सुनो, ‘मेरी यादों का पहाड़’

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अब भी हैरान हूं यह सोचकर कि क्या किताब भी बोल सकती है? लेकिन विश्वास न करने का भी तो कोई कारण नहीं हो सकता। आप ही बताइए कि स्वयं अपने कानों से किताब की बात सुन कर भी भला कोई अविश्वास कर सकता है?

यही हुआ। न जाने अर्द्ध निद्रा में था, तंद्रा में था या जाग ही रहा था पर इतना तय है कि नींद में तो कतई नहीं था। लेटे-लेटे वह आवाज सुनी। आवाज पलंग से सटी मेरी लिखने की मेज से आ रही थी। ध्यान से सुनने के लिए कान उस ओर लगाए तो पन्नों की फर-फर की आवाज आई। कनखियों से देखा, मेज पर रखी मेरी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ के पन्ने पंखे की हवा से खुल रहे थे।

“मैंने उसकी ओर देख कर ही मन ही मन कहा, हैलो! ”

तभी, कहीं उन्हीं पन्नों के बीच से आवाज आई, “कैसे हो दोस्त?’ मैंने आंखें खोल कर आश्चर्य से इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। “इधर-उधर क्या देख रहे हो, मैं बोल रही हूं, तुम्हारी किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’।” मेरी आंखें खुली रह गईं। मुंह से बस इतना निकला, “तुम? तुम बोल सकती हो? ”

वह बोली, “क्यों नहीं, तुम बोल सकते हो तो मैं भी बोल सकती हूं। वैसे, तुम में और मुझ में फर्क ही क्या है? तुम्हारी ही कहानी तो हूं। बल्कि, तुम्हारी सहचरी हूं, सहेली।”

सुन कर डा. जाकिर हुसैन के लेख ‘पुस्तकें : हमारी अंतरंग सखियां’ की पंक्तियां याद आ गईं।…

‘पुस्तक तो मानो आज मनुष्य की जीवन-सहचरी है। और, बड़ी गजब की सहचरी है यह- बड़ी ही शिष्ट। हम जब और जिस ‘मूड’ में भी पास बुलाएं, यह आ जाती है; सब कुछ साफ-साफ कह देती है, लेकिन बड़ी शिष्टता के साथ। हम बातचीत छेड़ें, तभी वह बोलती है; अनंत काल तक हमारे बुलावे का इंतजार कर सकती है; हमेशा मदद करने को, अपना सर्वस्व देने को तैयार रहती है।’

खिड़की-दरवाजे से आते धुंधले प्रकाश में मैं उसके फर-फर करते पन्नों से आती वह आवाज सुनते-सुनते अनायास ही उसकी बातों में शामिल हो गया। बताता हूं, उससे क्या बातें हुईं…

उसने बड़ी संजीदगी से कहा, “दोस्त, देखती हूं, अक्सर जब भी तुम मेरे पास आते हो, तुम्हें निराश और उदास-सा देखती हूं। ऐसा क्यों? याद है, तुम तो अपनी यादों का यह पहाड़ बचपन से ही मन में लिए-लिए घूम रहे थे। मुझे याद है, 1979 में तुमने पंतनगर में अपनी कलम से इन्हें कागज पर उतारना शुरू किया था? उन यादों को पढ़ कर बाज्यू (पिताजी) कितना खुश हो गए थे, है ना? ”

“हां, लेकिन तुम्हें तो पता है, कितना लंबा समय लगा पाठकों तक मेरी उन यादों को पहुंचने में? ‘मेरा गांवः मेरे लोग’ के रूप में उन्हें पाठकों ने कितने प्यार से पढ़ा था। है ना? असल में उन्हें पढ़ते-पढ़ते वे खुद कहानी से जुड़ जाते और फिर उन्हें यह अपनी कहानी लगने लगती। तभी तो, कहां-कहां से वे तमाम पाठक चिट्ठियां लिख कर और फोन पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते थे। सुनाऊं तुम्हें?” मुझे आज भी याद है- कौसानी से डेविड भाई ने लिखा था, ‘बहुत रुचि से देवेंद्र मेवाड़ी का लेख ‘मेरा गांवः मेरे लोग’ पढ़ रहा हूं। उन्होंने अपने बचपन के संस्मरणों द्वारा पाठकों के लिए बहुत रोचक ढंग से उस ग्रामीण जीवन शैली का वर्णन किया, जो आजकल लगभग पूर्णतः विलीन हो गई है। वास्तव में, स्थानीय सामाजिक इतिहास की दृष्टि से यह एक अमूल्य लेख है।’

