बारिश में पहाड़

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घाटियों से उठता कोहरा 

बारिश के मौसम में पहाड़ जाने की बात सुन कर कुछ मित्रों ने आशंकित होकर कहा कि पहाड़ और इस मौसम में? क्या पता कर लिया है कि वहां वर्षा कितनी हो रही है? और, यह भी कि क्या इस समय वहां जाना जरूरी है?

उन्हें बताया कि हां वहां जाना जरूरी है क्योंकि भाभी मां को इस धरती से विदा हुए साल भर पूरा हो रहा है और उनके बड़े बेटे मदन मोहन ने तभी तय कर लिया था कि मां की पहली पुण्यतिथि पर उनका पहला स्मृति दिवस अपने गांव में मनाएंगे-  गांव कालाआगर, जिला-नैनीताल में।

वही गांव कालाआगर जहां लगभग 58 वर्ष पहले ददा चौदह वर्षीय भाभी मां को ब्याह कर लाए थे। वहीं गांव जहां उन्होंने विवाह के बाद वधू के रूप में एक नए अनजान घर में पहली बार कदम रखा था, जहां के पानी के स्रोत के पास उन नव विवाहित वर-वधू के मुकुट रखे गए थे, और जहां से वे तांबे के कलश में अपने इस नए घर के लिए पहली बार पानी भर कर लाई थीं। वहीं गांव, जहां से उस पार दूर उनके मायके के मंदिर के बांज-देवदार के पेड़ दिखाई देते थे। और वही गांव, जहां से ठीक सामने के पहाड़ पर उस ओखलकांडा गांव के माचिस की डिबिया जैसे सफेद चमकते मकान दिखाई देते थे जहां उनके पति पढ़ाते थे। मोहन का मन था, वहीं बिरादरों, इष्ट-मित्रों के बीच मां का पहला स्मृति दिवस मनाएंगे।

संभावना थी कि स्मृति दिवस की तिथि शायद जून में पड़ेगी लेकिन पता लगा तिथि 12 जुलाई है। इस वर्ष बारिश जून मध्य से ही शुरु हो गई और उत्तराखंड के कई इलाकों में घनघोर वर्षा ने भारी तबाही भी मचा दी। जुलाई के पहले सप्ताह में भारी बारिश की भविष्यवाणी की जाती रही। नैनीताल जिले में भी भारी वर्षा का अंदेशा था। पर जो भी हो, स्मृति दिवस गांव में ही मनाना था। गांव में जैंतुवा भया (भाई) से बात हो गई। राशन-पानी और साग-सब्जियां दो दिन पहले हल्द्वानी मंडी से खरीदने की व्यवस्था कर दी गई। जैंतुवा ने बता ही दिया था, “द ददा, अगाश (आकाश) का क्या पता? चौमास के दिन हैं, झुरमुर-झुरमुर बारिश तो होती ही रहती है, बाकी कौन जाने कब बरस जाएं बादल। यह तो अगाश ही जानता है। हां, लकड़ी-ईंधन के लिए आदमी जंगल गए हुए हैं और पानी की कोई फिकर नहीं, घर के पास तक आया हुआ है पानी।”

और, हम 10 जुलाई 2013 को अल-सुबह 5.30 बजे गांव को रवाना हो गए। दिल्ली-गुड़गांव से गाजियाबाद, मुरादाबाद, रामपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, भीमताल, धारी, धानाचूली, ओखलकांडा, खनस्यूं, गरगड़ी होते हुए 380 किलोमीटर दूर अपने गांव कालाआगर पहुंचे। रास्ते भर आसमान में बादल तो थे लेकिन बीच-बीच में धूप-छांव का खेल चलता रहा। गौला नदी में साफ-सुकीला जल कल-कल, छल-छल बह रहा था। चारों ओर पहाड़ों-घाटियों में कोहरा छुपन-छुपाई खेल रहा था। कभी अचानक घिर उठता और फिर देखते ही देखते गायब हो जाता। रास्ते भर जगह-जगह पानी के सोते फूट चुके थे और ऊंचे पहाड़ों से झरनों में छल-छल उछलता-कूदता पानी नीचे गधेरों (नालों) की ओर भाग रहा था। ओखलकांडा और करायल के बीच चीड़ वन में ऐसे ही एक छल-छलाते झरने पर हमने अपनी गाड़ियों को स्नान कराया। रास्ते भर कहीं मोटर रोड पर ऊपर पहाड़ की गोद से छिटक कर छोटी-बड़ी चट्टानें आ गिरी थीं, कहीं मलबा गिरा था, लेकिन, गाड़ियों के निकलने लायक जगह मिलती रही।

