केवल खबर नहीं है डेंगू : देवेंद्र मेवाड़ी

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27 अक्टूबर 2009

अभी देर शाम गुड़गाँव के आर्टमेस अस्पताल से डिस्चार्ज होकर चार दिन बाद घर लौटा हूँ। आते ही, सबसे पहले ‘आर्टमेस’ का अर्थ खोजा। पता लगा, यह यूनानी पौराणिक कथाओं में चंद्रमा की देवी का नाम है। बेहद कमजोरी महसूस कर रहा हूँ, पर तीन-चार दिन पहले जैसा शरीर तोड़ बुखार और बेचैनी थी, अब नहीं है। डॉक्टरों ने डेंगू (वे इसे डेंगी कहते हैं) के शिकंजे से मेरी जान बचा ली है। मेरे लिये भी अब तक तो डेंगू केवल अखबार में छपी खबर था, लेकिन अब अच्छी तरह जानता हूँ कि यह केवल खबर नहीं है। किसी को हो जाये तो जान पर बन आती है। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का डंक जानलेवा भी हो सकता है। न जाने मुझे किस नामकूल मच्छर ने कब और कहाँ डंक मार दिया था।

17 अक्टूबर को दीपावली थी। दिन में लगा बुखार चढ़ रहा है। बहुत प्यास लगी और शरीर में अजीब-सी टूटन के साथ जोड़ों और पेशियों में पीड़ा होने लगी। समझ में नहीं आ रहा था कि हो क्या गया है। 18,19 और 20 अक्टूबर को भी 103 डिग्री फारेनहाइट तक तेज बुखार में तपता रहा। दर्द ऐसा कि पूरा शरीर जैसे किसी ने कपड़े धोने की मुंगरी से पीट दिया हो। नजदीक के डॉक्टर को दिखाया। उन्होंने फीस ली, बुखार की दवा दे दी। लेकिन,  न बुखार घटा, न दर्द कम हुआ। दिल्ली में डेंगू के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसलिये मैं डर रहा था। डॉक्टर से खून की जाँच के लिये कहता रहा, लेकिन वह समझाते रहे पहले दवा तो खाइए, फिर देखेंगे। जब देखा कि बुखार और शरीर का दर्द किसी तरह कम नहीं हो रहा है तब जाकर खून की जाँच के लिये लिखा। 23 तारीख को सुबह जाँच के लिये खून का नमूना दिया। शाम को रिपोर्ट लेने श्रीमती जी गईं। लौट कर बताया, ‘‘रिपोर्ट दिखाई तो डॉक्टर घबराए हुए से लगे। पूछने लगे कि मसूडों से खून तो नहीं आ रहा है? शरीर पर लाल पित्त तो नहीं दिखाई दे रहे हैं। फिर बोले- अगर रात को तबियत ज्यादा खराब हो जाए तो उन्हें अस्पताल ले जाइए।’’ श्रीमती जी हैरान। घबराकर कह आईं, ‘‘आपसे हफ्ते भर से कह रहे थे, खून की जाँच करा दीजिए। अब आप रात में अस्पताल ले जाने की बात कर रहे हैं। कहाँ ले जाऊँगी?’’

खैर, वापस आकर उन्होंने कहा, ‘‘सुनो, अभी अस्पताल चल पड़ते हैं।’’ मैंने पूछा, ‘‘क्यों?’’ तो डॉक्टर की बात बताई। रिपोर्ट देखी तो मैं भी सकते में आ गया। मेरे खून में प्लेटलेट संख्या 1.50-4.0 लाख से घट कर केवल 22,000 रह गई थी। यह खतरनाक स्थिति थी।

हमने बेटी और दामाद को फोन किया। वे भागे आए। श्रीमती जी, बेटी मानसी और दामाद राहुल के साथ अस्पताल जाने की तैयारी की। लेकिन, कहाँ और किस अस्पताल में जाएँ? राहुल ने इसी बीच गुड़गाँव में बहू सोनिया से बात की तो उसने बिना समय बर्बाद किए, फौरन सैक्टर-51 के आर्टमेस अस्पताल की ओर आने की राय दी। आर्टमेस? मैं चौंका था। चलो, अर्थ बाद में खोज लूँगा।….

