कोख

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विज्ञान-लेखकों को दुनिया के कोने-कोने में हो रही विज्ञान की नई-नई खोजों की जानकारी अपने पाठकों को देने में अलग ही किस्म का ‘थ्रिल’, एक अनूठा रोमांच महसूस होता है। खोज के उपयोग की संभावनाओं के अनुसार वह रोमांच आह्लादकारी भी हो सकता है या विज्ञान लेखक के रोंगटे खड़े कर सकता है। ऐसी जानकारी लेखक को निराशा के भंवर में डुबो सकती है या उसके मन में आशा की किरण भी जगा सकती है। सच पूछिए तो अपने पाठकों को वैज्ञानिक खोज की जानकारी देने के बहाने विज्ञान-लेखक उसकी संभावनाओं के रोमांच का भरपूर आनंद लेता है। अपने पाठकों को यह बताता है कि इस खोज से कल यह होगा और वह होगा।

मैं भी यही करता रहता हूं। इसलिए विज्ञान-लेखन का रोमांच मैंने भी खूब महसूस किया है। लेकिन, यह रोमांच भी किसी दिन इतना भारी पड़ सकता है- यह मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था। बल्कि अब तो मुझे यह लगता है कि विज्ञान लेखकों की नई खोजों की संभावनाओं का वर्णन करते समय आसन्न ज़िम्मेदारियों का भी अनुमान लगा लेना चाहिए।

मैं इसलिए आगाह कर रहा हूं कि ऐसी ज़िम्मेदारी कभी भी आ सकती है। ‘अब कोई कोख सूनी नहीं रहेगी’ लेख लिखते समय जब मैंने ‘परखनली शिशु’ तकनीक की संभावनाओं का चित्रण किया तब भला मुझे क्या मालूम था कि ऐसी कोई संभावना मेरे सामने आ खड़ी होगी और उसे हक़ीक़त में बदलवाने की ज़िम्मेदारी मुझे निभानी पड़ेगी ?

लेकिन ऐसा हुआ। वह ज़िम्मेदारी मुझे निभानी पड़ी।

आप सोच रहे होंगे- चलो अच्छा हुआ। मैंने लेख लिखने के साथ-साथ किसी की मदद भी की होगी। हां, की थी। लेख की तमाम संभावनाओं में से वह भी एक संभावना थी और सच कहूं- उसके हकीकत बनने के विचार ने मुझे रोमांचित कर डाला। मैं भीतर-भीतर आनंदविभोर हो उठा। इसलिए मैंने उस पाठक की मदद करना स्वीकार कर लिया।

पाठक ? हां, उनसे मेरा परिचय पाठक के ही रूप में हुआ था, लेकिन, आगे चलकर वे मेरे अभिन्न मित्र बन गए। मैं मानता हूं मैंने उनकी मदद की, लेकिन उस मदद से उन्हें क्या मिला ? यह विचार मुझे भीतर तक कौंच जाता है। जब-जब उस पाठक-मित्र दंपति का ध्यान आता है- मैं एक अजीब से पसोपेश में पड़ जाता हूं। कभी मुझे अपराध-बोध-सा भी होता है लेकिन फिर सोचता हूं – मैंने तो हर संभव सहायता की। जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं तो जिम्मेदार नहीं हूं। इस तरह मैं स्वयं को तो समझा लेता हूं लेकिन विनय और भाभी जी को कैसे समझाऊं ।

– आप सोच रहे होंगे- कौन विनय और भाभी जी ?

वही मेरे पाठक-मित्र। भाभी जी उनकी पत्नी हैं – सुमन शर्मा। मुझे क्षमा करें- अपने मित्र दंपति के असली नामों को मैं छिपा रहा हूं। आप मान लीजिए कि वे विनय शर्मा और सुमन शर्मा ही हैं। फिर इससे फ़र्क भी क्या पड़ता है ? अगर उनकी कहानी सच है तो नाम कुछ भी रख दें, उससे कोई अंतर नहीं पड़ता। असली नाम न बताने से उनकी बात की गोपनीयता बनी रहेगी। गोपनीयता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने पहले ही पत्र में साफ-साफ लिख दिया था।

पाठकों के पत्रों में ही तीन साल पहले मुझे विनय शर्मा का पहला पत्र मिला था। पंजीकृत पत्र। तब मुझे ताज्जुब भी हुआ था। पाठक प्रायः अपनी प्रतिक्रिया पोस्टकार्ड या बहुत हुआ तो अंतर्देशीय पत्र में लिख भेजते हैं। विनय शर्मा भी वैसे ही लिख सकते थे- पंजीकृत पत्र भेजने की क्या जरूरत थी? लेकिन ज्यों-ज्यों मैं पत्र पढ़ता गया, मुझे यह बात समझ में आती चली गई। वे चाहते थे कि पत्र मुझे ही मिले और उसमें लिखी हुई बातों के बारे में किसी और को पता न चले। मैंने उनकी बात रखी और अब तक इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। लेकिन, जो कुछ हो चुका है- उसे देखते हुए मैं समझता हूं मुझे सब कुछ बता देना चाहिए अन्यथा मेरी बैचेनी मुझे चैन से नहीं रहने देगी। फिर, पिछली कुछ घटनाओं से उनकी कहानी का सुराग कुछ लोगों को तो मिल ही गया है।

विनय शर्मा दंपति की कहानी आपको बताने का मेरा एक और मकसद भी है। यदि यह कहानी आपके आसपास घटती तो आप क्या करते? मैं जानता हूं- अंत में आप भी मेरी तरह बस एक बेचैनी महसूस कर रहे होते क्योंकि इसके अलावा आप भी कुछ नहीं कर पाते। क्या आप कानून को बदल सकते हैं ? नहीं ना ? मैं भी नहीं बदल सकता। अगर बदल सकता तो सबसे पहले मैं अपने इसी मित्र दंपति की समस्या को हल करता। लेकिन, क्या सचमुच मैं ऐसा कर पाता ?….आप भी सोचकर देखिए। मैं आपको सारी बात बताता हूं। आइए, उसी पहले पत्र से शुरू करते हैं।

पंजीकृत पत्र

‘प्रिय महोदय,

आपका लेख ‘अब कोई कोख सूनी नहीं रहेगी’ पढ़ा। इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आप और डा. अनिल कुमार दोनों ही बधाई के पात्र हैं। आपने डा. अनिल कुमार से इस विषय की हर बात पूछकर उसे हम पाठकों के लिए बेहद सरल और रोचक भाषा-शैली में संजो दिया है। इस जानकारी के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से आपके प्रति बहुत-बहुत आभारी हूं क्योंकि इससे हमारे मन में भी एक नई आशा जगी है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप इस संबंध में मेरी सहायता करें। मुझे लगता है, आपकी मदद से हमारे जीवन का सूनापन भर सकता है। मैं और मेरी पत्नी जीवनभर आपका अहसान नहीं भूलेंगे। इस उपकार के लिए आपके सदैव ऋणी रहेंगे।

मैं यह पत्र पंजीकृत डाक से भेज रहा हूं ताकि यह आपको ही सौंपा जाए। मेरा अनुरोध है कि मेरे इस पत्र को आप संभाल कर रखें ताकि यह किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में न पड़ सके। इसमें मैं अपनी नितांत निजी जिंदगी की बातें लिख रहा हूं, इसलिए यह ध्यान जरूर रखिएगा कि इनके बारे मे किसी को पता न चले।

महोदय, मेरा विवाह ग्यारह वर्ष पहले हुआ था। मैंने और मेरी पत्नी ने विवाह के बाद कई सपने संजोए थे। हमने एक छोटे से सुखी परिवार की कामना की ताकि हमारे आंगन में भी बच्चे की किलकारियां गूंजे। लेकिन, वर्ष-दर-वर्ष समय बीतता गया और हमारा सपना, सपना ही रह गया। आज ग्यारह साल बाद भी हमारी कोई संतान नहीं है। हमने हर संभव उपाय आजमाया। ओझा, मंत्र-तंत्र से लेकर पूजा-पाठ तक सभी कुछ किया। हकीमों और वैद्यों के चक्कर काटे। निजी और सरकारी अस्पतालों में भी जांच करा चुके हैं। लेकिन, कोई फायदा नहीं हुआ। हां, काफी पैसा खर्च करने के बाद अब डाक्टरों ने हमें यह बताया है कि मेरी पत्नी मां नहीं बन सकती। वे कहते हैं, उसके गर्भाशय की ट्यूब खराब है। वह ठीक नहीं हो सकती, इसलिए वह बच्चे को जन्म नहीं दे सकती।

हम पूरी तरह निराश हो चुके हैं। इस बात का पता लगने के बाद से मेरी पत्नी बहुत गुमसुम-सी रहने लगी है। वह मुहल्ले की महिलाओं के साथ भी अब अधिक नहीं उठती-बैठती। आप समझ सकते हैं, ऐसे मामले में व्यंग्य-बाणों का सामना करना आसान काम नहीं है।