घर पहुंचे तो शाम के 7 बज चुके थे। पश्चिम के पहाड़ों पर छाए श्वेत बादलों के बीच से सूरज नीचे पहाड़ों में बसे गांवों पर धूप की सर्च लाइट फैंक रहा था। लाल-भूरे पड़ते बादलों के पीछे ज्यों-ज्यों सूरज ढलता गया, चारों ओर अंधेरा घिरने लगा। दूर पहाड़ों पर बसे गांवों में बिजली की बत्ती जलते ही सैकड़ों दीए से जगमगाने लगे। हम घर के आगे आंगन की मेंड पर बैठे चारों ओर का नजारा देखते रहे। बच्चे आंगन में खेलते रहे और अपने आसपास अचानक दिप-दिप चमकती-बुझती नन्ही रोशनी के बिंदु देख कर चिल्लाए, “ये क्या है?” दिल्ली-गुड़गांव में पले-बढ़े बच्चों ने चौमास के इस मौसम में आज पहली बार जुगनू देखे थे। कुछ देर बाद ऊपर साफ आसमान में एक-एक कर तारे निकल आए। तारे इत्ते सारे! हमारे सामने बाईं ओर के आकाश में तमाम तारों के बीच सप्तर्षि के तारे चमक रहे थे। सप्तर्षि से अगले दो तारों की सीध में उत्तरी आसमान पर धु्रुवतारा चमकने लगा। ठींग के धूरे के ऊपर दक्षिणी आकाश में सुंदर वृश्चिक तारामंडल पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। और, हमारे सिर ऊपर दाईं ओर के आकाश में दूधिया छटा बिखेरती आकाशगंगा फैली हुई थी।

बहू-बेटियां रसोई में लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाने मेुं जुटी हुई थीं और हम मन ही मन मना रहे थे कि हे आसमान, अगले दो-तीन दिन इसी तरह साफ रहना। बीच-बीच में मोहन स्मृति दिवस की व्यवस्थाओं का जायजा लेता रहा। पता लगा, हल्द्वानी मंडी से आज राशन-पानी और साग-पात पहुंच गया है। गांव के लोग जंगल से ईंधन की लकड़ियां ला चुके हैं। कालाआगर-क्वैराला, गाजा, नैंथन, ककोड़ और अन्य गांवों में इष्ट-मित्रों तक स्मृति-दिवस का न्यौता पहुंच चुका है। करीबी रिश्तेदारों का कल से आना शुरु हो जाएगा, बाकी न्योतार 12 जुलाई को आएंगे।

थके-मांदे थे, खाना खा कर सो गए। सोते समय आसमान साफ था। बस, पूर्व में कलियाधूरा और छिंडारी के ऊंचे पहाड़ों के पीछे से घना सफेद-भूरा बादल उठ रहा था। लेकिन, रात में अचानक बादलों की तेज गड़गड़ाहट और रह-रह कर कौंधती बिजली की आसमान गुंजाती कड़कड़ाहट से नींद खुल गई। त्वां-त्वां-त्वां, तड़-तड़-तड़ की आवाजों के साथ तेज पानी बरस रहा था। मन धक्क से रह गया। इतनी बारिश? कल-परसों क्या होगा? बारिश की उस झड़ी में कभी नींद खुलती, कभी आ जाती।

सुबह बारिश धीरे-धीरे कम होने लगी। बंद हो गई तो नीचे घाटियों से घना कोहरा उठने लगा जो कभी पूरे गलनी गांव और ठींग के धूरे के पहाड़ को ढक लेता तो कुछ देर बाद वहां से गायब हो जाता। कभी दूसरी ओर गरगड़ी गांव की धार से बढ़ता हुआ कैड़ागांव और कानला से होता हुआ हमारी ओर दौड़ा चला आता। उसकी यह दौड़-भाग तब बंद हुई जब सूरज ने गांव के सीढ़ीदार खेतों और धारों पर धूप की  चादर फैला दी।

मैं कैमरा लेकर अपने खेतों की ओर निकल गया जिनमें जैंतुवा भया ने मक्का की फसल बोई हुई थी। रात में बारिश की असेट-बसेट और हुंकारती हवा के झौंकों ने मक्का की खड़ी फसल को खेतों में लिटा दिया था। मुझे पता था, दड़ घाम (तेज धूप) लगने पर मक्का के पौधे धीरे-धीरे खुद उठ खड़े होंगे। मुझे देख कर मनु और पल्लवी भी खेत में चले आए। पथरीले रास्ते के किनारे पेड़ों की फुनगियों पर चहकती बुलबुलें एक-दूसरे का पीछा कर रही थीं और झाड़ियों में मुश्या चड़ियां मतलब बैबलर यहां वहां फुदक रही थीं। कभी कोई मुश्या चड़ी किसी शाख पर बैठ कर सीटी-सी मीठी आवाज में गाने लगती थी।

हम नीचे उतर कर प्राइमरी पाठशाला के पास आए। छोटे-छोटे 30-40 बच्चे स्कूल यूनीफार्म में कतार में प्रार्थना के लिए खड़े थे। टीचर दीदी सामने खड़ी थी। तिरसेठ वर्ष पहले सन् 1950 में इसी स्कूल में मैं भी दाखिल हुआ था। मैं भी इन बच्चों की तरह कतार में खड़ा होकर ‘हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हम को दीजिए’ प्रार्थना गाता था।

बच्चों से बातचीत
बच्चों से बातचीत

बच्चों की प्रार्थना पूरी हुई। मैं स्कूल से हेड मास्टर गोपाल सिंह जी से मिला। मैंने टीचर दीदी से कहा, ‘मैं भी इसी स्कूल का विद्यार्थी रहा हूं। क्या मैं इन बच्चों से बात कर सकता हूं?’ वे श्रीमती सरिता दीदी थीं। उन्होंने खुश होकर आज्ञा दे दी। मैंने बच्चों से खूब बातें कीं। उन्हें बताया, जब मैं पढ़ता था तब स्कूल की यह इमारत नहीं थी। यहां एक झोपड़ी थी। हम उसी में पढ़ते थे। फिर यह इमारत बनी। चटाइयां आईं। हमने तब लकड़ी की काली पाटी यानी तख्ती में नरकुल की कलम और कमेट से लिखना सीखा। पूरे स्कूल में हमारे साथ केवल एक लड़की पढ़ती थी- क्वैराला गांव की सरली। आज इतनी सारी बच्चियों को स्कूल में पढ़ते हुए देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मैंने उन बच्चों की कविताएं सुनीं और उन्हें अपनी कविता सुनाई। स्कूल के सभी बच्चों के पास बस्ते थे, पेन-पेंसिल और कापियां थीं। वे पाटी-दवात नहीं पहचानते थे। मैंने उनसे कहा- शरमाओ, सकुचाओ नहीं, अपनी बात कहना सीखो। पढ़-लिख कर कल तुम्हें अपने माता-पिता, अपने गांव और देश का नाम रौशन करना है।

घर लौट कर नाश्ता किया। शहर से छोटे बच्चे नूडल्स ले आए थे। सोनिया ने बच्चों के लिए उनका नाश्ता तैयार कर दिया। गांव-घर के बच्चों ने भी बड़े कुतूहल से वह नूडल-नाश्ता किया। जैंतुवा भया की गाय ब्याई थी। उसका पहला गरमा-गरम दूध यानी बिगौत भी कुछ लोगों ने स्वाद के साथ पिया। मैंने अपने कैमरे से छत और दुदिल की शाख पर बैठी घुघुती यानी फाख्ते की तस्वीरें लीं। फिर पहाड़ी काले कव्वे, काली चड़ी यानी ड्रैंगो, गौरेयों और करौलों व लमपुछिया मतलब ब्लू मैगपाई की तस्वीरें खींचने की कोशिश की।