हम ऑर्टमेस की ओर भागे। रास्ते में सोनिया मिल गई। वह ऑर्टमेस में ले गई। डॉक्टर रमन अभि से फोन पर पहले ही बात कर चुकी थी। वह सैर छोड़ कर ट्रैक सूट में ही अस्पताल आ गये। मुझे इमर्जेंसी में भेज कर खून का नमूना लिया और फिर ‘इन पेशेंट’ के रूप में अस्पताल में भर्ती करके दूसरी मंजिल पर वार्ड नंबर 2502 में भेज दिया। नर्सों ने हाथ में फटाफट नली जोड़ कर स्टैंड में टंगी बोतल से ग्लूकोज का घोल ड्रिप कराना शुरू कर दिया। वे कभी खून का नमूना ले जातीं और कभी रक्तदाब व शरीर का तापमान मापतीं।

इस बीच कई परीक्षण किए गये- खून का परीक्षण, मूत्र का परीक्षण, मलेरिया परीक्षण (थिक एंड थिन स्मियर टेस्ट), यकृत क्रियाशीलता, वृक्कीय (रीनल) क्रियाशीलता, टाइफी डॉट, डेंगी एनएस1, एंटिजन कैप्चर टेस्ट, क्रॉस मैंचिंग, आटोमेटेड प्लेटलेट काउंट, ए बी ओ टाइपिंग, आर एच टाइपिंग आदि।

राहुल ने प्लेटलेट चढ़ाने के लिये रात में रक्तदान किया। सौभाग्य से उसका और मेरा रक्त ग्रुप एकसमान यानी ‘ए प्लस’ निकला।

कम्प्यूटर से मिले परीक्षणों के परिणाम से पता चलाः रक्त ग्रुप ‘ए’ टाइप, आर एच पॉजिटिव, प्लेटलेट संख्या 20000, मलेरिया एंटिजन निगेटिव (प्लाज्मोडियम वाइवैक्स तथा प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरम दोनों के लिये)। डेंगू एनएस1 एंटिजन कैप्चर टेस्ट भी निगेटिव निकला, लेकिन इस हिदायत के साथ कि एनएस1 एंटिजन असंरचनात्मक प्रोटीन है जिसे डेंगू की गंभीर अवस्था का सूचक माना जाता है। लेकिन, निगेटिव टेस्ट का मतलब यह नहीं है कि हाल ही में संक्रमण नहीं हुआ। डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप टेस्ट का गुणात्मक परीक्षण है और नमूने में एनएस1 एंटिजन की मात्रा नहीं दर्शाता है। नमूनों के साथ तुलना करने पर डेंगू एनएस1 एजी स्ट्रिप की अतिसंवेदनशीलता से पुष्टि हुई कि आर टी-पी सी आर तथा वायरल कल्चर 92.3 प्रतिशत व 100 प्रतिशत थी। टाइफी डॉट परीक्षण भी निगेटिव था।

टैक्नोलॉजिस्ट ने राय दी कि ‘निगेटिव’ परिणाम से हाल ही में हुए या वर्तमान संक्रमण की संभावना खत्म नहीं हो जाती क्योंकि ‘पॉजिटिविटी’ पर बुखार शुरू होने से लेकर अब तक के समय और मरीज की प्रतिरक्षात्मक क्षमता का असर पड़ता है। इसलिए, यदि अब भी एस. टाइफी संक्रमण का संदेह हो तो 5-7 दिन बाद दूसरा नमूना लेकर उसके पुनः परीक्षण की संस्तुति की जाती है।

सुबह-सुबह मेरे भतीजे यशवंत ने ‘आर्टमेस’ में आकर रक्तदान किया जिससे प्लेटलेट निकाल कर बाद में मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। उसका रक्त ग्रुप भी मेरी तरह ‘ए प्लस’ था।

इतना कुछ करने के बाद भी अगले दिन यानी 24 तारीख को मेरे खून में प्लेटलेट घट कर 18,000 हो गईं। डॉक्टर को शक था कि कहीं तो कुछ है। वह मेरे शरीर पर लाल पित्त खोजते रहे। पूछते रहे कि मसूड़ों से खून तो नहीं निकला। इसके साथ ही उन्होंने किसी प्रयोगशाला से पुनः मेरे खून के नमूने की जाँच कराई। प्लेटलेट चढ़ाने के बाद 25 तारीख को सुबह मेरे खून में प्लेटलेट संख्या बढ़ कर 38,000 हो गई। लेकिन, शाम को लगभग 6 बजे वह फिर घट कर 30,000 हो गई।

प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने पर अब तक छिपे डेंगू के वायरस का पता लग गया। सीरम के एस एस डी ई जी और एस एस डी ई एम परीक्षणों का परिणाम यह रहा-