ऐसे समय में आपके लेख ने हमारे मन में फिर से आशा जगा दी है। आप खर्चे की फिक्र न करें। हमारे पास भगवान का दिया और सब कुछ है। आपसे हमारी हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि किसी भी तरह हमें डा. अनिल कुमार से मिला दें। उनसे आपकी पहचान है, इसलिए वे हमारी जांच ध्यान से करेंगे अन्यथा आप जानते ही हैं- आजकल बिना जान-पहचान के कोई भी काम करना कितना कठिन है। मैं संतान पाने के लिए मुंह-मांगी रकम खर्च करने को तैयार हूं। यह बात आप चाहें तो डाक्टर को भी स्पष्ट रूप से बता सकते हैं।

एक बात और बता देना चाहता हूं। आपने अपने लेख में लिखा है कि ‘गर्भाशय में खुलने वाली नलियां’ अगर मामूली रूप से बंद हों तो उन्हें सर्जरी से ठीक किया जा सकता है।’ हमें यहां के डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। वे कहते हैं, मेरी पत्नी के गर्भाशय की नलियां ठीक नहीं की जा सकतीं। लेकिन, क्या पता कोई चमत्कार हो जाए। हो सकता है डाक्टर अनिल कुमार उन्हें ठीक कर दें। आप इस बारे में भी उनसे बात कर लें। अगर गर्भाशय में खुलने वाली नलियां- जिनका नाम आपने डिंबवाहिनियां या फैलोपियन ट्यूब लिखा है- ठीक नहीं हो सकेंगी तो उसका भी एक रास्ता मैंने सोच लिया है। आपने लिखा है कि ऐसी दशा में कोई दूसरी महिला ‘धाय मां’ बनकर भी बच्चे को जन्म दे सकती है। मैंने अपनी पत्नी को इस परिस्थिति के लिए भी राजी कर लिया है। हम दोनों चुपचाप इस बारे में अपने करीबी रिश्तेदारों से बातचीत कर रहे हैं। हमें भरोसा है-  इसके लिए कोई-न-कोई रिश्तेदार तैयार हो ही जाएगी।

लेकिन, महोदय, यह सब कुछ तो तभी हो सकेगा जब आपकी कृपादृष्टि हम पर होगी और आप हमारी मदद के लिए ‘हां’ कर देंगे। इसी आशा के साथ, अपना पता लिखा और पंजीकृत डाक से भेजने के लिए पूरे किट लगा कर लिफाफा भी भेज रहा हूं। आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगे और लौटती डाक से जवाब देंगे। इतना जरूर याद रखिए कि आपकी मदद से हमारी कामना पूरी हो सकती है।

मेरी पत्नी का सादर नमस्कार।

आपका चिरऋणी

विनय शर्मा

अब आप ही बताइए, क्या मैं मना कर सकता था? कभी नहीं। ऐसी परिस्थिति में आप भी कभी मना नहीं कर पाते। मानवीयता के नाते भी उनकी मदद करना मेरा कर्तव्य था। लिहाजा, मैंने मदद का आश्वासन देते हुए उन्हें लौटती डाक से जवाब भेज दिया। मैंने उन्हें लिखा कि जितना जल्दी संभव हो सकेगा, मैं डा. अनिल कुमार के पास जाऊंगा। उन्हें पूरी बात बताऊंगा और उनसे मुलाकात का समय लूंगा। समय तय हो जाने के बाद तुरंत पत्र से सूचित करूंगा।

मैं राष्ट्रीय जनन संस्थान के अस्पताल में जाकर डा. अनिल कुमार से मिला। ‘अब कोई कोख सूनी नहीं रहेगी’ लेख के बारे में पाठकों की प्रतिक्रिया से उन्हें अवगत कराया और उसके बाद मैंने विनय शर्मा का वह पत्र उन्हें पढ़ने के लिए दे दिया ताकि वे उस पाठक की समस्या को उसके ही शब्दों में समझ लें।

पत्र पढ़कर वे हंसते हुए बोले- ‘लगता है शर्मा काफी रुपया खर्च कर चुके हैं। खर्च से न डरने की बात उन्होंने बड़ा जोर देकर लिखी है। उन्हें आप यह जरूर लिख दें कि यहां उन्हें केवल दवाइयों का खर्च देना होगा।’

मैंने उत्सुकता से पूछा- ‘तो कब बुला लूं उन्हें ? ’

‘कभी भी बुला सकते हैं,’ उन्होंने कहा- ‘लेकिन पंद्रह दिन बाद वे आ सकें तो उन्हें अधिक फुर्सत से देख सकूंगा। और हां, उन्हें यह भी लिख दें कि अब तक जो भी जांच करा चुके हैं उसके कागजात साथ ले आएं।’

उन्हें धन्यवाद देकर लौट आया। मैं बहुत खुश था। मेरे लेख से किसी को लाभ मिलने की एक अच्छी शुरुआत हो चुकी थी। घर लौटकर मैंने बड़े उत्साह से पत्र लिखाः

‘प्रिय शर्मा जी,

आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि डा. अनिल कुमार आप लोगों की जांच करने के लिए तैयार हो गए हैं। मैं अभी-अभी उनसे मिलकर लौटा हूं। उन्होंने पंद्रह दिन बाद का समय दिया है। इस बीच आप यहां आने की तैयारी कर लीजिए। मुझे विश्वास है, डा. अनिल कुमार जैसे अनुभवी और जनन विज्ञान के जाने-माने चिकित्सक की मदद से आपको जरूर लाभ होगा। आपकी समस्या का कुछ-न-कुछ हल वह अवश्य खोज निकालेंगे। अब तक वे परखनली शिशु की तकनीक से अनेक निःसंतान दंपतियों को संतान का सुख दिला चुके हैं। कई सूनी कोखों ने इस विधि से गर्भाधारण कर संतान को जन्म दिया है। शर्मा जी, आपको पूरी आशा रखनी चाहिए। इस विधि से दुनिया भर में अब तक हजारों बच्चे पैदा हो चुके हैं। हमारे देश में भी कई शहरों में इस विधि से निःसंतान महिलाएं मां बनी हैं। इसीलिए मुझे लगता है, आपकी समस्या जरूर हल हो जाएगी और भाभी जी मां बनेंगी। क्षमा कीजिए, बिना परिचय के ही मैं उन्हें ‘भाभी जी’ कह कर संबोधित कर रहा हूं लेकिन आपका पत्र मिलने के बाद से ही मैं आप लोगों के साथ एक विशेष अपनापन-सा महसूस कर रहा हूं- इसीलिए आदरपूर्वक यह रिश्ता जोड़ रहा हूं। उन्हें मेरा सादर नमस्कार कहिएगा। मैं आप लोगों की प्रतीक्षा कर रहा हूं। आने की तिथि की सूचना जरूर दें।

आपका ही,

………….. ”

लौटती डाक से उनका पत्र भी आ गया। उन्होंने डाक्टर से मुलाकात का वक्त लेने के लिए बहुत आभार प्रकट किया था। साथ ही, लिखा था कि वह भी मेरे साथ बेहद अपनापन महसूस कर रहे हैं। उनके आने की तिथि की सूचना भी मुझे मिल गई।

नियत तिथि को वे सुबह ही मेरे घर पहुंच गए। एक अनजान महिला और पुरूष को देखकर मैं समझ गया कि वे ही विनय शर्मा दंपति होंगे। परिचय होते ही शर्मा जी ने मुझे गले से लगा लिया और बोले- इनसे मिलो। यह हैं आपकी भाभी जी-सुमन। मैंने उन्हें सादर नमस्कार किया तो उन्होंने मुस्कराकर हाथ जोड़ दिए।

थोड़ी देर बातचीत करने के बाद हम लोग तैयार होकर डा. अनिल कुमार से मिलने राष्ट्रीय जनन-संस्थान की ओर चल पड़े।

कुछ दिन तक डा. अनिल कुमार के मार्गदर्शन में शर्मा दंपति की जांच चलती रही। जांच पूरी हो जाने के बाद एक दिन डा. अनिल कुमार ने मुझे और विनय शर्मा को अपने कमरे में मिलने के लिए बुलाया। मिलने पर बोले- ‘मुझे खेद है। श्रीमती शर्मा के गर्भाशय और दोनों फैलोपियन ट्यूबों को  टी.बी. से काफी नुकसान हुआ है। ‘ट्यूबरकुलस इंडोमेट्राइटिस’ के कारण अब तक वह मां नहीं बन पाई हैं। इलाज के पुराने पर्चों पर दवाइयों के नाम देखकर ही मैं समझ गया था कि वह टी.बी. से पीड़ित हुई हैं। अब मैंने पूरी जांच से इस बात की तसल्ली कर ली है। शुक्र है कि मि. शर्मा समय-समय पर उन्हें इलाज के लिए दिखाते रहे। दवाइयों से  टी.बी. का इलाज हो गया लेकिन उसने दोनों फैलोपियन ट्यूबों और गर्भाशय को इतना नुकसान पहुंचा दिया है कि वे गर्भाधान नहीं कर सकतीं।’

शर्मा जी, ने बहुत निराश होकर पूछा- ‘तो क्या मेरी पत्नी मां नहीं बन सकेगी ? बच्चे को जन्म नहीं दे सकेगी ? ’