चट्टान के पास पान सिंह
चट्टान के पास पान सिंह

बहुत दिनों से मन में एक जिज्ञासा थी। आइरिश मूल के अंग्रेज शिकारी, प्रकृति प्रेमी और लेखक पीटर बायर्ने की किताब ‘शिकारी साहिब’ जब से पढ़ी थी, लगातार लगता रहा कि किताब में जो जगह बताई और फोटो में जो चट्टान दिखाई गई है, वहां कार्बेट ने चौगढ़ की आदमखोर बाघिन को नहीं मारा था। पीटर बायर्ने ने लिखा है कि बंगले का बूढ़ा चौकीदार और कालाआगर का एक ग्रामीण पान सिंह मेवाड़ी उन्हें उस स्थान पर ले गए जहां कार्बेट का बाघिन से सामना हुआ था। लेकिन, कार्बेट ने अपनी किताब ‘मैन ईटर्स आफ कुमाऊं’ में बाघिन को मारने की जो जगह बताई है, वह यह नहीं हो सकती। कार्बेट के जीवनी लेखक मार्टिन बूथ ने भी ‘कार्पेट साहिब’ किताब में यह जगह नहीं बताई है।

सोचा, क्यों न भतीजे पान सिंह मेवाड़ी से इस बारे में बात करूं। उसके पिताजी जोध्यदा मतलब जोध सिंह मेवाड़ी जी स्वयं अच्छे शिकारी थे। उनके द्वारा मारा गया एक विशाल बाघ बचपन में मैंने भी देखा था। मैं पत्नी लक्ष्मी और बेटे मनु के साथ पानसिंह से मिलने गया। पान सिंह घर पर ही मिल गया। बातों-बातों में अंग्रेज पीटर बायर्ने के बारे में पूछा तो उसने कहा, “हां, एक अंग्रेज आया तो था कुछ साल पहले। पूछने लगा, गांव का प्रधान कौन है? तब मेरी बहू प्रधान थी। मैंने कहा, वह तो बाहर गई हुई है। मुझे बताइए क्या काम है? उनके साथ दुभाषिया था जो हमारी बातचीत करा रहा था। उन्होंने कहा, जहां जिम कार्बेट ने आदमखोर बाघिन को मारा था, वहां तक हमारे साथ चल दोगे? मैंने कहा, क्यों नहीं चल दूंगा, आप उतनी दूर से आए हैं- जरूर चलूंगा। उनके साथ जंगलात के डाकबंगले में गया। वहां उन्होंने पुरानी किताबें पढ़ीं। फिर तिरछी सड़क से उस जगह तक गए जिसके बारे में हमने सुन रखा था। वहां उन्हें वह चट्टान दिखाई जिसके नीचे कहते हैं बाघिन बैठी थी और सामने की वह चट्टान भी जिस पर खड़े होकर कार्बेट साब ने बाघिन पर गोली चलाई थी।”

मैंने बेसब्र होकर कहा, “बेटा क्या तुम मेरे साथ भी वहां तक चल सकते हो?” पान सिंह ने कहा, “क्यों नहीं, कहां के उस अंग्रेज के साथ वहां तक गया था, आप तो घर के ही हैं। मैं चलूंगा।” मैंने कहा, “अभी चल सकते हो? ” उसने कहा, “बिल्कुल। चलिए, डाक बंगले से होकर चलते हैं।”

इस बीच बारिश का भी एक झमाझम झोंका आया। चाय पीकर हम पानसिंह के साथ डाक बंगले की ओर चले। रास्ते में हमने गांव के अपने पुश्तैनी धारे पर पानी पिया। पत्थर का वह धारा कभी हमारे पुरखों ने लगाया होगा। चौमास के इस मौसम में उससे छलाछल पानी निकल रहा था। पान सिंह डाक बंगले के चौकीदार जैंत सिंह को भी बुला लाया। डाक बंगले में हमने कार्ड बोर्ड के डिब्बे में रखी, बची-खुची चंद पुरानी, कीड़ों की चट की हुई किताबें देखीं। उनमें से कुछ किताबें सन् 1903 और 1926 में प्रकाशित हुई थीं। वे उपन्यास आदि थे जो कभी दौरे पर आने वाले अंग्रेज शिकारी और जंगलात के अधिकारियों के पढ़ने के लिए रखी गई होंगीं। उनमें जिम कार्बेट का लिखा कुछ भी नहीं था। वह रजिस्टर भी नहीं जिसमें जिम कार्बेट ने अपने आने और जाने की सूचना भरी होगी।