डेंगू वायरस आईजीएम …….मौजूद है
डेंगू वायरस आई जी जी……..मौजूद है

यानी, प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों प्रकार के डेंगू का संक्रमण है। रिपोर्ट में दी गई टिप्पणी के अनुसारः ‘डेंगू बुखार का वायरस लेविविरडी परिवार का वायरस है। इसके 4 सीरोटाइप हैं। इसका संक्रमण होने पर हल्का बुखार और शरीर में पीड़ा हो सकती है। लेकिन, गंभीर रूप से संक्रमण होने पर हेमोरेजिक यानी रक्तस्रावी बुखार आ सकता है। यह वायरस एडीज ग्रुप के मच्छरों से फैलता है। इस परीक्षण से प्राइमरी और सेकेंडरी संक्रमण का पता लग जाता है। आईजी एम एंटिबॉडी का पता बुखार आने के 3-5 दिन के भीतर लग जाता है। ये 30 से 90 दिन तक मौजूद रहती हैं। कभी-कभी तो आईजीएम पॉजिटिविटी का आठ माह बाद भी पता लगता है। सेकेंडरी संक्रमण में आईजी जी का स्तर बहुत बढ़ जाता है जिसके साथ-साथ आईजी एम का स्तर भी बढ़ा हुआ हो सकता है।

25 तारीख को सुबह मेरा बड़ा भतीजा मदन मोहन भी बंगलुरु के दौरे से लौट आया। आते ही उसने प्लेटलेट निकालने के लिए रक्तदान किया जिसे इमरजेंसी के लिए रख लिया गया।

26 तारीख की सुबह खून की जाँच से पता चला कि प्लेटलेट बढ़ कर 50,000 हो गई हैं। डॉ. रमन अभि ने मुस्कुरा कर कहा, ‘‘अगर प्लेटलेट इसी तरह बढ़ती गईं तो कल डिस्चार्ज कर देंगे। आप फिर घर पर आराम कर सकते हैं।’’

वही हुआ। अगले दिन यानी 27 अक्टूबर की सुबह प्लेटलेट 1,25,000 हो गईं। डॉक्टर ने मेरी जाँच करके इस हिदायत के साथ अस्पताल से छुट्टी देने का निर्देश दे दिया कि घर पर पूरी तरह आराम करें, रोज कम से कम 5 लीटर पानी व अन्य पेय पिएं और औषधियाँ लें।

अस्पताल से डिस्चार्ज होने की औपचारिकताएं पूरी करके बाहर निकला तो शाम ढल रही थी। बाहर खुली हवा में गहरी साँस ली। सामने ‘ऑर्टेमेस’ अस्पताल की भव्य इमारत खड़ी थी। कृतज्ञता के साथ उसकी ओर देखा। उसकी ऊपरी मंजिलों के गहरे रंग के कुछ काँच ढलते सूरज की किरणों से सहसा चमक उठे। नीड़ की ओर लौटते दो-एक पंछी चहचहाए। हवा का एक पुरसुकून ठंडा झौंका मुझे छू कर आगे बढ़ गया। लगा- ‘आह! कितनी सुंदर है हमारी यह दुनिया, जिसमें मैं बच कर वापस लौट आया हूँ!’

3 नवंबर 2009

प्लेटलेट की पहेली

कल शाम 6 बजे डॉ. रमन अभि से मिला। प्लेटलेट संख्या की जाँच के लिये खून का नमूना दिया। आज रिपोर्ट मिल गई है। प्लेटलेट संख्या अब 3,09,000 हो गई है। डॉक्टर की शुभकामनाएं और पुनः प्रतिदिन कम से कम पाँच लीटर पानी पीने की हिदायत लेकर लौट आया हूँ। बेहद कमज़ोर अनुभव कर रहा हूँ, लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि‍ कमजोरी धीरे-धीरे ही दूर होगी।

पुनश्‍च, 3 नवंबर 2009

डेंगू के कारण अठारह दिन से बीमार हूँ। इस बीच जिस चीज की सबसे अधिक चर्चा सुनी वह है- प्लेटलेट। आखिर यह क्या बला है? लेकिन, इसे बला भी कैसे कह सकता हूँ? इसने तो मेरे प्राण बचाने में मदद की। मेरे खून में इनकी कमी हो गई तो पहले राहुल और अगले दिन यशवंत के ताजा दान किए गये खून में से प्लेटलेट निकाल कर मेरे शरीर में चढ़ाई गईं। ग्लूकोज की बोतल उतार कर नर्स ने उसकी जगह प्लेटलेट का सैचेट लगा दिया था। प्लास्टिक के पारदर्शी सैचेट में भरी वह लाल-नारंगी चीज मैंने देखी थी। घट कर 18,000 तक हो गई मेरी प्लेटलेट संख्या को बढ़ाने के लिये मेरे शरीर में इनका ट्रांसफ्यूजन किया गया। तभी से जानने की बड़ी इच्छा है कि आखिर ये हैं क्या?

