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दिल्ली

5 नवंबर , 2025

आदरणीय दादा जी ,

मिताली और मेरा सादर प्रणाम। आप कैसे हैं? दादी जी कैसी हैं? इस बार तो बहुत दिनों से आपका पत्र नहीं मिला है। हमें भूल गए हैं क्या? इस बीच हमने आप दोनों को बहुत याद किया। जानते हैं क्यों? क्योंकि हम लोग अपने स्कूल की ओर से शैक्षिक टूर पर ‘सूर्योदय की स्वर्णिम घाटी’ दार्जिलिंग की सैर पर गए थे। हमें सूर्योदय देखना था। प्रकृति पर सूर्य की किरणों का मोहक प्रभाव देखना था। इस बार स्कूल की ओर से हमें यही प्राजेक्ट का काम दिया गया था। इसके लिए कहीं सूर्य देखने जाना था क्योंकि हमारी दिल्ली में तो सूर्य दिखाई ही नहीं देता। सुबह, शाम और दिन में भी इतनी धुंध रहती है यहां कि बस लगता है किसी घिसे हुए कांच के उस पार से रोशनी आ रही हो। मोटर-कारों का इतना धुंधा हवा में मिल जाता है कि बस आसमान उसी से घिरा रहता है।

दादा जी, एक बार आपने लिखा था कि जब आप दिल्ली में नौकरी करते थे तो उन दिनों सुबह-शाम मोटर-कारों के ज़हरीले धुएं से दम घुटने लगता था। दफ़्तर आते और घर लौटते समय कई चैराहों पर धुआं इतना घना हो जाता था कि आंखों में जलन होने लगती और लोग खांसने लगते। आपने यह भी तो लिखा था कि तक कुछ लोग स्कूटर, मोटर कारें चलाते समय ‘मास्क’ भी पहनने लगे थे। आपको वे लोग दूसरे ग्रहों के जैसे प्राणी लगते। लेकिन, वह तो तीस साल से भी पुरानी बात है। अब अगर आप यहां आएं तो आपको ज्यादातर दूसरे ग्रहों के प्राणी ही नज़र आएंगे! हमारी दिल्ली की आबोहवा में इतना धुंआ भर गया है कि लोग गाड़ी चलाते समय ही नहीं, बाज़ारों में घूमते समय भी ‘मास्क’ पहनना पसंद करते हैं। हमें अपनी पर्यावरण की कक्षा में बताया गया कि हमारी दिल्ली के आकाश में हर रोज करीब 1400 मीट्रिक टन एस.पी. एम. पहुंचता है। मतलब ज़हरीले धुएं का इतना अंश उस हवा में तैरता रहता है दादाजी, जिसमें हम लोग सांस ले रहे हैं। आपने अच्छा किया- यहां नहीं बसे। वापस उन्हीं पहाड़ों की गोद में लौट गए, जहां आप पैदा हुए थे। पापा बताते हैं कि आपको पहाड़ बहुत पसंद थे। वे कहते हैं, आपको सभी सपने पहाड़ों के ही आते थे! यहां की घटना भी होती थी तो वह पहाड़ के ही दृश्य में दिखाई देती थी!

दार्जिलिंग देखने के बाद अब मुझे लगता है कि काश आपकी तरह मुझे भी पेड़ों, पहाड़ों, पक्षियों और नदियों के ही सपने आया करें! टाइगर हिल में धूपी के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के बीच से उगते और डूबते सूरज को मैं कभी नहीं भूल सकूंगा। सूरज उगने से पहले और डूबने के बाद रंग बदलते कंचनजंगा और एवरेस्ट की चोटी को मैंने सपने में भी देखा। आपको एक मजे़दार बात बताऊं? लौटते समय हम मिरिक में रुके थे तो जानते हैं सुबह हमें कौन उठाता था? चिडि़यां…! हां, चिडि़यों की चहचहाहट से उठते थे हम लोग। शाम ढलने पर फिर वही चिडि़यों का कलरव, झींगुरों की झंकार और मेंढकों का शास्त्रीय संगीत! सच मानिए दादा जी, मिताली और मुझे लगता था जैसे हम किसी दूसरे लोक में आ गए हों। और हां, तारे! आकाश में उतने तारे तो हमने कभी देखे ही नहीं थे।  अनगिनत तारे और दूधिया आकाशगंगा। दिल्ली के आकाश में तो कभी भारी वर्षा के बाद खुले आसमान में चंद तारे ही दिखाई देते हैं। बाकी तो हम बस ‘नेहरू तारामंडल’ में देख पाते हैं।

