ये चहचहाते पक्षी

 

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2 जून 2009

दो दिन से नाई गांव में हूं, नैनीताल से लगभग 100 किमी. दूर पहाड़ में। आसपास खेत हैं, पेड़-पौधे हैं। नीचे बांज, बुरांश, अंयार और कई प्रजातियों के पेड़ों का हरा-भरा जंगल है। उससे नीचे पूरी घाटी चीड़ वनों से ढकी है। उस पार की पहाड़ी पर भी ऊपर तक चीड़ चढ़ आए हैं। सामने, थोड़ा नीचे गांव का देवस्थल है जिस पर देवदार और बांज के बुजुर्ग पेड़ों ने अपनी घनी छांव फैला दी है। मंदिरों के इर्द-गिर्द खड़े देवदार और बांज ये पेड़ देव-वृक्ष हैं। पूज्य हैं। इन्हें कोई नहीं काटता।

इन पेड़ों पर दिन भर कई पक्षी आते हैं। नीले रंग की ‘लाफिंग थ्रस’ यानी कलचुड़िया अक्सर आकर इनकी छांव में दोनों पैरों पर फुदक-फुदक कर भोजन खोजती है, कभी मंदिरों की ढालूदार छत के पत्थरों पर बैठ कर यहां-वहां निहारती है और कभी बांज की किसी शाख पर जाकर विश्राम करती है।

आज सुबह-सुबह उठकर बाहर आया तो पक्षियों के चहचहाने की तरह-तरह की आवाजों ने मन मोह लिया। इतने सारे पक्षी! तब न लोगों की आवाजें थीं, न जानवरों की। हवा में केवल चिड़ियों की चहचहाहट गूंज रही थी। मैं आंगन के किनारे पत्थर की दीवाल की मेंड़ पर बैठ कर चुपचाप वे आवाजें सुनने लगाः

टि टि टी का का…टि टि टी का का ….(ब्लू मैगपाइ, बनसरियां)

चिड़िक…चिड़िक…चिं…चिं….चिड़िक…चिड़िक…(गौरेया)

काफल पाक्को….काफल पाक्को…काफल पाक्को (इंडियन कुक्कू, काफल पाक्को)

कुक्कू…कुक्कू…कुक्कू….(कामन कुक्कू, कफुवा)

कियांक्…कियांक्….कियांक् (तोते)

पिटगुल…पिटगुल…(बुलबुल)

चुर्र…चुर…चुर…चुर…चुर्र…(मैना)

कुरूरू…कुर्र…कुर्र….कुरूरू…(घुघुती, फाख्ता)

तीन तोला तितरी…तीन तोला तितरी…(तीतर, नीचे दूर खेतों से)

चुक…चुक…चुक…किक्रिक्यां…किक्रिक्यां…किक्रिक्यां….(चकोर, सामने पहाड़ी से)

पीहू….पीहू…पीहू…..(चातक, नीचे घाटी से)

न्याहो…न्याहो….न्याहो….(पपीहा, ब्रेन फीवर बर्ड, नीचे घाटी से)

देर तक वे आवाजें सुनता रहा। बाद में घर से तिरछी पगडंडी से होकर बगल की पहाड़ी पर गया। पगडंडी से ठीक नीचे गहरे नीले रंग की ‘ब्लू लाफिंग थ्रस’ यानी  कलचुड़िया यहां-वहां कीड़े-मकोड़े खोज रही थी। मैं बिना हिले-डुले देर तक उसे देखता रहा। उसने दो-एक बार ठहर कर किसी को ‘स्वी ही ई ई’….की मधुर आवाज दी। शायद साथिन से कुछ कहा हो। ‘खग ही जाने खग की भाषा’! मैं कुछ नहीं समझा।

आगे पहाड़ी पर पत्थरों की दीवाल के साथ खड़े किरमोड़े, घिंघारु आदि की झाड़ियों और बांज के पेड़ों पर चहकती कई रंग-बिरंगी चिड़ियां दिखाई दीं। देर तक उन्हें देखता, सुनता रहाः

