आदमी उड़ा आसमान में

पहली उड़ान
पहली उड़ान

रितिक बहुत देर से चिड़ियों को उड़ते हुए देख रहा था। कबूतर पंख फटफटा कर आसमान में उड़ रहे थे। कौवा कांव-कांव कर कभी छत पर बैठता और कभी उड़ कर ऊंचे तार पर बैठ जाता। छोटी सी गौरेया दाने चुगते-चुगते उसके पास तक आ जातीं। वह हाथ बढ़ाता तो फुर्र से उड़ जातीं।

चिड़ियों को उड़ते हुए देख कर रितिक का मन बैचेन हो गया। सोचने लगा- अगर उसके भी पंख होते तो वह भी आसमान में उड़ता। लेकिन, पंख तो हैं नहीं। तब?

दादा जी धूप में बैठ कर अखबार पढ़ रहे थे। रितिक उनके पास गया और पूछा, “दादा जी, दादाजी! यह बताइए कि हमारे पंख क्यों नहीं होते? ”

दादा जी समझ गए। रितिक ऐसे अजीब-अजीब से सवाल उनसे पूछता ही रहता है। वे बोले, “क्योंकि कुदरत ने हमें ऐसा ही बनाया है।”

“नहीं, तो पंख क्यों नहीं बनाए? ”

“यह तो कुदरत ही बता सकती है। लेकिन, पंख होते तो तुम क्या करते? ” उन्होंने पूछा।

“उड़ता….दूर तक आसमान में उड़ जाता। बुआ के पास चला जाता…. ”

“बस…बस…खेलने के लिए आसपास निकल जाते हो तो खोजना मुश्किल हो जाता है। पंख होते तो तुम न जाने कहां-कहां भटकते रहते।”

“लेकिन, कितना मजा आता दादा जी….मैं यहां उड़ता….वहां पहुंच जाता। वहां से वहां। वहां बादलों तक….” फिर मायूस होकर धीरे से कहा, “लेकिन, पंख तो हैं नहीं हमारे पास।”

दादा जी बोले, “पंख नहीं हैं तो क्या हुआ? आदमी तो फिर भी आसमान में उड़ रहा है। क्यों ठीक है? उड़ ही नहीं रहा है बल्कि चांद-तारों की दुनिया खोज रहा है।…..लेकिन हां, बेटे जैसे अभी तुम सोच रहे हो, वैसे ही हमारे पुरखों ने भी सोचा होगा… ”

“हमारे पुरखों ने? ” रितिक ने पूछा।

“हां, हमारे आदिमानव पुरखों ने। वे गुफाओं में रहते थे। जंगलों में कंद-मूल खाते थे। जानवरों का शिकार करते थे। वे भी जब चांद-सितारों को देखते होंगे तो चौंक जाते होंगे। उन्हें पा लेने का सपना देखते होंगे। उनका मन भी चिड़ियों की तरह उड़ कर सूरज और चांद-सितारों तक पहुंच जाने को मचलता होगा…बिल्कुल तुम्हारी तरह। लेकिन, उनके पास भी पंख नहीं थे। फिर भी, आदमी उड़ा आसमान में…. ” दादा जी बोले।

“तो उड़ा कैसे, दादा जी? आदमी कैसे उड़ा? ”

“उड़ने की तो मजेदार कहानी है…. ”

“तो सुनाइए ना… ”

“सुनाऊंगा….सुनाऊंगा…पहले सभी बच्चों को बुलाओ। नहीं तो सब को अलग-अलग सुनाना पड़ेगा। रिशिका, शिविका, नवल सब को बुला लो।”

रितिक सभी बच्चों को बुला लाया। फिर बोला, “अब बताइए दादा जी, आदमी के उड़ने की कहानी… ” और, इसके साथ ही हवा में उड़ने के लिए हाथों को चिड़ियों के पंखों की तरह हिलाने लगा।

दादा जी ने सभी बच्चों की ओर देख कर प्यार से कहा, “तो सुनो कहानी….जब हमारे पुरखों ने चिड़ियों को उड़ते देखा तो उनके मन में भी पंख लगा कर आसमान में उड़ने की इच्छा हुई। लेकिन, पंख कहां से आएं? तो, पहले वे किस्से-कहानियों में उड़े।”

“किस्से-कहानियों में कैसे दादा जी? ” रिशिका ने शरमाते हुए पूछा।

“ऐसे कि उन्होंने उड़ने की कहानियां गढ़ लीं। उनमें कल्पना के पंखों से उड़ने लगे। हमारी पुराण कथाओं में तो न जाने कितने देवता उड़ रहे हैं। कोई गरूड़ पर बैठा उड़ रहा है, तो कोई मोर पर। हंस और उल्लू पर भी देवियां उड़ रही हैं। पुष्पक विमान में भी उड़ान भरी गई है। इतना ही नहीं हनुमान को तो वायुपुत्र ही मान लिया गया है। वे बिना पंखों के उड़ रहे हैं।”

“और कौन उड़े बिना पंखों के? दादा जी? ” शिविका ने धीरे से पूछा।

“और? गिलगामेश उड़ा।”

