चिन्नी चली गई (विज्ञान कथा)

‘प्रिय विवेक, हाई! तुम्हारी मेल मिली इतने दिनों के बाद! मैं तो नाराज था। सोच रहा था, देखूं मेरी याद तुम्हें कब आती है। पापा-मम्मी का ट्रांसफर क्या हुआ, तुम तो वहां जाकर मूझे भूल गए। चलो, अब पता लग गया। मेरी नाराजगी दूर हो गई।

दोस्त, मैं तुम्हें कुछ बताने के लिए बहुत बैचेन था। यहां होते तो मैं तुम्हें खुद सुनाता। लेकिन, कोई बात नहीं, ई-मेल से ही सही।…विक्की, तुम्हें याद है, हम एलियनों के बारे में कितनी बातें करते थे? जब कोई भूतों की बातें करता तो हम कहते थे- अरे, भूत नहीं होते हैं, एलियन होते हैं। याद है, तुम और मैं खूब बहस करते थे कि एलियन ऐसे होंगे, वैसे होंगे। छोटे सिर और बड़ी आंखों वाले, छोटे-से या लंबे-चौड़े, जानवरों जैसे या फिर हम जैसे। विक्की, हमें क्या पता था कि वे सचमुच हम जैसे भी हो सकते हैं!

विक्की, हमारी बात सही थी। वे हमारी तरह भी हो सकते हैं। बल्कि, अब तो मैं कह सकता हूं- हमारी तरह होते हैं। यह कोरी गप नहीं है दोस्त, सच है। सच, जिसे मैंने देखा है। मैंने ही नहीं, मिनी और मिक्की ने भी देखा है। देखा तो मम्मी और पापा ने भी लेकिन वे पहचान नहीं पाए।

चलो पूरी बात बताता हूं…विक्की, दशहरे की छुट्टियों में इस बार हम डाल्स म्यूजियम गए। अरे, वही अपना दिल्ली का गुड़ियाघर। याद है जब तुम यहां थे तो एक बार स्कूल की ओर से हम सभी बच्चे वहां गए थे। तुम्हें वह जापानी गुड़िया बहुत अच्छी लगी थी। अब वहां अनेक देशों की साढ़े छह हजार से भी अधिक गुड़िया हैं। एक से एक सुंदर। हां तो, हम मम्मी-पापा के साथ हर गुड़िया को गौर से देखते जा रहे थे। वे थोड़ा आगे निकल गए। मिनी और मिक्की भी। मैं एक बड़ी-सी गुड़िया को देखता रह गया। पता नहीं क्यों वह मुझे बहुत अच्छी लग रही थी। म्यूजियम बंद होने का समय हो रहा था। मैं थोड़ा पीछे छूट गया था और अकेला था। कि, तभी…तभी उस गुड़िया ने आंखें खोलीं और मेरी ओर देखा। वह मुस्कुराई फिर धीरे से बोली, “हेलो! मैं चिन्नी हूं, मुझसे दोस्ती करोगे? ”

मेरे मुंह पर तो हवाइयां उड़ने लगीं। वह गुड़िया बोल रही थी! मुझसे दोस्ती करना चाहती थी! मुझे तो वह पहले ही भा गई थी। इसलिए मैंने कहा, “हां, मैं दोस्त बनूंगा। लेकिन, तुम हो कौन? ”

“वह सब मैं बाद में बताऊंगी। म्यूजियम बंद होने वाला है। वह देखो तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हें लेने आ रहे हैं। अपनी घड़ी की जगह जल्दी से यह घड़ी पहन लो। मैं तुम्हें बाहर मिल जाऊंगी। अपनी घड़ी मुझे दे दो। जल्दी करो।”

जब तक मम्मी-पापा आए, वह फिर से उसी जगह बुत बन कर खड़ी हो गई।

मम्मी ने पास आकर कहा, “अकेले में बातें किस से कर रहे थे, यहां तो कोई नहीं है? ”

मैं उनके साथ-साथ चल पड़ा लेकिन मन में कई सवाल कौंध रहे थे- “यह चिन्नी कौन है? यहां बुत बन कर क्यों खड़ी है? वह बोल रही थी या उसके भीतर से रिकार्ड की हुई आवाज सुनाई दे रही थी? अगर वह गुड़िया थी तो यह घड़ी कैसे दे दी? मेरी घड़ी उसने क्यों रख ली? क्या चिन्नी बाहर आएगी? आएगी तो मुझे कैसे मिलेगी? ”

तभी मुझे ठोकर लगी और गिरते-गिरते बचा। पापा बोले,  “देख कर चलो दीपू, क्या सोचते रहते हो हर समय?” उन्हें क्या पता मेरे मन में क्या चल रहा है।

