सिसुणा

सिसुणा पहाड़ की पहचान है। लोग इसे डंक मारने वाले पौधे के रूप में जानते हैं। इसलिए यह ‘बिच्छू बूटी’ भी कहलाता है। बचपन में शैतानी करने पर खूब सुनने को मिलता था, ‘रुक जा, अभी लगाता हूं सिसुणा!’ छू जाने पर लगता था जैसे सचमुच बिच्छू ने डंक मार दिया हो। सिसुणा की झपक लगते ही चमड़ी में झनझनी फैल जाती। इसलिए बाहर से आने वाले लोग इसे ‘झनझनिया’ भी कह देते। गढ़वाल में यह काळि और कंडाळी कहलाता है। वैसे अपने गांव में हम इसे ‘सिन’ कहते हैं।

किसी के लिए सिसुणा, किसी के लिए काळि-कंडाळी, तो किसी के लिए बिच्छू बूटी, झनझनिया और नेटल, मगर कद्रदानों के लिए बढ़िया साग है सिसुणा। इसके सिरे व नरम पत्तियों के, जंबू-गंद्रायण में छौंके साग और घी चुपड़ी मंडुवा की रोटियों के स्वाद का क्या कहना! प्रकृति ने भी क्या जोड़ी मिलाई है- पहाड़ों में जहां मंडुवा होता है वहां सिसुणा भी खरपतवार की तरह खूब उगता है। हां, इसे उगाया नहीं जाता, यह खुद उगता है। लोग चिमटे से सिसुणा के नरम सिरे तोड़ कर, उन्हें धूप में फैला देते हैं। धूप में सूख कर वे मुरझा जाते हैं और उनका थोड़ा पानी भी सूख जाता है। फिर पानी में उबालने के बाद पीस कर साग तैयार कर लेते हैं।

सोचा, यह डंक मारने वाला, अपनी तरह का अनोखा पौधा आया कहां से होगा? किताबें टटोलीं तो पता लगा, यह एशिया, यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका का मूल निवासी पौधा है। यानी, हमारा सिसुणा हो सकता है यहीं पैदा हुआ हो और हमारे पुरखों ने मंडुवा की रोटी के साथ सदियों पहले इस जंगली पौधे का स्वाद पहचान लिया हो। और, समय के साथ‘‘मंडुवा की रोटी भली, सिसुणा क साग’ गीत बन कर जुबान पर चढ़ गया हो। और क्या? आज का जो क्या है सिसुणा, कांस्य युग की कब्रों में इसका रेशा मिला है। यानी, आज से कम से कम छह-सात हजार साल पहले!

वैज्ञानिकों ने देखा, परखा और डंक मारने, जलन मचाने के गुण के कारण इसका नाम रख दिया अर्टिका। लैटिन भाषा में ‘अरो’ का मतलब जलन होता है। अर्टिका की करीब 100 प्रजातियां पाई जाती हैं। उत्तराखंड में अर्टिका पर्विलोरा और अर्टिका डायोइका प्रजातियों का सिसुणा खूब उगता है। इसके अलावा दूसरी प्रजातियां भी पाई जाती हैं। प्रजातियां कई हैं, लेकिन हर प्रजाति डंक मारती है। असल में इसके तने और पत्तियों पर तीखे, नुकीले रोए या कांटे होते हैं जो शरीर से छू जाने पर सुई की तरह चुभ जाते हैं। उनमें फाॅर्मिक एसिड होता है। कांटे या रोएं चुभने पर वैसी ही जलन मचती है जैसी चींटियों और मच्छरों के चटकाने (काटने) पर मचती है। है कि नहीं? है, क्योंकि उनके डंक में भी फाॅर्मिक एसिड होता है। प्रकृति ने सिसुणे को सुरक्षा के लिए यही हथियार सौंप दिया होगा।

यों तो गाय-भैंसें भी धूप दिखा कर मुरझाया हुआ सिसुणा चाव से खा लेती हैं लेकिन इसका साग मनुष्यों को भी कम पसंद नहीं। मनुष्य और गाय-भैंसों के अलावा कोई और भी है जिसे यह बेहद पसंद है। इतना पसंद कि वे भुक्खड़ों की तरह पत्तियों पर टूट पड़ते हैं और उन्हें चट करते रहते हैं। सिसुणे के ये शौकीन हैं तितलियों और पतंगों के लप-लप करने वाले लार्वा! पेटू लार्वा जम कर सिसुणा खाते हैं और फिर कहीं किसी टहनी, पत्थर या दीवाल के ओने-कोने में प्यूपा बन कर समाधि लगा लेते हैं।

समाधि तो सुनते हैं महान तिब्बती धर्मगुरु मिलारेपा ने भी लगाई थी। वे दसियों वर्षों तक एकांत में समाधि लगा कर बैठे और आहार के नाम पर, कहते हैं उन्होंने केवल सिसुणा खाया। हो भी सकता है, क्योंकि सिसुणा खाली खरपतवार नहीं है। यह पौष्टिक भोजन है। लोग न जाने कब से इसके साग का स्वाद ले रहे हैं। चाय, ‘सूप’ और नेटल बीयर बना कर पी रहे हैं।