“गिलगामेश कौन? ”

“आज जहां इराक है- वहां सदियों पहले सुमेर सभ्यता पनपी थी। वहां करीब नौ हजार वर्ष पहले की एक मिट्टी की किताब मिली है। उसमें गिलगामेश की कहानी दी गई है। वह आसमान में उड़ कर नीचे धरती को देख कर उसके बारे में बताता है। और, यूनान की एक पुराण कथा में तो डीडालस और इकारस ने सचमुच पंख लगा कर उड़ने की कोशिश की।…. ”

“अब ये डीडालस और इकारस कौन हैं दादा जी? ” नवल ने अजीब से नाम सुन कर पूछा।

“वे यूनान के निवासी थे नवल। इकारस डीडालस का बेटा था। वहां की पुराण कथा में बताया गया है कि मिनोस नामक राजा ने डीडालस से एक भूलभुलैया बनवाया….जैसा लखनऊ में है। बाद में राजा नाराज हो गया। उसने बाप-बेटे को उसी भूलभुलैया में कैद कर दिया।”

“तो फिर क्या हुआ दादा जी? ” रितिक ने पूछा।

“फिर, डीडालस ने दोनों के लिए नकली पंख बनाए। उन्हें मोम से पीठ पर चिपकाया। इकारस से उसने कहा- बहुत ऊंचाई में मत उड़ना। न बहुत नीचे उड़ना। फिर उन्होंने भूलभुलैया की ऊंची दीवार से हवा में छलांग लगा दी। इकारस उड़ते-उड़ते ऊपर और ऊपर जाता रहा। तब सूरज की गर्मी से मोम पिघल गया। पंख टूट कर गिर गए और इकारस आसमान से जमीन पर आ गिरा।”

“तो फिर आदमी आसमान में उड़ा कैसे? ” शिविका ने पूछा।

“उसने चिड़ियों को गौर से देखा। इस बात का पता लगाया कि हवा से भारी होने पर भी चिड़ियां कैसे उड़ती हैं। जानते हो, एक महान चित्रकार हुए हैं- लियोनार्दो द विंची। उन्होंने भी चिड़ियों को देख कर आदमी के उड़ने के लिए उड़न मशीन के डिजायन बनाए थे। तो, यों समझो कि कुछ लोग कथा-कहानियों में उड़ने की कल्पना करते रहे और कुछ उड़ने के लिए मशीनों के डिजायन बनाने लगे। उड़ने की दूसरी तरकीबें सोचने लगे।”

“दूसरी तरकीबें कैसी? ” नवल ने पूछा।

“जैसे गुब्बारे। उन्होंने बड़े-बड़े गुब्बारों में उड़ने की बात सोची। 1781 के आसपास की बात है। फ्रांस में दो भाई थे- जोसेफ और जैकुइस मोंतगोल्फीअर। उन्होंने धुएं पर ध्यान दिया। देखा, धुआं उड़ता है। उन्होंने कागज का बड़ा-सा गुब्बारा बनाया और उसमें गरम हवा भर कर उसे आसमान में उड़ा दिया। बाद में पतले कपड़े के गुब्बारे बनाए। जानते हो, 17 सितंबर 1783 के दिन एक गुब्बारे में उन्होंने एक मुर्गा, एक भेड़ और एक बत्तख उड़ाई! ”

“क्या उनके गुब्बारे में आदमी भी उड़ा? ”

“हां, उसके बाद अक्टूबर 1783 में उनके गुब्बारे में पहली बार एक आदमी उड़ा। उसका नाम था पिलात्र द रोजिए। यह बड़ी हिम्मत की बात थी। अब तो दुनिया भर में लोग गर्म हवा के गुब्बारों में आराम से सैर करते हैं। तुम भी किसी दिन गुब्बारे की सैर करना।”

“दादा जी, गुब्बारा तो हवा के साथ उड़ता होगा। उसे इधर-उधर कैसे उड़ाते थे? ”

“गुब्बारों के नीचे टोकरी में इंजन और पंखा लगा कर। इनसे उसे आसमान में इधर-उधर मोड़ भी सकते थे। उसके बाद भी लोग दूसरे तरीकों से उड़ने की  कोशिश करते रहे। जर्मनी के बर्लिन शहर में एक इंजीनियर था-आटो लिलिएनताल। उसने लकड़ी और कपड़े के बड़े-बड़े पाल जैसे पंखों से ग्लाइडर बनाया और उड़ने के लिए एक पहाड़ी की चोटी से कूद पड़ा। लोग यह देख कर आश्चर्य में पड़ गए कि वह पतंग की तरह उड़ रहा था। एक दिन वह तेज हवा से ग्लाइडर उलट जाने के कारण जमीन में गिर कर अपनी जान गंवा बैठा।”

“दादा जी, क्या किस्से-कहानियों में फिर भी लोग उड़ते रहे? ” नवल ने पूछा तो दादा जी बोले, “हां बेटे, उड़ते रहे और आज भी उड़ रहे हैं। जूल्स वर्न और एच.जी.वेल्स ने तो ऐसी कहानियां लिखीं कि पढ़ने वालों को बस चांद तक पहुंचने का आनंद ही आ गया। आज भी कई ग्रहों-उपग्रहों और अनजान ग्रहों की बड़ी मजेदार कहानियां लिखी जा रही हैं। लोग कल्पना में उन अनजान ग्रहों तक उड़ रहे हैं।”