‘दे सकेंगी, लेकिन किसी और की कोख से। आप खुश किस्मत हैं कि उनके दोनों डिंबाशय ठीक है। डिंबाशय समझे आप? मेरा मतलब ‘ओवरी’ से हैं। उनमें से डिंब निकाल कर, आपके शुक्राणुओं से उनका गर्भाधान कराने के बाद किसी ‘धाय मां’ की कोख से आपका बच्चा जन्म ले सकता है। यह काम मेरी देखरेख में होगा।’ डा. अनिल कुमार ने समझाया।

विनय शर्मा ने बहुत आशा के साथ डा. अनिल कुमार की ओर देखा और अचानक भावुक होकर उनके दोनों हाथ पकड़ लिए। फिर फफक कर उसके हाथों में अपना सिर रख दिया।

डा. अनिल कुमार ने उनके कंधे थपथपाते हुए उन्हें दिलासा दी- ‘आप हिम्मत से काम लें। मैंने कहा न, यह काम मेरी देखरेख में होगा। आपको बच्चे का सुख जरूर मिलेगा।’

‘मुझे आप पर पूरा भरोसा है डाक्टर साहब! इसी भरोसे के कारण मैं यहां इतनी दूर आपके पास आया हूं। मन में यह आशंका भी थी कि हो सकता है किसी भीतरी खराबी के कारण पत्नी शायद मां न बन सके। डाक्टरों ने इतना तो बता ही दिया था कि गर्भाशय की नलियां खराब हैं लेकिन हलकी-सी आशा थी कि क्या पता कोई चमत्कार हो जाए और नलियां ठीक कर ली जाएं। ‘अब कोई कोख सूनी नहीं रहेगी’ लेख को मैंने कई बार पढ़ा और अनुमान लगाता रहा कि अगर ऐसा होगा तो क्या करूंगा, अगर वैसा होगा तो क्या करूंगा। गर्भाशय ठीक होने पर परखनली शिशु की विधि से क्या पता मेरी पत्नी ही मां बन जाए- यह आशा मन में बनी हुई थी।’

‘मां तो वे अब भी बनेंगी मि. शर्मा। बच्चा पूरी तरह आपका और आपकी पत्नी का ही होगा। ‘धाय मां’ की कोख से तो वह सिर्फ जन्म लेगा।’ डा. अनिल कुमार ने उनक बात काटते हुए कहा- ‘और हां, श्रीमती शर्मा को भी आप यह बात अच्छी तरह समझा दीजिए।’

तभी मैंने कहा- ‘शर्मा जी पहले ही समझा चुके हैं। इन्हें यह आशंका भी थी कि अगर पत्नी के गर्भ से बच्चा जन्म नहीं ले सकेगा तो फिर ‘धाय मां’ से अपने बच्चे का जन्म दिलाएंगे। पत्र में यह लिखा था इन्होंने।’

‘वेरी गुड। तब तो समस्या काफी हल हो गई। अगर श्रीमती शर्मा मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार हैं तो समझिए आधा काम हो गया। रही बात ‘धाय मां’ की तो उसके बारे में भी आपने कुछ-न-कुछ सोच ही लिया होगा। क्यों ? ’ उन्होंने विनय शर्मा से पूछा।

वे बोले- ‘हां, सोचा तो है। फिलहाल रिश्तेदारी में ही बात की है। उन लोगों ने कहा पहले सुमन की हर तरह जांच करा लो। क्या पता वहीं मां बन जाए। अगर ऐसा न हो पाए तो फिर देखेंगे। हमसे हमदर्दी जताने वाले तो बहुत हैं डाक्टर साहब, अब देखिए उनमें से कौन तैयार होता है। घर जाकर ही पता लगेगा।’

डा. अनिल कुमार ने मेरी ओर इशारा करते हुए उनसे कहा- ‘पता लगते ही इन्हें सूचना भेज देना। उसके बाद आप तीनों को आना पड़ेगा- आपकी पत्नी, आप और ‘धाय मां’। धाय मां की उम्र पैंतीस वर्ष से कम होनी चाहिए। वह शादीशुदा और एक या दो बच्चों की मां हो। रंग-रूप और कद-काठी पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बच्चा तो आपका और आपकी पत्नी का ही अंश होगा। हां, इतना ध्यान जरूर रहे कि वह स्वस्थ हो। उसे कोई गंभीर बीमारी न हो। जहां तक आपका सवाल है, आपमें कोई कमी नहीं है। आपके शुक्राणुओं की जांच मैंने कर ली है। अब आप जाएं और जितनी जल्दी हो सके ‘धाय मां’ को भी लेकर आएं। मैं चाहता हूं, आप लोग जल्दी-से-जल्दी मां-बाप बन जाएं। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।’

हम लोग लौट आए। मैं डर रहा था कि न जाने श्रीमती शर्मा की प्रतिक्रिया कैसी होगी, लेकिन जैसे वे इस परिस्थिति के लिए भी तैयार थीं। सब कुछ सुनकर बोलीं- ‘जब भगवान की यही इच्छा है तो यही सही। मैं भी समझ लूंगी कि कोयल की तरह कौवे के घोंसले में अपना अंडा रख आई! ’ यह कहकर वह हंस दीं। उस हंसी के भीतर का दर्द मैंने महसूस किया।

बातचीत का माहौल हल्का बनाने की गरज से विनय शर्मा बोले- ‘तो चलो, अब घर वापस लौटकर कौवे की तलाश शुरू करते हैं। अब तो कौवे को साथ लेकर ही यहां आएंगे।’

उन लोगों के साथ मैं भी हंस पड़ा।

अगले दिन शर्मा दंपति वापस लौट गए। मैं उन्हें स्टेशन तक छोड़ने गया। वे बार-बार मुझे धन्यवाद देते रहे। अंत में मुझे कहना पड़ा- ‘यह तो मेरा कर्तव्य है शर्मा जी। आपको मेरे लेख से इस बारे में मालूम हुआ, इसलिए मेरा भी कर्तव्य बनता है- आपकी मदद करना। इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है। या फिर ऐसा करते हैं कि बच्चे के जन्म के बाद एक साथ ही सारे धन्यवाद ले लेंगे। क्यों कैसा रहेगा ? ’ उन्होंने मुझे गले लगा लिया। जाते हुए वे काफी दूर तक हाथ हिलाते रहे।

कई दिन तक उनका कोई पत्र नहीं मिला। मुझे चिंता होने लगी। हर वक्त यही सोचता रहा कि न जाने क्या हुआ होगा। इसी फ़िक्र में डूबा था कि एक दिन पोस्टमैन ने आवाज़ दी- ‘रजिस्ट्री! ’

मन में आशा जगी कि हो-न-हो यह शर्मा जी का पत्र है। देखते ही पता लग गया कि उन्हीं का पत्र है। तुरंत खोलकर पढ़ा। लिखा थाः

“स्नेही भाई,

सोचा था यहां पहुंचते ही पत्र भेज दूंगा लेकिन फिर सोचा कि बात बन जाए तो लिख दूंगा ताकि आपको पता भी लग जाए और हमारे आने का कार्यक्रम भी मालूम हो जाए। मगर लगता है किस्मत में कुछ और ही लिखा है। हम हर संभव कोशिश कर चुके हैं लेकिन अभी तक कोई भी तैयार नहीं हुआ है। पूरी बिरादरी में कोशिश कर चुके हैं। हर तरह से समझा चुके हैं। यों समझ लो भाई कि बच्चे के लिए हाथ जोड़ कर भीख मांग चुके हैं। हमें पहले यह पता नहीं था अन्यथा हम इतना ऊंचा सपना भला देखते ही क्यों ? मेरी पत्नी ने अपनी विवाहित छोटी बहिन से पहले बात की थी। वह राजी भी थी। लेकिन, अब जब उसकी जरूरत पड़ी है तो उसने इनकार कर दिया है। उसके पति ने तो मुझसे साफ-साफ कह दिया है कि ऐसी कुत्सित भावना मेरे मन में आई ही क्यों ? साली की कोख से बच्चे को जन्म दिलाकर मैं व्याभिचार करना चाहता हूं ? उसने मुझसे संबंध तोड़ लिया है।

सुमन ने मेरे छोटे भाई की पत्नी से बात की तो घर में कोहराम मच गया। छोटे भाई की पत्नी की कोख में मेरा बच्चा ? घर वाले ही हमें हिकारत से देखने लगे हैं। इसे भी अधर्म और व्याभिचार कह रहे हैं। हमारे समझाने का कुछ भी फायदा नहीं हुआ है। कोई मानता ही नहीं कि चाहे साली की कोख से पैदा हो या भाई की पत्नी की कोख से- वह बच्चा तो आखिर मेरा और मेरी पत्नी का होगा। लेकिन भाई, कोई भी समझने को तैयार नहीं है। न जाने इन सबकी वह हमदर्दी कहां चली गई। बड़े-बूढ़े तो पहले से ही पिछले जन्म के कर्मों का फल बता रहे हैं। वे भला किसी को क्या समझाएंगे। इसलिए कहीं कोई आशा नज़र नहीं आ रही है। हम तो बस ठगे से रह गए हैं। यही लोग संतान पाने के लिए न जाने कितने सुझाव दे चुके हैं लेकिन जब उपाय सूझा तो इन्होंने चुप्पी साध ली है। अब आप ही बताएं हम क्या करें। डा.  अनिल कुमार से आप क्या कहेंगे हमारी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है। अब तो ऐसा लग रहा है जैसे इन्हीं लोगों ने हमारा बच्चा हमसे छीन लिया है। हमने नाहक आपको भी परेशान किया। क्षमा करेंगे। अभी बस इतना ही। सुमन आपको नमस्कार कह रही है।

आपका ही,

विनय शर्मा’’

पत्र पाकर मैं तो हतप्रभ रह गया। क्या सोचा था और क्या हो गया। मेरे लेख से एक पाठक की आशाएं जगीं, उसने संतान का सपना संजोया। क्या वह अधूरा ही रह जाएगा ? उसके लिए ‘परखनली शिशु तकनीक की जानकारी क्या अर्थहीन हो जाएगी ?

