हमारा मंगल अभियान

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दोस्तो, तुम्हें याद होगा, हमारे देश के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 22 अक्टूबर 2008 को चंद्रमा की खोजबीन करने के लिए ‘चंद्रयान-1’ भेजा था। हमारे उस अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा पर पानी की खोज की। चंद्रमा हमारी पृथ्वी से करीब 3 लाख 84 हजार किलोमीटर दूर है। तुम्हें यह जान कर गर्व होगा कि अब हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक करीब 40 करोड़ किलोमीटर दूर मंगल ग्रह तक अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी कर रहे हैं। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो इसी वर्ष अक्टूबर-नवंबर में मंगल अभियान शुरू हो जाएगा। वैज्ञानिकों का मन है कि चंद्रयान-1 भेजने के ठीक पांच वर्ष बाद मंगलयान भेज दिया जाए।

सच तो यह है दोस्तो कि पिछले 50 वर्षों में हमारे देश ने अंतरिक्ष में ऊंची छलांग लगा कर सफलता का नया इतिहास रचा है। आज रूस, अमेरिका, जापान, चीन और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद भारत विश्व का छठा अंतरिक्ष शक्ति से सम्पन्न देश है।

हमारे देश ने 21 नवंबर 1963 को पहली बार केरल में समुद्रतट के एक गांव थुंबा से एक नन्हा-सा साउंडिंग राकेट छोड़ा था। उसका नाम था, ‘नाइकी, अपाचे’। वह नन्हा राकेट भी हमें अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ ने भेंट किया था। और, केवल 50 वर्ष बाद अब हम मंगल ग्रह तक अपने ही देश में बना अपना अंतरिक्ष यान अपने ही राकेट से भेजने में समर्थ हो चुके हैं। यह हमारे लिए सचमुच बड़े गर्व की बात है। मंगलयान सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहरिकोटा से छोड़ा जाएगा।

जिस तरह दुनिया के कुछ देशों में चंद्रमा तक पहुंचने की होड़ लगी है, उसी तरह वे मंगल ग्रह तक पहुंच कर उसकी खोजबीन करना चाहते हैं। रूस, अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह तक पहुंच चुके हैं। जापान ने भी वर्ष 1988 में अपना अंतरिक्ष यान ‘नोजोमी’ मंगल की और भेजा था लेकिन वह मंगल ग्रह की परिक्रमा नहीं कर पाया। चीन का मंगलयान ‘यिंघुओ-1’ वर्ष 2011 में छोड़ा गया लेकिन वह पृथ्वी की कक्षा के पार नहीं जा पाया। अमेरिका, जापान और चीन अब फिर जल्दी ही अपना अंतरिक्षयान मंगल ग्रह तक भेजने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए यह ठीक ही है कि हमारे वैज्ञानिकों ने भी मंगल अभियान के लिए कमर कस ली है। इस होड़ में आखिर हम क्यों पीछे रहें।

कुछ लोग सोचते हैं, मंगल अभियान पर करोड़ों रूपए फूंकने का क्या फायदा? फायदा यह है कि इससे हमारी वैज्ञानिक प्रगति होती है। नई खोजें की जाती हैं। नई तकनीकों का पता लगता है जिसका धरती पर भी लाभ उठाया जा सकता है। और फिर, कौन जाने हमारा अंतरिक्ष यान मंगल के किस नए रहस्य का पता लगा ले, किस पहेली को सुलझा ले। ऐसी खोज इतिहास में दर्ज हो जाती है। इससे देश का मान-सम्मान बढ़ता है। देश के नागरिकों का सिर गर्व से ऊंचा उठता है। है कि नहीं?

दोस्तो, मंगल ग्रह के पास तक पहुंचने के लिए हमारा मंगलयान लगभग 300 दिन की लंबी यात्रा करेगा। वहां तक पहुंचने के लिए इसे हल्का-फुल्का बनाया गया है। इसका वजन केवल 1350 किलोग्राम है। यह चौकोर यान एलुमिनियम और कार्बन फाइबर से बना है। अंतरिक्ष  वैज्ञानिक इसे ‘मार्स आर्बिटर’ यान कह रहे हैं यानी मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाला अंतरिक्ष यान। बिजली पैदा करने के लिए इसमें बहुत बड़े सौर पैनल लगाए गए हैं। जानते हो क्यों? क्योंकि, मंगल ग्रह सूर्य से करीब 22 करोड़ 80 लाख किलोमीटर दूर है। वहां सूरज की रोशनी काफी कम पहुंचती है। इसलिए सौर पैनल यात्रा की राह में बिजली बनाते रहेंगे जो यान और उपकरणों के काम आएगी।

अंतरिक्ष यान में पांच वैज्ञानिक उपकरण रखे जाएंगे जिन्हें अंतरिक्ष वैज्ञानिक अपनी भाषा में पेलोड कहते हैं। ये उपकरण वहां तरह-तरह की खोजबीन करेंगे। एक उपकरण मंगल के आकाश में ऊपरी वायुमंडल की जांच करेगा तो दूसरा उपकरण यह पता लगाएगा कि वायुमंडल से पानी क्यों गुम हो गया। एक और उपकरण पता लगाएगा कि मंगल ग्रह पर मीथेन गैस कहां से आती है? क्या यह सूक्ष्मजीवों से बनती है या मंगल के भूगर्भ से आती है? अगर ऐसा है तो वहां कैसे बनती है। एक अन्य उपकरण मंगल की भूमि को खनिज तत्वों का पता लगाएगा। अंतरिक्ष यान का कलर कैमरा मंगल ग्रह के दोनों ध्रुवों की बर्फ की टोपी की तस्वीरें खींचेगा। मंगल पर उठने वाले धूल के भयंकर तूफानों की असलियत का भी पता लगाया जाएगा।