फिर हम ‘मैन ईटर्स आफ कुमाऊं’ में वर्णित जंगल की उस तिरछी कच्ची सड़क से पश्चिम की ओर आगे बढ़े। एक काला कुत्ता हमारा साथी और मार्गदर्शक बन गया। एकाध किलोमीटर चलने के बाद दाईं ओर सड़क के नीचे, नौपलपानी के धारे के ऊपर दो विशाल चट्टानें दिखा कर पान सिंह ने कहा, “वह अंग्रेज साब यहां आया था।” चट्टानें नीचे तीखे ढलान पर थीं और उनके चारों ओर काली बाशिंग की घनी झाड़ियां उग आई थीं। बीच-बीच में कंटीला घिंघारु, किरमोड़ा और सिसुणा यानी बिच्छू बूटी भी। पानसिंह ने मेरी ओर देख कर कहा, “इनमें से निकलना पड़ेगा।” मैंने कहा, “बिल्कुल, निकलना ही है। चट्टान के पास जाना जरूरी है- वहां पर, जहां पर तुम अंग्रेज के साथ गए थे।”

मैंने लक्ष्मी और बेटे से थोड़ा आगे जाकर नीचे की कच्ची सड़क पर चलने को कहा। दोनो हाथों से झाड़ियां हटाते, हम कदम-दर-कदम आगे बढ़े। पानसिंह कहता रहा, “भली कै, भली कै, संभल के हां?” मैं हां-हां कह कर आगे बढ़ता रहा। आसपास ऊंचे सुरई के पेड़ भी खड़े थे। दोनों चट्टानों के बीच बड़े-बड़े पत्थरों का ढांण था जिनके बीच खाली जगह में गलती से पैर पड़ जाए तो बस ‘खप्प’ नीचे। पानसिंह ने हंसते हुए कहा, “इन बड़े-बड़े पत्थरों के कारण ही तो इसे ‘गड़बड़ियाक ढांण’ कहते हैं! कहीं भी गड़बड़ हो जाए तो पत्थरों के बीच सीधे घुस जाएंगे। सांप-कीड़ों का भी डर रहता है।”

खैर हम हाथों से झाड़ियां हटाते, रास्ता बनाते किसी तरह चट्टान तक पहुंच गए। मैंने पान सिंह को चट्टान के पास वहीं खड़ा रहने को कहा, जहां बायर्ने के साथ उसका फोटो खींचा गया था। मैंने ठीक उसी जगह उसका फोटो खींचा। फिर सिसुणे के लंबे तनों से बचते हुए ढांण के पत्थरों पर कूद कर उस खड़ी चट्टान के सामने पहुंचा जहां पान सिह ने बताया था कि जिम कार्बेट ने खड़े होकर बाघिन पर गोली चलाई थी। फोटो खींच कर हम चट्टानों से बाहर निकले और काली बाशिंग के घने भूड़ में से उसी तरह रास्ता बनाते नीचे नौपलपानी के पास की कच्ची सड़क पर निकले। नीचे से मैंने उन चट्टानों को एक बार फिर गौर से देखा और आश्वस्त हुआ कि सचमुच यह वह जगह नहीं जहां जिम कार्बेट ने चौगढ़ की आदमखोर बाघिन को मारा था। वह जगह तो वहां है, जहां पिछली बार मैं अपने भतीजे मदन मोहन और राघवेंद्र के साथ गया था।

