बोगेनविल

बोगेनविलिया
बोगेनविलिया

आज (12 नवंबर) बोगेनविल का जन्मदिन है। उनका पूरा नाम हैः लुई एंतोइने दे बोगेनविल। यह नाम पढ़ कर कुछ याद आता है आपको? कहते हैं, नाम में क्या रखा है, लेकिन कई नाम हमें चीजों की जड़ तक पहुंचा देते हैं। मैंने भी जब पहली बार बोगेनविल का  नाम पढ़ा तो मन में खटका हुआ कि कहीं रंग-बिरंगे खूबसूरत बोगेनविलिया के फूलों के साथ इसका कोई रिश्ता तो नहीं है? खटका दूर करने के लिए बोगेनविलिया का इतिहास खोजा तो रहस्य का पता लग गया कि हां, बोगेनविल का बोगेनविलिया के साथ सीधा रिश्ता है। 

रिश्ता यह है कि सुंदर फूलों वाली इस आरोही झाड़ी का नाम पेरिस में जन्मे फ्रांसीसी एडमिरल और अन्वेषक लुई एंतोइने दे बोगेनविल के नाम पर रखा गया है। लेकिन, उनके नाम पर क्यों, जबकि इसकी खोज तो 1768 में फ्रांसीसी प्रकृति विज्ञानी डा. फिलबर्ट कामरकान ने ब्राजील की राजधानी रियो डि जेनेरो में की थी? हां, खोज उन्होंने की थी लेकिन इस पौधे का नाम स्वयं उन्होंने अपने प्रिय एडमिरल और अन्वेषक दोस्त बोगेनविल के नाम पर रख दिया। कामरकान तो उनके ला बोदेयूज जहाज के यात्री थे जिसमें वे लोग पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे। यों बोगेनविल भी कुछ कम नहीं थे। वे 25 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही समाकलन गणित का एक ग्रंथ लिख चुके थे और लंदन की प्रसिद्ध रायल सोसायटी के सदस्य थे। 
बोगेनविल दो जहाज लेकर लुई पंद्रहवें की अनुमति से 15 नवंबर 1766 को पृथ्वी की परिक्रमा के महाअभियान पर रवाना हुए। दोनों जहाजों पर कुल 330 लोग सवार थे। कड़े नियमों के अनुसार इस यात्रा में जहाज पर किसी महिला को ले जाना संभव नहीं था। बोगेनविल के जहाज पर डाक्टर, खगोलविज्ञानी, इंजीनियर और मानचित्रकार के साथ ही प्रकृति विज्ञानी फिलबर्ट कामरकान भी सवार था जिसकी देखभाल के लिए एक सेवक को भी उसके साथ जाने की अनुमति दे दी गई थी। यह तो ताहिती द्वीप पहुंचने के बाद पता लगा कि वह सेवक नहीं सेविका थी। पुरूष के वेश में वैज्ञानिक कामरकान की चहेती जेन बारी! लेकिन, अब कुछ नहीं हो सकता था। जेन बारी पूरे परिक्रमा अभियान में साथ रही। बोगेनविल अगर वह पहला फ्रांसीसी नौचालक था जिसने सफलतापूर्वक पृथ्वी की परिक्रमा पूरी की तो सच यह है कि जेन बारी भी वह पहली महिला थी जिसने यह कीर्तिमान बनाया। 

मैंने लाल, गुलाबी और सफेद बोगेनविलिया की झाड़ियां पहली बार 1963-64 में नैनीताल और भुवाली से आगे सात ताल में देखी थीं जिन्हें मैं देखता ही रह गया था।

फिर कहीं पढ़ा कि ये फूल प्रशांत महासागर में स्थित खूबसूरत ताहिती द्वीप में देखे गए। ताहिती? अपनी विश्व परिक्रमा यात्रा में बोगेनविल अप्रैल 1768 में ताहिती द्वीप के पास पहुंचा। वहां घूमते हुए उसे लगा जैसे वह स्वर्ग में पहुंच गया है। वहां की जलवायु बहुत अच्छी थी। पेड़-पौधे फलों से लदे थे। लोग बहुत सीधे-सादे और मिलनसार थे। वे सुखी जीवन जी रहे थे। 1770 में जेम्स कुक भी ताहिती पहुंचा था।

बोगेनविल की 28 माह की कठिन परिक्रमा यात्रा 16 मार्च 1769 को पूरी हुई। दो साल बाद 1771 में उसके यात्रा वृत्तांत की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें उसने ताहिती, अर्जेंटीना, पैटोगोनिया और इंडोनेशिया के भूगोल, जीव विज्ञान तथा मानव विज्ञान का वर्णन किया था। उसने ताहिती द्वीप को फ्रांस के अधीन घोषित किया। उसने सोलोमन द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीप का नाम अपने नाम पर बोगेनविले रख दिया। ताहिती द्वीप से मुझे पेरिस में जन्मे अपने प्रिय चित्रकार पाल गोगा की याद आई जो यूरोपीय सभ्यता और परंपराओं से ऊब कर 3 जुलाई 1895 को फ्रांस छोड़ कर सदा के लिए ताहिती चला गया था। वहां रहकर उसने ताहिती के शानदार लैंडस्केप और जन जीवन के सैकड़ों चित्र बनाए। मैं पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में था तो मेरे छात्र – मित्र अरूण तिवारी ने मेरे पढ़ाई के कक्ष की एक दीवार पर मेरे इस प्रिय चित्रकार के चित्र ‘अकेली’  की बड़ी सी अनुकृति बना कर लगा दी थी।

चार्ल्स डार्विन ने भी 1835 में एम एस बीगल जहाज में ताहिती की यात्रा की थी। बहरहाल प्रकृति विज्ञानी कामरकान ने साल भर पहले अपनी यात्रा में रियो डी जेनेरो, ब्राजील में चटख रंग के इस फूलदार पौधे की खोज कर ली थी जिसका नाम उसने अपने मित्र अन्वेषक बोगेनविल के नाम पर रखा। बोगेनविल की परिक्रमा यात्रा के 20 वर्ष बाद 1789 में फ्रांसीसी वनस्पति विज्ञानी  एंतोइने लारेंत दे जुसियू ने पौधों के वर्गीकरण पर लिखे अपने प्रसिद्ध ग्रंथ जेनेरा प्लांटेरम में  इसका ‘बुगिनविलिया’  नाम से वर्णन किया। जुसियू वे पहले वनस्पति विज्ञानी थे जिन्होंने फूलदार पौधों का सुव्यस्थित रूप से वर्गीकरण प्रकाशित किया। वर्गीकरण के लिए उन्होंने स्वीडिश वनस्पति विज्ञानी कारोलस लिनीअस की द्विनाम प्रद्धति अपनाई। इस पौधे का संशोधित नाम ‘बोगेनविलिया’ 1930 के दशक में ‘इंडेक्स क्यूवेंसिस’ की प्रामाणिक सूची में लिखा गया। यह सूची क्या है? यह लंदन में क्यू स्थित विश्व प्रसिद्ध रायल बोटेनिकल गार्डन का प्रकाशन है जिसमें विश्व भर के पौधों की प्रामाणिक सूची प्रकाशित की जाती है। सूची में पौधों का कुल, वंश और जाति के अनुसार विवरण दिया जाता है।

पहले तक बोगेनविलिया की एक ही प्रजाति मानी जाती थी। बाद में इसकी दो अलग-अलग प्रजातियां पहचान ली गईं। ये हैंः बोगेनविलिया स्पेक्टाबिलिस और बो. ग्लेब्रा। उन्नीसवीं सदी में ये दोनों किस्में समुद्री यात्रियों के साथ यूरोप पहुंचीं जहां लोगों ने इन मनमोहक फूलदार पौधों को हाथों-हाथ लिया। फ्रांस और इंग्लैंड में नर्सरियां बड़ी तादाद में बोगेनविलिया के पौधे बेचने लगीं। इस तरह दक्षिणी अमेरिका का निवासी यह पौधा सुदूर आस्ट्रेलिया और अन्य देशों तक पहुंच गया। क्यू गार्डन ने इसके पौधे ब्रिटिश कालोनियों को भेजे। और, धीरे-धीरे बोगेनविलिया दुनिया भर में फैल गया। आज घरों और पार्कों में बहुतायत से खिले रंग-बिरंगे बोगेनविलिया को देख कर भला कौन कह सकता है कि इसका जन्म दक्षिणी अमेरिका में हुआ था।

बोगेनविलिया के फूलों के इतिहास में एक और घटना घटी। कैरेबियन सागर के तटीय शहर कार्टगन में एक थीं श्रीमती आर.वी.बट। उन्हें अपनी बगिया में एक सुंदर क्रिमसन यानी किरमिजी रंग के फूलों वाला बोगेनविलिया दिखाई दिया। वनस्पति वैज्ञानिकों को लगा, यह एक नई प्रजाति है। उन्होंने श्रीमती बट के सम्मान में उसका नामकरण कर दियाः बोगेनविलिया बुटियाना! लेकिन, जल्दी ही पता लग गया कि वह कोई नई प्रजाति नहीं बल्कि पहले से मौजूद बोगेनविलिया ग्लेब्रा और बो. पेरुवियाना की संकर संतान है। यानी, प्रकृति ने स्वयं इन दोनों प्रजातियों का ब्याह रचा दिया जिससे इस संकर संतान का जन्म हो गया।

धीरे-धीरे पता लगा कि दुनिया भर में इस तरह प्राकृतिक रूप से बोगेनविलिया की अनेक संकर किस्में तैयार हो रही हैं। वैज्ञानिक भी पीछे नहीं रहे, उन्होंने भी संकरण करके इसकी नई किस्में तैयार करना शुरू कर दिया। आज विश्व के तमाम देशों में आकर्षक फूलों वाले इस पौधे की सैकड़ों किस्में तैयार की जा चुकी हैं। बल्कि, दुनिया भर में बोगेनवेलिया की जितनी किस्में उगाई जा रही हैं, उनमें से कम से कम आधी किस्में तो हमारे देश में ही तैयार की गई हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली बोगेनविलिया की नई किस्में तैयार करने का एक प्रमुख केन्द्र है। वहां इनका संग्रह देखा जा सकता है।

चंडीगढ़ के 20 एकड़ में फैले बोगेनविलिया पार्क में भी इसे देखा जा सकता है जहां इसकी लगभग 65 किस्में उगाई जा रही हैं। वहां सालाना बोगेनविलिया मेला भी लगाया जाता है। इसके अलावा देश के कई अन्य शहरों में भी बागों में बोगेनविलिया की बहार देखी जा सकती है।

इसलिए नाम में क्या रखा है कहने के बजाए कहना चाहिए बहुत कुछ रखा है नाम में। नाम की अंगुली पकड़ कर इतिहास के गलियारों की लंबी यात्रा की जा सकती है। है कि नहीं?

 

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