। जमीन पर बहुत कम देखे जाते हैं। हरी-पीली पत्तियों के बीच कुछ इतना घुल-मिल जाते हैं कि इन्हें पहचानना कठिन हो जाता है। पीपल, बरगद, अंजीर आदि के पेड़ इन्हें खूब पसंद हैं। वहां पत्तियों की छांव भी मिलती है और सरस फल भी। हरियल रसीले फलों और पत्तियों पर जमा ओस की बूंदों से ही अपनी प्यास भी बुझा लेते हैं। पेड़ों की शाखों पर ही सारा जीवन बिता देने वाले हरियलों के लिए कहा जाता है- ‘गही टेक छूट्यो नहीं, कोटिन करो उपाय/हारित धर पग न धरै, उड़त-फिरत मरि जाय।’

पक्षी वैज्ञानिक इन्हें ट्रेरान फोनिकोप्टेरा कहते हैं। हमारे देश में इनकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं। उनमें से कई के पैर पीले होते हैं तो कुछ का सीना नारंगी रंग का होता है। एक प्रजाति की पूंछ चपटी होती है तो एक और प्रजाति की पूंछ का सिरा सुई जैसा पतला होता है। पोंपादोर हरियल के पैर लाल रंग के होते हैं। बड़े आकार के हरियलों को शाही कबूतर का खिताब दिया गया है।

हरियल पिछले साल भी हमारे आंगन में अमलतास के पेड़ पर आए थे। तब अमलतास पर पीले फूलों की बहार आई हुई 100_4284थी। अमलतास की हरी पत्तियों और पीले फूलों के बीच हरे-पीले हरियलों का जोड़ा बैठा हमारे सीमेंट-कंक्रीट के बने घरों का झांकता रहता था।  मन करता था उन्हें प्यार से पुचकारे, सहलाए लेकिन वे सीधे, शरमीले हरियल दूर शाख पर पत्तियों की छांव में ही आराम करते रहते थे। बिटिया ने शाख पर बैठे हरियलों के उस जोड़े की फोटो खींच ली थी। इस महानगर में भी हरियल हमारे घरों के आसपास आ रहे हैं, क्या यही कम है! आते रहना प्रिय हरियल।

सुंदर और शरमीले, लजीले हरियल प्रकृति की अनुपम देन हैं। शिकारियों ने इनका इतनी निर्ममता से शिकार किया कि अब गिने-चुने हरियल ही दिखाई देते हैं। हमें इन्हें अपना प्यार देना चाहिए ताकि ये हमारी दुनिया को सुंदरता प्रदान करते रहें।

 

 

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