यह पता लग जाने के बाद हमने अंजुली में भर कर नौपलपानी के छलछलाते धारे का पानी पिया और घर की ओर लौट चले। घर में खाने के लिए हमारा इंतजार हो रहा था। देर दोपहर खाना खाया। बहुत थक चुके थे। आराम करते रहे। गनीमत यह थी कि अब बारिश नहीं हो रही थी। बिद हो गया था। घने सफेद बादल चारों ओर की पर्वतमालाओं की चोटियों पर लुका-छिपी खेल रहे थे। नीचे गौला घाटी और दाईं-बाईं ओर के गधेरों में कोहरे की मर्जी चल रही थी- चाहता तो कभी घिर आता और न चाहता तो तेजी से भाग कर गायब हो जाता।

पंडित हरीश जी, मोतीराम जी और लीलाधर जी आ चुके थे। पंडित दुर्गादत्त जी को पांच-सात किलोमीटर दूर ड्वाबा गांव से आ जाना था लेकिन वे अब तक पहुंचे नहीं थे। जैंतुवा भया ने बताया, उनका संदेश आया है कि कल रात की घनघोर बारिश में उनके घर के बगल में ही एक मकान मलबे में ढह गया है। घर के 5 लोग उसमें दब गए हैं। उन्हें निकालने का काम चल रहा है। कल फज़र ही पहुंच जाऊंगा।

बारह जुलाई को साढ़े चार बजे उठा। मन ही मन भाभी मां को याद किया। आज उनका दिन था। जिस साफ आसमान ने सोते समय मन में सुकून भर दिया था, सुबह-सुबह उसे लगातार बरसता देख कर मन मायूस हो गया। प्रताप ने रात में ईंधन की लकड़ियां पक्के छप्पर के नीचे चूल्हे के आसपास सुखाई हुई थीं। मुंह अंधेरे पौने पांच बजे वह बारिश में भीगते हुए उनका मुआयना कर रहा था। मैं पाइप में पानी आने का इंतजार ही कर रहा था कि छाता ओढ़े जैंतुवा भया आ गया। उसने पानी की टंकी से पाइप जोड़ दिया और मैंने नहा-धो लिया। उस झामाझम बारिश में ही भतीजा जीवन भी नहा-धोकर तैयार हो गया। मोहन-यशू भी जल्दी ही तैयार हो गए। गनीमत हुई कि सुबह खुलने के साथ-साथ बारिश भी थमती गई। दूर-दूर से न्योंतार आने लगे और उत्साही युवक चाय-पानी और भोजन की रन-फन में जुट गए।

पहाड़ ही पहाड़ ढाई घंटा पैदल चल कर युवा पंडित दुर्गादत्त जी भी पहुंच गए। आते ही उनसे लोगों ने ड्वाबा गांव की भूस्खलन की दुखद घटना के बारे में पूछा। उन्होंने बताया, “जो कुछ होना था, सब कुछ रात में ही हो गया। पता ही नहीं चला। घनघोर बारिश, बादलों की गड़गड़ाट और कड़कती बिजली, उसमें सुनाई भी कैसे देता? वैसे भी रात में तो सभी सोए हुए थे। पड़ोस में हयात राम जी, उनकी पत्नी और तीन बेटियां भी अपने मकान में सोई हुई थीं। उनका बेटा चाचा के यहां सो रहा था। रात में तड़तड़ाती बारिश में ऊपर से पहाड़ फिसला और मकान, उसमें सोए परिवार के पांचों सदस्यों, गाय-बैल और पंद्रह थान बकरियों को दबा दिया। हम सुबह उठे तो बगल में देख कर चौंके कि वहां तो मकान था, वह कहां गया? मलबे ने उसे ऐसे दबा दिया कि लगता ही नहीं था, वहां कुछ था।…खैर, लोगों ने लग-लगा कर मलबे में से शव निकाले। प्रशासन के भी कुछ लोग पहुंचे हैं। देखो क्या होता है। क्या करें पहाड़ में तो यही सब होने वाला हुआ…प्रकृति का कोप है। आस्था घट रही है और प्रकृति का कोप बढ़ रहा है।” दुःखी मन से हम सभी लोगों ने घटना का ब्यौरा सुना।

