एक और युद्ध

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खबर है कि सीरिया में सेना ने हथियारों का इस्तेमाल करके निहत्थे लोगों का निर्मम संहार किया है। मारे गए लगभग 1300 लोगों में बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे हैं देश कोई भी हो,  कहीं भी हो, रासायनिक और जैविक हथियार कितना विनाश कर सकते हैं, इसकी एक बानगी पढ़िए मेरी कहानी ‘एक और युद्ध’ में…

इस बात पर वह हैरान था।

लगातार कोशिश करने पर भी नियंत्रण-कक्ष से उसका संपर्क नहीं हो पा रहा था। उसने सोचा, अब तक सूरज चढ़ आया होगा। लगभग 4 बजे प्रातः उसकी बात उनसे हुई थी। नं. 3 ने बताया था कि स्थिति बहुत तनावपूर्ण है। उधर से समझौते की कोई शर्त स्वीकार नहीं की जा रही है और वार्ता विफल होने की पूरी आशंका है। इस सिलसिले में कुछ भी आदेश हो सकते हैं, इसलिए हर समय तैयार रहने की आवश्यकता है। नं. 2 ने बड़ी आशा के साथ कहा था- देखते जाओ, तूफान यों ही गुजर जाएगा मेरे भाई, हर बार की तरह। भारी तनाव का यह कुहासा अपने आप छंट जाएगा और चाहे किसी तरह लेकिन समझौता हो जाएगा। ऐसी तनावपूर्ण स्थिति पहली बार तो है नहीं, इसलिए फिक्र की कोई बात नहीं है। फिर भी पूरी तरह तैयार तो रहना ही है। नं. 4 शायद मन-ही-मन   सहमा हुआ था। उसी ने अंत में कहा था- कुछ नहीं कहा जा सकता है अभी। मैं तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा हूं। पल-पल बदलती हुई स्थिति मेरी तो धड़कनें बढ़ाती जा रही है। खुदा न करे कुछ हो। हमें वार्ता की सफलता की आशा करनी चाहिए दोस्त और खतरे के टलने का इंतजार। तुम नं. 1 के आदेश का इंतजार करते रहो….लेट अस होप फार द बैस्ट। गुडबाई्!

इस व्यक्तिगत मगर गोपनीय बातचीत के बाद अब तक कोई भी संदेश नहीं मिला है। पांच घंटे की उबाऊ प्रतीक्षा उसके लिए असह्य हो उठी। वह मन-ही-मन बुदबुदाया- डैम इट, मैं यहां इस जमींदोज़ तहखाने में क्या इन कंक्रीट की दीवारों से बातें करूं?

उठना भी संभव न था। न जाने कब और कैसा आदेश मिल जाए। उस जमीदोंज तहखाने में उसके सामने संहारक लक्ष्यभेदी प्रक्षेपास्त्रों के बटन चमक रहे थे। सिर्फ अंगुली का हलका-सा दबाव और प्रक्षेपास्त्र दुश्मन देश की ओर चल पड़ेंगे और थोड़ी ही देर बाद भयानक विस्फोट के साथ सब कुछ स्वाहा हो जाएगा- आदमी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, इमारतें, कल-कारखाने सभी। सभ्यता के सभी निशान मिट जाएंगे। जीवन की चहल-पहल में जैसे प्रलय आ जाएगा और फिर मौत का सन्नाटा छा जाएगा- उसने सोचा। सतरंगी रोशनियों की उस झुलसा देने वाली कौंध और विकिरण बिखेरते भीषण गर्जन करते बादलों के विशाल कुकुरमुत्ते को शायद कोई याद रखने वाला भी न बचे।….बस, देखना यह है कि पहल कौन करता है, आदेश किस पहले मिलता है और बटनों पर किसकी अंगुलियां पहले दबती हैं।

उसने अपनी अंगुलियों की ओर देखा और उसे झुरझुरी-सी महसूस हुई। नं.1 का आदेश मिलते ही उसे अपनी अंगुलियां बटनों पर रखनी होंगी।

लेकिन, यह खामोशी!