लेकिन, चिन्नी को शायद सब पता चल रहा था। हम घर लौट आए। थके-मांदे थे। खाना खा कर जल्दी सो गए। मगर मेरी आंखों में नींद कहां! काफी देर तक जागने के बाद मैंने धीरे से मिनी और मिक्की को जगाया। उन्हें चिन्नी की बात बताई और कहा, चिन्नी मिलने आएगी। सुन कर वे चकित रह गए।

मैं चिन्नी के बारे में बता ही रहा था कि मेरे हाथ की घड़ी में दिप-दिप रोशनी जलने- बुझने लगी। हल्का संगीत बजने लगा। मैंने बटन दबाया तो आवाज आने लगी- दीपू….दीपू….। मैंने कहा, “हां”। उधर से आवाज आई, “मैं चिन्नी बोल रही हूं। तुम्हारे घर के बाहर खड़ी हूं।” मैंने दरवाजा खोला। चिन्नी भीतर आ गई, हमारे कमरे में। मिनी और मिक्की उसे घूर कर देखने लगे। मैंने उनका परिचय करा दिया। अब हम तीनों चिन्नी से बातें करने लगे।

मैंने पूछा, “चिन्नी तुम हो कौन? कहां से आई हो? वहां म्यूजियम में क्यों खड़ी थी?”

“अरे…रे, एक साथ इतने सवाल! बताता…नहीं, बताती हूं। मैं तुम्हारी इस दुनिया से दूर किसी और लोक से आई हूं। अपनी दुनिया से। जिस तरह तुम लोग अनंत आकाश में अपनी पृथ्वी जैसी कोई दुनिया खोज रहे हो, वैसे ही हमारी दुनिया के लोग भी दूसरे लोकों में जीवन की खोज कर रहे हैं। मैं अपने ग्रह के दो वैज्ञानिकों के साथ यहां आई हूं।”

“तो वे कहां हैं? ”

“वे भी इसी शहर में रूप बदल कर खोज कर रहे हैं। हमने अपना यान अदृश्य बना कर छिपाया हुआ है। उसी में बैठ कर यहां-वहां आते-जाते हैं।”

“तुम क्या खोज कर रही हो? ”

“मैं इस दुनिया के बच्चों पर खोज कर रही हूं।”

“बच्चों पर कैसी खोज? ”

“कि यहां के बच्चे कैसे जन्म लेते हैं, कैसे तमाम बातें सीखते हैं और कैसे बड़े होते हैं। लेकिन, जो देखा उससे बहुत खुशी नहीं हुई।”

हमने पूछा, “क्यों? ” तो जानते हो उसने क्या जवाब दिया? बोली, “यहां बच्चों को माता-पिता जन्म देते हैं। हमारे यहां ऐसा नहीं होता। और, यहां बच्चों को पढ़-पढ़ कर सीखना पड़ता है। पीठ पर इतना बड़ा बैग और उसमें इतनी सारी किताबें। क्लास में भी पढो-पढ़ो । बस, रटते रहो। उनके पास खेलने-कूदने और अपने आसपास की दुनिया को देखने का कोई समय ही नहीं है। बच्चों को पता ही नहीं कि बीज कैसे उग रहे हैं, पौधे कैसे बढ़ रहे हैं, फूल कैसे खिल रहे हैं, वर्षा कैसे हो रही है, बादल कैसे बन रहे हैं। कोई पशु-पक्षियों की भाषा तक नहीं जानता।”

“चिन्नी क्या तुम जानती हो? ”

“और नहीं तो क्या? मैं देखती हूं चिड़ियां सुबह-सुबह उठ कर प्यार से कहती हैं- उठो, उठो सुबह हो गई। कई बार कहती हैं- हमें दाना दो, पानी दो। लेकिन, किसी को कोई मतलब ही नहीं। डागी पूछता है- भौं, भौं, भौं कैसे हो? सुनने वाला कुछ समझता ही नहीं। बस डांट देता है।

मैंने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हारे यहां के लोग पशु-पक्षियों की भाषा भी समझते हैं? ” तो उसने हंस कर कहा, “बिल्कुल समझते हैं। हम उनकी हर बात समझते हैं। उनकी मदद करते हैं। यहां उनकी मदद तो दूर बहुत सारे आदमियों के अपने बच्चे तक भूख-गरीबी में जी रहे हैं।” फिर मिनी के सिर पर हाथ फेर कर बोली, ”यह मिनी किस्मत वाली है। इसे प्यार मिल रहा है। यहां तो लोग लड़कियों को पैदा ही नहीं होने दे रहे हैं। मां के पेट में ही मार देते हैं। ऐसे चलेगी यह दुनिया? नहीं, दोस्तो, ऐसे तो यह दुनिया उजड़ जाएगी।”

रात बहुत हो गई थी। हम चिन्नी से उसकी दुनिया के बारे में बातें करते रहे। उसकी बातें सुन-सुन कर हैरान होते रहे।

हमने पूछा, “तुम्हें इतना ज्ञान कैसे मिला? ” तो उसने जवाब दिया, “वह तो जन्म के समय ही हमारे दिमाग में भर दिया जाता है।”