कुछ देर बाद ‘दुनिया है महराज, क्या करें, सब कुछ चलते रहना हुआ’ कह कर पंडित जी ने भाभी मां की पुण्य तिथि की पूजा शुरु की। सामने उनका फोटो रखा गया। उनके तीनों बेटे और देवर-बेटा मैं सामने बैठे थे। बहुएं, देवरानी, बहू-बेटियां भी साथ थीं। दिवंगत भाभी मां और ददा के साथ ही पड़दादा-पड़दादी तक सभी विदा हो चुके बड़े बुजुर्गों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।

हमारा यही पुश्तैनी घर था जहां से मां ने कभी ददा को पढ़ने के लिए गांव से बाहर भेजा था। इसी घर से बाज्यू घोड़े में महीने भर का राशन-पानी रख कर पहाड़ों को पार करते हुए दूर भीमताल तक ददा की बारी और फीस देने जाते थे। इसी गांव-घर से कभी शिक्षक ददा पांचवीं कक्षा के बाद मुझे पढ़ाने के लिए ले गए थे। ददा और भाभी मां ने न केवल मुझे और अपने बच्चों को पढ़ाया बल्कि पूरे इलाकों के गांवों के कई गरीब बच्चों को पढ़ने की प्रेरणा दी, अपनी छोटी-सी तनखा में से भी पुअर ब्वाइज फंड बना कर कई बच्चों की मदद की। शिक्षा की उस ज्योति को आज उनके बच्चे आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए यह केवल हमारा पुश्तैनी घर ही नहीं, बल्कि सरस्वती का भी निवास स्थान है।…यही सब कुछ याद करते हुए भाभी मां को उनकी पहली पुण्यतिथि पर हम सभी ने विनम्र श्रद्धांजलि दी।

देर दोपहर नीचे घाटी की ओर देखा तो चौंक गया। हें, यह क्या? परसों तो गौला में काफी कम मगर साफ पानी बह रहा था, लेकिन आज वह भूरे-मटमैले रंग के पानी से आर-पार भरी हुई थी। मतलब, दूर गौला के उद्गम मोरनौला और उसके आसपास  की पहाड़ियों पर तेज बारिश हो रही होगी या रात भर हुई होगी। बचपन में छुट्टियों के बाद गांव से उस पार की  पहाड़ी पर ओखलकांडा इंटर कालेज में पढ़ने के  लिए जाते समय हम इसी तरह दूर से देख लेते थे कि कहीं गौला नदी में बाढ़ तो नहीं आ गई? तब गौला पर पुल नहीं था और अनुभवी ग्रामीण तैराक हमारी बांह पकड़ कर तैरते हुए नदी पार कराते थे। शर्त यह रहती थी कि हम दूसरे हाथ से उन्हें नहीं जकड़ेंगे अन्यथा वे हमें उफनती नदी में छोड़ देंगे।

उफनती गौला नदी
उफनती गौला नदी

अब गौला नदी पर पक्का पुल बन चुका है इसलिए उसे पार करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। मैंने बेटे को पास बुला कर इशारा करके दिखाया कि बाढ़ और बिना बाढ़ की नदी में क्या अंतर होता है। कई बार पहाड़ों में नदी पार करते समय ऊपर से अचानक बाढ़ का उफनता-दौड़ता पानी आ जाता है तो उसका सुसाट-भुभाट पहले ही सुनाई देने लगता है। तब नदी पार कर रहे लोग सतर्क हो जाते हैं और तेजी से बाहर निकल आते हैं। कल अल-सुबह दिल्ली को लौटना है। रात बारिश न हो तो बात बने। यही मनाते-मनाते हुए हमारी आंख लग गई।

