एक अंतरंग समाज की पुनर्रचना-बटरोही

 

cover  अपनी जड़ों से जुड़े बचपन के लापरवाह सामाजिक ताने-बाने को याद करते ही दिमाग में हमेशा एक ही किताब का बिंब उभरता रहा है: रसूल हमज़ातोव का ‘मेरा दागिस्तान’। हालांकि आज का दागिस्तान मन में दहशत पैदा करता है, मगर जिन दिनों यह किताब पढ़ी थी, रसूल हमजातोव से अधिक आत्मीय कोई और परिजन तथा दागिस्तान से अधिक सुंदर कोई और जगह दिखाई ही नहीं देती थी।… हम अपने गाँव-कस्बों में दागिस्तान-जैसा ही पहाड़ी परिवेश और अपने परिजनों के बीच रसूल के परिजनों को खोजने लगते! ऐसा ही अनुभव हुआ था, पिछले दिनों देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ को पढ़ते हुए। देवेंद्र मेवाड़ी सुपरिचित विज्ञान-कथाकार और प्रकृति को उसके नैसर्गिक रूप में जीने के साथ-साथ अकादमिक ज्ञान से समृद्ध लेखक हैं, इसलिए इस किताब को पढ़ना एक अलग तरह की समृद्धि प्रदान करता है। उनका बचपन घने जंगलों और जंगली पशुओं से घिरे कठिन, मगर स्वप्निल परिवेश के बीच बीता है। वनस्पति-विज्ञान में एम. एससी करके उस परिवेश की उन्होंने अकादमिक विशेषज्ञता हासिल की, जिस कारण उनके विचारों और अभिव्यक्ति में गंभीरता और विश्वसनीयता आई, उससे इस किताब का महत्व और अधिक बढ़ गया है। ऐसी रचनाओं में एक खास तरह के नाॅस्टेल्जिया का भी खतरा रहता है; यह एक सुखद अहसास है कि देवेंद्र मेवाड़ी उससे काफी सीमा तक बचे रह सके हैं।

‘मेरी यादों का पहाड़’ की विषयवस्तु नैनीताल जिले के एक छोटे-से गाँव कालाआगर से जुड़ी है… यह गाँव अपने भौगोलिक और सांस्कृतिक रूपाकार में इलाके के दूसरे गाँवों से किसी भी रूप में अलग नहीं है!… एक परिवार है, जिसमें एक असाक्षर, अभावग्रस्त पहाड़ी काश्तकार पिता और उम्र के लिहाज से छोटा, मगर स्नेह से लबालब विराट जीवन लेकर आई हुई माँ हैं, जिन्हें अपनी दूर ब्याह दी गई बेटी, कठिन खेतों के बीच झोंक दिये गए बड़े बेटे, किसी तरह पढ़ा-लिखा कर मुख्यधारा का हिस्सा बनाए गए मँझले बेटे और अपनी हैसियत से कहीं अधिक, उच्चशिक्षा का सपने देखने वाले छोटे बेटे से जुड़े सपनों को पूरा करना है। अनपढ़ माँ के पास अपनी संतानों को देने के लिए भोर की किरण से लेकर रात के अँधेरे तक हर पल कठोर धरती से जूझती हुई कठिन जिंदगी और लोक-विश्वासों, किस्से कहानियों की संपदा के अलावा अधिक कुछ नहीं है… और बच्चों के पास उस सीमित भौगोलिक परिवेश में देखे गए ब्रह्मांड से भी विराट सपने हैं… जो जिंदगी का लगभग असंभव फलक लगता है, मगर लेखक अपने असाधारण किस्सागो-शिल्प के द्वारा अपने निजी अनुभवों को इस तरह एक आम पहाड़ी बच्चे के अनुभव बना देता है कि प्रकृति और उसके बीच अपनी जगह तलाशता, इस धरती पर आया हुआ हर संवेदनशील व्यक्ति उन सवालों के साथ उसी उसी तीव्रता के साथ जूझने लगता है। यही नहीं, लेखक के जीवन के इस इतिवृत्त को पढ़ने के बाद उसके पिता, माँ, बहिन और भाई उसके नहीं रहते, वे और उनका समूचा संसार उसके समाज के प्रतिनिधि बन जाते हैं… निजी अस्मिताओं का सामाजिक अस्मिता में इस प्रकार विलय हो जाता है कि पाठक स्वयं को उस परंपरागत भारतीय समाज का हिस्सा अनुभव करने लगता है, जिसमें व्यक्ति-इकाई के लिए कोई स्वतंत्र जगह नहीं थी!… जो भी निजी जीवन के रूप में है, वह सब समाज के लिए है।… दरअसल लेखक की यह जीवन-यात्रा प्रकृति और मनुष्य की एक दूसरे के साथ कदम मिलाकर, आत्मीय जगह तलाशने का उपक्रम है। लेखक की आत्मकथा के रूप में शुरू हुआ यह विवरण पाठक को जल्दी ही अपनी आत्मकथा अनुभव होने लगता है। हालांकि लेखक ने विवरण में जिस भाषा और कथन-भंगिमा का इस्तेमाल किया है, वह भी नितांत निजी और स्थानीय है, मगर किताब पूरी करते-करते यह अहसास पुख्ता हो जाता है कि यह यात्रा सिर्फ उसकी ‘निजी’ नहीं है… पाठक इसके जरिए एक वृहत्तर (कुमाउंनी) समाज और परिवेश की अधिक प्रामाणिक यात्रा करने का अहसास करने लगता है।