“अरे, बाप रे! इतना रटते कैसे हो? ”

“रटते नहीं हैं। तुम्हारा कम्प्यूटर रटता है क्या? ”

मैंने आश्चर्य से कहा, “नहीं तो”।

“तो बस समझ लो ऐसी ही बात है। खैर, छोड़ो, देर बहुत हो गई है। तुम्हें तो सोना भी है।”

“तुम नहीं सोओगी? ”

“नहीं। मैं सोती नहीं। बस कहीं पर बुत बन कर खड़ी हो जाती हूं। आराम मिल जाता है। अच्छा तो अब मैं चलूं? ”

चिन्नी हमारी दोस्त बन गई थी। उसका जाना हमें अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन, क्या करते। उसे तो जाना ही था। उसे छोड़ने हम चुपचाप बाहर आए।

बाहर दूधिया चांदनी बिखरी हुई थी। आसमान में पूनम का चांद चमक रहा था। तभी मुझे घड़ी का ध्यान आया। मैंने कहा, “चिन्नी, यह तुम्हारी घड़ी।”

उसने कहा, “इसे रख लो। तुम्हारे लिए मेरा उपहार है यह।”

“अच्छा मेरी घड़ी तुम रख लो,“ मैंने कहा तो वह खुश होकर बोली, “मैं इसे अपनी दुनिया में ले जाऊंगी। ऐसे प्राचीन कल-पुर्जे देख कर वहां के लोग बहुत खुश होंगे।”

“प्राचीन?” मैंने आश्चर्य से पूछा, “यह तो बिलकुल नई है।”

“हां, नई है लेकिन ऐसी चीजें हमारे यहां हजारों साल पहले बनती थीं। इसलिए बेशकीमती है यह, ” उसने कहा।

फिर मिनी को गले लगा कर बोली, “खूब पढ़ना मिनी और आगे बढ़ना।  तुम्हारी दुनिया में लड़कियों को बहुत कठिनाइयां झेलनी पड़ती हैं।”

मिनी ने पूछा, “ तुम्हारे यहां नहीं झेलनी पड़तीं? ”

“नहीं। वहां लड़की-लड़के का भेद ही नहीं है।”

मैंने पूछा, “तो तुम क्या हो? ”

“मैं भी लड़की-लड़का कहां हूं। सच पूछो तो चिन्नी भी नहीं हूं। यह नाम तो मैंने गुड़ियाघर में लोगों के मुंह से सुना था। मैं तो ‘जिंग-चिंग 5220’ हूं।”

हम उसे देखते ही रह गए। वह बोलती जा रही थी, “दोस्तो, तुम्हारा तो जन्म होता है लेकिन हमें बनाया जाता है। बनाते समय ही हमारे दिमाग में सारे ज्ञान की चिप डाल दी जाती है। हम सब ऐसे ही होते हैं। तुम कितने भाग्यशाली हो कि मां के गर्भ से जन्म लेते हो। मां को बचाना दोस्तो, तभी तुम्हारी दुनिया बचेगी। लड़कियों के जीवन की रक्षा करना। वे मां हैं जो तुम्हें जन्म देती हैं। ठीक है? ”

चिन्नी से बिछुड़ने का हमें बहुत दुःख हो रहा था। हमारी आंखें भर आईं। चिन्नी

मेरे गले लगी तो मेरे आंसू बहने लगे। चिन्नी ने उन्हें पोंछते हुए कहा, “दीपू इन्हें बहाओ मत। दोस्त, दुःख जताने के लिए तुम्हारे पास आंसू तो हैं, मेरे पास तो वे भी नहीं हैं। मैं भी दुःखी हूं, पर आंसू नहीं बहा सकती।”

चिन्नी की आंखें चमक उठीं। उसने एक ओर को इशारा करके दिखाया। वहां कांच के गोले जैसा उनका अंतरिक्ष यान आ गया था।”

हमने उसे विदा किया। जाते-जाते उसने कहा, “मैं तुम्हें याद रखूंगी। इस घड़ी में जब भी दिप-दिप होगी, संगीत बजेगा तो बटन दबाना। मैं तुमसे बात करूंगी।”

हमने कहा, “टाटा चिन्नी! ” और, चिन्नी चली गई।

हां तो, विक्की यह है चिन्नी की कहानी। मेरे लिए तो यह कहानी नहीं दोस्त, सच्चाई है। मुझे विश्वास हो गया है कि एलियन होते हैं और वे दोस्त भी होते हैं। बताना कि तुम्हें इस पर विश्वास हुआ या नहीं। अगर नहीं हुआ तो कभी मिलने पर मैं तुम्हें वह प्यारी-सी घड़ी दिखाऊंगा जो मुझे चिन्नी ने दी है। ठीक है? बाई!

तुम्हारा,

दीपू

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *