एक थे कैलाश साह

कैलाश दाज्यू अगर इस ग्रह से गए नहीं होते तो आज 75 वर्ष के होते और उसी तरह हंसते हुए किस्से सुना रहे होते।

मौला-मस्त शख्सियत के मालिक थे वे, मगर दूसरों के दर्द को साझा करने में सदा दो कदम आगे रहते थे। मुफलिसी को जीभर कर जीकर नौकरियों तक पहुंचे कैलाश साह किसी के लिए पत्रकार रहे, किसी के लिए विज्ञान लेखक, किसी के लिए जिगरी व जान देने वाले यार, किसी के लिए खलीफा और किसी के लिए महज ‘सोर्स’। मैंने उन्हें संघर्ष के उन दिनों में भी देखा था, जब इंटरव्यू लेने के लिए वे कंधे पर झोले में टेपरिकार्डर रख कर दिन-दिन भर दिल्ली के एम्स यानी आयुर्विज्ञान संस्थान, सफदरजंग अस्पताल और कई डाक्टरों के घर-क्लिनिकों की खाक छानते फिरते थे और कहा जाता था कि कई बार इसी तरह ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के चिकित्सा व स्वास्थ्य विशेषांक की पूरी सामग्री जुटा देते थे। उनकी यह मेहनत रंग लाई और वे उस दौर में चिकित्सा पत्रकारिता के दमदार पत्रकारों की कतार में सबसे आगे आ खड़े हुए। उन्होंने चिकित्सा पत्रकारिता को हिंदी में एक नई दिशा दी।

उत्तराखंड में नैनीताल के निकट भवाली में 11 दिसंबर 1937 को जन्मे कैलाश साह मूलतः पत्रकार थे। उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी के दर्जन भर अखबारों में दर्जन भर नौकरियां कीं, समाचार एजेंसी में रहे, एक अरसे तक सोवियत सूचना विभाग में अनुवाद किया और फिर एक सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था में आ टिके।

मैंने उन्हें पहली बार सन् साठ के दशक में नैनीताल के ‘पर्वतीय’ अखबार के दफ्तर में देखा था जहां वे मुख्य रिपोर्टर थे और तमाम खबरों के साथ-साथ अपना लोकप्रिय स्तंभ ‘ट्रंकाल’ भी लिखा करते थे। ग्रीष्म और शरद ऋतु का सीजन शुरू होने पर वे अपने एक और साप्ताहिक कालम ‘लो, फिर बहारें आईं?’ में सैलानियों और मेजबान शहर की रंगत का जायजा लेकर भीतरी हकीकत बयां करते थे। मैं तब ‘साप्ताहिक पर्वतीय’ में विज्ञान के लेख और कहानियां लिखता था। कैलाश दाज्यू मुझसे अक्सर कहा करते थे, ‘तुम विज्ञान के विद्यार्थी हो, विज्ञान को समझते हो। विज्ञान से सारी दुनिया बदल रही है। उस पर लिखो, लिखते रहो।’ उनके ‘नेशनल हेरल्ड’ और ‘नवजीवन’ में लखनऊ-कानपुर चले जाने के बाद विज्ञान का स्तंभ और ‘लो, फिर बहारें आईं’ मैंने संभाला। साथी बटरोही ने साहित्य के पृष्ठों की जिम्मेदारी ली।

बाद में वे घूम-फिर कर दिल्ली पहुंच गए। पहले बंगाली मार्केट के इलाके में एक कमरे में दिन काटे और फिर परिवार लाकर न्यू राजेन्द्र नगर की एक दो कमरों की बरसाती में डेरा डाला। वे बहुश्रुत-बहुपठित लेखक-संपादक मनोहरश्याम जोशी जी के मुरीद थे और उनके विस्तृत अध्ययन की बातें सुनाया करते थे। एक बार उन्हीं ने बताया था कि डी एन ए की खोज गाथा पर लिखी फ्रैंसिस तथा क्रिक की ‘डबल हेलिक्स’ किताब जोशी जी ने हासिल कर ली है और उनके पढ़ने के बाद मैं अपने लिए बुक कर आया हूं।

सत्तर के दशक में मैं दिल्ली के पूसा इंस्टिट्यूट से पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय चला गया। एक दिन वे राजनेता के. सी. पंत की संगत में आकाश मार्ग से पंतनगर आए। स्टेट गेस्ट हाउस से फोन किया कि आओ, बहुत बातें करनी हैं। बातें हुईं। वे हिंदी में पुस्तक छपवाने की विकट स्थिति से दुःखी थे। पर बोले, ‘मैंने तंग आकर एक रास्ता खोज लिया है। जल्दी ही दो पुस्तकें आएंगी। न उनके छपने का झंझट होगा, न उन पर चर्चा का। वे आए जरूर आकाशमार्ग से थे लेकिन बातें करके ट्रक की आगे की सीट में बैठ कर वापस दिल्ली की ओर लौट गए। रूद्रपुर या रामपुर से उन्हें बस मिली होगी।

उस दौरान वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रसिद्ध सर्जन, शिक्षाविद और मानववादी प्रोफेसर आत्म प्रकाश के इंटरव्यू लेकर ‘एक सर्जन के संस्मरण’ लेखमाला लिख रहे थे जिन्हें संस्मरण  साहित्य की बहुमूल्य निधि माना जा रहा था।

कैलाश साह ने जो कहा, जल्दी ही वह साकार हो गया। एक दिन देश के सभी प्रमुख अखबारों की सुर्खियों में एक समाचार कुछ यों छपा, ‘जनसाधारण तक विज्ञान की जानकारी का पहुंचना जरूरी- इंदिरा गांधी’। समाचार में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘बहुत-सी भाषाओं में विज्ञान-लेखन अभी भी लोकप्रिय नहीं हो सका है। मैं चाहती हूं कि यह कमी शीघ्र पूरी हो।….और, यह भी कि वैज्ञानिक साधारण जनता से सरल और सुबोध भाषा में बात करें जिसमें अपनापन झलके। लोकप्रिय विज्ञान का यह मुख्य कार्य है।’…

पता लगा, समाचार डा. आत्मप्रकाश और कैलाश साह लिखित और सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘शल्य चिकित्सा के वरदान’ की भूमिका पर आधारित है। भूमिका श्रीमती इंदिरा गांधी ने लिखी थी। उन्होंने दिल्ली में चिकित्सकों के एक सम्मेलन में उस पुस्तक का लोकार्पण किया। समाचार उसी अवसर का था।

कैलाश साह की योजना ‘एक सर्जन के संस्मरण’ लेखमाला को डा. आत्म प्रकाश की जीवनी के रूप में प्रकाशित करने की थी। कई अन्य जाने-माने विशेषज्ञ चिकित्सकों से भी उनकी घनिष्ठता थी। प्रसिद्ध इंडोक्रायनोलाजिस्ट और डायबिटीज के विशेषज्ञ डा. हरि वैष्णव से उनके घरेलू संबंध थे। उनके साथ उन्होंने ‘मधुमेह’ और डा. एम. एम. सिंह  के साथ यक्ष्मा रोग पर पुस्तकें लिखीं। वे इस श्रंखला में अन्य चिकित्सकों के साथ भी विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखने की योजना बना रहे थे। उन दिनों वे कई रोगियों के मददगार भी बने जिन्हें वे खुद ले जाकर डाक्टरों से मिलाया करते थे।

सामाजिक विषयों पर घनघोर पत्रकारिता लेखन के बाद मनोहरश्याम जोशी की संगत में उन्हें विज्ञान का क्या बल्कि साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथाओं का चस्का लग गया। जोशी जी ने उन्हें समझाया कि हिंदी में विज्ञान कथाओं का भारी अभाव है। इस दिशा में लिखो। कैलाश साह को बात जम गई और वे विज्ञान कथाओं की उधेड-बुन में खोए रहने लगे। विज्ञान की अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए उस दौरान उन्होंने ‘इंसाक्लोपीडिया आफ पापुलर साइंस’ के बारहों खंड खरीद लिए और विज्ञान कथा साहित्य की अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए विदेशी विज्ञान कथाकारों की विज्ञान कथाएं पढ़ने लगे। मेरे साथ वे विज्ञान की तमाम संभावनाओं पर खूब चर्चा किया करते थे। इसका फल भी उन्हें मिला और आगे चल कर उन्होंने अनेक विज्ञान कथाएं लिखीं, जो चर्चित  भी हुईं। मनोहर श्याम जोशी ने उनके लिए लिखा था, ”कैलाश साह भारतीय भाषाओं के उन गिने-चुने लेखकों में हैं जिन्होंने विज्ञान कथा लेखन की चुनौती स्वीकार की और इस काम को सफलता से पूरा किया है।“