किताब कुल 21 अध्यायों में विभक्त है। हर अध्याय लेखक के गाँव के इर्दगिर्द, जिसका एक ग्रीष्मकालीन पर्वतीय छोर है और दूसरा सर्दियों के प्रवास के लिए मैदानी छोर… के बीच की यात्रा प्रस्तुत करता है। इसी के बीच वह छोटी-सी दुनिया है, जो आकार में भले ही छोटी दिखाई दे, वहाँ भरा-पूरा एक संपूर्ण पहाड़ी समाज निवास करता है। उसमें बच्चों को शिक्षा और जीवन के शुरूआती संस्कार देने वाले अध्यापक और माँ-बाप हैं, देवी-देवता हैं, तीज-त्योहार हैं, शादी-विवाह, घर से बिछुड़ने वाली बहिन की कसक और नई आने वाली भाभी का स्नेह-संबल, कठिन-से-कठिन जिज्ञासा को अपने लोक-विश्वासों से चुटकी में शांत कर देने वाली माँ है और मनुष्य और धरती के पारस्परिक सद्भाव भरे श्रम से पैदा की गई फसलों के साथ जुड़े किस्सों-कहानियों का भरा-पूरा संसार है, जो पेट की भूख को ही नहीं, सामाजिक स्नेह-सद्भाव का विस्तार करते हुए मानवीय संवेदना के स्रोतों को भी अधिक उर्वर बनाता है…! यहाँ वनवासी लोगों के जीवन के वे सारे पक्ष हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं और जिनका एक दूसरे के बिना अस्तित्व संभव नहीं है।… और ये जीवन के वे पक्ष हैं जिनके बारे में हम कभी अलग से नहीं सोचते!…

आदमी के सांस्कृतिक व्यक्तित्व (संस्कारों) का निर्माण करने वाली इन विशेषताओं के अलावा उसके चारों ओर हवा-पानी की तरह बिखरी हुई तमाम नियामतों के सौंदर्य का लेखक ने परिचय दिया है, जिनके बिना मनुष्य का अस्तित्व ही संभव नहीं है।‘गोरु-बाछ’ में पालतू पशुओं, ‘घुघुती बासेंछी… कुरू…रू’ में मनुष्य को भावनात्मक और भौतिक संबल देने वाले पक्षियों, ‘धुर-जंगल, घ्वैड़-काकड़’ में आदमी और प्रकृति दोनों को समान रूप से संरक्षण देने वाले वन्य जीवों के आत्मीय प्रसंग तो हैं ही, रोजमर्रा के जीवन में हमारी जीवन-शैली को सुविधापूर्ण बनाने वाले लकड़ी, धातु, मिट्टी आदि से उपयोगी वस्तुएँ गढ़ने वाले मानवीय सरोकारों से लबालब कारीगर हैं और एक दूसरे के अस्तित्व की ही नहीं, उनका अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने वाले मनुष्य के अस्तित्व की भी चिंता करने वाली निष्काम गायक चिड़ियों, खतरे से सावधान करने वाले पक्षियों, अपने अस्तित्व को संकट में डालकर दूसरों को जीवन-दान देने वाले जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों का भरा-पूरा संसार है इस किताब में जो मनुष्य और प्रकृति के सहभाव की ही नहीं, आदमी को जीने का प्रेरक और खूबसूरत आधार भी देते लगते हैं।