हैवलघाटी से विजय जड़धारी ने कुछ इस तरह लिखा था, ‘ देवेंद्र मेवाड़ी भाई ने तो वास्तविक उत्तराखंड का इतना सुंदर चित्रण किया है कि इसको शब्दों में लिखना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। पहाड़ की आज की तो क्या बात कहूं, किंतु तब के पहाड़ की सारी चीजें एवं परिवेश, पर्यावरण खुद बोलने लगता है और बोलता जाता है। और, सुनने वाला कथा की कल्पना या प्रयोजित पात्रों की तरह नहीं, अपितु जिंदा वास्तविक पात्रों के मुख से सुनता जाता है। और, सुनता ही नहीं है अपितु विश्लेषण भी करता है।’

दिल्ली के शंभू प्रसाद शाह के शब्द थे, ‘मेवाड़ी जी ने अपने बचपन के पर्वतीय ग्रामीण परिवेश का जिस तरह से जीवंत चित्रण किया है वह किसी उपन्यास से कम रोचक नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर उनकी तीव्र दृष्टि, उनका निरीक्षण एवं आंचलिक शब्दों का पुट देकर उनका सजीव चित्रण इसे उच्च साहित्यिक स्तर प्रदान करता है। वस्तुतः यह उस समय का ईमानदारी से लिखा गया ऐतिहासिक दस्तावेज है, जिसमें उत्तराखंड का सुदूर स्थित ग्राम्य जीवन सजीव हो चुका है।’ और, अल्मोड़ा के कमल कुमार जोशी ने लिखा, ‘अपने बचपन की छोटी से छोटी घटनाओं तक का जो सजीव और हृदयस्पर्शी विवरण लिखा है वह अद्भुत है, इसके बहाने ही सही अतीत के दर्पण में झांकने और अपने प्रतिबिंबों को ढूंढने का मन बार-बार होता है।’

मैती के कल्याण सिंह रावत ने लिखा था, ‘इन हृदयस्पर्शी संस्मरणों को पढ़ना बेहद रोचक लगता है। उत्तराखंड के गांव की सच्ची तस्वीर, परम्पराएं, गांव की आत्मा, सीधा-साधा ग्रामीण जीवन तथा सबसे बड़ी बात प्रकृति से हमारे अटूट रिश्ते इन संस्मरणों में उकेरे गए हैं। हालांकि देवेंद्र मेवाड़ी जी से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उनकी लेखनी ने दिल छू लिया।’ पिथौरागढ़ के दिनेश भट्ट का तो कहना था कि ‘‘मेरा गांवः मेरे लोग’ पढ़कर ऐसा लगता रहा कि- अरे यह तो मेरी व मेरे गांव की कथा है। इस श्रृंखला ने पहाड़ी गांव, समाज, संस्कृति को पूरा उघाड़ कर प्रस्तुत किया है।’ सुनो दोस्त, रामनगर के दामोदर जोशी ‘देवांशु’ ने लिखा था, ‘हम सब उसी अतीत की उपज हैं, जिसकी गहराई में मेवाड़ी गोते लगाते हैं और अंतर्मन को छू जाने वाले बिंबों द्वारा उसे प्रतिबिंबित करते हैं। हमारी आस्था और संस्कृति के बीज अब वृक्ष बनकर खड़े हैं।’ दिल्ली के देवेंद्र उपाध्याय तो कहते थे कि ‘यह आत्मगाथा हर उस उत्तराखंडी की है जो अपनी माटी से जुड़ा रहा, दूर होकर भी उस माटी से अपने जुड़ाव को अलग नहीं कर पाया।’

और दोस्त, तब लेखमाला के समापन की बात पढ़ कर देहरादून के रमेश चंद्र चौधरी और नैनीताल की डा. उमा पालनी की तरह तमाम पाठकों का मन भर आया था। देवेंद्र उपाध्याय ने तो लिख भी दिया था कि समापन किस्त के साथ पहाड़ की जिंदगी, बचपन की यादों का एक सिलसिला ठहर गया।’…स्वयं संपादक जी ने एस एम एस किया, ‘इस लेखमाला के समापन की सूचना पढ़ कर पाठक सदमे में हैं। हो सकता है, आगे और प्रकाशित करना पड़े।’