“लेकिन दादा जी, लोग तो हवाई जहाज में उड़ते हैं, ” शिविका ने कहा तो रितिक तुरंत बोला, “लोग क्यों, हम भी उड़े हवाई जहाज में। हम बंगलौर तक हवाई जहाज में गए और वापस आए। दादा जी, हम बादलों के ऊपर भी उड़ रहे थे। कितना आनंद आया…. ”

“हवाई जहाज की तो बात ही निराली है रितिक। लेकिन, बेटे मैं तो उन दिनों की बात कर रहा हूं, जब हवाई जहाज थे ही नहीं।”

“क्या कहा दादा जी, हवाई जहाज नहीं थे? ” नवल ने पूछा।

“हां बेटे, हवाई जहाज को बने बहुत समय नहीं हुआ है। अपने हाथों से बनाई हुई उड़न मशीन में आदमी पहली बार 1903 में उड़ा था। और, वह भी कितनी देर? केवल 12 सेकेंड! ”

बच्चे सुन कर हैरान रह गए। कुछ देर सोच कर रितिक ने पूछा, “दादा जी वह पहला हवाई जहाज किसने बनाया था? ”

“राइट बंधुओं ने। वे भी दो भाई थे- आर्विले और विल्बर। उन्होंने अमेरिका में किटी हाक की पहाड़ी ढलान पर 17 दिसंबर 1903 को पहली बार अपनी उड़न मशीन उड़ाई। उसमें पेट्रोल का इंजन लगा था। लकड़ी की पट्टियों पर कपड़ा कस कर पंख बनाए थे। पहले आर्विले उड़ा, 12 सेकेंड में 30 मीटर। फिर विल्बर ने उसे उड़ाया। वह 59 सेकेंड में 260 मीटर दूर तक उड़ा। इसके साथ ही आदमी का उड़ने का सपना साकार हो गया।”

“दादा जी, राइट बंधु तो एक मिनट से भी कम उड़े। लेकिन, अब तो लोग रात-दिन हवाई जहाजों में उड़ते हैं, ” रिशिका ने कहा तो दादा जी बोले, “ तुम ठीक कहती हो बिटिया, अब तो ऐसे-ऐसे हवाई जहाज बन गए हैं जो आवाज से भी तेज गति से उड़ते हैं। लोग इनमें बैठ कर आसमान की सैर करके दूर-दूर देशों में पहुंच जाते हैं। लेकिन, रिशिका आदमी की उड़ान हवाई जहाज पर ही समाप्त नहीं हो गई। उसका सपना तो चांद-तारों तक पहुंचना है।”

“वह तो ठीक है दादा जी, चांद पर आदमी पहुंच ही चुका है। लेकिन वहां, उतनी दूर तो अंतरिक्ष यान में जाते हैं, ” शिविका ने कहा तो दादा जी खु्श हो गए। बोले, “शिविका ठीक कह रही है। चांद-तारों की सैर के लिए आदमी ने अंतरिक्ष यान बनाए। उन यानों को पृथ्वी से राकेटों की ताकत से अंतरिक्ष में भेजा जाता है।”

“राकेटों की ताकत से क्यों? ” नवल ने पूछा।

“इसलिए नवल कि जब तुम अपनी गेंद आसमान में उछालते हो तो वह चांद-तारों की ओर नहीं जाती। पृथ्वी पर लौट आती है। हमारी पृथ्वी हर चीज को अपनी ओर खींचती है। यह गुरूत्वाकर्षण शक्ति कहलाती है। इसलिए राकेट की ताकत से अंतरिक्षयान को इतनी दूर भेज देते हैं कि वह इसकी गुरूत्वाकर्षण शक्ति से बाहर अंतरिक्ष में चला जाता है। सोवियत संघ ने पृथ्वी से पहली बार 4 अक्टूबर 1957 को ‘स्पुतनिक-1’ उपग्रह इसी तरह अंतरिक्ष में भेजा था। इस बात को 50 वर्ष हो गए हैं।”

“दादा जी, तब तो इसे हम अंतरिक्ष विजय के 50 वर्ष कह सकते हैं, क्यों? ” रितिक ने कहा।

“बिल्कुल कह सकते हैं रितिक। मानव के लिए अंतरिक्ष विजय के 50 वर्ष पूरे हो गए हैं। इन 50 वर्षों में उसने न केवल चांद पर कदम रखा बल्कि तमाम ग्रहों-उपग्रहों की खोज के लिए सौरमंडल में अपने कई अंतरिक्षयान भेजे हैं। उसके अंतरिक्षयान सौरमंडल से बाहर भी जा चुके हैं। लेकिन बच्चों, राकेटों अंतरिक्षयानों, अंतरिक्ष स्टेशन और अंतरिक्ष यात्रियों की तो अलग कहानी है… ”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *