उन बगुलों की व्यथा कथा

आज हल्द्वानी शहर से दस-बारह किलोमीटर दूर चोरगलिया के एक स्कूल के प्रांगण में बगुलों के 250 अबोध शिशुओं की अकाल मृत्यु की खबर पढ़ कर मन रो पड़ा है। निरीह जीवों के प्रति यह मनुष्य का कैसा निर्मम व्यवहार है? यह दुखद खबर पढ़ कर बिश्नोइयों के हाथों चारा-दाना खाते मृग छौने याद आए। कर्नाटक के कोकराबेलूर गांव के इमली के पेड़ों पर अपनी दुनिया बसाए वे सैकड़ों मेहमान कोकरे यानी पेंटेड स्टार्क याद आए, जिनसे गांव का बच्चा-बच्चा प्यार करता है। गांववासी उनकी देखभाल करते हैं और जरूरत पड़ने पर गांव की पक्षी-डिस्पेंसरी में उनकी मरहम पट्टी भी करते हैं। घोंसलों से गिर पड़े बच्चों को बचाते हैं।

और, दूसरी ओर ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में नेहा लाल चंदानी की यह खबर कि चोरगलिया के उस तथाकथित प्रभात तारा पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल और प्रशासिका ने पाकर का वह हरा-भरा पेड़ ही कटवा डाला जो न जाने कब से उन तमाम सुर्खिया बगुलों उर्फ गाय बगुलों का घर था। जून से अगस्त इन बगुलों का प्रजनन का समय होता है। उन्होंने पाकर के पेड़ पर अपने घोंसलों में इसी ऋतु में अंडे दिए होंगे जिनसे अब बच्चे निकल आए थे। बच्चे भोजन के लिए चिचिया रहे होंगे, उनके माता-पिता बगुले भोजन की तलाश में गए होंगे। लेकिन उसी बीच प्रिंसिपल और प्रशासिका के इशारे पर पाकर धराशायी कर दिया गया। बच्चों सहित वे तमाम घोंसले जमीन पर आ गिरे। कई बच्चे मारे गए, कई चिचियाते यहां-वहां घिसटने लगे। क्रूरता की हद यह कि खबर के अनुसार पेड़ कटवाने के बाद  बगुलों  के यहां-वहां भागते बच्चों को मिट्टी में दबा देने का हुकूम दे दिया। घबराए बच्चों ने घर पहुंच कर यह खबर दी। अभिभावकों ने वन विभाग तक खबर पहुंचाई और अंततः घटना के जिम्मेदार दोनों व्यक्तियों पर बगुलों की संकटग्रस्त प्रजाति को नष्ट करने के एवज में  वन्य जीव संरक्षण कानून की धारा 29 तथा 39 और वृक्ष सुरक्षा अधिनियम की धारा 4 और 10 लगा कर उन्हें न्यायिक हिरासत में सौंप दिया गया।

ये वही बगुले हैं जिन्हें कालीदास ने ‘मेघदूत’ में बलाका कहा है। यक्ष मेघ से कहता है कि हे मित्र, तुम्हें देख कर बलाकाओं को पता लग जाएगा कि गर्भाधान के उत्सव का समय आ गया है और नयनों को सुख देने वाले मित्र मेघ, उनकी पांत तुम्हारे साथ-साथ उड़ चलेगी!

ये वही बगुले हैं जो गांवों में गाय-भैंसों के पैरों के साथ-साथ चल कर अपनी चोंच से हानिकारक कीड़े-मकोड़े पकड़ते रहते हैं और इस तरह खेती को लाभ पहुंचाते हैं। मौका मिलने पर मवेशियों पर सवारी भी कर लेते हैं। सुर्खिया यानी गाय-बगुलों की चोंच पीली होती है। प्रजनन ऋतु में इन सफेद बगुलों का सिर, गर्दन और कंधे नारंगी रंग के हो जाते हैं। इसी रंग के कारण इनका नाम सुर्खिया बगुला पड़ गया है।

मनुष्य और मवेशियों के दोस्त ये बगुले गांव की बस्तियों के आसपास पेड़ों पर घोंसलों की अपनी बस्ती बसा लेते हैं। ये लौट-फिर कर हर साल अपने उन्हीं बसेरों में आते रहते हैं। लेकिन, चोरगलिया के उस पाकर की बस्ती के लुटे-पिटे बगुले अब किस बस्ती में जाकर बसेंगे?

वहां न अब पाकर रहा, न उन सुर्खिया बगुलों का घर, न बच्चे। हताश, निराश, वे किससे गुहार करें? न आंधी आई, न तूफान, इस धरती पर सबसे बुद्धिमान माने जाने वाले प्राणी मनुष्य ने उनकी दुनिया उजाड़ दी।

यहां एक विज्ञान कथा शिद्दत से याद आ रही है जिसमें पृथ्वी पर मनुष्य की करतूतों से सब कुछ खत्म हो चुका है। पृथ्वी का हाल जानने के लिए किसी अन्य ग्रह से एलियन आकर देखते हैं कि एक वीराने में केवल दो जीव बचे हैं। उनमें से एक दो पैरों पर इधर-उधर भाग कर स्वयं को बचा रहा है और दूसरा हवा में उड़ते हुए उस पर चोंच से प्रहार कर रहा है। एलियन गंभीरता से सोचते हैं कि इनमें से किसे बचाया जाए? वे विश्लेषण करते हैं और उस छोटे बुद्धिमान जीव को बचा लेते हैं। ….

 

 

 

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