दोस्त, मैं भूला नहीं हूं कि तब कितने पाठकों ने फोन पर अपनी भावनाएं व्यक्त करके मेरा उत्साह बढ़ाया था। 30 जुलाई 2009 को दूर खुर्पाताल गांव से हंसा बिष्ट ने फोन पर बताया था, “दाज्यू ‘मेरा गांव मेरे लोग’ जैसा कुछ मैंने अब तक कभी नहीं पढ़ा था, ऐसा अब तक लिखा ही नहीं गया। आप खूब लिखते रहना, हां।” नैनीताल से डा. बटरोही का फोन आया था, ‘बहुत अच्छा लग रहा है यह सब पढ़ कर। तुमने तो बचपन की एक-एक चीज को याद रखा है। इसे लिखते रहो।’ और, उधर पिथौरागढ़ से प्रभात उप्रेती ने कहा था, “अद्भुत शैली में लिखा गया है यह। पहाड़ की संस्कृति का सशक्त चित्रण है।”  डा. शेखर पाठक ने कैलिफोर्निया, अमेरिका से ई-मेल भेजा था,  ‘प्रिय ददा, ‘मेरी यादों का पहाड़’ बहुत अच्छा आ रहा है। दरअसल ये अनुभव सबके पास हो ही नहीं सकते। इन्हें पूरा कर लो। एक पठनीय किताब बनेगी।’

छपने से पहले जब तुम पांडुलिपि थी तो कथाकार नवीन जोशी ने एक रात एस एम एस  भेजा था, ‘इलाहाबाद के एक होटल में इसे पढ़ रहा हूं।…अपना बचपन, गांव, जंगल, जानवर, रिश्ते-नातेदार आंखों के आगे नाच रहे हैं….यह सब अब बीत गया, लगभग खतम हो गया। आपने इसे लिख कर बड़ा जरूरी काम कर दिया है।’

बताओ, इतना प्यार पाठकों का मित्र! मैंने भी ‘मेरा गांवः मेरे लोग’ की किस्तों के समापन पर अपने पाठकों को दिलासा दी थी कि इजू, फिर भेंट होगी। जी रया, भाल ह्वै रया, फिरि मिलुल (जीते रहें, कुशल-मंगल रहे, फिर मिलेंगे)।

शुरू से ही कितना मन था मेरा कि तुम किताब के रूप में छपो और अधिक से अधिक पाठकों के पास तक पहुंचो। मैंने जब पांडुलिपि तैयार की तो उसे ईजा, बाज्यू, नान ददा और नानी भौजी को समर्पित किया। तब नानी भौजी यानी भाभी मां हम लोगों के बीच थीं। सोचता था, किताब छपेगी तो पहली कापी उन्हें भेंट करूंगा और दूसरी कापी पर उनके हस्ताक्षरों के साथ आशीर्वाद लूंगा। लेकिन, नियति को शायद मंजूर नहीं था। जब तक किताब छपी, देर हो चुकी थी। बीमार भाभी मां तब तक सदा के लिए विदा हो चुकी थीं।

जानती हो, पांडुलिपि के रूप में तुम्हें पढ़ कर लखनऊ से कथाकार, संपादक नवीन जोशी ने मुझे चिट्ठी में क्या लिखा था? लिखा था, “आपके संस्मरण अद्भुत, रोचक  और दस्तावेजी हैं- उस पहाड़ के जो अब बहुत कम बचा है। उस देबी के बचपन की बोली-बानी, शब्द, रीति-रिवाज, मुहावरे- लोकोक्तियां, गांव, जंगल, रिश्ते-पेड़-पौधों, पशुओं से भी, सब बदल गए, खत्म हो गए। इसलिए यह एक तरह से उस शानदार अतीत और संस्कृति का संकलन- दस्तावेजीकरण है। यह बात कई लोग स्वीकार कर चुके हैं और बिल्कुल उचित ही।”….

और हां दोस्त,  युवा कथाकार योगेंद्र आहूजा ने लिखा था, “इसे लिख कर आपको जिस मुक्ति का एहसास हुआ होगा, मैं उसकी कल्पना कर सकता हूं। …आपका इतना अनुभव संपन्न बचपन, अपनी जमीन और लोगों से इतनी गहरी संपृक्तता, और आपका अंतरंग गद्य सचमुच सब कुछ रश्क जगाता है। यह उन किताबों में से है जिन्हें पढ़ना नहीं पड़ता। वे अपने को अपने आप पढ़वा लेती हैं। हम जल्दी से जल्दी उन्हें पूरी पढ़ना चाहते हैं लेकिन यह अवचेतन आकांक्षा साथ चलती रहती है कि वह कभी समाप्त न हो।”….

पुरुलिया, पश्चिम बंगाल के निवासी और वरिष्ठ विज्ञान लेखक डा. सुबोध महंती ने भी पांडुलिपि को आद्योपांत पढ़ा और मुझे लिखा, “हालांकि यह आत्मकथात्मक  आख्यान है लेकिन इसका मुख्य पात्र यानी लेखक स्वयं वहां के लोगों, पर्यावरण और प्राणियों के साथ पूरी तरह घुल-मिल गया है। वर्णन इतना प्रभावशाली और मोहक है कि उत्तराखंड के पाठक की आंखों के सामने वहां के निवासियों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, फसलों आदि के चित्र उभरने लगते हैं। वे लोग जो उस क्षेत्र के नहीं हैं, जिनमें मैं भी शामिल हूं, उन्हें भी लेखक के साथ अनायास ही अतीत के उन पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करने का सुअवसर मिल जाता है।”

”अच्छा, तो ये सब मेरे किताब के रूप में छपने से पहले की बातें हैं?”

“हां दोस्त, लेकिन, तुम्हें क्या पता, किताब के रूप में तुम कैसे सामने आईं? जिस तरह पहाड़ के एक सुदूर गांव से आकर जिंदगी के बियाबान में मैंने कदम-दर-कदम किसी तरह अपने लिए राह बनाई, उसी तरह प्रकाशन के दिन का उजाला देखने के लिए तुम भी ऐसे ही कदम-दर-कदम आगे बढ़ीं। मानसी बिटिया के अतीत में ले जाने वाले रेखांकनों से सज-धज कर जब पांडुलिपि तैयार हो गई तो वह मैंने अपने मित्र पद्मश्री शेखर (पाठक) को भेजी। वे 2011 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में प्रख्यात पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट जी की पुस्तक ‘पर्वत-पर्वत बस्ती-बस्ती’ के लोकार्पण समारोह में मिले। बोले, “देवेनदा, ‘मेरी यादों का पहाड़’ नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया को दूंगा ताकि यह बृहत पाठक वर्ग तक पहुंच सके और वे उत्तराखंड की संस्कृति से आत्मीय रूप से जुड़ सकें।”

“अच्छा, तो फिर क्या हुआ?”

“दो दिन बाद शेखर का फोन मिला, ‘रास्ते में हूं, नैनीताल वापस जा रहा हूं। ‘मेरी यादों का पहाड़़’ की पांडुलिपि नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया के अध्यक्ष को सौंप आया हूं और उन्हें बता आया हूं कि यह पांडुलिपि उत्तराखंड की जड़ों से हमारा परिचय कराती है।”

“दोस्त, बहुत दिनों तक कोई उत्तर नहीं आया। मैं मायूस हो चला था कि एक दिन अचानक नेशनल बुक ट्रस्ट का पत्र मिला। लिखा था, ‘आपके द्वारा लिखित पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ प्रकाशनार्थ स्वीकृत की गई है, डा. ललित मंडोरा।’ मेरी खुशी का तुम अनुमान लगा सकती हो। मैंने पांडुलिपि को तैयार करने में अपनी जिंदगी निचोड़ कर रख दी थी। उन्हें तुरंत आभार की मेल भेजी। और फिर, तुम्हारे छपने का इंतजार करने लगा। महीना-दर-महीना समय बीता। मैं संशय में उतराता रहा कि क्या हुआ होगा ‘मेरी यादों का पहाड़ का’ कि एक दिन एक अनजान व्यक्ति का फोन आया, ”आप देवेंद्र मेवाड़ी बोल रहे हैं? ”

“जी हां, आपको नमस्कार करता हूं।”

“नमस्कार मैं करता हूं सर, मैं बिपिन बोल रहा हूं।”

“बिपिन? कहां से?”

“मुनीरका से। जे एन यू से पढ़ाई पूरी की है। पीएच.डी. करके नौकरी तलाश रहा हूं। मैंने आपकी पांडुलिपि पढ़ी ‘मेरी यादों का पहाड़’। नेशनल बुक ट्रस्ट ने दी है। यह किताब मुझे बहुत अच्छी लगी, इसलिए आपको फोन कर रहा हूं। इसे पढ़ते-पढ़ते कई जगह बहुत भावुक हो गया।”