यह सब कुछ सोच-समझकर मेरा मन बैचेन हो उठा। मन हुआ तुरंत जाकर डा. अनिल कुमार को सब कुछ बता दूं ? फिर सोचा- उन्हें भी यह जानकर तकलीफ़ होगी। इसलिए अभी बताने से क्या लाभ। लेकिन, इस घटना ने मुझे परेशान कर डाला। मेरी नींद उड़ गई। लिखते समय मन में यह भाव बना रहता है  कि इस जानकारी से पाठकों को प्रेरणा मिलेगी। वे इसका लाभ उठाएंगे। लेकिन, अगर वह काम न आ सके और महज जानकारी भर रह जाए तो फिर ऐसे लेखन का क्या लाभ ? विनय शर्मा का पत्र रह-रहकर मेरे लेख के लिए एक चुनौती की तरह सामने आने लगा। मुझे महसूस होने लगा जैसे यह सब मेरी वजह से हुआ। न मैं डा. अनिल कुमार से भेंट करता, न लेख लिखता और न विनय शर्मा सपना देखते। फिर सोचता- अगर मैं न लिखता तो क्या वह न पढ़ते ? कहीं और किसी दूसरे लेखक की रचना पढ़ लेते।

इसी ऊहापोह में था कि कुछ दिन बाद उनका एक और पत्र मिल गया।

‘‘प्रिय भाई,

मेरा पिछला पत्र पढ़कर आप बहुत परेशान हुए होंगे। बात ही कुछ ऐसी थी। पत्र भेजने के बाद लगा, मैं नाहक आपको परेशान कर रहा हूं। आप हमें अपना मानने लगे हैं इसलिए पत्र में लिखी हुई बातों से आपको भी दुःख हुआ होगा। फिर, सच तो यह है कि यह सब आपके ही भरोसे शुरू हुआ। इसलिए मुझे लगातार लगता रहा कि मैंने पत्र भेजकर गलती की। मुझे क्षमा करें।

इस बार अच्छी खबर दे रहा हूं। लगता है ईश्वर ने हमारी सुन ली है। जब बिरादरी में कोई तैयार नहीं हुआ तो हम बहुत निराश हो गए। ‘धाय मां’ वाली बात कानो-कान फैल गई। लोग पहले हमें सहानुभूति की नजर से देखते थे, लेकिन अब वे एक अजूबे की दृष्टि से देखने लगे।

एक दिन फूलमती सुमन से पूछने लगी- बीबी जी, लोग यह क्या-क्या बातें कर रहे हैं ? सुमन ने पूछा- कैसी बातें ? करने दो, जिसे जो बात करनी है करे! लेकिन फूलमती पीछे पड़ गई और पूछने लगी कि लोग कह रहे हैं- आप दोनों किसी दूसरी औरत से बच्चा पैदा कराने की सोच रहे हैं ? आप तो खुद औरत हैं। आपने कैसे मान ली यह बात ? आपका मरद दूसरी औरत से बच्चा पैदा कराने की बात कर रहा है और आप चुप बैठी हैं ? कल उसे घर में बिठा लेंगे बाबूजी, और आप देखती रह जाएंगी, हां?

सुमन ने उसे पूरी बात समझाई। यह भी समझाया कि दूसरी औरत से मेरे पति का कोई संबंध नहीं होगा। जैसे मुर्गी का अंडा मशीन में रख कर सेते हैं तो उससे चूजा निकल आता है। वैसे ही मेरा अंडा दूसरी औरत की कोख में रखना है जिससे मेरा बच्चा जन्म लेगा। बस।

सुमन ने मुझे बताया कि हमारे घर में काम करने वाली फूलमती यह सुनकर चकित रह गई। उसने सुमन से पूछा- औरत कहीं अंडे देती है ? सुमन ने उसे बताया कि औरतों के अंडे उनकी कोख में होते हैं। बहुत ही छोटे-छोटे। डाक्टर उन्हें निकाल कर, उनमें गर्भाधान कराते हैं और फिर अंडे को उसी या किसी ऐसी औरत की कोख में डाल देते हैं जो बच्चे को जन्म दे सकती है। इसमें पराये मर्द की तो कहीं बात ही नहीं है।  अपने खेत में दूसरे के लिए भी एक पौधा उगा देने की बात है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं सुमन और फूलमती की बातचीत भी आपको क्यों बता रहा हूं ? इसका भी कारण है। डा. अनिल कुमार ने जांच के दौरान मुझे औरतों के बांझपन के कई कारण बताए थे। उन्होंने कहा था कि किसी तरह के डर या अपराध की भावना से भी कई बार महिलाएं गर्भधारण नहीं कर पातीं। इसलिए मैं हर बात लिख रहा हूं  ताकि आपको और डा. अनिल कुमार को इसका पता रहे। मां और धाय मां की मानसिक दशा का इससे पूरी तरह पता लग जाएगा।

अब तो आप समझ ही गए होंगे कि फूलमती धाय मां बनने को तैयार हो गई है। सुमन की बात उसकी समझ में आ गई है। सब कुछ समझ कर वह बोली- ‘बीबी जी, आपका बच्चा तैयार करने को कोई राज़ी नहीं हुआ तो क्या, मैं तैयार हूं। अगर आपको कोई एतराज नहीं है तो। जात-पांत का कोई झंझट हो तो आप जानें।’

सुमन कहती है कि उसने फूलमती को डांटा- कैसी जात-पांत ? बैठे तो हैं हमारी जात-पांत वाले चुप्पी साध कर। आदमी की जाति सिर्फ आदमी है बहिन। जैसे घोड़ों की जाति घोड़ा और गायों की जाति गाय है, समझी।

फूलमती से मैंने भी बात की। उसे हर चीज अच्छी तरह समझाई। एक शर्त भी रखी। आप सोच रहे होंगे कैसी शर्त ? यह शर्त कि उनकी इस मदद के बदले उसके परिवार के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी मैं संभालूंगा। परिवार में उसका पति है जो रिक्शा चलाता है और एक बेटी है तीन साल की। फूलमती कर उम्र पच्चीस के आसपास है। मैंने उससे कहा कि पहले अपने पति से स्वयं बातचीत कर ले। उसे सब कुछ समझा दे।

दो दिन फूलमती मुंह फुलाए खामोश रही। चुपचाप आकर काम करके चली गई। तीसरे दिन हंसकर कहने लगी- ‘अब मान गया है मेरा मरद। उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था। बार-बार कह रहा था- ‘लोग खिल्ली उड़ाएंगे। कहेंगे बीबी पराये मर्द को सौंप दी। मैंने कहा, नासपीटों की जुबान खींच लेंगे। हम नहीं डरते किसी से। उनका दिया खा रहे हैं क्या ? अपनी मेहनत से कमा कर खा रहे हैं। लोग देवी-देवताओं से मन्नत मांगते हैं संतान की। बीबी जी मुझसे मांग रही हैं। मैं उनकी मन्नत पूरी करूंगी। जहां तक पराए मरद की बात है तो तुम साथ चलना अस्पताल। बाबू जी और बीबी जी के साथ हम लोग भी चलेंगे। मैंने तो कह दिया बाबू जी कि आप लोग देवता हैं। जो मदद हमसे हो सकती है वह हम कर देंगे और जो मदद आप लोग कर सकते हैं- वह आप करेंगे। क्यों ठीक है ना ? ’

मैं तो जैसे फूलमती को नहीं किसी देवी को देख रहा था। उस देवी ने हमारी पुकार सुन ली थी। मेरा मन उसके प्रति श्रद्धा से भर उठा। मैंने उससे कहा- ‘हम तुम्हारे जीवन भर एहसानमंद रहेंगे, फूलमती। तो मैं चिट्ठी लिख दूं कि हम लोग आ रहे हैं ? डाक्टर साहब को यह खबर दे दें ? ’

वह बोली- ‘बिल्कुल दे दीजिए। चिट्ठी में लिख दीजिए कि आप लोग और हम लोग सभी आ रहे हैं।’

मैं समझ गया। मैंने कहा- ‘यही लिखूंगा। वहां अब कुछ महीने रहना होगा। जांच वगैरह के साथ-साथ शहर भी घूम लेंगे।’ यह सुनकर उसकी आंखों में चमक आ गई। उसके जाने के बाद ही मैंने यह पत्र लिखना शुरू कर दिया था। मैं समझता हूं, मैंने सभी बातें लिख दी हैं। डाक्टर साहब को भी सभी बातें विस्तार से बता दीजिए। हम अगले सप्ताह बुधवार को प्रातः पहुंच जाएंगे। बाकी बातें भेंट होने पर।

