अंधविश्वास का अंधकार

प्रख्यात कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर
प्रख्यात कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर

अंधविश्वास के खिलाफ पिछले तीस वर्षों से लड़ाई लड़ रहे नरेंद्र दाभोलकर की आवाज को प्रतिगामी शक्तियों ने खामोश करने की कोशिश की है लेकिन उन्हें नहीं पनता कि दाभोलकर की आवाज हजारों-हजार लोगों की आवाज बन चुकी है। प्रगतिशील विचारों वाले सभी लोग समाज से अंधविश्वास का पाखेड मिटाने की पुरजोर कोशिश करते रहेंगे। इस कोशिश में नरेंद्र दाभोलकर सदा जीवित रहेंगे..

आज विज्ञान का युग है। विज्ञान के तमाम गैजेट हमारे दैनंदिन जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। हम विज्ञान की खोजों तथा आविष्कारों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। फिर भी हमारे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी निर्मूल धारणाओं और अंधविश्वासों से घिरा हुआ है। इनमें अशिक्षित और पढ़े-लिखे दोनों ही प्रकार के लोग शामिल हैं। ये लोग झाड़-फूंक, जादू-टोना और टोटकों से लेकर तरह-तरह के भ्रमों पर विश्वास करते हैं जिसके कारण वे वैज्ञानिक चेतना से दूर हैं। अनेक टी.वी. चैनल भी सामान्य प्राकृतिक घटनाओं की ज्योतिषियों से अवैज्ञानिक व्याख्याएं प्रस्तुत करके अंधविश्वास फैलाने में योगदान दे रहे  हैं।

इसका एक उदाहरण समय-समय पर लगने वाले सूर्य और चंद्रग्रहण भी हैं। 15 जून 2011 को इस सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण लगा था जो एक यादगार और अद्भुत आकाशीय घटना थी। लेकिन, अनेक टी. वी. चैनलों ने ज्योतिषियों को आमंत्रित करके ग्रहण के बारे में अनेक प्रकार के भ्रम फैलाए। सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की इस विशेष स्थिति को समझाने के बजाय अंधविश्वासों को सामने रखा।

ज्योतिषी फलाफल परिणाम बांचने के मोह में प्राचीन ज्योतिषी आर्यभट प्रथम के ‘आर्यभटीय’ ग्रंथ तक का उल्लेख नहीं करते जिसमें ग्रहणों की सटीक व्याख्या की गई है। आर्यभट ने 499 ई. में ही गणना करके बता दिया था कि चंद्र ग्रहण पृथ्वी की छाया और सूर्य ग्रहण चंद्रमा की छाया के कारण लगता है।

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू समाज की उन्नति में वैज्ञानिक प्रवृत्ति को आवश्यक मानते थे। उन्होंने सन् 1958 में संसद में भारत की ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की। किसी देश की संसद द्वारा विज्ञान नीति का प्रस्ताव पारित करने का यह विश्व में पहला उदाहरण था। यह प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए नेहरू ने विज्ञान नीति के उद्देश्यों में देश में वैज्ञानिक वातावरण के निर्माण पर बल दिया था। नेहरू का विचार था कि वैज्ञानिकों को चाहिए, वे प्रयोगशालाओं  को वैज्ञानिक अनुसंधान का मात्र केन्द्र न मानें, बल्कि उनका लक्ष्य यह हो कि जन मानस में वैज्ञानिक दृष्टिकोण लाया जा सके। ऐसा दृष्टिकोण ही उन्नति का मेरुदंड है।

प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान न होने के कारण अंधविश्वासों का जन्म होता है। विज्ञान प्रकृति के इन रहस्यों का पता लगाता है और रहस्य का पता लग जाने पर उससे जुड़ा भ्रम या अंधविश्वास खत्म हो जाना चाहिए। लेकिन, कई बार वैज्ञानिक प्रवृत्ति या वैज्ञानिक सोच की कमी के कारण ऐसा नहीं होता।

हमें समझना चाहिए कि हम अपना भविष्य आप बना सकते हैं, दूर आसमान के तारे या हमारी हथेली पर बनी आड़ी-तिरछी रेखाएं या माथे की लकीरें हमारा भविष्य नहीं बनातीं। भविष्यवाणियां केवल संयोग से काम करती हैं। ये अंधेरे में चलाए गए तीर हैं।

हमारे समाज में कई रीति-रिवाज आज भी केवल परंपरा के नाम पर चल रहे हैं। क्योंकि, वे पहले से चले आ रहे हैं- इसलिए कई लोग अभी भी उन रीति-रिवाजों को मान रहे हैं। आज वे रीति-रिवाज तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसलिए हमें ऐसी मिथ्या मान्यताओं को नहीं मानना चाहिए। इन्हीं मिथ्या मान्यताओं और अंधविश्वासों का परिणाम है कि हमारे ही देश के कुछ राज्यों में हर साल सैकड़ों महिलाएं ‘डायन’ के नाम पर मार दी जाती हैं। कई तांत्रिक आज भी अबोध बच्चों की बलि दे रहे हैं। तमाम लोग आज भी अज्ञानवश बीमारी का इलाज झाड़-फूंक और गंडे-ताबीजों से करवाते हैं। बीमारियां पैदा करने वाले बैक्टीरिया, वाइरस, फफूदियां और पैरासाइट गंडे-ताबीज या झाड़-फूंक को नहीं पहचानते। यह समझना चाहिए कि बीमारी का इलाज केवल औषधियों से हो सकता है जो रोगाणुओं को नष्ट करती हैं। अंधविश्वास के कारण हर साल बड़ी संख्या में मरीज जान से हाथ धो बैठते हैं।

इसी तरह अबोध पशुओं की बलि देकर भी किसी बीमार व्यक्ति की बीमारी का इलाज नहीं हो सकता। बल्कि, पालतू पशु आदमी के विश्वासघात का शिकार हो जाता है। हमें यह भी समझना चाहिए कि जन्मपत्री मिला कर अगर विवाह सफल होता तो आपसी कलह का शिकार होकर इतने जोड़े तलाक न लेते। वास्तु शास्त्र और फेंगसुई का भी कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार नहीं है। समाज में आए दिन किस्मत बदल देने, गड़ा धन दिलाने, सोना-चांदी दुगुना कर देने वाले ढोंगी  बाबा लोगों को ठग रहे हैं। इसका कारण भी वैज्ञानिक प्रवृत्ति की कमी ही है। यदि तार्किक ढंग से सोचा जाए तो समाज में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी।

समाज में वैज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए जरूरी यह है कि हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं। किसी भी घटना या परिघटना के रहस्य को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास करें, उसके बाद ही उस पर विश्वास करें। तभी, समाज में वैज्ञानिक चेतना आएगी और समाज आगे बढ़ेगा।

(देवेंद्र मेवाड़ी)

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