लौटे हुए मुसाफिर

हमें उन दिनों जंगलों और जंगली जानवरों के बारे में पढ़ने का कितना शौक था! जिम कार्बेट की ऐसी कोई किताब नहीं जो हमने न पढ़ी हो। वे जंगल के चप्पे-चप्पे के बारे में लिखते थे। पढ़ कर ऐसा लगता जैसा हम खुद जंगल में घूम रहे हों। अच्छी बात यह थी कि वे जानवरों से प्यार करते थे। आदमखोर जानवरों को ही मारते थे। उनकी किताबें पढ़ते-पढ़ते हमें भी जंगल और जानवरों से प्यार हो गया।

यही प्यार हमें बार-बार चिड़ियाघर की सैर के लिए उकसाता। छुट्टियों में हम और कहीं जाएं या न जाएं, चिड़ियाघर जरूर जाते। आज भी वहां जाते रहते हैं। वहां जाते तो हैं लेकिन पिंजरों और बाड़ों में कैद जानवरों को देख कर अक्सर मन उदास हो जाता है। हाथी, गैंडा, शेर, बाघ, भालू, जिराफ, हिरन….तरह-तरह के पक्षी! हम पांचों  दोस्त सोचते रहते थे- कभी ये भी जंगल में रहते होंगे, अपने परिवार और साथियों के साथ। इन्हें जंगल याद आता होगा….

कई साल पहले की बात है। उस दिन भी हम चिड़ियाघर के भीतर पेड़ों की छांव में उदास बैठे थे। मैं, विजय, चेतन, मनु और मानसी। तभी एक मजेदार से अंकल आए और हमसे बातें करने लगे।

“क्या नाम है तुम्हारा? ”

हमने अपना-अपना नाम बताया।

“छुट्टी मना रहे हो? ”

“हां, ” हमने कहा।

“मैं गजानन हूं। प्रोफेसर गजानन।”

फिर पूछा, “यहां क्या-क्या देखा? ”

हमने जानवरों और चिड़ियों के नाम बता दिए।

“चीता देखा? ”

“चीता? चीता तो चिड़ियाघर में है ही नहीं। वह तो कब के खत्म हो गया है, ” मैंने कहा तो वे हंस कर बोले, “इसीलिए पूछा मैंने। अब चीता केवल चित्रों में है। तुम्हारी किताबों में है बस।…बुरा नहीं लगता? ”

“लगता है अंकल। बहुत बुरा लगता है।”

“तुम्हें पता है, कभी हमारे देश में हजारों चीते थे।”

“हजारों? ” चेतन ने चैंक कर पूछा।

“और, क्या? मुगल बादशाह अकबर के पास ही सिखाए हुए हजारों चीते थे। वह उन्हें शिकार पर ले जाता था। देश भर में खूब हाथी, गैंडे, शेर , भालू, बाघ, तेंदुए और कई तरह के जानवर पाए जाते थे।… ”

“तो कहां गए वे सब? ” मानसी ने पूछा तो मायूस होकर बोले, ”मारे गए, और कहां। उनका बुरी तरह शिकार किया गया। घने जंगल कटे तो जंगल में रहने वाले जानवरों के घर उजड़ गए। कई जानवर पकड़-पकड़ कर ऐसे चिड़ियाघरों में कैद कर दिए गए। बहुत बुरा हुआ दोस्तो।….वह सब देखोगे तो दिल भर आएगा।”

हमने हैरान होकर कहा, “हम कैसे देख सकते हैं वह सब? ”

उन्होंने हमारे नजदीक आकर रहस्य भरे अंदाज में कहा, “देख सकते हो दोस्तो, जरूर देख सकते हो। लेकिन, यह बात किसी को बताना मत। लोग विश्वास नहीं करेंगे।”

“लेकिन, हम देखेंगे कैसे? ” मनु ने उत्सुक होकर पूछा।

“मेरे साथ कालयात्रा पर चल कर। जैसे तुम यहां चिड़ियाघर की सैर पर आए हो, वैसे ही अतीत की सैर पर चल सकते हो, मेरे कालयंत्र में।”

“कालयंत्र? ”

“हां वहीं जिसे लोग टाइम मशीन भी कहते हैं।”

