धन्यवाद, जिम कार्बेट

जिम कार्बेट
जिम कार्बेट

25 जुलाई 2012 को  आदमखोर बाघों और तेंदुओं के विश्वप्रसिद्ध शिकारी और प्रकृति संरक्षक जिम कार्बेट की 137 वीं जयंती थी। उस दिन हमने उन्हें खूब याद किया।

कार्बेट 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में पैदा हुए थे। बचपन में उन्होंने नैनीताल में ही पढ़ा-लिखा और वहां अपने मकान गर्नी हाउस में रहे। सर्दियों में वे हल्द्वानी से आगे कालाढूंगी में अपने तराई-भाबर के घर अरुंडेल में रहते थे जो अब ‘जिम कार्बेट म्यूजियम’बना दिया गया है। जिम ने नैनीताल के आसपास और कालाढूंगी के जंगलों में प्रकृति की किताब पढ़ी और वन्य जीवों के बारे में गहन जानकारी हासिल की।

जिम कार्बेट मेरे गांव के डाक बंगले में भी रहे। उन्होंने वहां से दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर 11 अप्रैल 1930 को चौगढ़ पट्टी की आदमखोर बाघिन को मारा था जो पांच वर्ष (1925-30) के भीतर उस इलाके के 64 लोगों को मार चुकी थी। मेरे ही गांव के जंगलों में उसने 8 लोगों की जान ले ली थी। हमारे गांव के निहत्थे लोग, हमारे माता-पिता उन्हीं जंगलों में पशुओं को चराते थे, वहीं से घास और ईंधन के लिए लकड़ियां लाते थे। आज हम हैं क्योंकि वे आदमखोर बाघिन से बच सके।

अपने उन बुजुर्गों और उनकी हम संतानों की ओर से प्रिय ‘कार्पेट साब’ की स्मृति को सादर नमन। आज एक बार फिर कार्बेट की ‘मैन ईटर्स आफ कुमाऊं’ पढूंगा। डी.सी. काला जी की ‘जिम कार्बेट आफ कुमाऊं’ भी पढ़ने का मन है।

‘मैन ईटर्स आफ कुमाऊं’का ‘चौगढ़ टाइगर्स’ अध्याय पढ़ लिया है जो हमारी पट्टी की आदमखोर बाघिन के बारे में है।

किताब के कई दृश्य मन में जीवंत हो रहे हैं…मेरे गांव से आदमखोर बाघिन की तलाश में 10 मील दूर डालकंडिया गांव की ओर जाते हुए कार्बेट को किसी और गांव में वारदात की खबर मिली। वहां जाते हुए रात हो जाने पर वे वहां घने जंगल में एक बांज के पेड़ पर सोए। अपनी रायफल पेड़ की शाखा से बांध दी थी। रात में शोर सुन कर नींद खुली तो पता लगा, पास में ही एक काफल के पेड़ पर चढ़ कर भालुओं का परिवार काफल खा रहा है! उसी दौरान उन्होंने एक रात नदी किनारे पीपल के पेड़ के नीचे खुले चबूतरे पर भी काटी, जबकि आदमखोर बाघ इलाके में था। एक रात उन्होंने बांज के एक बौने पेड़ पर भी बिताई जिसके सामने बाघिन के चारे के लिए एक बकरी बांधी गई। लेकिन, बाघिन नहीं आई। उसने डालकंडिया गांव की एक ग्रामीण युवती को बुरी तरह घायल कर दिया था। बाघ के नाखूनों ने खोपड़ी खोल दी थी और माथे से लेकर पीछे गर्दन तक बहुत गहरे घाव थे। कार्बेट को साल भर पहले उनके एक डाक्टर दोस्त ने एक छोटी-सी शीशी दी थी जिसमें पीले रंग की दवा भरी थी। डाक्टर ने हिदायत दी थी कि जब भी शिकार पर जाएं, वह शीशी साथ रहे। उस दिन कार्बेट ने अपनी कमीज को फाड़ कर पट्टियां बनाईं। गर्म पानी से युवती के घाव धोए और फिर उन पर दवा की वह पूरी शीशी उड़ेल दी। सिर को सहेज कर पट्टियों से कस कर बांध दिया। फिर युवती को उसके घर पहुंचाया जहां दरवाजे के पास लटकी टोकरी के पालने में उसकी नन्हीं बेटी उसका इंतजार कर रही थी।

दस दिन बाद जब वापसी में कार्बेट उस घर के पास से निकले तो युवती को दरवाजे के पास बैठे हुए देखा। नन्हीं बच्ची उसकी गोद में सो रही थी। उसने मुस्कुराकर कार्बेट को सिर के घाव दिखाए जो भर गए थे। केवल पीछे गर्दन पर का गहरा घाव भरना बाकी था।
कार्बेट लिखते हैं, ‘‘अगर कभी मेरे उस डॉक्टर दोस्त को ये पंक्तियां पढ़ने का मौका मिले तो मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि जो पीली दवा भरी शीशी बहुत सोच-समझ कर कभी उन्होंने मुझे दी थी, उसने एक बहादुर युवा मां की जान बचाई।”