पिईप…पिईप…पिईप…

चीं चीं चीं ई ई ई….चीं वीं चीईई

चुह्…..चुह्…चुह्…

ह्वी चीची…ह्वी चीची…ह्वी चीची…

हो ओ ओ…हो ओ ओ….हो ओ ओ…

हो S ट ह S हो S ट है

कुर…कुर…कुर…कुर…कुर…

चीं चीं चीं ई ई ई…चीं वीं चींवीं चीं ई ई

ह्वीई ट्वीट….ह्वीई ट्वीट…

इस आखिरी आवाज को सुन कर सुमित्रानंदन पंत की ‘बांसों का झुरमुट’ कविता की पंक्तियां याद हो आईंः

बांसों का झुरमुट

संध्या का झुटपुट

हैं चहक रहीं चिड़ियां

टी-वी-टी टुट्-टुट्

यहां आए चार दिन हो गए हैं। इन चार दिनों में कितने सुंदर, रंग-बिरंगे पक्षी देख चुका हूं। सुबह और दोपहर बाद आसपास के पेड़ों पर व आंगन में काले सिर, आसमानी नीले रंग के पंखों और पीली-नारंगी चोंच वाली ‘ब्लू मैगपाई’ यानी गांव की भाषा में ‘बंसरियां’ आ जाती हैं। यहां-वहां पेड़ों तक उड़ान भरती हैं। नीचे खेतों में पानी के हौज के पास टहलती हैं और फिर ‘टि टि टी…काका…’ कहते हुए नीचे हरे-भरे बांज के जंगल की ओर तैरते हुए उड़ान भरती हैं। कभी आंगन के आगे लगे तार या सूखी शाख पर बुलबुल का जोड़ा आकर बैठ जाता है। इन बुलबुलों की पूंछ के नीचे पीले रंग का धब्बा है। नीचे शहरों में तो मैंने अब तक लाल धब्बे वाली ‘रेड वेंटेड’ बुलबुलें ही देखी हैं। ये पीले धब्बे वाली शायद ‘ह्वाइट इयर्ड बुलबुल’ है।

कल सुबह किलमोड़े की झाड़ी में गौरेया के आकार की काली-लाल और ग्रे-पीले रंग की बहुत सुंदर दो चिड़ियां देखीं। रंग-रूप अलग, फिर भी दोनों साथ? दोनों में इतना मेल? मैं चौंका। लेकिन, सालिम अली की किताब ‘द बुक आफ इंडियन बर्डस्’ से बाद में पहचाने की कोशिश की तो पता लगा वे दो अलग चिड़ियां नहीं बल्कि ‘स्कार्लेट मिनिवेट’ यानी पहाड़ी बुलालचश्म का जोड़ा है। वाह! पति-पत्नी दोनों अलग-अलग आकर्षक रंगों की परिधान में!

वहीं शाखाओं-टहनियों पर यहां-वहां फुदकती, उड़ती पीली-काली ‘आयोरा’, काली-सफेद ‘ग्रेट टिट’ और नीली-सफेद ‘फ्लाइ कैचर’ भी देखीं। झाड़ियों में भोजन खोजती ‘जंगल बैबलर’ यानी ‘मुशिया चड़ी’ (सात भाई) दिखाईं दीं। मैनाएं यानी सिटौले चार-छह के झुंड में आकर कभी आंगन में अनाज के दाने खोजते और कभी चुर्र…चुर्र…चुर…चुर…करते गाय-भैंसों के आसपास गोबर में कीड़े-मकोड़े ढूंढने लगते। वे गाय-भैसों की पीठ या सिर पर और कभी सींगों पर बैठ कर चुर्र…चुर्र…चहकती रहीं। परसों सुनसान आंगन में ‘हूपो’ यानी हुदहुद भी कीट-पतंगे खोज रहा था। बादामी रंग के हुदहुद की पीठ पर काली-सफेद जेब्रा-पट्टियां कितनी सुंदर लगती हैं और सिर पर फैली कलगी का ताज भी!

आंगन में अनाज के दाने खोजने फाख्ते (घुघुते) भी आए। लगता था गले में जैसे दानेदार माला पहनी हो। आसपास किसी के आने की आहट पाते ही वे पंखों की ताली बजा कर उड़ जाते और आसपास ही किसी पेड़ की डाल पर बैठ जाते। डाल पर बैठे-बैठे कभी कूजने लगते…कुरूरू…कुरूरू…

हमारी दुनिया को सचमुच कितना सुंदर बना देती हैं ये रंग-बिरंगी चिड़ियां!

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