‘मेरी यादों का पहाड़’ उस सामुदायिक सह-अस्तित्व का खूबसूरत आईना है जिसे आदमी ने अपने और चारों ओर फैली प्रकृति की सुरक्षा के लिए बड़ी मजबूती से बुना है, मगर दुर्भाग्य से जो आज भौतिक आपाधापी में तेजी से नष्ट होता जा रहा है। हालांकि इस तरह के विलुप्ति के कगार में जी रहे समाजों को लेकर बहुत लिखा गया है, अकादमिक दृष्टि से भी और रचनात्मक विधाओं की अभिव्यक्ति के रूप में भी… ‘मेरी यादों का पहाड़’ इनसे एकदम अलग, मन को ज्यादा गहरे उद्वेलित करने वाली किताब है। इसका कारण यह है कि प्रकृति को लेकर लेखक की ये ऐसी प्रतिक्रियाएँ हैं जिनमें लेखक उसके साथ आत्मीय संबंधी की तरह बतिया रहा है। यह बतियाना उन्हीं की भाषा और उन्हीं की शैली में है, इसलिए पाठक स्वयं को पूरी तरह उस परिवेश का हिस्सा अनुभव करने लगता है। अपने कथ्य को अधिक विश्वसनीय और रोचक बनाने के लिए लेखक उन लोक-विश्वासों, किंवदंतियों और किस्सों भी सहारा लेता है जिन्हें प्रकृति ने ही अपने आत्मीय गर्भ से जन्म दिया था:

‘‘उन दिनों सैकड़ों पक्षी मेरे गाँव की जमीन, खेतों में खड़े पेड़-पौंधों और गाँव की सरहद से लगे डान्-कानों और घने हरियाले जंगलों में रहते थे। उनकी आवाजों, उनकी उड़ानों और उनकी हरकतों से ऋतुओं और मौसमों का तक पता लग जाता था। गोंतली (अबाबील) हवा में मौज से स्वांई करके तेज उड़ने लगती तो बाज्यू कहते, ‘द्यौ (बारिश) होने वाला है। बाज जैसी बौड़ै चिड़िया ऊँचे आसमान में थर-थर, थर-थर पंख थरथराती एक ही जगह टिक जाती तो कहते, बौड़ै थाक लग रही है, अब बरखा आएगी। आसमान में उड़ते हुए कोई चिड़िया जोर से ‘टिटिट…टिटीट…टीट…टीट…’ की आवाज़ लगाती तो ईजा कहती थी, ‘देख बौड़ै अगाश से कह रही है – सरग दिदीऽऽपानि-पानि’ मतलब ‘आकाश दीदी, पानी बरसा, पानी बरसा!’ भादो-असौज में शरद् ऋतु होते ही गौरैयों जैसी छोटी-छोटी पीले रंग की चिड़ियाँ आ जातीं तो ईजा बताती, ‘वो देख, ह्यों चड़ी आ गई है। अब ह्यों (हिम) गिरेगा।’ जंगलों में कफुवा (कुक्कू) बासने लगता तो गर्मियों की शुरूआत हो जाती और बहू-बेटियों को मायके की याद सताने लगती थी। आँख खुलते ही ठींग के धूरे से कफुवा के बोल सुनाई देने लगते, ‘कुक्कू! कुक्कू! कुक्कू!’ वह तो थकता ही नहीं था।…