“टाइम मशीन कहां होती है? वह तो केवल कल्पना है, ” विजय ने कहा तो प्रोफेसर गजानन ने भेद भरे स्वर में कहा, “हां, लोग तो यही समझते हैं। लेकिन, कल्पना सच भी तो हो सकती है। हवाई जहाज भी तो कल्पना ही था। आज तो हम उसमें बैठ कर सफर कर रहे हैं। क्यों, सच है ना? ”

हमने हामी भरी और पूछा, “तो, हमें क्या करना होगा? ”

“कालयंत्र में मेरे साथ चलना होगा, बस। तुम लोग बहादुर बच्चे हो। अतीत की सैर करके अपनी आंखों से सब कुछ देख लोगे। अगर तुम लोग तैयार हो तो अगले इतवार को चलें? ” उन्होंने पूछा।

हम लोगों ने आपस में बातचीत की और इस रोमांचक सैर पर जाने को तैयार हो गए। वैसे भी स्कूल में हम लोग ‘डेयर डेविल्स’ कहलाते ही हैं। गजानन सर ने समय और जगह बता दी। इतवार को हम वहां पहुंच गए।

गजानन सर का कालयंत्र बड़ा मजेदार था। भीतर कार की तरह सीटें बनी थीं। हम जाकर उन पर बैठ गए। गजानन सर आगे तमाम बटनों के सामने बैठ गए। थोड़ी देर बाद बोले, “मैंने कालयंत्र को 642 साल पीछे सेट कर दिया है। तब चारों ओर घने जंगल रहे होंगे। चलो देखते हैं…हम चल रहे हैं दोस्तो, शुभ यात्रा… ”

और, हम चल पड़े। कालयंत्र थरथराया और चारों ओर अंधेरा छा गया। हम आंखें बंद किए बैठे रहे। रोशनी दिखाई देने पर हमने आंखें खोलीं। हम एक घने जंगल में पहाड़ी के पास उतरे थे। सामने भी विशाल जंगल फैला हुआ था। हमने देखा वह दूर-दूर तक ऊंची दीवाल से घिरा हुआ था। गजानन सर ने समझाया, कालयंत्र के भीतर ही बैठ कर बाहर का दृश्य देखना है। हमने यही किया।

अचानक हमने देखा उस घने जंगल में एक लंबा जुलूस चला रहा है। आगे-आगे झंडे और निशान लिए आदमी, फिर हाथी पर सवार शायद कोई राजा, उसके पीछे शिकार मारने के लिए सिखाए हुए चीते और जंगली बिलाव, उनके पीछे शिकारी कुत्ते। फिर हाथ पर बाज बिठाए घुड़सवार।

“दोस्तो हम दिल्ली में हैं। सुलतान फिरोज शाह तुगलक शिकार पर जा रहा है। हम अच्छे दिन आए। यह जुलूस दिख गया।”

तभी हिरन, नीलगाय और दूसरे जंगली जानवरों की आवाजें आने लगीं। वे जान बचा कर इधर से उधर भागने लगे। सिखाए हुए चीते और जंगली बिलाव शिकार पर टूट पड़े। चीतों ने हिरन पकड़े, बिल्लियों ने जंगली मुर्गियां और बाज खरगोश पकड़ने लगे। हमसे देखा नहीं गया। आंखें बंद कर लीं और गजानन सर से वापस लौटने को कहा।

वे बोले, “दोस्तो, यह दिखा कर मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता। बस, तुम्हें असलियत की झलक दिखाना चाहता हूं। इतिहास के कुछ पड़ावों पर ओर रूकेंगे। फिर अपने समय में लौट जाएंगे।”

कालयंत्र कई बार रुका। हमने कई मुगल बादशाहों को शिकार करते देखा। अकबर और उसके सिखाए हुए चीते देख कर तो हम हैरान ही रह गए। हजारों चीते! हमने जंगलों में सैकड़ों लोगों को खेदा करके हाथियों को पकड़ते देखा। ढोल-नगाड़े बजा कर और हो-हल्ला मचा कर हांका करके जानवरों का शिकार करते नवाबों और राजाओं को देखा। मचानों पर बैठ कर बंदूकों से जानवरों को मारते अंग्रेजों और अपने ही देश के शिकारियों की झलक देखी। जंगलों को कटते और जानवरों को भागते देखा।

वह सब देख कर हम बहुत दुःखी हो चुके थे। हमारी समझ में आ गया कि जंगलों में विचरते हमारे हजारों जानवर कहां गए। हमने गजानन सर से कहा, “सर, अब हम कुछ नहीं देखेंगे। हम लौटना चाहते हैं।”