वहां से लौटे तो लगा किसी भट्टी में वापस आ गए हैं। भयानक रूप से तपती, दमघोंटू धुएं से अटी भट्टी में। हमारा विमान जब उतरने के लिए दिल्ली के ऊपर मंडराया तो नीचे सिर्फ काली सड़कें और कंक्रीट की हजारों इमारतें ही इमारतें दिखाई दीं। धुंध के आवरण मे लिपटी सूखी इमारतें। लगता था कहीं इंच भर ज़मीन भी नहीं है। वहां की उस साफ हवा और हरियाली के बाद अपनी दिल्ली को देखकर मेरा तो मन भयभीत हो उठा। मिताली और मैं कई दिन तक घर में भी अधिकांश समय मास्क पहने रहे।

आप लोग तो रोज सूर्योदय और सूर्यास्त देखते होंगे। साफ हवा में सांस लेते होंगे। हम क्या करें?  न पापा को कभी फुर्सत मिलती है और न मम्मी के पास वक्त होता है। इसलिए हम लोग भी कहीं नहीं जा पाते।  अगर हम आपके पास आएंगे तो खूब शुद्ध हवा फेफड़ों में भर लाएंगे। मोटर-कारों का शोर कुछ कम हो गया है। लगता है, रात काफी हो गई है। इसलिए इस बार इतना ही। बाकी बातें अगले पत्र में। सुबह चिडि़यों के कलरव से नहीं, बसों और मोटर-कारों के हार्नों के कोलाहल से नींद खुलेगी।

अच्छा दादा जी। दादी जी को हमारा प्रणाम। आपके पत्र की प्रतीक्षा करूंगा।

-मुकुल

दिल्ली

14 मई, 2025

दादा जी,

आपका पत्र मिल गया है। आपने लिखा है कि कभी टेलीफोन पर हमसे बात करने का बड़ा मन होता है, लेकिन यह संभव नहीं क्योंकि आपको सुनाई नहीं देता।…आपको तो बयासी वर्ष की उम्र में नहीं सुनाई देता। लेकिन, दादा जी क्या आप विश्वास करेंगे- हम लोग तो अभी से बहुत ऊंचा सुनने लगे हैं। हम ही क्यों, हमारी दिल्ली की सडकों पर बसों, मोटरकारों, तिपहिया और दुपहिया वाहनों का इतना कर्कश कोलाहल है कि यहां की तीन करोड़ 11 लाख आबादी में से ज्यादातर लोगों को बहुत कम सुनाई देता है। हम लोग शोरजनित बहरेपन-डाक्टरों की भाषा में ‘नाॅइज इंड्यूस्ड हियरिंग लास’ के शिकार हो चुके हैं। यहां लोगों को फुसफुसाहट नहीं सुनाई देती। वे तीखी आवाज़ देने वाली अलार्म घडि़यां रखते हैं। आपस में चीख-चीख कर बातें करते हैं। आपने लिखा है जब आप यहां थे तो दिल्ली की आबादी करीब 85 लाख थी और जब सड़कों पर करीब 22 लाख वाहन दौड़ते थे। लेकिन आज तो विशाल दिल्ली की सड़कों पर 91 लाख से भी अधिक बसे, मोटरकारें और दूसरे वाहन दौड़ रहे हैं। आप अनुमान लगा सकते हैं दादा जी कि इनसे कितना शोर होता होगा और कितना जहरीला धुआं ये हवा में छोड़ रहे होंगे। क्या आप बता सकते हैं दादा जी कि यहां सबसे ज्यादा लोग किस बीमारी से पीडि़त हैं? अस्थमा और ब्रोंकाइटिस से! यह हवा में घुले ज़हरीले धुएं की देन है।

आपने जिन पुस्तकों को पढ़ने के लिए लिखा था, मैंने वे पढ़ ली हैं। उन्हें पढ़कर मैं सोच में पड़ गया हूं।  कहां गई वह हरियाली? कहां गए वे सड़कों के किनारे लगे हरे-भरे पेड़? दादा जी, अब वे सिर्फ़ इन किताबों में रह गए हैं। इनमें लिखा है- सर एडविन ल्यूटिएंस ने नई दिल्ली की नींव डाली थी और मस्टोव ने इसमें हरियाली बोई थी, आज से करीब 105 वर्ष पहले। कहीं नीम तो कहीं जामुन, शिरीष, पाकर, अमलतास, गुलमोहर, जैकरेंडा, विलायती बबूल, सेमल, कचनार आपने भी उनकी छांव देखी थी। लेकिन, अब यहां सड़कें सूनी हैं। उनमें से ज्यादातर पेड़ न जाने कब सूख गए। आप जानते हैं, क्यों सूख गए वे पेड़?