कैलाश साह ने अपनी नौ विज्ञान कथाओं के संकलन ‘मृत्युंजयी’ में लिखा, ”इन कहानियों के लिखे जाने के पीछे एक ललक है कि हमारा जन-मानस विज्ञान और उसकी संभावनाओं से परिचित हो सके। विज्ञान को लोग रूखा-सूखा विषय मानते हैं जबकि यह बहुत दिलचस्प विषय होता है- यहां तक कि गणित भी। इन कहानियों को पढ़ने के बाद अगर पाठकों को रूचेगा तो वह विज्ञान का अध्ययन अवश्य करेंगे और उसे दिलचस्प पाएंगे। विज्ञान का काम अंधविश्वासों को दूर करना है। विज्ञान की समझ में अंधविश्वास तो दूर होते ही हैं साथ ही यह आदमी को समझने-केवल जैविक इकाई के रूप में नहीं बल्कि  एक व्यक्तित्व के रूप में भी सहायता करता है।“

कैलाश साह के कहानी संग्रह ‘मृत्युंजयी’ की कहानियां हमें उनके वैज्ञानिक कल्पना लोक की सैर कराती हैं। संकलन की पहली कहानी ‘पूर्वजों की खोज‘ में मनुष्य के आदि पुरखों की खोज के बहाने उन्होंने मानव सभ्यता से भी कहीं अधिक विकसित सभ्यता से साक्षात्कार कराया है और बताया है कि सितारों से आगे जहां और भी हैं। रेनबो स्टेशन-8 की प्रोफेसर फ्रेदर्येव लौटे हुए वैज्ञानिक दल से कहते हैं, ‘मैं समझता हूं, हम अपनी इस खोज को असफल नहीं कहेंगे। यह विज्ञान की नई खोज है। ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं हैं बल्कि हमारी जैसी बहुत सी-सभ्यताएं हैं।’…

अंतरिक्ष की ही एक मार्मिक लंबी कहानी है, ‘मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया।’ विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ जटिल और सख्त नियमों में अबोध भूल भी कितनी दुःखद स्थिति पैदा कर सकती है, यह बताया गया है इस कहानी में। अपने भाई से मिलने को आतुर मोहिनी एक महायान से निकलकर चुपचाप आपातकालीन लघुयान ‘आलया-7431’ में जाकर छिप जाती है। आलया में कंप्यूटरों से निर्धारित दूरी तक एक निश्चित भार के लिए ही ईंधन भरा है। खतरा यह है कि उस अबोध लड़की मोहिनी के अतिरिक्त वजन से कारण यान का ईंधन समय से पूर्व समाप्त हो जाएगा और वह नष्ट हो जाएगा। इसलिए अंतरिक्ष के कड़े नियमों के अनुसार अतिरिक्त भार को अंतरिक्ष में फेंकना जरूरी है। आलया का पायलट यही करता है।

पत्रशैली में लिखी कहानी ‘सर्वोच्च मानव’ वर्जनाहीन सामाजिक स्थितियों में अधिकतम प्यार और स्नेह में पाले गए उन मेधावी बच्चों की कहानी है, जिनका अद्भुत मानसिक विकास होता है। वे मस्तिष्क तरंगों की भाषा पढ़ने लगते हैं और अकल्पनीय आविष्कार करते हैं। अंततः वे समय के क्रम में एक सेकेंड के दस हजारवें हिस्से के बराबर अंतर पैदा करके दृश्य जगत से अदृश्य हो जाते हैं। वे मौका मिलने पर भी इस दृश्य दुनिया में वापस नहीं लौटना चाहते हैं। उस अदृश्य दुनिया से उन बच्चों की अभिभावक शुभ्रा अपने भाई हरेन्द्र को लिखती है, ”वह दिन दूर नहीं हमारी बस्ती की आबादी काफी बढ़ जाएगी और हमारे युवक अपनी सामूहिक मस्तिष्क-तरंग-शक्ति से संसार के नवजात शिशुओं को विवेकी बनाकर सर्वोच्च मानवों से धरती को भर देंगे। तब संसार में क्लेश, कलह, हिंसा समाप्त हो जाएगी“….।

