यहीं रहते थे रुडयार्ड किपलिंग

बंगला जिसमें रुडयार्ड किपलिंग रहते थे
बंगला जिसमें रुडयार्ड किपलिंग रहते थे

कुछ दिन पहले की बात है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में सुबह के नाश्ते का इंतजार कर रहा था। सामने बैठे युवा अनजान व्यक्ति से यों ही बातों-बातों में परिचय हो गया। वे संजय प्रताप सिंह थे। हम बातों ही बातों में साहित्य और शिक्षा का गढ़ रहे इलाहाबाद को याद कर रहे थे कि वे बोले,“ वे इलाहाबाद के दिन थे। कितने साहित्यकारों का शहर था यह। उनकी यादें संजोने के बजाय उनकी यादगार चीजों को नष्ट किया जा रहा है। जहां रुडयार्ड किपलिंग रहे थे, वह जगह और वह निवास भी बर्बाद हो रहा है?”

“आप जानते हैं मित्र, वह जगह कहां है? ” मैंने बहुत उत्सुक होकर पूछा।

वे बोले, “हां जानता हूं। यहीं सीनेट भवन के ठीक सामने, सड़क के दूसरी ओर।”
मैंने संजय का पहुंचा पकड़ लिया। कहा, “मित्र अब आप दिखा ही दीजिए वह जगह।”
मोतीलाल नेहरू रोड पर आगे बढ़े। सीनेट भवन के ठीक सामने, घने बुजुर्ग पेड़ों के बीच थी वह जगह जहां सवा सौ वर्ष पहले 1888-89 में रुडयार्ड किपलिंग रहे थे। वे तब ‘पायनियर’ अखबार के सहायक संपादक थे।

किपलिंग सोसाइटी का लगाया हुआ बोर्ड
किपलिंग सोसाइटी का लगाया हुआ बोर्ड

विश्वास करना कठिन था कि जिस बाग-बंगले में रहते हुए उसकी कहानियों का पहला संग्रह ‘प्लेन टेल्स फ्राम द हिल्स’ (1888) और उसी वर्ष छह अन्य कथा संग्रह छपे और जिसे 1907 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, वह कथा-शिल्पी यहीं रहता था। सड़क से सटी दीवार के पास गंदगी के बीच छोटी-सी पान-बीड़ी-सिगरेट की गुमटी के किनारे एक नीले टिन का पोस्टर चिपका गोलाकार बोर्ड इस बात का एकमात्र सुबूत पेश कर रहा था कि हां वह विश्वविख्यात लेखक यहीं रहता था। बोर्ड में लिखा था, ”रुडयार्ड किपलिंग (1865-1936), लिव्ड हियर, 1888-1889, इरैक्टेड बाइः किपलिंग सोसायटी, लंदन।“

घनी छांव वाले शीशम, इमली, बरगद आदि के पेड़ों के बीच से होकर कच्चा रास्ता भीतर उस जर्जर बंगले तक जाता है जिसमें कभी किपलिंग रहे। उनकी ‘बा बा ब्लैक शीप’ कहानी पहली बार 12 दिसंबर 1888 को ‘द वीक्स न्यूज’, इलाहाबाद में ही छपी थी।
चारों ओर उगी घास और बेतरतीब खड़े झुरमुटों से घिरे उस बंगले के बरामदे में कोई बर्तन मांज रहा था। गेट के भीतर प्रवेश करते ही दाहिनी ओर, पता लगा कभी दो कमरे हुआ करते थे जो तोड़ दिए गए हैं। एक कमरे का अवशेष बचा है जिसमें मजदूर रहते हैं। रुडयार्ड किपलिंग जब 1300 वर्ग गज में फैले इस बंगले में रहने के लिए आए तब यह उनके मित्र प्रोफेसर एलेक हिल का घर था। कहते है, इसे 1917 में इसके वर्तमान मालिक श्री सुधीर टंडन के पुरखों ने खरीद लिया था। 2008 में कई स्थानीय अखबारों ने इस जमीन के बिकने की खबर छाप कर इसके ऐतिहासिक महत्व की ओर ध्यान आकर्षित किया था और यह भी बताया था कि सरकार और विश्वविद्यालय की रुचि के कारण बंगले की 70 प्रतिशत जमीन किसी ‘कमजोर वर्ग एवं कर्मचारी सहकारी गृह समिति’  को बेची जा चुकी है।

