दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-13

तभी, संकरी घाटी में अचानक गगास नदी का पुल आ गया। पुल पार करके थोड़ा ऊपर पहुंच कर शेखर ने रोक लिया। यहां भी सड़क के घूम पर नीली गुलमोहर के पेड़ में बहार आई हुई थी। हम शीशम के पेड़ की बगल में खड़े हो गए। शेखर ने नीचे गगास की ओर देख कर कहा, “जगदीश चंद्र पांडे के गगास के तट पर’ उपन्यास में जो गगास नदी है, वह यही है। हम उसके बारे में बचपन से पढ़ते आ रहे हैं। पांडे जी ने इसे अपने उपन्यास में अमर कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे शेखर जोशी ने कोसी का घटवार’ कहानी में कोसी को। लेकिन, पता नहीं ये नदियां कब तक अमर बनी रहेगीं क्योंकि हर साल इनमें पानी घटता जा रहा है। क्यों मेहता जी?”

“आप ठीक कह रहे हैं। गगास और कोसी दोनों के बहाव की गति घटती जा रही है। कोसी के घटते बहाव का तो बाकायदा अध्ययन भी किया गया है। शायद 4.6 किमी. प्रति वर्ष या ऐसे ही कुछ हिसाब से पानी के बहाव की गति घट रही है।”

यह ‘गिरदा’ भी सदा ऐन मौके पर याद आ जाता है। अब देखो तो आंखें बंद करके कान में सुना रहा हैःमेरि कोसि हिरै गे कोसि/आब कचुई है गे, मेरि कोसि हिरै गे कोसि/तिरंगुली जसि रै गे, मेरि कोसि हिरै गे कोसि।”…

गगास को एक नजर और देख लेता हूं। कानों में गिरदा की आवाज गूंज रही है। भीतर कहीं कोसी की पीड़ा बहने लगी है। हम आगे चल पड़ते हैं।

रानीखेत अब केवल 14 किमी. दूर था और हम चीड़ वनों से होकर आगे बढ़ रहे थे। उन चीड़ वनों के बीच शांत, एकांत मौना गांव आया। एक चीड़ानी धार की ढलान पर विद्यालय का बोर्ड दिखा- चौकुनी विद्यालय, जिला-अल्मोड़ा। ऊपर जाने पर चौकुनी गांव के खेत और घर दिखाई दिए। हरे-भरे जंगल में चीड़ के पेड़ों की सांय-सांय सुनते हुए हम कब रानीखेत में रंग-बिरंगे छावनी द्वार के पास पहुंच गए, पता ही नहीं लगा। और लीजिए, वहां काफल देखते ही कूद कर बाहर! दो-तीन लोग टोकरियों में काफल लेकर बैठे हुए थे। एक के पास खुबानी, आड़ू, कुसमिया आड़ू और प्लम थे। साथियों ने थैलियों में दस-दस रूपए के काफल लेकर एक-दूसरे को दिए। महेश ने मुझे भी एक थैली पकड़ा दी। ‘काफल-काफल’ करते मन को मुट्ठी भर-भर कर काफल खाने से बड़ा सुकून मिला। पाए हुए जैसे लगे वे मीठे रसीले काफल। खाते-खाते मन बचपन में भी हो आया, गांव में काफल के पेड़ों में चढ़ कर, टहनियों से टीप-टीप कर काफल चख आया।

काफल
काफल

सदर बाजार में जाकर रुके। महेश ने दाज्यू से परिचय कराया। फिर एक होटल में विशेष रूप से हमारे लिए बना खाना खाया- हरे लंबे गदुवा का जायकेदार साग, आलू-टमाटर की रसदार सब्जी, रोटी और चावल। सब्जियों को जखिया से छौंका गया था। स्वाद इतना अद्भुत कि प्रकाश ने फटाफट एक पहाड़ी लौकी खरीद ली कि दिल्ली जाकर खाएंगे। कुछ साथियों ने दिल्ली में परिवार को पहाड़ की याद दिलाने के लिए बाल मिठाई खरीद ली। मुझे बीच बाजार में रेढ़ी पर काफल दिख गए। काफल वाले से कागज के डिब्बे में काफल की ही पत्तियां बिछा कर काफल पैक करवा लिए। पहाड़ की ये सौगातें लेकर हम आगे रवाना हुए।

खैरना में कोसी मिली। देख कर ‘चाय्ये रै गए’ (देखते ही रह गए)। गिरदा फिर कान में कहने लगे, “देखो, इस कोसी को देखो। ये वही कोसी है दाज्यू जो कभी….गदगदानी औंछी, मेरि कोसि हिरै गे कोसि/घट-गूला रिंगोंछी, मेरि कोसि हिरै गे कोसि।…

अब अपने-अपने घरों को जाने की घड़ी आ गई थी। खैरना में सभी साथियों ने जे.एस. मेहता जी के गले लग कर उनसे विदा ली। वहां से उन्हें अल्मोड़ा जाना था। माहौल थोड़ा भावुक हो गया। चुपचाप आगे बढ़ गए। 1.30 बजे भुवाली पहुंचे। वहां शेखर, नवीन, राजू, हरीश और समीर से इस संकल्प के साथ विदाई ली कि जल्दी ही अगले कार्यक्रम में मिलेंगे। वे नैनीताल, हल्द्वानी को गए और हमने भीमताल की राह पकड़ी। धार पार फरसौंली में भगतदा की दूकान ‘फ्रुटेज’ पर रुके। वे तो बाहर गए हुए थे लेकिन उनके बेटे संजीव ने पहचान लिया। बुरांश और लीची के रस का रसास्वादन कराया। उस रस में संघर्ष और मेहनत का रस भी घुला होने के कारण उसका स्वाद बहुत बढ़ गया था।

असल में यात्रारंभ और यात्रा समापन के समय के अब दो ऐसे उदाहरण हमारे सामने थे जो पहाड़ों में रह कर पहाड़ के लिए बहुत-कुछ कर सकने का संदेश देते हैं। पहला उदाहरण उस युवा विद्यार्थी का है जिसने अपने साथियों के साथ मिल कर 1974 में उत्तराखंड की आर-पार यात्रा करके पहाड़ में रह कर पहाड़ को समझने और कुछ कर दिखाने की अलख जगाई थी। वह रमता जोगी साथी अभी-अभी गले लग कर नैनीताल की ओर चला गया है। विगत 36 वर्षों में उसके दो कदमों के साथ हजारों कदम जुड़ गए हैं और वह सबको साथ लेकर ‘पहाड़’ के जरिए पहाड़ की धड़कनों को लगातार सुन और गुन रहा है।

दूसरा उदाहरण इस साथी का है जिसने वन विभाग की नौकरी के बाद पहाड़ में ही रह कर स्वरोजगार अपना कर आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया और आज स्वरोजगार के साथ-साथ दूसरों को भी रोजगार दे रहा है। उसका सपना ‘फ्रुटेज’ के रूप में फला-फूला है। हमने फ्रुटेज से बुरांश का रस और कुछ अन्य फल उत्पाद खरीदे।

सपना साकार करने के इन दोनों उदाहरणों के बारे में सोचते-सोचते, लौटने का सुखद स्वप्न लेकर हम भीमताल के रास्ते दिल्ली की ओर रवाना हो गए।

(समाप्त)

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