“आभारी हूं बिपिन जी।” कह कर फोन रखा। आशा बंधी कि ‘मेरी यादों का पहाड़’ प्रगति पर है। फिर वर्ष के सबसे छोटे दिन यानी 21 दिसंबर को एक बड़ा काम हुआ। डा. मंडोरा ने बुलाया। कलाकार के साथ ‘मेरी यादों का पहाड़’ के कवर का डिजायन पूरा किया। और, फिर बेस्रबी से किताब के छपने का इंतजार शुरू। इंतजार पूरा हुआ। नए वर्ष में 25 फरवरी को, जब डा. मंडोरा का फोन आया ‘मेरी यादों का पहाड़’ छप गई है। लेखकीय प्रतियां ले सकते हैं।” लक्ष्मी और मैं भागे हुए गए और उनसे नवजात शिशु की तरह तुम्हें अपने हाथों में लिया, माथे से लगाया। तुम प्रकाशित हो गईं।

वर्षों पहले ‘मेरी यादों का पहाड़’ लिखने की शुरुआत मित्र शेखर पाठक के साथ बातचीत से हुई थी इसलिए तुम्हारी पहली प्रकाशित प्रति शेखर को भेजी। फिर मेरे युवा उत्साही मित्र चंदन डांगी तुम्हारी प्रतियां मेरी कथा शैली के रसिक पाठकों तक पहुंचाने में जुट गए। दिल्ली से लेकर लखनऊ, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत, देहरादून और गोरखपुर जैसे शहरों और कई गांव-कस्बों से कई प्रेमी पाठकों ने फेसबुक पर लिख कर तथा फोन करके तुम्हारे बारे में बताया और अब भी बता रहे हैं। उनकी बातें पढ़ता हूं, सुनता हूं और कृतज्ञता से भर उठता हूं।

“और सुनो, तुम्हारी छपी हुई प्रति मिली तो प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी जी का फोन आया, ‘बहुत अच्छी लगी मुझे आपकी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’। आपने बहुत अच्छा लिखा है। मानसी ने भी अपने चित्रों में पहाड़ के जीवन को जीवंत बना दिया है।’ नैनीताल में डा. बटरोही ने तुम्हें पढ़ा और ‘समयांतर’ मासिक के पुस्तक समीक्षा विशेषांक, जून 2013 में तुम्हारे बारे में लिखा, “एक अंतरंग समाज की पुनर्रचनाः अनपढ़ मां के पास अपनी संतानों को देने के लिए भोर की किरण से लेकर रात के अंधेरे तक हर पल कठोर धरती से जूझती हुई कठिन जिंदगी और लोक-विश्वासों, किस्से-कहानियों की संपदा के अलावा अधिक कुछ नहीं है… और बच्चों के पास उस सीमित भौगोलिक परिवेश में देखे गए ब्रह्मांड से भी विराट सपने हैं…जो जिंदगी का लगभग असंभव फलक लगता है, मगर लेखक अपने असाधारण किस्सागो-शिल्प के द्वारा अपने निजी अनुभवों को इस तरह एक आम पहाड़ी बच्चे के अनुभव बना देता है कि प्रकृति और उसके बीच अपनी जगह तलाशता, इस धरती पर आया हुआ हर संवेदनशील व्यक्ति उन सवालों के साथ उसी उसी तीव्रता के साथ जूझने लगता है। यही नहीं, लेखक के जीवन के इस इतिवृत्त को पढ़ने के बाद उसके पिता, मां, बहिन और भाई उसके नहीं रहते, वे और उनका समूचा संसार उसके समाज के प्रतिनिधि बन जाते हैं… निजी अस्मिताओं का सामाजिक अस्मिता में इस प्रकार विलय हो जाता है कि पाठक स्वयं को उस परंपरागत भारतीय समाज का हिस्सा अनुभव करने लगता है, जिसमें व्यक्ति-इकाई के लिए कोई स्वतंत्र जगह नहीं थी…

लेखक की आत्मकथा के रूप में शुरू हुआ यह विवरण पाठक को जल्दी ही अपनी आत्मकथा अनुभव होने लगता है। हालांकि लेखक ने विवरण में जिस भाषा और कथन-भंगिमा का इस्तेमाल किया है, वह भी नितांत निजी और स्थानीय है, मगर किताब पूरी करते-करते यह अहसास पुख्ता हो जाता है कि यह यात्रा सिर्फ उसकी ‘निजी’ नहीं है… पाठक इसके जरिए एक वृहत्तर (कुमाउंनी) समाज और परिवेश की अधिक प्रामाणिक यात्रा करने का अहसास करने लगता है।

‘मेरी यादों का पहाड़’ लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की आत्मकथात्मक स्मृतियां हैं, लेकिन वे सिर्फ इतनी ही नहीं हैं, एक ऐसे समाज की प्रेरक स्मृतियां हैं जो अपने भोलेपन, वचन-बद्धता और प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव के लिए जाना जाता रहा है। यह परंपरा अब बहुत तेजी से अतीत बनती जा रही है, काफी हद तक बन ही चुकी है; देवेंद्र मेवाड़ी ने उन्हें उनके मूल रूप में सुरक्षित रखा है, यह इस किताब का उल्लेखनीय योगदान है। किताब की एक अन्य अपूर्व विशेषता यह भी है कि यह पहाड़ी समाज का उसके चारों ओर फैली प्रकृति के साथ किया गया सनातन संवाद है… प्रकृति के साथ उसके रिश्तों का बारहमासा है।”…और भी बहुत कुछ…..

‘दैनिक हिंदुस्तान’ में धर्मेंद्र सुशांत ने तुम्हें ‘आत्मा में रचा-बसा पहाड़’ बताते हुए लिखा, ‘इसमें अपने गांव-घर के संस्मरणों को इतनी आत्मीयता से संजोया है कि पूरा उत्तराखंडी पहाड़ी ग्राम्य जीवन इसमें जीवंत हो उठा है। खेत-खलिहान, नदी-नाले, गीत-किस्से, पंछी-पखेरू…इतनी चीजों का इसमें जिक्र है कि कोई आम शहराती इंसान यह देख कर ही चकरा सकता है कि व्यक्ति के जीवन में इतनी चीजें शामिल होती थीं। इसमें किस्सागोई जबरदस्त है और पहाड़ी बोली-बानी की भरपूर सुगंध इसे अतिरिक्त विशिष्टता प्रदान करती है।”…

जब तुम किताब के रूप में पाठकों के हाथ में पहुंचती गई तो उनकी बात भी मुझ तक पहुंचने लगी। जानती हो, वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु ने तुम्हारे बारे में क्या लिखा है? सुनो, उन्होंने लिखा है, ‘ ‘मेरी यादों का पहाड़’ ने दिल को छुआ और हमेशा के लिए मेरी साथी हो गई। मटियानी जी के बाद पहली बार पहाड़ पर लिखी चीजों ने मुझे इतने भीतर तक और इतने विश्वसनीय ढंग से छुआ…जिसमें जरा भी बनावट नहीं, जरा भी कोई मुलम्मा नहीं और न अपने को बड़ा बनाने और कुछ खास साबित करने की कोशिश। मां, पिता, बड़े भाई, गांव के सीधे-सादे लगते अनपढ़, मगर दिल से बड़े, बहुत बड़े लोग..सब आपकी कलम से उतरकर मेरे भीतर आ गए और अब हमेशा-हमेशा के लिए मेरी स्मृतियों में रहेंगे। विज्ञान पर लिखी आपकी बहुत अलग-सी और उम्दा चीजें पढ़ी थीं, जिनके बहुत अद्भुत जीवनियों और देवी दा से जुड़े अनुभूतिपरक लेख सब मुझे प्रिय हैं और सबसे बढ़कर ‘फसलों की कहानी’। पर आप ‘मेरी यादों का पहाड़’ भी लिखेंगे और इस कदर मर्म को छू लेंगे, सच्ची कहूं मेवाड़ी जी, मैंने इसकी कल्पना नहीं की थी। यह कल्पनातीत है और अद्भुत। ऐसी बढ़िया और मन की संवेदना से छलछलाती किताब, जिसे मैं हमेशा अपने साथ रखूंगा।’

और सुनो, जाने-माने कथाकार-उपन्यासकार एस. आर. हरनोट ने शिमला से लिखा है, ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ़ते हुए लगता रहा कि मैं अपने गांव, वहां के सुख-दुख, वहां की अनूठी प्रकृति, नदियां, झरने, खेत-खलिहान, देवी-देवता, मेले-त्योहार और हरे-भरे जंगलों के मध्य विचर रहा हूं। जिन लोगों ने गांव और पहाड़ महज पर्यटन करके देखे हैं उनके लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण होगी।’

मित्र सुभाष लखेड़ा ने लिखा है, ‘उत्तराखंड के लोगों के जीवन में विगत सात दशकों के दौरान जो परिवर्तन हुए हैं, यदि आप उनको गहराई से बूझना-समझना चाहते हैं तो श्री देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ इस कार्य में आपकी सहज सहायता कर सकती है। भले ही यह पुस्तक उत्तराखंड के एक क्षेत्र विशेष को पृष्ठभूमि बनाकर लिखी गयी है किंतु पूरे भारत के गांव-कस्बों में हो रहे बदलावों को भी इस पुस्तक के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है। इस पुस्तक को यद्यपि बातचीत ( कथा ) शैली में लिखा गया है किंतु इसे कुछ अर्थों में एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी कहा जा सकता है। पुस्तक में नैतिकता को लेकर कोई प्रवचन मौजूद नहीं हैं किंतु हमारी युवा पीढ़ी इस पुस्तक से यह प्रेरणा ले सकती है कि हम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने जीवन को कैसे संवार सकते हैं। पुस्तक में लेखक कहीं भी किसी को कोई निदेश, उपदेश देते नजर नहीं आते हैं। मजेदार बात यह है कि इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते आप स्वयं यह महसूस करने लगते हैं कि परिश्रम, अनवरत लगन और विवेक से समस्याओं का निराकरण किया जा सकता है।’

“चलो मित्र, इस कथा के कुछ और रसिक पाठकों की लिखी बातें तुम्हें सुना दूं। सुन रही हो? ”

“हां, सुन रही हूं। किसे जिज्ञासा नहीं होगी, अनजान लोगों से अपने बारे में सुनने की? ”

“नहीं, नहीं, वे पहले भले ही अनजान थे लेकिन तुम्हें पढ़ने के बाद तुम्हारे आत्मीय हो गए हैं। याद रखना इन्हें।”

“आजीवन याद रखूंगी।”

“तो सुनो, सुदूर लंदन से साहित्यकार डा. तारा चंद्र त्रिपाठी ने तुम्हारे बारे में लिखा हैः ‘ ‘मेरी यादों का पहाड़’ ने अपना बचपन याद दिला दिया। पढ़ना आरम्भ क्या किया कि बार-बार पत्नी की डांट सहनी पड़ी। रात के बारह बज गए हैं, ऐसी क्या किताब मिल गई है कि न खुद सो रहे हो और न मुझे सोने दे रहे हो। मानसी के रेखाचित्रों ने तो आपकी रचना को और भी जीवंत बना दिया है। जी रया, जागि रया।’

“और, किताब मिली तो कौसानी, अल्मोड़ा से डेविड भाई ने ई-मेल किया, ‘ मैंने ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ़ना शुरू किया, फिर किसी को पढ़ने को किताब दे दी थी। राधा बहन भट्ट को भी इसे पढ़ने में आनंद आया। मैं इसकी एक प्रति उनकी बहन देवी को भेजने की कोशिश कर रहा हूं जो इस समय नार्वे में है। प्रेमा पढ़ लेगी तो मैं फिर इसे आगे पढ़ूंगा। आपको पता है, जब यह ‘नैनीताल समाचार’ में ‘मेरा गांवः मेरे लोग’ के रूप में छपी थी तो मुझे बहुत अच्छी लगी थी। किताब में रेखांकन शब्दों की शानदार संगत दे रहे हैं। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो ये रेखांकन शायद आपकी बेटी ने बनाए हैं। उसे बताइएगा कि उसने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है।’

1“लो, चंपावत के भगवत पांडे जी ने तो फेसबुक पर ‘मेरी यादों का पहाड’ पढ़ते हुए अपना शानदार फोटो खिंचवा कर यह लिखा है, ‘ पहाड़ की पहाड़ जैसी जिंदगी के खट्टे-मीठे अनुभवों की यादों का पहाड़।….लेखक ने अपने घर आंगन से लेकर लिखने-पढ़ने, रहन-सहन, रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज, पर्व-त्यौहार, खेत-खलिहान, जीव-जंतुओं तक सभी को याद किया है। अपने बचपन का नटखटपन, भोलापन, जिज्ञासुपन, सब कुछ है। ईजा (मां) के प्यार-दुलार की ममतामयी यादों की एक लंबी फेहरिस्त है। अपनी मां के निधन का मार्मिक वर्णन ‘ओ ईजा’ पढ़ने वाले की आंखें नम कर देता है तो जंगल में मंगल उसे हंसाता और गुद्गुदाता है।’

“सुनो, इसका मतलब तो यह है कि मुझे लोग पढ़ रहे हैं? ”

“ठीक कह रही हो मित्र। कई लोग तो मुझे फोन पर भी बताते रहते हैं कि वे ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ़ रहे हैं। लेकिन, कुछ और लोगों ने यही बात फेसबुक पर लिख कर बताई है।”

