खिल गए पलाश

 

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ग्रीष्म ऋतु की आहट सुन कर पलाश खिल गए हैं। ढाक, पलाश और टेसू एक ही पेड़ के नाम हैं। संस्कृत में इसे किंशुक कहा गया है जिसका अर्थ शुक या तोता भी होता है। लेकिन, पलाश को किंशुक इसलिए कहा गया है क्योंकि इसके फूलों की पंखुड़ियां तोते की लाल चोंच की तरह होती हैं। पलाश को जंगल की ज्वाला भी कहा जाता है क्योंकि खिल जाने के बाद दूर से देखने पर लगता है जैसे जंगल में आग लगी हो। वनस्पति विज्ञानी इसे ब्यूटिया फ्रांडोसा कहते हैं। लेकिन, ब्यूटिया क्यों? असल में इसका नामकरण अंग्रेज वनस्पति विज्ञानी राक्सवर्ग ने ब्यूट के तीसरे अर्ल जान स्टुअर्ट के सम्मान में किया। और, फ्रांडोसा का अर्थ है पत्तियों से भरा। वनस्पति विज्ञान के पुराने ग्रंथो में इसका यही नाम दिया गया है। लेकिन, अब यह ब्यूटिया मोनोस्पर्मा कहलाता है। मोनोस्पर्मा का अर्थ है ‘एक बीज वाला’, क्योंकि इसके चपटे फली में सिरे के पास केवल एक बीज होता है। यह फूलदार पेड़ हमारे देश भर में पाया जाता है। चटख सिंदूरी फूलों के अलावा कहीं-कहीं चमकीले पीले फूलों वाली प्रजाति भी पाई जाती है। पलाश या ढाक की पत्ती तीन हिस्सों में बंटी होती है। इसीलिए मुहावरा बन गया है ‘ढाक के तीन पात’। इसमें पतझड़ होता है और उत्तरी भारत में जनवरी से मार्च तक ढाक बिना पत्तियों के वसंत के इंतजार में यों ही खड़ा रहता है। वसंत आता है और इसकी कलियों को जगा कर पूरे पेड़ को सुंदर, चटकीले सिंदूरी फूलों से भर देता है। फूल गुच्छों में लगते हैं। विज्ञान लेखक मित्र अरविंद मिश्र ने सूचित किया है कि इस बार सोनभद्र में पलाश नहीं खिले। तब से मन में बहुत दर्द है कि उन तितलियों, भौंरों और अन्य कीट-पतंगों का क्या हुआ होगा जो पलाश के फूलों पर मधु और पराग लेने आते थे, परागण कराते थे और इस तरह पलाश की नई पीढ़ी के जन्म लेने का अनुष्ठान शुरू होता था। इस बार पलाश नहीं खिले तो वे कीट-पतंगे परागण नहीं कर पाएंगे। तब पलाश के बीज कैसे बनेंगे? हर जीवधारी के लिए बड़े संकटों से भरा है यह जीवन। क्या यह भी जलवायु परिर्वतन का ही कोई कारनामा है!

 

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