4723 facebookउनको सुखाने का काम शायद आपके समय में ही शुरू हो गया था। हर चीज को सीमेंट, कंक्रीट और पत्थरों से ढकने की धुन में सड़कों के किनारे पेड़ों के चारों ओर भी सीमेंट-कंक्रीट की टाइलें बिछा दी गईं। पूरी ज़मीन ढक दी गई। तब पेड़ों को वर्षा का पानी मिलना भी बंद हो गया। धीरे-धीरे वे सूखते चले गए। वर्षा होती लेकिन उसका पानी ज़मीन में जाने के बज़ाय सड़कों और पक्की नालियों से बह कर सीधे यमुना में पहुंच जाता। दादा जी आपने एक बार लिखा था कि तीस साल पहले जब आप लोग दिल्ली में थे तो यहां कई कालोनियों में हैंडपंपों से पानी आता था। मोटर पंप से पानी खींचकर टंकियों में भर लिया जाता था। वह नहाने-धोने के काम आता था। सुबह-शाम महानगर निगम की ओर से पीने का पानी सप्लाई किया जाता था। लेकिन, अब न हैंडपंप हैं और न मोटरपंप क्योंकि ज़मीन के भीतर पानी इतना नीचे पहुंच चुका है कि उसे पंपों से निकालना संभव ही नहीं रहा। काश, दिल्ली की बारिशों का लाखों गैलन पानी नालों में बहाने के बजाय धरती के सीने में जज़्ब होने दिया गया होता या उसे निचले इलाकों में कच्ची झीलों और तालाबों में जमा कर लिया जाता तो जमीन में पानी बना रहता। यह सोचकर मुझे तकलीफ़ होती है दादा जी कि उन बड़े बुजुर्ग वृक्षों ने अपनी लंबी-लंबी जड़ों से धरती के भीतर लगातार पानी खोजा होगा लेकिन ज्यों-ज्यों पानी घटता गया होगा- वे भी प्यास से तड़प कर सूखते गए होंगे। इसलिए अब न कहीं सुर्ख पलाश दहकते हैं, न गुलमोहर फूलते हैं, न नीम और पीपल की पत्तियां सरसराती हैं।

दादा जी, इतना सब कुछ होते हुए भी पीने के पानी की किल्लत नहीं है। हमें यह सुनकर बड़ी हंसी आई कि जब आप यहां थे तो उन दिनों कई बार खाली घडे़ और बाल्टियां लेकर पीने के पानी के लिए प्रदर्शन किए जाते थे! अब ऐसा नहीं है। यहां यमुना, गंगा और टिहरी बांध से पीने का पानी आता है। हां, प्रदर्शन अब भी होते हैं लेकिन झील-तालाब बनाने के लिए। लाखों गैलन बरसाती पानी दिल्ली में ही रोकने के लिए। ऐसा हो गया तो संभव है यहां धरती के भीतर पानी का स्तर बढ़े। हो सकता है यहां फिर धरती की कोख हरी हो उठे। लेकिन, इसमें न जाने कितना समय लगेगा। ऐसा हो भी गया तो विशाल छायादार वृक्षों की कतारें तो बीसियों वर्ष बाद खड़ी हो सकेंगी। हां, जल्दी बढ़ने वाले वृक्षों और शोभाकारी झाडि़यों और बेलों से तो हम अपनी दिल्ली में हरियाली वापस ला ही सकते हैं। क्यों दादा जी?

-मुकुल

दिल्ली

5 जून, 2025

आदरणीय दादा जी,

अच्छा है, आपको आज की दिल्ली का हाल पढ़कर अपने समय की दिल्ली याद हो आई। आपने लिखा है कि शायद यही होना था क्योंकि जिस रफ़्तार से दिल्ली का ‘विकास’ हो रहा था और बिल्डर उसकी एक-एक इंच जमीन में कंक्रीट की आसमान छूने वाली इमारतें खड़ी कर रहे थे, उससे लगता था कि एक दिन दिल्ली सिर्फ कंक्रीट का जंगल बन जाएगी। उसी रफ़्तार को देखकर आप दिल्ली छोड़कर चले गए। जाते हुए आपको वह किस शायर की पंक्ति याद आती रही….आपने लिखा है….हां, ज़ौक….क्यों जाए ज़ौक दिल्ली की गलियां छोड़कर! ऐसा तो हम और पापा जी भी सोचते हैं। सोचते हैं, कुछ भी हो फिर भी है तो अपनी ही दिल्ली! हां, लाल किला देखने आने वाले पर्यटक अब बहुत हैरान होकर उन शब्दों को दुहराते हैं- पृथ्वी में अगर कहीं स्वर्ग है तो वह….यहीं है….यहीं है….ज़मीनस्तो….जमीनस्त….आप खुद सोचिए, कैसा लगता होगा मुंह पर मास्क पहनकर यह सब कुछ पढ़ना?