वनवासी समाज में पशु-पक्षियों और पेड़-पौंधों का संसार आदमी के अस्तित्व के साथ इतना जुड़ा रहता है कि उनकी स्वतंत्र रूप में कल्पना संभव ही नहीं है। हालांकि यह स्थिति हर उस समाज में है, जहाँ उनका संबंध एक-दूसरे के अस्तित्व के साथ जुड़ा है, मगर दूर-दूर छिटकी हुई बस्तियों और मुख्यधारा के संसाधनों के अभाव के कारण पहाड़ों में अकेलापन अधिक सालता रहा होगा, इसलिए शेष प्रकृति के साथ यह वार्तालाप कहीं अधिक स्थायी और मुखर दिखाई देता है। हर पशु-पक्षी को, जो परिवार या गाँव से जुड़ा रहता, उसे नाम से पुकारा जाता; यहाँ तक कि वृक्षों-वनस्पतियों की भी संज्ञाएँ रहतीं, उनके नाम रहते और उनके सामने अकेलेपन के उद्गार व्यक्त होते और दुख-सुखों का आदान-प्रदान होता: ‘आहिएऽऽ लेऽऽ! ले गुजारा (बैल का नाम) ले!’… ब्याने वाली गाय-भैंसों का संवेदनशील मनुष्यों की तरह का ख्याल रखा जाता था, उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता और बछड़ों का नामकरण-संस्कार किया जाता।… ‘हम बच्चे उनकी आवाज़ का मतलब समझ लेते थे। अगर भैंसों को भूख लग जाती तो अड़ातीं (पुकारती) ‘ह मांऽऽ।’ अगर थान पर बँधी भैंसों को चरने के लिए खोलने में देर हो जाती तो वे इसी आवाज़ को लंबा कर देतीं… ‘हमां ऽऽऽ ह’,… कभी किसी भैंस का बच्चा आगे-पीछे रह जाता तो वह बेचैनी से इधर-उधर देखकर जल्दी-जल्दी अड़ाती… ‘ह्वैं ऽऽऽ ह्वैं ऽऽ।’ खुद भटक जाने पर बहुत लंबी आवाज़ में अड़ाती… ‘अमां ऽऽऽऽ ह्… अमां ऽऽऽऽ ह्…।’ और, अगर कहीं आस-पास डर-वर महसूस करती या तेज आँधी में फँसतीं तो अड़ातीं… ‘ह्आं ऽऽऽ ह्।’…

‘‘ब्याने वाली गाय-भैंस की खास देखभाल की जाती थी। उसे ऊँची-नीची अठवारी (असुविधाजनक) जगह पर नहीं जाने दिया जाता था। ब्याने पर बछिया या थोरी भरपेट मां का दूध पीतीं। बाकी दूध निकाल कर गरम करके हमें दिया जाता था। उसे ‘लौद्य’ (बिगौत) कहते थे। मोटा दूध होता था वह। दस-पाँच दिन हम भी बिगौत पीते। ग्यारहवें दिन बछिया या थोरी (भैंस का मादा बच्चा) का नामकरण करने के लिए ‘बध्वान’ पूजा जाता था। थोरी का ‘बध्वान’ कुछ लोग पाँचवें या सातवे दिन भी कर लेते थे। बध्वान के दिन मकान के गोठ में सुबह ही थोड़ी जगह साफ-सूफ कर ली जाती। हम भाग कर तिमिल के चैड़े पत्ते तोड़ लाते। धूपबत्ती के लिए कुर्ज की पत्तियाँ ले आते। तब तक ददा ताज़े गोबर के थोपे की गोल मोटी और बीच में धूनी जैसी गहरी भराड़ी बना लेते। जले कोयले रखने के लिए अंगीठी बनाते। तिमिल के पात को मोड़कर, उसमें पानी भरकर भराड़ी के चारों ओर धार डालते। फिर उसी पत्ते से भराड़ी में दूध, दही और नौनी भर देते। तिमिल के पाँच पत्तों में ब्याए हुए गोरू या भैंस के दूध की खीर बनाकर द्योथल बनाते। कुर्ज की पत्तियों में नौंनी मिलाकर उसे जले कोयलों पर रखते। उससे धूप का खूब सुगंधित धुआँ उठने लगता। माथे पर नौनी का टीका लगाते। हाथ जोड़कर गोरू-भैंस और उसकी नई जन्मी बाछी या थोरी की कुशल के लिए दड़ी-मोटी रहने, खूब जीने और घर-गुसैं सबके लिए सुभागी होने की प्रार्थना करते। फिर अपनी पसंद से बाछी-बाछे या थोरी का नाम रख देते। बध्वान की पूजा के साथ-साथ ‘गोधनी महर’ की भी पूजा करते थे कि ‘हे गोधनी, दैन भए (भला करना), हमारे गाय-भैंसों की रक्षा करना।’ मान्यता है कि बहुत पहले गोधनी नामका एक ग्वाला था, भैंसों को अपना परान (प्राण) मानना था। मरने के बाद वह भैंसों की रक्षा करने वाला देवता बन गया।…