कैलाश साह ने रोबोटों के दो रूप दिखाए हैं ‘टोनी’ और ‘मशीनों का मसीहा’ कहानियों में। टोनी रोबोट है और अपनी मालकिन विमला का हर काम करता है। सायास प्यार का भी नाटक करता है ताकि विमला की हीन भावनाएं दूर हो सकें। निदेशक रोबोट का माॅडल बदलने का निश्चय करती है क्योंकि ‘मशीन औरत से प्यार नहीं कर सकती है, लेकिन औरत तो मशीन से प्यार कर सकती है।’

दूसरी ओर ‘मशीनों का मसीहा’ में 26 वीं सदी में एक दिन दुर्घटनावश धर्मप्रचारक लोम साम्य निथाम्बु एक अनजान ग्रह में जा पहुंचता है। साथ में होते हैं 30 बौने रोबोट। वह रोबोटों से ‘ध्यान’ लगवाता है और उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करता है। बौना रोबोट एक दिन पूछता है- ‘आचार्य, क्या देह छूटने से मुक्ति हो जाती है? निथाम्बु कहता है कि आत्मा के स्वतंत्र होने पर मुक्ति होती है। रोबोट फिर पूछता है- ‘आचार्य अगर आपकी आत्मा शुद्ध न हो और आत्मा आपकी देह छोड़ दे तो क्या होगा? निथाम्बु कहता है- ‘तब मेरी आत्मा दूसरे जीव में अवतरित होगी।’…और, रोबोट झपटकर आचार्य की गर्दन तोड़ देता है और आचार्य का अवतार बन जाता है। यह कहानी मशीनों को मानवीय समझ देने के एक खतरे की ओर संकेत करती है। मैंने कैलाश साह की इस कहानी को टेलीविजन के लिए पटकथा में भी ढाला है।

इस संग्रह की मुख्य कहानी ‘मृत्युंजयी’ में अमर बनने की इच्छा से देह के बजाय केवल मस्तिष्क के बल पर जीने की कल्पना की गई है। मानसिक तरंगों से ही आटोमेशन नियंत्रण किया जाता है। रोबोटों में भी कठोर वर्ग व्यवस्था दिखाई गई है। इस विचित्र जीवन व्यवस्था के बारे में वैज्ञानिक दल का प्रमुख सुब्रत सोचता है – क्या यह अमरत्व जड़ता नहीं है। यह कैसा अमरत्व है? क्या धरती का मानव भी शरीर -विहीन अमरत्व का आकांक्षी हो सकेगा? फिर वह अपनी डायरी में लिखता है, ‘क्वासर जैसे अमर प्राणियों से हम नश्वर धरतीवासी बहुत सुखी हैं। हमें जीवन से प्यार है….’।

मृत्युंजयी के माध्यम से कैलाश साह के कल्पना लोक की यात्रा करने पर विज्ञान की वर्तमान और भावी खोजों के संभावित परिणामों की साफ तस्वीरें उभरती है जिन्हें गौर से देखकर सबक लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी इन कहानियों में भविष्य की दुनिया के कई रंग भरे हैं।

‘मृत्युंजयी’ के अलावा कैलाश साह ने ‘अंतरिक्ष के पार’, ‘हरे दानवों के देश में’ और ‘मकड़ी का जाल’ उपन्यासों में भी अपनी कल्पना का यान असीम ऊंचाइयों तक उड़ाया है। वे ‘मोआमू’ चरित्र की रचना करके एक लघु उपन्यास श्रंखला भी लिख रहे थे लेकिन तभी जून 1978 में वे स्वयं अनंत यात्रा पर चले गए। लेकिन, अद्भुत जीवट के धनी कैलाश साह अपनी विज्ञान कथाओं के कल्पना लोक में आज भी मौजूद हैं।

 

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