एक-तार बारिश की झड़ी से साढ़े चार बजे नींद खुल गई। बेटे, पत्नी और भतीजे जीवन को तैयार होने को कहा। जीवन ने बताया सारथी भोला तैयार है। ठीक  साढ़े पांच बजे हम छाते ओढ़ कर नीचे गाड़ी के पास आए। बेटा मोहन और जैंतुवा भया छोड़ने आए। उसी रिमझिम में हमने अपनी वापसी यात्रा शुरू की। हमें क्या पता था कि ऊपर चोटियों पर कितनी बारिश हो रही है और रात में बादल कितना बरस चुके हैं। वह तो आगे कैड़गों के उफनते, गरजते गधेरों को देख कर समझ में आया। मेरे उकसाने पर पहला गधेरा तो किसी तरह पार कर लिया लेकिन दूसरे गधेरे के तेज बहते पानी और आगे के गड्ढे को देख कर उसे पार करने की हिम्मत नहीं हुई। इस बीच गधेरों में पानी बढ़ता गया। बहाव और भी तेज हो गया। मनु और जीवन ने उतर कर गधेरे के पानी में बहाव देखने के लिए कुछ भारी पत्थर फैंके जो पानी की धार के साथ ही बह गए। अब क्या किया जाए? मोहन के साथ मोबाइल पर बात हुई। उसने बताया, इस रूट पर हल्द्वानी तक चलने वाली हेमू की जीप आ रही है। वे देखेंगे और मदद करेंगे।

वे आए और मदद की। जीप में से दो-तीन लोगों ने फटाफट उतर कर पत्थर हटाया, नाले के आगे गड्ढे में पत्थर भरे और हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ने का इशारा किया। किसी तरह हमने वह गधेरा भी पार कर लिया। मदद के लिए उन लोगों को धन्यवाद दिया और आगे बढ़े। जीप तेजी से आगे निकल गई। बीच-बीच में हमें कहीं-कहीं गहरे नीले रंग की कलचुड़िया मतलब ब्लू ह्विसलिंग थ्रस भी दिख रही थीं।

गरजता गधेरा
गरजता गधेरा

सर्पीली सड़क पर बोलते-बतियाते उतार में चले जा रहे थे कि खुटका के आर-पार उफनते चौड़े गधेरे ने रास्ता रोक दिया। हैरानी की बात यह थी कि जीप तेजी से आगे निकल जाने के बजाए हमारा इंतजार कर रही थी। उन्हें डर था कि हमारी गाड़ी वहां फंस सकती है। वही हुआ, हम आगे बढ़े और गाड़ी गधेरे के बीचों-बीच फंस गई। हम न आगे निकल पा रहे थे, न पीछे। जीप से फिर तीन-चार लोग बाहर आए और उन्होंने जांच कर कहा- गाड़ी का चैंबर एक बड़े पत्थर में फंस गया है। उनके साथ मिल कर गाड़ी को आगे से ऊपर उठाया और पीछे की ओर धकेला। फिर उन्होंने हाथ से इशारा करके यहां भी गाड़ी बाहर निकलवाई। आभार व्यक्त कर हम उनके पीछे-पीछे चल पड़े। एक जगह रुक कर उफनती गौला नदी और उसके पुल के फोटो खींचे और तेजी से आगे बढ़ चले। हल्की रिमझिम जारी थी।

धारी में सरली इंतजार कर रही थी। उसने थोड़े आलू और फल-सब्जी रख दी। बोली, ‘खा लेना, घर के हैं।’ चाय पीने का बड़ा मन था। भूख भी लग रही थी। नीचे पदमपुरी पहुंच कर गर्मागर्म चाय के साथ आलू के चटपटे गुटके खाए। वहां नीचे दो भूरी उफनती नदियों का संगम हो रहा था। हम भीमताल की ओर बढ़ चले। काफी आगे चंदादेवी के ऊपर सौ-पचास गाड़ियां रुकी देखकर चौंके। पता लगा, बारिश के कारण रात में पहाड़ से सड़क पर मलबा आ गिरा है। आधे-एक घंटे बाद एक-एक करके गाड़ियां निकल सकीं। और फिर, काठगोदाम पहुंचने से ठीक पहले एक चिरकालीन रेले के पास मलबे ने फिर रोक दिया।  बाईं ओर उफनती हुई गौला बह रही थी। वहां से भी एक-एक कर गाड़ियां निकलीं।

मैदानी इलाके में आकर हमने ही नहीं, गाड़ी ने भी राहत की सांस ली और वह तेज रफ्तार से दिल्ली की ओर दौड़ने लगी। दिल्ली अब दूर नहीं थी।     – (देवेंद्र मेवाड़ी)

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