‘मेरी यादों का पहाड़’ लेखक देवेंद्र मेवाड़ी की आत्मकथात्मक स्मृतियाँ हैं, लेकिन वे सिर्फ इतनी ही नहीं हैं, एक ऐसे समाज की प्रेरक स्मृतियाँ हैं जो अपने भोलेपन, वचन-बद्धता और प्राणिमात्र के प्रति करुणाभाव के लिए जाना जाता रहा है। यह परंपरा अब बहुत तेजी से अतीत बनती जा रही है, काफी हद तक बन ही चुकी है; देवेंद्र मेवाड़ी ने उन्हें उनके मूल रूप में सुरक्षित रखा है, यह इस किताब का उल्लेखनीय योगदान है। किताब की एक अन्य अपूर्व विशेषता यह भी है कि यह पहाड़ी समाज का उसके चारों ओर फैली प्रकृति के साथ किया गया सनातन संवाद है… प्रकृति के साथ उसके रिश्तों का बारहमासा है।… चैत्र मास के देहरी-पूजन (फूलदेई) से लेकर शिशिर के बर्फीले माहौल के बीच प्रकृति के साथ मुक्त विचरण करता, नाचता-गाता यह समाज एक प्रकृति-पूजक समाज की बानगी-मात्र नहीं, मनुष्य और उसके परिवेश के रिश्तों की नई परिभाषाएँ गढ़ता है। ऐसे समय में, जब मनुष्य का रिश्ता प्रकृति के साथ शिथिल होता रहा हो, देवेंद्र मेवाड़ी की ये स्मृतियाँ मनुष्य को जीने के लिए सुंदर-सामथ्र्यवान सपने देकर आदमी और धरती के आपसी रिश्तों को अधिक मजबूत बनाने में निश्चय ही मदद करेंगी।

पुस्तक में कुमाउंनी शब्दों, मुहावरों और कथन-भंगिमा से जुड़े प्रयोगों की कहीं-कहीं अति पुनरावृत्ति दिखाई देती है। हालांकि लेखक ने यथासंभव उनके हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किए हैं, फिर भी चूँकि नए हिंदी समाज में ये शब्द अप्रचलन में आ गए हैं, इसलिए उनका ठीक वही आशय पाठक के द्वारा ग्रहण कर पाना कठिन होगा। इस संदर्भ में दो सुझाव दिए जा सकते हैं: पहला यह कि अपना पक्ष रखने के लिए लेखक ने पुस्तक के अंत में ‘ये जाने-अनजाने आँखर’ नामक जो टिप्पणी दी है, उसे पुस्तक के आरंभ में दिया जाना चाहिए, जैसी कि मनोहरश्याम जोशी ने अपने उपन्यास ‘कसप’ में ‘कुमाउंनी-हिंदी’ शीर्षक से दी है; दूसरे, जिन संवादों को मूल कुमाउंनी में दिया जाना आवश्यक हो उन्हें ही मूल में दिया जाए, बाकी में उनका हिंदी रूप देना ही ठीक होता, बशर्ते कि वहाँ मूल शब्द का चरित्र न बिगड़ रहा हो। इसके बावजूद पुस्तक में भाषा, हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ एकदम नहीं हैं, जो बड़ी बात है।

किताब के साथ मानसी मेवाड़ी के रेखांकन आकर्षक और प्रभावशाली हैं जिन्होंने किताब में एक समानांतर संसार ही रच डाला है।

 

 

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