मैं बंगले के प्रवेश द्वार के पास अहाते के साथ खड़ा होकर चुपचाप उस पार सीनेट हाल के टावर की घड़ी को देखता रहा। न जाने क्यों किसी पुरानी हिंदी फिल्म का गाना मन में गूंजने लगा…‘सुनो गजर क्या गाए, समय गुजरता जाए…’। सोचता रहा कि हां समय किस तरह गुजर जाता है और पीछे अपने गहरे निशान छोड़ जाता है।

किपलिंग में मेरी विशेष रूचि उनके विज्ञान कथा साहित्य को लेकर है। उन्होंने ‘जंगल बुक’ में वन्य जीवों और मोगली के माध्यम से जंगल के जीवन की दुनिया तो रची ही, नई खोजों, आविष्कारों, समाज पर प्रौद्योगिकी के प्रभाव और भावी युद्धों की आशंकाओं के बारे में भी कहानियां लिखीं। संभावनाओं पर आधारित उनके इस अनूठे साहित्य ने भावी विज्ञान कथा साहित्य को प्रभावित किया। पाल एंडरसन, एल. स्प्रेग डी कैम्प, जो हाल्डेमन और जीन वोल्फ जैसे विज्ञान कथाकारों ने स्वीकार भी किया कि वे किपलिंग के साहित्य से प्रभावित हुए। जूल्स वर्न, एच.जी. वेल्स, राबर्ट हीनलीन, आइजैक असिमोव और वान वोगट उनके समकालीन विज्ञान कथाकार थे। विज्ञान कथा विधा को ‘साइंस फिक्शन’ का नाम देने वाले प्रख्यात संपादक जान डब्लू. कैम्पवेल ने रुडयार्ड किपलिंग को पहला आधुनिक विज्ञान कथाकार कहा था। ऐसा विज्ञान कथाकार जिसने अपने पाठकों को विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के प्रभावों के बारे में सोचने का मौका दिया।  किपलिंग ने अपनी दो प्रमुख कहानियों ‘विद द नाइट मेलः ए स्टोरी आफ 2000 ए. डी.’ (1905) और ‘एज ईजी एज ए बी बी’ (1912) में भावी उड़ानों और तत्कालीन समाज की कल्पना की। वे पत्रकार थे और ‘विद द नाइट मेल..’ कहानी को पत्रकारिता की शैली में कुछ इस तरह लिखा कि लगता है जैसे हम वर्ष 2000 की घटनाएं देख रहे हैं।

इस कहानी में उन्होंने कल्पना की कि बीसवीं सदी में अटलांटिक महासागर के आरपार हवाई यात्राएं आम हो चुकी हैं। इसी तरह ‘एज ईजी एज ए बी सी’  में वे इक्कीसवीं सदी के वर्ष 2065 की कल्पना करते हैं जब हवाई यात्राओं का नियंत्रण ‘एरियल बोर्ड आफ कंट्रोल’ यानी ए बी सी के हाथ में है। तत्कालीन समाज में बिजली और रेडियो से चलने वाली मशीनें मौजूद हैं। ए बी सी के सदस्य इक्कीसवीं सदी की बढ़ती आबादी और लोगों की निजी जिंदगी में दखल जैसी विकट समस्याओं के समाधान के लिए उच्च प्रौद्योगिकी से विकसित युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। ध्यान रहे, किपलिंग जब ये कहानियां लिख रहे थे तक हवाई यात्राएं स्वप्न ही थीं। राइट बंधुओं ने हवाई जहाज के अपने प्रयोग में 1903 में सफलता हासिल की थी।

किपलिंग ने अपनी क्लासिक पुस्तक ‘किम’ में भी एक ऐसी दुनिया रची जिससे पश्चिम के लोग तब तक पूरी तरह अनजान थे। उसमें किपलिंग ने पुरानी अजनबी संस्कृतियों का चित्रण किया और पुरातनपंथी समाज पर नई प्रौद्योगिकी के प्रभाव को दर्शाया। उनकी एक और कहानी ‘द आइ आफ अल्लाह’ में एक मध्ययुगीन समाज में अचानक नई प्रौद्योगिकी के आ जाने से मची खलबली का जिक्र है। वह समाज नई प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए तैयार ही नहीं है। इस कहानी में एक डाक्टर के पास एक ‘आर्ट आप्टिक’ उपकरण हैं जिससे वह पोखर के पानी की एक बूंद में सूक्ष्मजीवों की दुनिया दिखा सकता है।

उनकी ‘.007’ कहानी में भापचालित इंजन और मशीनें हैं और लोग मशीनों के साथ मिल-जुल कर काम कर रहे हैं। इसी तरह ‘वायरलैस’ कहानी एक प्रयोगकत्र्ता और रेडियो के आविष्कार पर बुनी गई है।

प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार जान ब्रूनर ने रुडयार्ड किपलिंग की विज्ञान कथाओं पर गंभीरता से काम किया। उन्होंने ‘किपलिंग्स साइंस फिक्शन’ (1992) ग्रंथ का संपादन किया जिसमें किपलिंग की विज्ञान कथाएं संकलित की गई हैं।

लेकिन, इलाहाबाद कैसे पहुंचे रुडयार्ड किपलिंग? कौन थे वे? कहां से आए थे?

रुडयार्ड किपलिंग का जन्म बंबई (अब मुंबई) में जे.जे. स्कूल आफ आर्ट के परिसर के एक काटेज में 30 दिसंबर 1865 को हुआ था, जिसमें उनके मूर्तिकार तथा पाटरी डिजायनर पिता जान लाकवुड किपलिंग और उनकी मां एलिस किपलिंग रहती थीं। पिता तब जे. जे. स्कूल आफ आर्ट में प्रिंसिपल तथा वास्तु-मूर्ति शिल्प के प्रोफेसर थे। मां और पिता की भेंट पहली बार 1863 में इंग्लैंड की एक खूबसूरत झील रुडयार्ड के किनारे हुई थी। उसकी याद में उन्होंने अपने बच्चे का नाम रुडयार्ड रख दिया।

पांच वर्ष की उम्र में रुडयार्ड को उसकी तीन वर्षीय बहिन एलिस के साथ पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया जहां वे माता-पिता से दूर एक दम्पत्ति के पास रहे। रुडयार्ड उन दुखद दिनों को कभी नहीं भूल पाया। उन दिनों को याद करते हुए उसने इलाहाबाद में अपनी प्रसिद्ध आत्मकथात्मक कहानी ‘ बा बा ब्लैकशीप’ लिखी। इंग्लैंड में सात वर्ष तक पढ़ाई करने के बाद रुडयार्ड भारत लौटे और लाहौर में एक स्थानीय अखबार ‘सिविल एंड मिलिटरी गजट’ के सहायक संपादक बन गए। शिमला उन्हें बहुत पसंद था और वे हर साल छुट्टियां बिताने वहां जाते थे। नवंबर 1887 में उन्हें ‘सिविल एंड मिलिटरी गजट’ के सहयोगी अखबार ‘पायनियर’ में भेज दिया गया जो तब इलाहाबाद से निकलता था।

तो, इस तरह पहुंचे थे वे इलाहाबाद जहां उनकी याद में आज वह एक छोटा सा बोर्ड लगा है…रुडयार्ड किपलिंग (1865-1936) लिव्ड हियर…’ और सामने सीनेट हाल के टावर की घड़ी बता रही है कि समय गुजरता जाता है और यादें शेष रह जाती हैं…. 

     

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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