किताबें और इंटरनेट टटोला तो पता लगा, ये रक्त में पाई जाने वाली सूक्ष्म कणिकाएं हैं। अक्सर हम दो तरह की रक्त कोशिकाओं के ही नाम सुनते हैं- लाल रक्त कोशिकाएं और श्‍वेत रक्त कोशिकाएं। लाल रक्त कोशिकाओं में लाल रंग का हीमोग्लोबिन होता है। ये कोशिकाएं शरीर के हर हिस्से में ऑक्सीजन पहुँचाती हैं। श्‍वेत रक्त कोशिकाएं दुश्मनों से शरीर की रक्षा करती हैं। ये संख्या में तो लाल रक्त कोशिकाओं से कम होती हैं लेकिन इनका आकार उनसे बड़ा होता है। ये रक्त में पहुँचने वाले जीवाणुओं आदि को हड़प कर जाती हैं। इनके अलावा खून में इन से भी छोटी कणिकाएं होती हैं जो प्लेटलेट कहलाती हैं। इनका काम है खून का थक्का जमाना। कहीं कोई काँटा या सुई चुभ जाए या चाकू से कट जाए तो ये फौरन वहाँ खून का थक्का जमा कर उसे बहने से रोक देती हैं। हमारे शरीर में इनकी संख्या आमतौर पर एक माइक्रो लीटर खून में 1,50,000 से 4,00,000 तक होती है।

डॉक्टर ने मेरी पर्ची में रोग का नाम लिखा थाः ‘थ्रोम्बोसाइटोपेनिया’ यानी प्लेटलेटों की संख्या असामान्य रूप से कम। और,  पूछा था, ‘‘क्या हाथ-पैरों में छोटी-छोटी पित्तियां उभरीं? आंखें और चेहरा लाल हुआ? मसूढ़ों से खून तो नहीं निकला?’’ अब पढ़ कर समझ में आ रहा है कि शरीर में प्लेटलेट संख्या कम हो जाने पर ये लक्षण दिखाई देते हैं। पैरों की पिंडलियों से नीचे के भाग में चमड़ी पर तमाम लाल-लाल बिंदियाँ निकल आती हैं। चोट लगने पर चमड़ी लाल पड़ जाती है। मसूढ़ों से खून निकलने लगता है। मल-मूत्र में भी खून आ सकता है। कहीं पर कट-फट जाने से खून मुश्किल से रुकता है। प्लेटलेट 20,000 से कम हो जाने पर आँतों या दिमाग में बिना चोट के भी खून निकल सकता है। यह हालत जानलेवा हो सकती है।

और, मेरी प्लेटलेट संख्या 24 तारीख को 18,000 हो गई थी! प्लेटलेट संख्या 50,000 से कम होने पर लोग डॉक्टर की राय लेकर अस्पताल चले जाते हैं। यह संख्या 20,000 से कम होने पर तो हर हालत अस्पताल में होना चाहिए ताकि डॉक्टर शरीर में प्लेटलेट चढ़ा सकें। पढ़ने पर यह भी पता लगा कि हेपॉरिन जैसी कुछ दवाइयों से भी प्लेटलेट कम हो जाती हैं। कई बार तिल्ली भी प्लेटलेटों को हड़पने लगती हैं। तब तिल्ली को ही आपरेट करके शरीर से बाहर निकाल देते हैं।

डेंगू का प्रकोप होने पर तो प्लेटलेट कम होती ही हैं। कुछ और कारणों का भी पता चला। ये अस्थि मज्जा में बनती हैं। इसलिए अस्थि मज्जा के किसी विकार के कारण भी इनकी संख्या में कमी हो सकती है। ल्यूकेमिया और एचआइवी का संक्रमण होने और शराब अधिक पीने पर भी इनकी संख्या घट सकती है।

फिलहाल तो मुझे संतुलित आहार से अपनी प्लेटलेट संख्या को सामान्य स्तर तक बढ़ाना है। और हाँ, मच्छरों से भी बच कर रहना है।

(‘मेरी विज्ञान डायरी’ आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा से )

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