राकेश तिवारी ने लिखा है, “हम सभी प्रवासियों की यादों में पहाड़ है, भले ही हम सबकी यादों का पहाड़ अलग-अलग हो…मेवाड़ी जी की पुस्तक इस लिहाज से भी पढ़नी है कि कहां-कहां वह पहाड़ हम सबको जोड़ता है, कहां-कहां एक-सी हूक होती है, कहां-कहां हम पहाड़ में बिताए उन दिनों की स्मृतियों में, एक स्वर में रोना चाहते हैं पर रो नहीं पाते …।” हेम पंत लिख रहे हैं, ‘ ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ रहा हूं। ऐसा लग रहा है जैसे अपना बचपन दोबारा जी रहा हूं।’ दयाल पांडे का कहना है, ‘मैंने पढ़ ली है, बहुत रोचक है। हर कहानी में लगा मुझे कि ये तो मेरी यादों का पहाड़ भी है।’

अच्छा लो, अब मानसी की बात भी सुन लो। हालांकि, उसने तो अपने रेखांकनों से तुम में नई जान डाल दी थी लेकिन शब्दों में भी उसने अपनी बात कही है। लिखा है, ‘हम सबको इस पुस्तक का इंतजार था। इसे लिखने से भी पहले से लेकर प्रिंट होकर हाथ में आने तक का आपका सफर…सिर्फ सफर नहीं, इमोशनल सफर देखा है जो इसे और भी खास बना देता है। आपकी यादों का पिटारा अब सिर्फ आपके लिए ही खास नहीं है, उन सब के लिए है जो इसे पढ़ कर हर वह मनोभाव महसूस कर पाएंगे….और इस किताब से जुड़ जाएंगे, हमेशा के लिए। यादों का पुनर्जन्म मुबारक हो!’

प्रसिद्ध लेखिका और ‘नंदन’ की कार्यकारी संपादक क्षमा शर्मा, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में जनसंचार के प्रोफेसर डा. गोविंद सिंह, हिंदी अकादमी, दिल्ली के सचिव डा. हरिसुमन बिष्ट, ‘कादंबिनी’ के कार्यकारी संपादक राजीव कटारा, ‘अमर उजाला’ के वरिष्ठ पत्रकार कल्लोल चक्रवर्ती, कथाकार महेश दर्पण, बाल साहित्यकार रमेश तैलंग, रिटायर्ड अरण्यपाल जे. एस. मेहता, भंडारी दम्पती और कई अन्य लोगों का भी फोन आया है कि वे तुम्हें पढ़ रहे हैं।

अरे हां, इसी 31 जुलाई को जब मुझे अपने मोबाइल फोन में कोयल की कुहू, कुहू सुनाई दी तो मैं समझ गया कि कोई एस एम एस संदेश आया है। देखा, संदेश में लिखा था, ‘प्रेमचंद जयंती के अवसर पर रामगढ़ में ‘मेरी यादों का पहाड़’ की चर्चा सुन कर अच्छा लग रहा है। संतोष मिश्र।’ मैं चौंका, कैसी चर्चा? कौन कर रहा है? सोच ही रहा था कि दो दिन बाद फेसबुक की वाल पर एम बी डिग्री कालेज, हल्द्वानी के डा. संतोष मिश्र की टिप्पणी दिखी, ‘ महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा आयोजित ‘प्रेमचंद जयंती’ के अवसर पर डॉ. दीपा कांडपाल ने ‘मेरी यादों का पहाड़’ की चर्चा करते हुए कहा कि इस पुस्तक को जब भी पढ़ती हूं-मुझे अपनी कहानी लगती है। इसलिए बार-बार पढ़ने का मन करता है…जन रुचि और पठनीयता का संकट वहां नहीं है..।’

लेकिन दोस्त, हैरान तो तब रह गया, जब फेसबुक पर प्रख्यात लेखक, उपन्यासकार डा. रमेश उपाध्याय की यह पंक्ति दिखाई दी, ‘मैंने पढ़ी है यह किताब…और सच कहूं तो भाई मेवाड़ी जी से ईर्ष्या हुई कि ऐसी किताब मैं क्यों नहीं लिख पाया!’

बताओ, अब क्या कहूं? उनके स्नेह ने मुझे चुप कर दिया है और मैं संकोच से गड़ा जा रहा हूं। इसलिए दोस्त, अभी बस इतना ही। प्रेमी पाठकों ने कुछ और लिखा या कहा तो फिर किसी दिन बताऊंगा। ठीक है?

‘अं’ की हुंकारी सुनाई दी। और फिर ‘मेरी यादों का पहाड़’ भी मेज पर आराम करने लगी।

– (देवेंद्र मेवाड़ी)

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