उसने फिर संपर्क साधने की कोशिश की। रिसीवर में कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी।……

उसे नियंत्रण-कक्ष से लगातार संदेश मिलने चाहिए। फिर यह खामोशी क्यों? उसे पहले आश्चर्य हुआ था, अब वह आशंकित हो उठा। उसने बाहर निकलकर नियंत्रण कक्ष तक जाने का निश्चय किया। सुरक्षा-पोशाक पहनकर उसने आक्सीजन मास्क लगा लिया।

नियंत्रण-कक्ष में पहुंचते ही उसकी चीख निकल गई। मास्क के भीतर उसकी आखें भय और विस्मय से फैल गई। वह बदहवास होकर चीखा- नहीं! लेकिन उसकी आवाज मास्क के भीतर ही घुट गई। नं. 2, नं.3 और नं. 4 तीनों कुर्सियों से गिरकर फर्श पर पड़े थे- निर्जीव। हाथ, छाती व गर्दन को भींचे हुए जैसे अब भी सांस खींचने का प्रयास कर रहे हों। आंखें भयानक रूप से फैली हुई और गर्दन की नसें खिंची हुई। तीनों के शरीर पीले पड़ गए थे। नाक से झागदार खून बह रहा था और बहते हुए रक्त की लकीरें कमरे से दूर तक पहुंच गई थीं। वह अचानक चीखा- बी……बी-एजेंट!

वह अच्छी तरह जानता था कि वे ‘बी-एजेंट’ जीवाणुओं के लक्षण थे। इसका मतलब शत्रु ने आक्रमण कर दिया है, उसने सोचा और उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। शहर का क्या हाल होगा और उसका परिवार! यह विचार आते ही वह बदहवासी में बाहर की ओर दौड़ा। इस अकेले और कटे हुए प्रतिबंधित इलाके से शहर काफी दूर था।

वह कार लेकर सड़क पर निकला।

पेड़ों से घिरी उस लंबी सुनसान सड़क पर यहां-वहां मरे हुए पक्षी पड़े थे। चोंच खोले और अकड़े हुए। कितनी ही गौरेयां, कितने ही जंगली कबूतर। भागती हुई कार से उसे चारों ओर मौत का सन्नाटा लगा। शहर में घुसते ही भय, आशंका और पीड़ा से उसका चेहरा स्याह पड़ गया। उसके सामने सड़क पर लोग औंधे पड़े थे- इधर-उधर चारों ओर। घरों को लौटते हुए लोग, सैर पर निकले हुए लोग, फुटपाथों पर आते-जाते हुए लोग,  कारों में बैठे हुए लोग। चौराहों पर कई कारें आपस में टकराई हुई थीं। सड़क के बीच कई जगहों पर कारें, मोटरगाड़ियां, स्कूटर, साइकिलें अपने सवारों के शवों के साथ पड़ी हुई थीं। कुत्ते और बिल्लियों के शव भी जगह-जगह पड़े हुए थे। आदमी हों या जानवर, सभी के नाक-मुंह से खून बह-बहकर लकीरों में सूख गया था।

किसी तरह बचते-बचाते वह अपने फ्लैट की बहुमंजिली इमारत तक पहुंचा। उसने लिफ्ट का बटन दबाया। लिफ्ट काम कर रही थी। आठवीं मंजिल पर वह अपने फ्लैट में पहुंचा। दरवाजा खुला हुआ था। मास्क में ही सांस रोक-कर वह भीतर घुसा। बच्चा सामने सोफे पर पड़ा था। पत्नी बच्चे के सामने कालीन पर हाथों से गला भींचे हुए पड़ी थी। सोफे में बच्चे की नाक से टपके हुए खून का लाल धब्बा बन गया था। वह चीखा मगर चीख मास्क के भीतर उसके ही कानों से टकराकर खामोश हो गई। अविश्वास से उनकी मृत देहों को घूरता, दुःख और आतंक से थरथराता, वह आंसू बहाता रहा- चुपचाप। फिर अपनी सुरक्षा-पोशाक में ही उन्हें अंतिम बार गले लगकर वह कातर मन से खड़ा हुआ। तभी उसे घुर-घुर-घुर की आवाज सुनाई दी। एयर-कंडीशनर चल रहा था। टेलीविजन भी आन था। उसमें आड़ी-तिरछी रेखाएं कौंध रही थीं। असह्य वेदना के साथ वह कमरे से बाहर निकला। किसी फ्लैट से कोई आवाज नहीं आ रही थी- न कोई हंसी, न कोई किलकारी।

वह दुःख और आतंक से जैसे पागल होकर बाहर निकल आया। बाल नोंचने का उसके हाथ ऊपर उठते और मास्क से टकरा जाते। सहसा कहीं घंटा बजा। वह उस ओर मुड़ा। घड़ी की दूकान में कोई दीवार घड़ी बारह बजा रही थी। वह आगे बढ़ा। दो खूबसूरत युवतियों को देखकर सहसा रूक गया। विक्षिप्त की तरह वह उनकी ओर लपका। मास्क के भीतर से चीखा- तुम…तुम जिंदा हो मेरी तरह? लेकिन उनके गले लग जाने को आतुर उसकी पोशाक में बंद बांहें शीशे की दीवार से टकराई। चीखकर वह ‘शो विडो’ पर लातें मारने लगा। टूटे हुए शीशे के साथ प्लास्टिक के वे सुंदर शरीर जमीन पर गिर पड़े। उनकी आंखों का सूनापन उसे भीतर तक वेध गया।

जीवित आदमी को देखने के लिए तरसता हुआ वह आगे-पीछे इधर-उधर दूकानों में घुसने लगा। दहशत से चीखता एक दूकान से निकलता और दूसरी दूकान में घुस जाता। लेकिन नाक-मुंह से रक्त उगलकर मृत पड़े लोगों, कुत्ते-बिल्लियों और पक्षियों के अलावा उसे कुछ नहीं मिला। घरो और गलियों-सड़कों में लोग प्लेग के चूहों की तरह समाप्त हो गए। शायद किसी को भी संभलने का मौका नहीं मिल पाया था। तब तक खतरे के सायरन चीखते और लोग संभलते, तब तक शायद हवा में जहर घुल चुका था।

वह रुक-रुककर सोचने लगता- जो जहां रहा होगा, वहीं तड़पने लगा होगा और फिर धमनियां फटने से खून उगलते हुए दम तोड़ दिया होगा। घरों, सड़कों,पार्कों, कारखानों, कार्यालयों, स्कूलों, अस्पतालों और दूसरी जगहों में लोगों ने इसी तरह छटपटाकर प्राण दे दिए होंगे। कोई कहीं नहीं बचा होगा। सांस ही मौत बन गई होगी।

बुरी तरह थककर वह जमीन पर बैठ गया और सोचने लगा- वह कहां जाए। मुर्दा महानगर में वह किससे मिले। उसने चारो ओर नजर फेरी- भव्य इमारतें। आदमी के हाथों गढ़ी हुई इमारतें। विश्व के सबसे बुद्धिमान प्राणी के हाथों की कारीगरी। लेकिन अब उनमें कोई नहीं था। कोई भी नहीं- न आदमी, न कुत्ते, न बिल्लियां, न चूहे, न चिड़ियां। उजड़े हुए नीड़ों की नीरवता छाई थी वहां। लेकिन उत्कर्ष पर पहुंची मानव सभ्यता के सभी चिह्न सही-सलामत खड़े थे।

वह धीरे-धीरे संजीदा होने लगा। उसे अहसास हो गया कि उसके अलावा कोई जीवित नहीं है। जीवन पूरी तरह समाप्त हो गया है। शहर कब्रगाह बन गया है।….उसने सोचा, अगर प्रक्षेपास्त्रों के बटन दब गए होते तो दुश्मन के देश मे विध्वंश हो गया होता, लेकिन दुश्मन ने उनकी प्रगति के सभी चिह्नों को बचाकर केवल जीवन समाप्त कर दिया।

सहसा उसे ख्याल आया, उसके मास्क की आक्सीजन अब समाप्त होने वाली होगी!

वह दहशत से भर उठा। वह जीना चाहता था। वह मरना नहीं चाहता था। तेजी से उठकर वह अपने फ्लैट की ओर भागा। आक्सीजन समाप्त होने से पहले वह अपनी पत्नी और बच्चे के पास पहुंच जाना चाहता था। फ्लैट में पहुंचते ही उसने अपनी पत्नी और बच्चे की देह को आगोश में लिया और एक झटके से मास्क खोल दिया।

(‘एक और युद्ध’, मेरे संग्रह ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’ से)

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