वे बोले, “ठीक है, लौट जाते हैं। लेकिन, भविष्य नहीं देखोगे? ”

“भविष्य? ” हमने एक साथ पूछा।

“और नहीं तो क्या? कल क्या होगा तुम्हें क्या पता। तुम लोग चाहो तो अगले इतवार को फिर चिड़ियाघर आ जाना। तब चल पड़ेंगे भविष्य की सैर पर, ” गजानन सर ने कहा तो हमने उनसे कहा, “ठीक है सर। हम जरूर देखना चाहेंगे कि कल क्या होगा।”

वे मुस्कुराए, “मैं तो कालयात्री हूं दोस्तो। समय की सैर करता रहता हूं। जहां कहोगे चल पड़ूंगा।”

अगले इतवार को हम फिर चिड़ियाघर के पास पहुंचे। तय समय पर चिड़ियाघर की दीवार के पास एकांत में गजानन सर अपने कालयंत्र के साथ प्रकट हुए। हम पांचों ‘डेयर डेविल्स’ उनके कालयंत्र में बैठे और उड़नछू हो गए!

कालयंत्र जहां रुका, वहां से दूर-दूर तक चमचमाती शानदार इमारतें दिखाई दे रही थीं। गजानन सर ने बताया, हम 2070 में पहुंच गए हैं। सामने विशाल प्रवेश द्वार जिस पर अनेक जानवरों के सुंदर चित्र बने हुए थे। हम कालयंत्र में से उतर कर प्रवेश द्वार के पास गए। प्रवेश फ्री था। वहां दो चिम्पैंजी सुरक्षा गार्डों की तरह सबकी जांच कर रहे थे। चारों ओर कैमरे और मशीनें लगी थीं। जांच के बाद चिम्पैंजी एक छोटा-सा गोल टोकन दे रहे थे। हमने टोकन लिया। उन्होंने हमारी भाषा में हमें समझाया कि टोकन से किसी भी पिंजरे या बाड़े में जा सकते हैं। जानवरों को नजदीक से देख सकते हैं लेकिन उन्हें छूना मना है।

टोकन लेकर हम भीतर चले गए। भीतर दूर-दूर तक जानवरों के बाड़े बने थे। कई जानवर खुले बाड़ों में घूम रहे थे। पक्षी पिंजरों से निकल कर आसपास के पेड़ों पर जाकर चहकते और फिर पिंजरे में लौट आते।

हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि टोकन छुआ कर हम शेर, बाघ और गैंडे के बाड़े में जाने का खतरा क्यों मोल लेंगे? लेकिन, लोग उन बाड़ों में भी आराम से जा रहे थे। डरते-डरते हम भी बब्बर शेर के बाड़े में गए। वह हमें देख कर जोर से दहाड़ा। डर के मारे हमारी तो बस जान ही निकल गई। लेकिन, शेर पूंछ फटकारता हुआ शान से अपने बाड़े में ही घूमता रहा। वह हमें घूरता जरूर था लेकिन हम पर झपटा नहीं।

हैरान होकर हम दूसरे जानवरों के बाड़ों में भी गए। वहां न भालू ने हमें नोचा, न गैंडे ने सींग मारा और न चिंघाड़ते हाथी ने सूंड में लपेटा। वे तो बस अपने-अपने बाड़े में एक ही तरह से घूम-फिर रहे थे। जैसे उन्हें बताया गया हो कि एक इंच भी इधर-उधर नहीं होना है। चिम्पैंजी एक ही तरह के करतब दिखा रहे थे। गोरिल्ला बस छाती कूट रहा था। बंदर और लंगूर बाड़े से निकलते, पेड़ों पर चढ़ कर उछल-कूद मचाते और फिर बाड़े में आ जाते। फिर-फिर वही दुहराते।

हमने देखा बाड़े और पिंजरे बिल्कुल साफ-सुथरे थे। उनमें कोई गंदगी नहीं थी। न बंदर केला मांगते, न भालू मूंगफली। चिड़ियाघर के सभी पशु- पक्षी जैसे एक सुर में रटे-रटाए काम कर रहे थे। जानवर बोल रहे थे, चिड़ियां चहक रही थीं लेकिन हमें लगा वे बार-बार एक ही तरह से बोल और चहक रहे हैं। यह देख कर कुछ देर बाद हम ऊबने लगे।