कार्बेट का प्रकृति वर्णन सम्मोहित करता है। उन्होंने 1932 में ‘माई इंडिया’ की भूमिका में वे पाठकों को नैनीताल की ‘चीना पीक’ पहाड़ी पर चलने के लिए आमंत्रित करते हुए लिखाः ‘एक जोड़ी बढ़िया फील्ड ग्लासेज लीजिए और मेरे साथ चीना पीक की चोटी पर चलिए। यहां से आप नैनीताल के चारों ओर का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। सड़क खड़ी चढ़ाई में जा रही है लेकिन अगर पक्षियों, पेड़ों और फूलों में आपकी रुचि है तो आपको यह तीन मील की चढ़ाई खलेगी नहीं। और, अगर चोटी पर पहुंच कर आपको प्यास लग आई तो मैं आपको साफ ठंडे पानी का सोता दिखाऊंगा जहां उन तीन महर्षियों की तरह आप भी अपनी प्यास बुझा सकते हैं। आराम कर लिया, भोजन भी कर लिया, अब चलिए उत्तर की ओर देखिए। आपके ठीक नीचे जंगलों से भरी गहरी घाटी है जो कोसी नदी तक पहुंच रही है। नदी के उस पार अनेक समानांतर पर्वतमालाएं हैं जिन पर यहां-वहां गांव बसे हुए हैं। उन्हीं में से एक पर्वतमाला पर अल्मोड़ा शहर है और दूसरी पर्वतमाला पर है रानीखेत छावनी। उनके पीछे और भी पर्वतमालाएं हैं जिनमें सबसे ऊंची डूंगर बुकाल की ऊंचाई 14,200 फुट है लेकिन विशाल हिमाच्छादित हिमालय के सामने यह बौनी दिखाई देती है। आपसे कव्वे की उड़ान 60 मील दूर उत्तर में है त्रिशूल और उस 23,406 फुट ऊंची भव्य चोटी के पूर्व व पश्चिम में सैकड़ों मील तक हिमाच्छादित पर्वतों की कतार फैली हुई है। त्रिशूल के पश्चिम में जहां बर्फ दृष्टि से ओझल हो जाती है, वहां पवित्र केदारनाथ व बद्रीनाथ धाम के ऊपर पहले गंगोत्री समूह है, फिर ग्लेशियर और पर्वतमालाएं। और, उसके बाद है कामेट जिसे स्माइथी ने प्रसिद्ध बना दिया है। त्रिशूल के पूर्व में, पीछे की ओर आप नंदादेवी की चोटी (25,689 फुट) देख सकते हैं, जो भारत का सबसे ऊंचा पर्वत है। आपके दाहिनी ओर ठीक सामने देवी पार्वती का धवल तकिया नंदाकोट है। और, थोड़ा आगे पूर्व में पंचचुली की सुंदर चोटियां हैं, यानी पांच चूल्हे जिनका उपयोग पांडवों ने तिब्बत में कैलाश तक जाते समय किया था। सूर्योदय से पहले जब चीना और उसके आसपास की पहाड़ियां अभी रात्रि के आगोश में ही होती हैं, हिमाच्छादित पर्वतमालाओं का रंग जामुनी से गुलाबी हो जाता है और जैसे ही सूर्य स्वर्ग की निकटस्थ चोटियों को स्पर्श करता है, उनका गुलाबी रंग चकाचौंध कर देने वाले श्वेत रंग में बदल जाता है। दिन भर वे पहाड़ ठंडे और श्वेत दिखाई देते हैं, उनका हर शिखर जैसे भुरभुरी बर्फ का पंख ओढ़ लेता है, लेकिन सूर्यास्त के समय स्वर्ग के चितेरे की मर्जी कि वह उस दृश्यावली में गुलाबी रंग भरता है या सुनहरा अथवा लाल।’….

जिम कार्बेट ने उस भूमिका में यह भी लिखा था कि शहर नैनीताल के चारों ओर फैले जंगलों में उसने बाघ, तेंदुए, भालू, सांभर और 128 प्रकार के रंग-बिरंगे पंछी देखे थे! 8569 फुट ऊंचे चीना पहाड़ की तीन मील की खड़ी चढ़ाई में घने पेड़ थे, तमाम तरह के रंग-बिरंगे जंगली फूल खिलते थे और पक्षियों का मधुर कलरव गूंजता रहता था। पास ही बसे खुर्पाताल के खेतों में भारत का सर्वोत्तम आलू पैदा होता था। उसके नीचे की गहरी घाटी शाल और अन्य पेड़-पौधों, बेलों व फूलों से भरी रहती थी।

आज नैनीताल में घूमते समय यह सब कुछ कितना याद आता है!  (‘ मेरी विज्ञान डायरी से’)

 

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