‘‘सूप’ से याद आया, कई साल पहले सैर पर सपरिवार सिक्किम गया था। जाने से पहले सिक्किम के बारे में किताबों से जानकारी जुटाई। एक जानकारी यह मिली कि सिक्किम जाएं तो वहां का अद्भुत नेटल सूप ‘सोचा’ जरूर पीएं। बात मन में बैठ गई। वहां पहुंच कर एक दिन होटल के कर्मचारियों से कहा, ‘‘ आज‘‘नेटल सूप’ पीना चाहते हैं।’’   सुन कर वे खुश हुए और बोले, ‘‘आज शाम आप लोगों को नेटल सूप का स्वाद चखाएंगे। वह पेट की अचूक दवा भी है।’’

शाम हुई। खाने को बैठे तो मक्खन-सजा, गाढ़ा हरा, लसलसा और साग जैसा ‘सोचा’ परोसा गया। मुंह में रखते ही मैं बोला,  ‘‘ अरे, यह तो सिसुणा का साग है! ’’   हमारा सिसुणा का साग सिक्किम का नायाब ‘सोचा’ बन गया था। यह तो यहां की बात है, दूसरे देशों में यह न जाने कब से और किस-किस नाम से पकाया-परोसा और खाया जा रहा होगा!

कब से इसलिए कि लोग इसे सदियों से खा रहे हैं। सच तो यह है कि अपने आप उगे सिसुणे के गुणों को हमने ही कम पहचाना है। इसके साग को हमने जितना मुंह लगाना चाहिए था, उतना नहीं लगाया है क्योंकि हमें पता ही नहीं है कि यह कितना पौष्टिक है। वरना, दूसरे देशों की ओर देखें तो मुंह में अंगुली दबा लेंगे। लोग वहां इसका न केवल सूप बना रहे हैं बल्कि इसकी नरम पत्तियों का सलाद खा रहे हैं, पुडिंग बना रहे हैं, पत्तियों के नाना प्रकार के व्यंजन बना रहे हैं, उन्हें सुखा कर ‘नेटल टी’ पी रहे हैं। वे इसका कार्डियल पेय और हल्की मदिरा यानी ‘ नेटल बीयर’ बना रहे हैं। इतना ही नहीं, इससे कई तरह की दवाइयां बना रहे हैं और इसके रेशे से कपड़े तैयार कर रहे हैं।

जहां तक खाने की बात है तो यह‘‘माल न्यूट्रिशन’ यानी कुपोषण, एनीमिया, और सूखा रोग से बचा सकता है क्योंकि इसमें कई जरूरी विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। सिसुणा में विटामिन ए और सी तो पर्याप्त मात्रा में पाए ही जाते हैं, विटामिन ‘डी’ भी पाया जाता है जो पौधों में दुर्लभ है। इसके अलावा इसमें आयरन (लौह) , पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैल्सियम आदि खनिज भी पाए जाते हैं। अब बताइए, घर के आसपास बिना उगाए उगे सिसुणे में इतने पोषक तत्व और लोग तंदुरूस्ती की दवाइयां दुकानों में ढूंढते फिरते हैं। अरे, पालक की तरह उबालिए सिसुणा और सूप या साग बना कर खाते रहिए।

यों भी, लोग कहते हैं, यह खाने में पालक जैसा ही तो लगता है। कुछ लोग इसकी पत्तियों को सुखा कर संभाल लेते हैं और उनकी चाय बनाते हैं। कहते हैं, इसकी चाय पेट के लिए बड़ी मुफीद है, पेचिस में भी आराम पहुंचाती है और गुर्दों के लिए भी फायदेमंद है। कहते हैं, इसका रस पीने पर एक-एक चम्मच रस शरीर में से यूरिक एसिड को घटाता जाता है। असल में सिसुणा सदियों से औषधि के रूप में काम आ रहा है। इसे चर्म रोगों, जोड़ों के दर्द, गाउट और गठिया में लाभकारी पाया जाता है। सिसुणा के झपाके मार कर लकवा पड़े अंगों को भी सचेत किया गया है। कहते हैं, इससे दर्द और सूजन भी घटती है। इसकी जड़ प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने की शुरुआती अवस्था में लाभकारी पाई गई है। सिसुणा बार-बार छींक आने की समस्या में भी फायदा पहुंचाता है। यह जोड़ों के दर्द, खिंचाव, पेशियों की पीड़ा और कीड़ों के काटने की दवा के रूप में मलहम बनाने के भी काम आता है।

इसके रेशे से लोग न जाने कब से रस्सियां बनाते आ रहे हैं। इसे प्राचीन काल से ही लोगों ने सन और अलसी के रेशे के बराबर सम्मान दिया। यूरोप में पहले सिसुणे का रेशा ही अधिक प्रचलित था। सन यानी भांग (हैम्प) और अलसी (लैक्स) के रेशे के साथ इसका मुकाबला चलता रहा। इनकी खेती बढ़ने से सिसुणे के रेशे का उपयोग कम होने लगा। सिसुणे के मोटे, रूखे रेशे से बोरियां, थैले और पालों का मोटा कपड़ा बुना जाता था। बारीक, मुलायम रेशा कपड़ा बुनने के काम आता था। और हां, हेंस एंडरसन की परी कथा ‘द वाइल्ड स्वांस’ की राजकुमारी ने हंस बन गए अपने ग्यारह राजकुमार भाइयों के लिए सिसुणे के रेशों से ही तो कमीजें बुनी! यह कहानी 2 अक्टूबर 1838 को छपी थी। यानी, उन दिनों भी लोग सिसुणे के कपड़ों के बारे में जानते थे।

तो, सिसुणे के डंक पर मत जाइए। उसके गुणों को देखिए और मंडुवा की रोटी के साथ स्वाद लेकर खाइए।

 

 

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