आपकी भाभी जी का नमस्कार।

आपका ही अपना,

विनय शर्मा’’

मेरी चिंता दूर हुई। मन प्रसन्नता से भर उठा। मेरे पाठक की अधूरी आशा अब पूरी हो सकती थी। यह खुशखबरी मैं जल्दी-से-जल्दी डा. अनिल कुमार को देना चाहता था, इसलिए तुरंत ही उनसे मिलने चल पड़ा।

अगले सप्ताह वे आ पहुंचे। विनय शर्मा ने रहने की व्यवस्था राष्ट्रीय जनन संस्थान के निकट एक होटल में कर ली। फूलमती को उसके पति और बिटिया के साथ उसी होटल के दूसरे कमरे में टिका दिया। डा. अनिल कुमार ने पूरा कार्यक्रम बना लिया था और उन्हीं का इंतजार कर रहे थे। विनय शर्मा दंपति की उपस्थिति में उन्होंने फूलमती और उसके पति से पूरी बातचीत की। उन्हें बारीकी से हर चीज समझाई। फिर फूलमती से बोले- ‘बहुत पुण्य का काम कर रही हो तुम फूलमती। तुम्हारी मदद से इन लोगों को संतान का सुख मिल सकेगा।’

उसके पति की ओर देखकर उन्होंने कहा- ‘आपने फूलमती को पुण्य के इस काम के लिए आज्ञा देकर बहुत बड़ा त्याग किया है।’

‘अरे कहां डाक्टर साहब,’ फूलमती चट से बोली- ‘हमने सुना है लोग दूसरे के लिए अपना खून दे देते हैं, गुर्दा दे देते हैं, हमको तो बस बीबी जी का बीज उगाकर दे देना है। नौ महीने अपनी कोख में उनके बच्चे को पाल देना है यही ना ? ’

‘हां यही। लेकिन, यह कोई मामूली बात तो नहीं है फूलमती।’ डा. अनिल कुमार बोले।

‘हां साहब। लेकिन हमारा सारा खर्चा तो बाबू जी उठा रहे हैं। फिर हमें कौन परेशानी है? रही कोख की बात, वो तो भरनी ही है। बाबूजी, एक बात कहूं ? परिवार के लिए रोटी कमाना ज्यादा मुश्किल है- यह कोख-वोख तो भरती ही रहती है हम गरीबों की।’

डा. अनिल कुमार ने बाद में मुझे बताया कि ‘धाय मां’ के लिए फूलमती बिल्कुल सही महिला है। वह मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार है। यह बहुत अच्छी बात है। उसके बाद उन्होंने फूलमती की जांच का काम शुरू करा दिया। उन्हें जांच के परिणाम देखकर खुशी हुई। फूलमती स्वस्थ तो थी, लेकिन गर्भ-धारण के लिए उसे अब अधिक पौष्टिक आहार की आवश्यकता थी। इस बारे में उन्होंने उसके पति और विनय शर्मा को अच्छी तरह समझा दिया। साथ ही यह भी बताया कि अब उसका ‘साइकिल इवेल्युएशन’ शुरू कर रहे हैं। विनय शर्मा ने जिज्ञासा से उनकी ओर देखा तो वे बोले- ‘मासिक चक्र’ का अच्छी तरह पता लगाना जरूरी है ताकि यह पता लग जाए कि फूलमती के डिंबाशय में हर माह डिंब कौन-सी तिथियों को तैयार होकर गर्भाशय की नलियों में आता है। उन तिथियों में ही हम उसयके गर्भ में भ्रूण पहुंचाएंगे क्योंकि तब उसका गर्भाशय स्वयं ही भ्रूण के पनपने के लिए तैयार रहेगा।

इस विषय में मेरी रुचि देखकर डा. अनिल कुमार हर रोज मुझे जांच और उसके परिणामों के बारे में बताते रहते। एक दिन मैंने उनसे पूछा- ‘क्या सिर्फ ‘मासिक चक्र’ से यह पता लग जाएगा कि भ्रूण गर्भाशय में कब पहुंचाना है ? ’

‘नहीं, ’ उन्होंने कहा- ‘उसके साथ-साथ दूसरे परीक्षण भी किए जाते हैं। मासिक चक्र का पता लगाने के लिए शुरुआत ‘बी.बी.टी.’ से करते हैं- मतलब बेसिक बाॅडी टेम्प्रेचर से। महीने भर  में महिलाओं के शरीर का तापमान एक बार अचानक घटता है और फिर बढ़ जाता है। कुछ दिन शरीर का तापमान अधिक रहता है, फिर सामान्य हो जाता है। तापमान के घटने और बढ़ने का समय ही डिंब या अंडे के निकलने का समय है। हर सुबह बिस्तरे से उठने से पहले एक विशेष थर्मामीटर से फूलमती के शरीर का तापमान लिया जा रहा है। इसके अलावा दूसरे परीक्षण भी चल रहे हैं। अल्ट्रा सोनोग्राफी से हम डिंबाशय में डिंब के बढ़ने का पता लगा रहे हैं।

फूलमती अब संस्थान में ही रह रही थी। फूलमती का परिवार काफी प्रसन्न था। इन दिनों न खाने की चिंता थी, न पहनने और न रहने की। भरपेट अच्छा भोजन मिल रहा था और समय मिलते ही वे शहर की सैर भी कर रहे थे। परेशानियां जैसे वे भूल गए थे इन दिनों। फूलमती का पति शुरू में हर चीज को संदेह की नज़र से देखता था लेकिन डा. अनिल कुमार से बातचीत कर लेने के बाद उसका संदेह बहुत कम हो गया।

और मैं? मैं अपने लेख की संभावना को हकीकत में बदलते हुए देखने के ‘थ्रिल’ को महसूस करता हुआ कभी फूलमती परिवार से मिलता, कभी शर्मा दंपति से और कभी डा. अनिल कुमार से। कई बार मुझे लगता जैसे वे मेरे लेख में से पैदा हुए पात्र हैं, इसीलिए वे सभी मुझसे जुड़े हुए हैं। लेकिन, जब मैं उन हाड़-मांस के जीते-जागते पात्रों को देखता, उनसे मिलता और बातचीत करता तो मुझे विश्वास हो जाता कि वे पात्र नहीं, जीते-जागते इंसान हैं।

एक दिन जब मैं डा. अनिल कुमार से मिला तो उन्होंने कहा – फूलमती ठीक सौलह दिन बाद गर्भ धारण करेगी।

फूलमती के गर्भाधारण के लिए श्रीमती सुमन शर्मा के डिंब निकालने की तैयारी शुरू कर दी गई। उनकी डिंब ग्रंथियों को दवा से उकसाया गया। डा. अनिल कुमार ने मुझे बताया कि वे श्रीमती शर्मा के मासिक चक्र के तीसरे से सातवें दिन तक यह दवा देंगे जिसमें इस्ट्रोजेन हार्मोन हैं। पांचवे, छठे और सातवें दिन हार्मोनों की एक दूसरी खुराक भी दी गई। हर रोज श्रीमती शर्मा के रक्त की जांच करके उसमें हार्मोन रसायनों का पता लगाया जा रहा था।

फिर एक दिन डाक्टर अनिल कुमार ने मुस्कराकर मुझसे कहा- ‘डिंबों का पकना शुरू हो गया है! ’ मुझे पता था कि डिंबों के ‘पकने’ से उनका क्या मतलब है। डिंब ग्रंथियों में डिंब तो होते ही हैं लेकिन गर्भ धारण के लिए उनमें से एक डिंब बढ़कर बाहर फूट पड़ता है और फैलोपियन ट्यूब या डिंब वाहिनी में चला आता है। यही है डिंब का पकना! लेकिन, श्रीमती शर्मा के तो एक से अधिक डिंबों की आवश्यकता थी। इसीलिए हार्मोन देकर उनके एक से अधिक डिंबों को तैयार किया जा रहा था।

ग्यारहवें दिन उन्होंने बताया- ‘अल्ट्रा सोनोग्राफी से पता लग गया है कि कम-से-कम नौ डिंब बढ़ चुके हैं। उनका व्यास 15 से 20 मिलीमीटर हो चुका है! ’

आप मेरी खुशी का अनुमान लगा सकते हैं। लेख में जानकारी देने और उसे अपनी आंखों के सामने सच्चाई में बदलते हुए देखने में कितना फर्क है! अगले दिन डा. अनिल कुमार ने मुझे बताया कि वे हार्मोन की एक और खुराक दे रहे हैं ताकि जो डिंब बढ़ चुके हैं वे एक साथ फूटने को तैयार हो जाएं।

चौदहवें दिन लैपरोस्कोप की मदद से श्रीमती शर्मा की डिंबग्रंथि से पके हुए, गर्भधारण के लिए तैयार डिंब निकाल लिए गए। उन्हें एक रक्षक और पोषक घोल से भरी कांच की प्याली में डालकर, पांच मिनट तक हवा बंद डेसिकेटर में रखने के बाद इंकुबेटर में 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रख दिया गया।