3785आपको दिल्ली का ‘हरा फेफड़ा’ उर्फ़ रिज़ अभी भी याद है! दिल्ली के पूरे काले-धूसर धुआंए हुए कैनवस पर दादा जी, सिर्फ यही एक हरे रंग के ब्रश का ‘स्ट्रोक’ जैसा लगता है। यह भी प्रदूषित हवा की कालिख से मैला पड़ा रहता है। कभी बारिश होने पर जब पत्तियां घुल जाती हैं तो पिलखन, पीपल, नीम, कीकर, गूलर, शीशम वगैरह के पेड़ हरियाली फैला देते हैं। राजस्थान से आने वाली गर्म रेतीली हवाओं को यही तो रोकता रहा है अन्यथा आधी दिल्ली तो अब तक रेगिस्तान हो चुकी होती।  रिज़ अब संरक्षित वन क्षेत्र है। इसके लिए शायद आपके जमाने में ही लड़ाई शुरू हो चुकी थी। अच्छा दादा जी एक बात बताइए। इतनी-सी बात वर्षों तक हमारी समझ में क्यों नहीं आई होगी कि रिज़ वास्तव में दिल्ली का हरा फेफड़ा है। अगर वह नहीं रहा तो दिल्ली की सांस रुक जाएगी। उसका दम घुट जाएगा।….अब तो खैर वह संरक्षित वन है। पक्षी वहीं चहचहाते हैं। तुग़लकाबाद और दूसरे इलाकों के सभी बंदर अब रिज़ में ही रहते हैं।

दादा जी, पापा कहते रहते हैं कि कल क्या होगा। दिल्ली की आबादी बढ़ती ही जा रही है। इसके ‘विकास’ की रफ्तार भी बढ़ती जा रही है। कंक्रीट का जंगल और भी घना होता जा रहा है। उसमें मशीनी जानवरों की तादाद और उनका कर्कश कोलाहल बड़ता जा रहा है। बढ़ती औद्योगिक इकाइयों की चिमनियां हर पल हवा में धुआं उगलती जा रही हैं?….तब, कल क्या होगा? वे कहते हैं, हम तुम्हें क्या दे रहे हैं? यही सब? कहते हैं, कल तुम्हारे बच्चे पूछेंगे कि आपने हमें क्या दिया? तब क्या जवाब दोगे तुम?

दादा जी, सचमुच क्या जवाब देंगे हम? दिल्ली के इतिहास की सचित्र पुस्तकों के पन्ने पलटते हुए हम भी तो मन ही मन यही सवाल पूछते हैं- कि आप लोगों ने क्या दिया है हमें? वह अपार्टमेंट जिसमें कभी धूप नहीं आती! वे सड़के जिनमें लाखों स्कूटर, मोटर-कारें और बसें चीखती हुई कानों के पर्दे फाड़ रही हैं और हवा में ज़हर उगल रही हैं! वह हवा जिसमें हम सांस तक नहीं ले पा रहे हैं! वह ज़मीन जिसमें एक अंकुर नहीं फूट सकता!

इसलिए आज हम ‘स्मृति वन’ जा रहे हैं। रिज़ के ही इलाके में। हम लोगों ने तय किया है कि हम दिल्ली के हरे फेफड़े की ताक़त बढ़ाएंगे। पापा को बड़ी कोशिश करके किसी तरह एक पेड़ लगाने की अनुमति मिल गई है। इस पर हजारों रुपए का खर्च आएगा। लेकिन, खुशी की बात तो यह है कि वहां एक पेड़ हम लगा सकते हैं। पहले यहां सिर्फ़ संसार से विदा हो चुके प्रियजनों की स्मृति में  पेड़ लगाए जाते थे। अब आने वाली पीढ़ी को सांस देने के लिए पेड़ लगा सकते हैं। पेड़ का नाम हम आपके और दादी जी के नाम पर रख रहे हैं। आप लोगों की ओर से यह एक पेड़ होगा हमारे लिए….और, हमारे बाद आने वालों के लिए।

अच्छा दादा जी, बाकी बातें अगले पत्र में लिखूंगा। दादी जी को प्रणाम।

आपका प्यारा पोता,

मुकुल

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