धूल के तूफान? हां, दोस्तो मंगल ग्रह पर धूल भरी आंधियां और तूफान आते रहते हैं। तुम सोच रहे होगे, आखिर कैसा है मंगल ग्रह? सूर्य से दूरी के हिसाब से देखें तो यह बुध, शुक्र और पृथ्वी के बाद चैथा ग्रह है। सौरमंडल के आठ ग्रहों में बुध के बाद यही सबसे छोटा ग्रह है। अगर दूर आकाश में इसे गौर से देखोगे तो तुम इसे साफ पहचान सकते हो। क्योंकि, अन्य ग्रह-नक्षत्रों की तुलना में यह नारंगी-लाल रंग का दिखाई देता है।

नारंगी-लाल रंग के कारण प्राचीनकाल में रोम और यूनान के लोगों ने मंगल को युद्ध का देवता मान लिया। हमारी पौराणिक कथाओं में इसे पृथ्वी का पुत्र माना गया है। वैज्ञानिकों ने सच्चाई का पता लगाया और कहा यह भी हमारी पृथ्वी की तरह मिट्टी पत्थर का बना ठोस ग्रह है। पृथ्वी की तरह ही इसमें भी बादल उमड़ते हैं, आंधी-तूफान आते हैं, वहां भी दिन-रात होते हैं और मौसम बदलते हैं। मंगल ग्रह के ध्रुवों पर भी बर्फ की टोपी है। वहां भी पहाड़, मैदान और घाटियां हैं। पृथ्वी की तरह वहां भी ज्वालामुखी के पहाड़ हैं। हमारी पृथ्वी का एक चांद है लेकिन मंगल ग्रह के दो छोटे-छोटे चांद हैंः फोबोस और डीमास।  मंगल का दिन हमारे चैबीस घंटे के दिन से थोड़ा सा बड़ा होता है। वहां का वर्ष हमारे दिनों के हिसाब से 687 दिनों का होता है।

दोस्तो, वैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि अरबों वर्ष पहले मंगल हमारी प्यारी पृथ्वी से और भी अधिक मिलता-जुलता था। आज वहां वायुमंडल बहुत ही हल्का है जिसमें सांस भी नहीं ली जा सकती। लेकिन, तब शायद वहां घना वायुमंडल था और बादल बरसते थे, घनघोर वर्षा होती थी। तब वहां भी नदियां थी, झील-तालाब थे और यहां तक कि शायद सागर भी थे। लेकिन, लाखों-लाख वर्ष बीते और धीरे-धीरे वह सब-कुछ समाप्त हो गया। रह गया केवल रूखा-सूखा आज का मंगल ग्रह।

खगोल वैज्ञानिकों ने जब शुरु-शुरु में दूरबीन से मंगल ग्रह को देखा तो उन्हें वहां आड़ी-तिरछी रेखाएं दिखाई दीं। उन्हें लगा वे नहरें हैं। सोचा, अगर नहरें हैं तो फिर वहां बुद्धिमान जीव भी होंगे। बस, इतना सोचना था कि लेखकों ने मंगल तक कल्पना की उड़ानें भरना शुरु कर दिया। उन्होंने वहां तरह-तरह के जीवों की कल्पना कर ली। प्रसिद्ध कथाकार एच.जी. वेल्स ने मंगल के जीवों के पृथ्वी पर आक्रमण की कल्पना करके ‘वार आॅफ द वल्र्डस्’ उपन्यास लिखा। उसे जब नाटक के रूप में अमेरिका में 30 अक्टूबर 1938 को प्रसारित किया गया तो सुनने वाले हजारों लोग डर कर सड़कों पर निकल आए। उन्हें लगा, मंगलवासियों का सचमुच आक्रमण हो गया है!

यह तो रही नाटक की बात, पर आज तक मंगल ग्रह पर जीवन का पता नहीं लग पाया है।

दोस्तो, वैज्ञानिकों के सामने बड़ी अटकल तो यही है कि मंगल ग्रह पर जीवन है या नहीं? दूसरा रहस्य है कि क्या वहां पानी मौजूद है? और, यह भी कि क्या वहां कल मानव बस सकेगा? मंगल के वायुमंडल में ज्यादातर कार्बन डाइआक्साइड गैस है। थोड़ी-सी नाइट्रोजन और आर्गन गैस है। लेशमात्र जल-वाष्प है। जरा सोचो, ऐसे वायुमंडल में भला कौन सांस ले सकता है? इसलिए यह पता लगाना जरूरी है कि वहां क्या हुआ, कैसे हुआ, क्या वहां कभी जीवन पनपा था, अगर हां तो वह समाप्त कैसे हो गया। सूक्ष्मजीवों के रूप में ही सही क्या वहां आज भी जीवन है? और, यह भी कि अगर हमारी ही करतूतों से पृथ्वी रहने लायक न रही तो क्या हम वहां अपनी बस्तियां बसा सकेंगे?

हमारा मंगलयान ऐसी ही बातों का पता लगाने के लिए मंगल ग्रह की ओर कूच करेगा।

– देवेंद्र मेवाड़ी

 

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