इसके साथ ही विनय शर्मा के शुक्राणुओं को भी एक रक्षक और पोषक घोल में 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर इंकुबेटर में रखा गया। बाद में शुक्राणुओं की एक-एक बूंद कांच की प्याली में श्रीमती शर्मा के डिंबों पर डाली गई। उन्हें फिर इंकुबेटर में रख दिया गया।

अगले दिन डिंबों की जांच की गई। उसके बाद उन्हें बढ़ने-पनपने के लिए एक नए पोषक घोल में रख दिया गया। दूसरे दिन जब इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से डिंबों की जांच की गई तो पता चला नौ में से सात डिंबों का शुक्राणुओं से निषेचन या गर्भाधान हो चुका है। उनमें विभाजन की क्रिया शुरू हो गई थी- एक से दो, दो से चार और चार से आठ कोशिकाएं! इसी तरह बढ़ते-बढ़ते भ्रूण बच्चे में बदल जाएगा।

इलैक्ट्रान माइक्रोस्कोप में उन नन्हें गोल भ्रूणों को देखते हुए मैं विचारों में खो गया था कि डाक्टर अनिल कुमार ने मेरा कंधा थपथपाते हुए कहा- ‘कहां खो गए? इन भ्रूणों में चार कोशिकाएं बन चुकी हैं और जल्दी ही आठ कोशिकाएं बन जाएंगीं। इनकी बढ़वार शुरू हो चुकी है। इसलिए अब इन्हें फूलमती की कोख में पहुंचाने का समय आ गया है। आप भी अब बाहर चलें।’

मैं बाहर चला आया। शर्मा दंपति, फूलमती का पति और उसकी बिटिया बैंच में बैठे बातें कर रहे थे। मुझे देखते ही विनय शर्मा ने पूछा- ‘क्या कह रहे हैं डाक्टर साहब ? ’

‘कह रहे हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक है।’ फिर मैंने उनके कान में कहा- ‘फूलमती की गोद भरने की वैज्ञानिक रस्म पूरी करने जा रहे हैं।’

फूलमती के खून की जांच चलती रही। एक दिन डा. अनिल कुमार ने शर्मा दंपति से बड़े उत्साह के साथ कहा- ‘बधाई हो, फूलमती का ‘सीरम प्रोजेस्टेरान’ और ‘एच-सी-जी’ बढ़ गया है!’

वे अवाक होकर कभी मुझे और कभी डाक्टर अनिल कुमार की ओर देखने लगे।

तब मैंने कहा- ‘आपका मतलब है फूलमती ने गर्भ धारण कर लिया है ? ’

‘अरे हां! ’ वह बोले-  ‘उसके खून में इन दोनों हार्मोनों का स्तर बढ़ गया है जिसका मतलब है फूलमती की गोद भर चुकी है।’ फिर शर्मा दंपति से बोले- ‘आप लोगों की संतान फूलमती की कोख में आ चुकी है। नौ माह बाद वह आपकी गोद में होगी।’

विनय शर्मा और श्रीमती शर्मा ने अनायास ही दोनों हाथ जोड़कर पहले आकाश की ओर और फिर डाक्टर अनिल कुमार की ओर देखा। कहने लगे-  ‘आप लोगों की दया है डाक्टर साहब अन्यथा हम तो निपूते ही रह जाते। आप लोगों को किस तरह धन्यवाद दें- हम समझ ही नहीं पा रहे हैं।’

मेरी ओर इशारा करके उन्होंने डा. अनिल कुमार से कहा- ‘अगर इनका लेख न पढ़ते तो हमें संतान का विचार ही कहां आता ? विज्ञान की इस खोज का लाभ हमें कैसे मिल पाता? आप हमें मां-बाप बना रहे हैं, इसलिए हमारे लिए तो आप देवता हैं।’

डा. अनिल कुमार हंसने लगे- ‘इसमें देवता की क्या बात है ? डाक्टर का काम इलाज करना है और वही मैं कर रहा हूं। इलाज सफल हो जाए और कल आप दोनों की गोद में बच्चा खेलने लगे तो मुझे भी अपने काम की सफलता की खुशी होगी। और हां, मैं कोई ‘रिस्क’ लेने को तैयार नहीं हूं। फूलमती को बच्चे के जन्म तक यहीं रहना होगा ताकि मैं नियमित रूप से उसकी जांच कर सकूं। इसलिए आप लोग यहां रहने की व्यवस्था कर लें।’

रहने की व्यवस्था भी हो गई। विनय शर्मा ने संस्थान के निकट ही एक घर किराए पर ले लिया। शर्मा दंपति फूलमती के पति और उसकी बिटिया के साथ वहीं रहने लगे। कुछ दिन बाद फूलमती को भी संस्थान से रिलीव कर दिया गया और वह भी वहीं आकर रहने लगी। डाक्टर की सलाह के अनुसार उसे श्रीमती शर्मा पौष्टिक आहार और दवाइयां देती रहीं। वे फूलमती की बड़े मनोयोग से सेवा करती रहीं ताकि उसे किसी प्रकार की तकलीफ़ न हो। अपने साथ संस्थान में ले जातीं और बहुत सावधानी से, संभालते हुए उसे वापस घर लातीं। फूलमती की कोख में उनके घर का चिराग पनप रहा था।

डा. अनिल कुमार ने ‘डी-डे’ तय किया था- गर्भधारण से ठीक 280 दिन बाद 11 जनवरी। फूलमती के स्वास्थ्य से वे काफी संतुष्ट थे। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में उन्होंने सुझाव दिया कि ठीक 11 जनवरी को सीजे़रियन आपरेशन से बच्चे को जन्म दिलाया जा सकता है। लेकिन, आपरेशन के नाम से फूलमती घबरा गई। डा. अनिल कुमार से बोली- ‘नहीं डाॅक्टर साहेब, हम आपरेशन नहीं कराएंगे। इतने बच्चे जन्म लेते हैं- क्या वे सभी आपरेशन से पैदा होते हैं ? हमको कोई परेशानी नहीं होगी। आप फ़िक्र मत कीजिए। और, आगे हमारी गोद भरेगी तो वह भी तो ऐसे ही होगा।’

उसकी ज़िद के कारण बच्चे को स्वाभाविक रूप से जन्म दिलाने का निश्चय किया गया। इसमें कोई खतरा नहीं था।

7 जनवरी की शाम को टहलते समय फूलमती को असुविधा-सी महसूस हुई। शर्मा दंपति उसे तुरंत संस्थान ले गए। डा. अनिल कुमार ने फूलमती को एडमिट करा लिया और अपने सहयोगियों के साथ उसकी जांच की। शर्मा दंपति को उन्होंने शिशु के लिए आवश्यक चीजें लाने की हिदायत दी।

आखिर वह बहुप्रतीक्षित समय भी आ पहुंचा। 9 जनवरी की प्रातः ही फूलमती को प्रसव-पीड़ा महसूस हुई। उसये तुरंत प्रसव-कक्ष में पहुंचाया गया। और, मैं भी शर्मा दंपति के साथ बाहर शिशु जन्म की खुशखबरी का इंतजार करने लगा।

ठीक सवा नौ बजे नर्स ने खुशखबरी दी- ‘बधाई हो, बेटा पैदा हुआ है! ’

शर्मा जी मेरे गले लग गए। बांहों के कसाव से मुझे उनकी खुशी के ज्वार का पता लग रहा था। श्रीमती शर्मा की आंखों में खुशी के आंसू भर आए। शर्मा जी ने ज्यों ही उनकी पीठ थपथपाई- वे फफककर रो पड़ीं। मैंने उन दोनों को बधाई दी। तभी डा. अनिल कुमार आ गए और शर्मा जी की ओर हाथ बढ़ाकर बोले- ‘बधाई हो। आप लोग मां-बाप बन गए हैं। जच्चा-बच्चा दोनों बिल्कुल ठीक हैं। सात पौंड का स्वस्थ शिशु पैदा हुआ है। थोड़ी देर में आप जच्चा-बच्चा से मिल सकते हैं। अपने बच्चे को देख सकते हैं! ’

विनय शर्मा ने खुशी के अतिरेक में डाक्टर के हाथों को कसकर पकड़ कर उन पर ऋणी भाव से अपना माथा टिका दिया। श्रीमती शर्मा उनकी ओर लगातार हाथ जोड़े खड़ी रहीं।

आप यकीन करेंगे, मैंने इस अवसर पर स्वयं भी मिठाई खरीद कर बांटी ? मेरी खुशी की वजह जाहिर है कि मेरे लेख की सफलता थी। लेख प्रकाशित होने पर जितनी खुशी होती है- उससे कई-कई गुना अधिक खुशी हुई थी तब मुझे। खुशी का कोई विशेष भाव अगर किसी के चेहरे पर नहीं था तो वह था फूलमती का पति। लेकिन, उसकी मनःस्थिति का अंदाज आप भी लगा सकते हैं। उसकी पत्नी के बच्चे को जन्म दिया था और हम लोग शर्मा दंपति को बधाई दे रहे थे। ऐसी दशा में स्वाभाविक ही है कि वह चुपचाप अपने मन पर काबू रख रहा होगा। उस समय मैं जानबूझकर उससे कुछ नहीं बोला। हां, शर्मा दंपति ने जरूर उसकी ओर आभार व्यक्त करने के भाव से हाथ जोड़े थे। और फूलमती ? बच्चे के जन्म से वह बेहद खुश थी।

संस्थान से रिलीव होकर कुछ दिन किराए के घर में रहने के बाद शर्मा दंपति फूलमती के परिवार के साथ वापस लौट गए। जाते समय मैंने देखा, श्रीमती शर्मा ने शिशु को अपनी गोद में पकड़ा हुआ था और वे प्यार से उसकी आंखों में झांक रही थीं। मैंने ट्रेन में उनकी खिड़की के समीप जाकर हंसते हुए कहा- ‘बिल्कुल आप पर गया है भाभी जी। वही नाक, वही आंखें! ’

उन्होंने मुस्कुराते हुए बच्चे को चूम लिया।

तभी ट्रेन ने सीटी दी और चल पड़ी। मैं ट्रेन के ओझल हो जाने तक उन लोगों की ओर विदा का हाथ हिलाता रहा और फिर एक भारी संतोष के साथ वापस लौट आया। एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी होने के संतोष के साथ।

विनय शर्मा ने घर पहुंचते ही पुनः मुझे पत्र भेजा था। पत्र में सकुशल घर पहुंच जाने और बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में लिखा था। मेरे प्रति आभार व्यक्त करते हुए भी काफी कुछ लिख डाला था।

उसके बाद धीरे-धीरे यह घटना पुरानी पड़ने लगी। मैं भी इस बीच विज्ञान की अन्य नई खोजों के बारे में लिखता रहा। पाठकों के सुझाव और जिज्ञासा भरे पत्र मिलते रहे। नए पाठकों के साथ मेरा पत्र व्यवहार चलता रहा। मैं उनकी जिज्ञासाओं के उत्तर देते हुए उनके बारे में सोचता। कभी-कभी विनय शर्मा की अचानक याद हो आती और मैं सोचने लगता कि कैसे होंगे शर्मा दंपति? फूलमती परिवार उनके साथ सुख से रह रहा होगा। सहजीवन का कितना अच्छा उदाहरण हैं वे लोग। फूलमती ने उन्हें उनकी संतान दी और उन्होंने फूलमती परिवार को आर्थिक चिंताओं से मुक्त किया है। कितना संतोष मिलता था मुझे यह सब सोच कर।

लेकिन एक अरसे के बाद मिले विनय शर्मा के पत्र ने मेरा यह संतोष छीन लिया। पत्र पढ़कर मैं ठगा-सा रह गया। कभी मैं शर्मा दंपति के बारे में सोचता और कभी फूलमती के परिवार के बारे में। श्रीमती सुमन शर्मा और फूलमती के बारे में सोचते हुए मैं ऐसी उधेड़-बुन में उलझ गया कि लगा उससे बाहर नहीं निकल सकूंगा। विनय शर्मा ने लिखा थाः

‘प्रिय भाई,

यहां पहुंचने के बाद एक पत्र भेजा था, मिला होगा। सोचा था, बीच-बीच में आपको पत्र भेजता रहूंगा ताकि आपसे संपर्क बना रहे लेकिन सोचने से क्या होता है? कहा भी तो गया है- मनुष्य सोचता है और ईश्वर उसे उलट देता है। मेरे साथ तो यही होता रहा है। कई बार सोचता हूं कि आखिर हमने ऐसा कौन-सा पाप किया है जिसकी सज़ा हम भुगत रहे हैं ? लेकिन कुछ समझ में नहीं आता। इस बात का कोई उत्तर नहीं मिल पाता। ऐसी ही स्थिति में लोग शायद पिछले जन्म के कर्मों की बात पर विश्वास करने लगते हैं। अब तो कई बार मुझे भी लगता है कि हम जो कुछ झेल रहे हैं- वह शायद हमारे पिछले जन्म के कर्मों का फल होगा। अन्यथा ऐसा क्यों हो रहा है ? आखिर हमारा दोष क्या है ?

यह सब कुछ पढ़कर आपको बहुत तकलीफ़ होगी लेकिन क्या करूं ? आपको न लिखूं तो और किससे कहूं ?

यहां पहुंचने के बाद कुछ दिन हम सभी लोग साथ रहे। सभी लोग से मेरा मतलब हमारे और फूलमती के परिवार से है। फूलमती हर समय बच्चे को अपने साथ रखने लगी। उसे वह अपना दूध पिलाती और अपने साथ ही सुलाती। बच्चा जब भी रोता तो फूलमती की गोद में जाकर ही चुप होता। हम करते भी क्या ? दूध भी तो फूलमती ही पिला सकती थी। लेकिन हम चाहते थे कि बच्चा जितनी जल्दी हो सके, हमारे पास आ जाए। यह फूलमती के बजाय सुमन की गोद में पले। हमने कुछ लोगों से सलाह भी ली। उन्होंने कहा कि बच्चे को ऊपरी दूध दें। हमने बोतल से दूध पिलाना शुरू कर दिया। लेकिन जब कभी वह रोने लगता तो फूलमती झपटकर उसे छाती से लगा लेती और दूध पिलाने लगती।

हमने उसे काफी समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। बच्चे को वह अपने साथ ही रखना चाहती थी। इससे धीरे-धीरे घर में तनाव बढ़ने लगा। सुमन बच्चे को अपने बैडरूम में सुलाती लेकिन फूलमती उसे उठाकर अपनी कोठरी में चली जाती।

एक दिन मैंने उससे साफ-साफ कह दिया- ‘फूलमती यह हमारा बच्चा है। इसकी मां सुमन है। इसे सुमन के पास ही रहने दिया करो। तभी तो वह अपनी मां को पहचानेगा।’

वह बोली, ‘अपनी मैया को तो वह अच्छी तरह पहचानता है बाबूजी। हर बच्चा अपनी मैया की गोद पहचान लेता है। इसीलिए तो मेरी गोद में आत ही कैसा चुप हो जाता है और छाती टटोलने लगता है।’

अपने गुस्से को भीतर ही भीतर दबाते हुए मैंने कहा, ‘तुमने इस बच्चे को जन्म दिया है फूलमती। इसीलिए तुम्हारा मोह भी इसके लिए होगा ही। लेकिन, तुम यह बात अच्छी तरह जानती हो कि यह बच्चा मेरा और सुमन का है। इसके साथ तुम्हारा ज्यादा मोह ठीक नहीं है। तुम इससे थोड़ा दूर रहा करो। इसके बदले मैं तुम लोगों के लिए इतना कुछ कर रहा हूं। भूल गई क्या ? ’

उसे कहा, ‘नहीं भूली हूं बाबूजी। आखिर साल भर से आपका दिया खा रहे हैं। लेकिन, यह खाना-पीना औलाद से बड़ा तो नहीं है ना ? ’

मैंने गुस्से से पूछा, ‘क्या मलतब ? ’

उसका उत्तर सुनकर मेरा गुस्सा काफूर हो गया और मैं सन्न से रह गया।

वह बोली, ‘मतलब यह कि यह मेरी औलाद है। मैं हूं इसकी मां। मैंने इसे अपने पेट में नौ महीने पाला है। मैंने जन्म दिया है इसे।…आप कहते हैं मैं दूर रहूं इससे ? कैसे रहूं ? बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को भी छाती से चिपटाए हुए घूमती है। फिर मै। तो एक औरत हूं बाबूजी। मैं कैसे अपनी औलाद से दूर रहूं ? बताइए ? ’

मैं तो उसकी ओर देखता ही रह गया। सुमन बच्चे को गोद में भींच कर सिसकते हुए भीतर चली गई।

मैंने उसे फिर समझाने की कोशिश की। उससे कहा, ‘तुम जानती हो फूलमती, इस बच्चे में तुम्हारा कोई अंश नहीं है ? ’

वह बोली, ‘क्यों नहीं है ? नौ महीने मेरे पेट में कैसे पला यह ? इसकी रगों में मेरा खून है। मेरे दूध पर पल रहा है।’

मैं क्या कहता। निरूत्तर होकर उसकी ओर देखता रहा।

तब उसी ने कहा, ‘मैं भी बहुत दिन से देख रही हूं बाबूजी कि आप लोगों को बच्चे के साथ मेरा रहना ठीक नहीं लग रहा है। उसे अपना दूध पिलाना, प्यार करना, अपनी कोठरी में ले जाना- कुछ भी आप लोगों को अच्छा नहीं लग रहा है। बुरा मत मानिएगा बाबूजी, बच्चे को जन्म देने के बाद आपकी देवी अंतर्धान हो गई है और फूलमती नौकरानी फूलमती बन गई है। उस नौकरानी का दूध पिलाना और बच्चे को अपने पास रखना आप लोगों को बहुत खटक रहा है। लेकिन मैं भी क्या करूं ? मां हूं उसकी। बच्चे के बिना मैं नहीं रह सकती।’

आशंका से मेरा मन कांप उठा। मैंने पूछा, ‘तो क्या चाहती हो तुम ? ’