गजानन सर हमारी उलझन समझ गए। हमारी ओर देख कर उन्होंने पूछा, ”क्यों कैसा लगा भविष्य का चिड़ियाघर? पसंद आया? ”

हमने कहा, “सब कुछ मशीनी लग रहा है, जैसे पशु-पक्षी नहीं, मशीनें करतब दिखा रही हैं।”

उन्होंने मायूस होकर कहा, “ये मशीनें ही हैं दोस्तो। ये सभी मशीनी पशु-पक्षी कम्प्यूटर के दिमाग से काम कर रहे हैं। इनमें जैसा प्रोग्राम फीड किया हुआ है, ये वैसा करतब दिखा रहे हैं। शाम को प्रोग्राम शट-डाउन करते ही ये सब मूर्ति बन जाएंगे। सुबह चिड़ियाघर खुलने पर ये फिर चलने-फिरने लगेंगे।”

मानसी ने हैरान होकर पूछा, “तो क्या ये सभी नकली पशु-पक्षी हैं? ”

“हां, सब नकली हैं। असली पशु-पक्षी अब रहे कहां? पहले निर्ममता से शिकार किया, फिर जंगल उजाड़ दिए। पशु-पक्षी बचते भी तो कैसे? जैसे चीता खत्म हुआ, वैसे ही धीरे-धीरे तमाम पशु-पक्षी समाप्त हो गए। इतिहास से आदमी ने कुछ नहीं सीखा”…

फिर बोले, “आज बस उसकी इमारतें हैं और वह है। लोग इसी चिड़ियाघर से नकली जानवर और पक्षी किराए पर ले जाते हैं। घर में रख कर बच्चों को दिखाते हैं। फिर लौटा जाते हैं। दोस्तो, कैसी लगी 2070 की यह दुनिया? ”

“बिलकुल बेकार, ” मनु ने मुंह बना कर कहा, ”यह भी कोई दुनिया है? ”

“दुनिया तो है, तुम्हारे सामने है। लेकिन दोस्तो, अगर तुम चाहो तो कम से कम अपनी कल की दुनिया को बदल सकते हो।”

“कैसे बदल सकते हैं सर? ” हमने पूछा।

“पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से प्यार करके। अपनी आज की दुनिया में इन्हें बचाओगे तो तुम्हारी कल की दुनिया खूब हरी-भरी होगी। उसमें जीव-जंतुओं की चहल-पहल होगी और चिड़ियां चहचहाएंगी। दुनिया पहले ऐसी ही तो थी ना? ”

“हां, सर थी तो ऐसी ही। आदमी ने उसे खुद ही उजाड़ दिया है। लेकिन, हम अपनी दुनिया को बचाएंगे, सर ” विजय ने भावुक होकर कहा।

“शाबाश! अच्छा तो लौटें अब? ” गजानन सर ने पूछा।

“हां सर। यहां तो दम घुट रहा है। इससे तो हमारी आज की दुनिया फिर भी अच्छी है। हम उसे और अच्छी बना सकते हैं।”

हम कालयंत्र में बैठे। गजानन सर के साथ मुसाफिर भविष्य से वापस लौट आए। कालयंत्र चिड़ियाघर के बाहर उतरा। आसपास के पेड़ों पर पक्षी चहक रहे थे। कुछ पेड़ों पर बंदर उछल-कूद मचा रहे थे। वे असली थे और लौटे हुए मुसाफिरों की ओर देख कर ऊं-ऊं कर रहे थे।

गजानन सर ने जाते-जाते कहा, “दोस्तो, मैं तुम्हें तुम्हारी दुनिया की सच्चाई दिखाना चाहता था। वह दिखा दी है। फिर किसी दिन तुम्हारी ही तरह के कुछ और हिम्मती बच्चों को सैर पर ले जाऊंगा। अभी चलता हूं मैं… ”

“कहां सर? ” हमने पूछा तो बोले, “समय में कहीं भी। भई कालयात्री हूं, कहीं भी चला जावूंगा। टा-टा दोस्तो! ”

“टा…टा गजानन सर! शुभ यात्रा! ” हमने कहा और गजानन सर अपने कालयंत्र में अदृश्य होकर अपनी यात्रा पर निकल गए।

 (देवेंद्र मेवाड़ी)

 

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