टैगोर का विज्ञान

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गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का वैज्ञानिकों और विज्ञान से बहुत लगाव था। उन्होंने आम लोगों को सरल-सरस भाषा में विज्ञान की जानकारी देने के लिए स्वयं ‘विश्व परिचय’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने इसे अल्मोड़ा के शांत वातावरण में पूरा किया। उनके प्रिय मित्र बोशी सेन उनके साथ थे। ‘श्रीयुत सत्येंद्र नाथ बसु प्रीतिभाजनेषू’ संबोधन के साथ यह पुस्तक उन्होंने प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर सत्येन्द्र नाथ बसु को समर्पित की। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने परमाणु लोक, नक्षत्र लोक, सौर जगत, ग्रह लोक और भूलोक के बारे में विस्तार से लिखा।

वे लिखते हैं, ‘‘ पिताजी के साथ गया था डलहौजी पहाड़। दिन भर घूमने के बाद सांध्यबेला में डाक बंगले में पहुंचते। वहां आंगन में कुर्सी लगा कर बैठते। देखते ही देखते गिरि श्रंगों के घेरे के ऊपर निविड़ नील आकाश के स्वच्छ अंधकार में तारावलि निकट उतर आती। वे मुझे नक्षत्र दिखाते, ग्रह दिखाते। इतना ही नहीं, वे मुझे सूर्य से उनकी प्रदक्षिणा की दूरी, उनके घूमने का समय और अन्य विवरण विस्तार से बताते।’’

उनके भीतर बचपन से ही जड़ और चेतन जगत के प्रति अत्यधिक जिज्ञासा थी। वे प्रकृति के रहस्यों को विज्ञान और कविता दोनों ही के माध्यम से समझना चाहते थे। वे प्रकृति के इन रहस्यों पर अपने समकालीन वैज्ञानिकों से विमर्श किया करते थे। यह जान कर खुशी भी होती है और आश्चर्य भी कि कालजयी कविताओं के महान रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर की विज्ञान में गहरी रूचि थी और अपने समय के अनेक नामी वैज्ञानिकों से भी उनकी घनिष्ठता थी। यह विज्ञान के प्रति उनका प्रेम ही था कि वे आचार्य जगदीश चंद्र बसु, सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाद साहा, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, चंद्रशेखर वेंकटरामन, प्रशांत चंद्र महालनोबिस जैसे भारतीय और अल्बर्ट आइंस्टाइन, वेर्नर कार्ल हीजनबर्ग और आनोल्ड जोहानीज विलहेल्म सोमरफील्ड जैसे प्रसिद्ध विदेशी वैज्ञानिकों के संपर्क में रहे। वे वैज्ञानिक सोच के पक्षधर दार्शनिक व साहित्यकार बर्टेंड रसल से भी मिले। जर्मन भौतिक विज्ञानी सोमरफील्ड और हीजेनबर्ग से उनकी भेंट सन् 1928 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुई थी। हीजेनबर्ग ने उनके साथ आपेक्षिकतावाद जैसे गूढ़ वैज्ञानिक विषय पर चर्चा की थी। हीजेनबर्ग ने तब कहा भी था कि महाकवि के साथ की गई बातचीत से उनको लाभ मिला है।

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टाइन से सन् 1926 से 1930 के बीच टैगोर की चार बार भेंट हुई। इन मुलाकातों में टैगोर की चार बार भेंट हुई। इन मुलाकातों में महाकवि और आइंस्टाइन ने यथार्थ की प्रकृति और विज्ञान व संगीत जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा की।

आचार्य जगदीश चंद्र बसु और टैगोर में घनिष्ठ मित्रता थी। उन्होंने लिखा है: ‘‘जगदीश के सम्पर्क में आने पर मुझे प्रथम बार मित्रता के आनंद का अनुभव हुआ।…कविता से आनंद प्राप्त करने में उनका मस्तिष्क मेरे मस्तिष्क जैसा ही संवेदनशील है।’’

टैगोर ने लिखा है, ‘मेरे कल्पना लोक की सार्थकता तथ्यों की पूर्णता की खोज न करके उनसे प्रसन्नता प्राप्त करने में थी। इसके बावजूद, मेरी धारणा है कि मेरे स्वभाव में आंशिक रूप से ऐसी तार्किकता है जिसे तथ्यों से खेलना पसंद करने के अलावा स्थूल यथार्थ का विश्लेषण प्राप्त करने में आनंद प्राप्त होता है। मेरे मित्र अक्सर कहा करते थे कि मेरी प्रकृति तो एक वैज्ञानिक की है, वैज्ञानिक होने में कमी सिर्फ  यह रह गई है कि मुझे प्रशिक्षण का अवसर नहीं मिला।’

जगदीश चंद्र बसु के अनुसंधान कार्य के लिए टैगोर ने आर्थिक सहायता भी जुटाई। बसु सन् 1901 में जब इंग्लैंड में थे, तब उन्हें पत्र भेज कर राय दी कि वे अपना काम अधूरा छोड़ कर भारत वापस न आएं। टैगोर ने अगरतला जाकर अपने मित्र महाराजा त्रिपुरा से पंद्रह हजार रूपए का दान लेकर यह राशि जगदीश चंद्र बसु को भिजवाई।

टैगोर ने अपने वैज्ञानिक मित्र आचार्य बसु और उनके महत्वपूर्ण प्रयोगों के आधार पर ‘छुई-मुई’  यानी लाजवंती के पौधे पर भी कविताएं लिखीं। जब सन् 1913 में टैगोर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए तो कहते हैं, आचार्य बसु ने उन्हें शुभकामनाओं के साथ छुई-मुई का एक गमला भी भेंट किया था!

यह जानना बहुत रोचक है कि महाकवि टैगोर ने अपनी 13 वर्ष की उम्र में पहली रचना विज्ञान पर लिखी। वह रचना थी, ‘ग्रह आगन जीबेर आबासभूमि’ यानी जीवों की आवास-भूमि ग्रह। उनकी यह रचना सन् 1874 में ‘तत्वबोधिनी पत्रिका’ में छपी थी जिसके संपादक उनके पिता देवेंद्र नाथ टैगोर थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने समय-समय पर पांच पत्रिकाओं का संपादन किया और लोगों को विज्ञान संबंधी लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। ‘बंगदर्शन’ में उन्होंने स्वयं आचार्य जगदीश चंद्र बसु के अनुसंधान कार्य के बारे में लिखा। ‘साधना’ पत्रिका के विज्ञान खंड को वे स्वयं देखते थे। इस पत्रिका में उन्होंने कई वैज्ञानिक लेख लिखे। टैगोर परिवार ने सन् 1885 में बच्चो की पत्रिका ‘बलाका’ निकाली थी। उसमें भी टैगोर ने विज्ञान संबंधी लेख और समाचार लिखे। वे बच्चो को शुरु से ही विज्ञान की शिक्षा देने के लिए पहले उनकी आंखें खोलना और उनके देखने-समझने यानी अवलोकन की शक्ति को बढ़ाना आवश्यक है।

 

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