उसने कहा, ‘अपना बच्चा। मुझे मेरा बच्चा दे दो बाबूजी। मैं उसे आप लोगों को नहीं दे सकती। मैंने आप लोगों से ‘हां’ कर दी थी लेकिन मुझसे यह नहीं हो पाएगा। मैं बहुत खराब औरत हूं बाबूजी। देवी नहीं हूं। मुझे मेरा बच्चा दे दो। हम लोग अपनी झोपड़ी में वापस चले जाएंगे। हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए।…’

और इसके साथ ही वह बुरी तरह रोने लगी। भाई, आप मेरी स्थिति का अनुमान अच्छी तरह लगा सकते हैं। मैं गुस्से में कांप भी रहा था और बच्चा खो देने की आशंका से डारा हुआ भी था।

मैंने चीखते हुए कहा, ‘बच्चा हमारा है फूलमती। होश में आओ। अपना बच्चा हम तुम्हें नहीं देंगे।’

यह सुनकर वह और जोर से रोने लगी।

मैंने समझा इस बातचीत से फूलमती सच्चाई को स्वीकार कर लेगी और बच्चा मांगने का विचार छोड़ देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फूलमती बच्चा पाने के लिए बेचैन हो उठी।

आप विश्वास करेंगे? एक दिन फूलमती बच्चे को लेकर गायब हो गई। हमने पुलिस की मदद ली। फूलमती को उसने ढूंढ निकाला। बच्चा उसी के पास था। उसने अपने बयान में पुलिस को बताया कि बच्चा उसी का है। उसी ने अपनी कोख से जन्म दिया है। उसके पति ने भी इस बात को स्वीकार किया। हमने पुलिस को पूरी बात समझाई लेकिन उन्होंने हमारी कोई मदद नहीं की। बस यह हिदायत देकर चले गए कि इस मामले को हम लोग आपस में ही सुलझा लें।

लेकिन मामला सुलझता कैसे? फूलमती ने साफ-साफ मना कर दिया।

आप सोच रहे होंगे, मैंने कानून की मदद क्यों नहीं ली ? मैंने इस बारे में भी सोचा। पहले डाक्टरों और अस्पतालों के चक्कर लगाए थे, अब वकीलों के दरवाजे खटखटाए। पैसा भी खर्च किया। कुछ वकील तो सब्जबाग दिखाते रहे लेकिन एक नेकदिल वकील ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि हमारे कानून की नजर में फूलमती और उसका पति ही बच्चे के ‘प्राकतिक’ या ‘नेचुरल’ मां-बाप हैं और बच्चा उनकी जायज़ संतान है। बच्चे को उनसे कोई अलग नहीं कर सकता।

मैंने फूलमती के साथ समझौते की दुहाई दी और वकील को बताया कि हमारे लिए बच्चे को जन्म देने के बदले मैं उसके परिवार का पालन-पोषण कर रहा हूं।

वकील ने कहा, मुझे आप लोगों से पूरी सहानूभूति है लेकिन इस समझौते या करार का कोई अर्थ नहीं है। बच्चा मां-बाप की मर्जी से लाफुल वेडलाक में पैदा हुआ है। कानून उसे आपको नहीं दिला सकता।

सारी रात हम सो नहीं पाए। मां-बाप बन जाने के बाद भी निःसंतान रहने की पीड़ा हमें सालती रही। हम भाग्य की विडंबना को कोस रहे हैं। विधि का यह आखिर कैसा खेल है भाई? ‘धाय मां’ तो असली मां बन गई है और ‘मां’ दिन-रात बच्चे के लिए आंसू बहा रही है। तब बच्चे की आशा ही नहीं थी। अब बच्चा होकर भी नहीं है। यह सोच-सोचकर कि वह फूलमती की झोपड़ी में पल रहा है और भी अधिक तकलीफ होती है। मां-बाप के पास सब कुछ होते हुए बच्चा गरीबी और परेशानियों के बीच पल रहा है।

हमें फूलमती से शिकायत है, फिर भी बच्चे की खातिर उसकी मदद करना चाहते हैं। लेकिन, वह मदद को भी संदेह की नजर से देखती है कि कहीं इसी बहाने धीरे-धीरे बच्चा न हथिया लें। इसीलिए वह किसी भी तरह की मदद के लिए मना कर देती है। हम दूसरे लोगों के माध्यम से उसकी सहायता कर रहे हैं।

इस तरह आप लोगों की मदद से जो संतान पैदा हुई- उसे हमने खो दिया है। और, ऐसा कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है जिससे वह हमें मिल सके। भाई, आपके शहर में तो बड़े-बड़े बैरिस्टर होंगे। उनसे राय ले सकेंगे? जो भी फीस होगी, मै। दूंगा। उसकी बिल्कुल चिंता न करें। क्या कानून में कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है जिससे हमारा बच्चा हमें मिल जाए। हमें विश्वास है जैसे आपने एक सच्चे भाई की तरह पहले हमारी सहायता की, वैसे ही अब भी कर सकेंगे। हमें आप पर भरोसा है। हम आपके पत्र का इंतजार करेंगे।

आपकी भाभी जी आपको स्नेह कह रही हैं।

आपका दुःखी भाई

विनय शर्मा’’

मैं भाग्य की विडंबना को नहीं मानता, लेकिन विनय शर्मा दंपति के साथ जो कुछ हुआ है- उसे मैं क्या कहूं ? सब कुछ पाने के बाद भी कुछ नहीं मिल सका उन्हें। फूलमती के लिए क्या कहा जाए ? उसकी ममता को कैसे नकार दें। उसने स्वयं को बच्चे की असली मां मान लिया है और मां के अधिकार से उसे पाल रही है।

मैं नहीं जानता, कानून में कोई रास्ता है या नहीं लेकिन मुझे पता है कि डा. अनिल कुमार और राष्ट्रीय जनन संस्थान की मदद से विनय शर्मा और श्रीमती सुमन शर्मा बच्चे के आनुवंशिक मां-बाप सिद्ध किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, ‘डी.एन.ए. फिंगर-प्रिंटिंग’ की विधि से भी शर्मा दंपति को बच्चे का असली मां-बाप साबित किया जा सकता है। इस बारे में पिछले दिनों मैंने लेख भी लिखा था। कहीं ऐसा न हो कि विनय शर्मा उसे पढ़कर फिर आशान्वित हो जाएं। इसलिए मैं उन्हें लिख रहा हूं कि बच्चे की पैतृकता तो साबित की जा सकती है लेकिन उनके मामले में ‘प्राकृतिक मां-बाप’ वाली बात फिर भी आड़े आएगी। यहां कुछ बैरिस्टरों से भी मैं मिला। उन्होंने यही बताया है कि वर्तमान कानून की नजर में प्राकृतिक मां-बाप ही बच्चे के मां-बाप हैं और वह उन्हीं के पास रहेगा। डा. अनिल कुमार को जब मैंने पूरी बात बताई तो वे भी उदास हो गए। कहने लगे- ‘एक डाक्टर के लिए तो सबसे बड़ी खुशी की बात यह होती है कि उसका इलाज सफल हो गया। इसलिए विनय शर्मा के शुक्राणुओं और उनकी श्रीमती जी के डिंब से ‘धाय मां’ ने जब बच्चे को जन्म दे दिया तो मेरा काम पूरा हो गया। उसमें मुझे खुशी मिली। लेकिन, मैं डाक्टर ही नहीं इंसान भी तो हूं। यह सब सुनकर मैं भी पसोपेश में पड़ गया हूं। मुझे शर्मा दंपति से सहानुभूति है लेकिन फूलमती को भी कैसे गलत कह दूं? आपका क्या विचार है ? ’

मैंने कहा- ‘मैं भी इसी उलझन में हूं। साथ ही इस पूरे घटनाक्रम में मैं भी एक निमित्त बन गया हूं। शुरूआत तो उसी लेख से हुई ना- ‘अब कोई कोख सूनी नहीं रहेगी।’

डा. अनिल कुमार बोले- ‘तब तो मैं भी निमित्त बन गया हूं। वह जानकारी मैंने ही तो आपको दी थी। लेकिन हम लोग निमित्त मात्र ही हैं। हमने उनके हित में ही यह काम किया। जिन परिस्थितियों पर हमारा कोई वश नहीं, उनके लिए क्या किया जा सकता है। पत्र में शर्मा दंपति और फूलमती को मेरी ओर से भी याद कर दें।’

अब आप ही बताइए मुझे क्या करना चाहिए ? हां, यह भी बताइए कि अगर मैं या आप कानून को बदल सकते तो क्या फूलमती की गोद से बच्चा लेकर शर्मा दंपति को सौंप देते?

बताइए ना ?

मैं जानता हूं- आप निर्णय नहीं ले पा रहे  हैं। सोच में पड़ गए हैं। जब से विनय शर्मा का पत्र मिला है- मैं भी इसी तरह सोच में पड़ा हुआ हूं। अक्सर सोचता रहता हूं कि वैज्ञानिक खोजें कितनी चौंकाने वाली होती हैं लेकिन उनका प्रभाव कई बार उससे भी अधिक विस्मय में डाल देता है। हम विज्ञान लेखक लिखते समय भला उन सबका अनुमान कहां लगा पाते हैं ?

                                                    (मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं, देवेंद्र मेवाड़ी, प्रकाशकः आधार प्रकाशन, पंचकूला से)

 

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