दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-12

गैरसैंण  का पर्यटक विश्राम गृह
गैरसैंण का पर्यटक विश्राम गृह

दिवालीखाल से कुछ देर उतराई में चलने के बाद गाड़ी गैरसैंण पहुंच गई। गैरसैंण! लोगों की आशाओं की भावी राजधानी। वही गैरसैंण जहां से कभी राजा कल्याण चंद और गढ़वाल के राजा की सेनाओं ने एक होकर दुश्मन से लोहा लेने के लिए कैड़ारौ की ओर कूच किया था। और, वही गैरसैंण जो गढ़वाल और कुमाऊं की सीमाओं का मिलन स्थल है।

हम रात 9-30 बजे पर्यटक विश्राम गृह में पहुंचे। तय हुआ, एक-एक कमरे में दो-दो साथी रहेंगे। मैंने भी पिट्ठू लादा और एक कमरे में जाकर टिका दिया। नहाने-धोने की तैयारी कर ही रहा था कि बाहर कहीं से शेखर की आवाज सुनाई दी, “साथियो, पानी की यहां भारी कमी है। इसलिए यह तय हुआ कि जो लोग अभी नहा लेंगे, वे सुबह नहीं नहाएंगे। जो अभी नहीं नहाएंगे, वे सुबह नहा लेंगे। इस तरह सबको पानी मिल जाएगा।” मैंने एक बाल्टी पानी भरा और उसकी एक-एक बूंद से आनंद लेकर नहाया।

कमरे में बैठा ही था कि कमल ने भीतर आकर पूछा, “अरे, आप अकेले हैं ?”

“हां,  अभी तो अकेला हूं। आप आ रहे हैं? ”

“मैं देखता हूं।”

रुका रहा, लेकिन कोई नहीं आया। कमल बाद में एक रजाई ले गए। मैं भोजन करने के बाद चुपचाप सो गया।

सुबह 4-45 पर नींद खुली तो खिड़की का परदा हटा कर बाहर देखा। अंधेरा छंटने को था। सामने स्याह, धीर-गंभीर पहाड़ खड़ा था। उसके माथे के ऊपर हंसियाकार चांद टिका हुआ था और चांद के बाईं और कुछ दूर कोई तारा हीरे की तरह चमक रहा था। रात ब्याने की खबर देने के लिए दो-एक चिड़ियां तेजी से चहचहा रही थीं। मैंने नहाने-धोने का उपक्रम किया और नहा-धोकर बाहर निकल आया। गौरेयां और कुछ दूसरी छोटी-छोटी चिड़ियां सुबह के सगुन गीत गा रही थीं।

रात ब्या चुकी थी। पहाड़ों के पार से सुनहरी उजास फैलने लगी थी। चारों ओर घूम कर देखा। गैरसैंण पर्वमालाओं से घिरा था। लगता था जैसे किसी विशाल कटोरे के बीच में खड़ा हूं। बेहद सुंदर भूदृश्य था। तभी, पहाड़ों से बने उस विशाल प्राकृतिक कटोरे में सूरज अपनी किरणों से सुनहरी धूप भरने लगा। चाय बन चुकी थी। मैं चाय की प्याली लेकर विश्राम गृह की छत पर चला गया जहां तीन-चार कव्वे मौके का मुआयना कर रहे थे। उनमें से एक उड़ कर सामने खड़े चीड़ के विशाल वृक्ष की सूखी टहनी पर जाकर बैठ गया और कांव-कांव की भाषा में अपने साथियों से कुछ कहा। कौन जाने क्या कहा? हो सकता है,  कह रहा हो- इस आदमी के पास बिस्किट नहीं हैं। खग की भाषा तो खग ही जाने ना?

सभी साथी चलने के लिए तैयार होकर बाहर आए तो शेखर ने सामने पश्चिम में सुबह की सुनहरी धूप से रंगे पहाड़ों की ओर इशारा करके कहा, “वह है दूधातोली और इधर देवली पर्वतमाला। इन पहाड़ों के उस पार पिंडर बहती है और इस ओर रामगंगा। इनसे इस ओर सारा पानी बह कर, निथर कर आता है और उससे बने गाड़-गधेरे रामगंगा में आकर मिल जाते हैं।”

हम आगरचट्टी गांव से नीचे उतर रहे थे। गांव के किनारे-किनारे मयगाड़ मेहलचौरी में रामगंगा से मिलने चली जा रही थी। हम फरसों गांव को पीछे छोड़ कर मेहलचौरी पहुंच गए। वर्षा हो चुकी थी और मेहलचौरी गांव के निवासी खेतों में जुताई, बुआई के काम में जुटे हुए थे। दूर से देखने पर काले, मटमैले खेत काफी उपजाऊ लग रहे थे। सामने पुराना पुल दिखाई दे रहा था जो सड़क से गांव को जोड़ता था। पहाड़ों की गोद से आकर रामगंगा मेहलचौरी से पूर्व की ओर बह रही थी, लेकिन गनाई पहुंचे तो देखा वह पश्चिम की ओर बह रही है। यानी, घूम कर इस ओर आ गई है।

घाटी पार करके चढ़ाई में कुछ दूर पहंुचे ही थे कि शेखर ने रुकने का इशारा किया। रुके। गांव की दो-तीन महिलाएं हाथ में दातुली और प्लास्टिक की रस्सी लेकर घास काटने जा रही थीं। शेखर ने वहां रुक कर हमें बताया कि हम लोग रामगंगा जलागम क्षेत्र में खड़े हैं। आसपास की पर्वमालाओं से सहायक नदियां निकल कर रामगंगा में मिल जाती हैं और उसकी जलराशि को बढ़ा देती हैं। उसने कहा, द्वाराहाट के उस तरफ पहुंचेंगे तो वहां परिदृश्य बदल जाएगा और हमारे सामने गगास नदी का जलागम फैला होगा।

नीली गुलमोहर
नीली गुलमोहर

रास्ते में कई जगह झाड़ियों और पत्थरों के आसपास दोनों पंजों पर एक साथ फुदकती, खजबज करती भूरी मुसिया चिड़ियां दिखाई दीं। सड़क के किनारे खिले नीली गुलमोहर के पेड़ भी वहां दिखाई दे रहे थे। द्वाराहाट से पहले तो पहाड़ों पर चीड़ ही चीड़ के वन थे, ऊपर चोटी से नीचे पैताने तक। द्वाराहाट बाजार में प्रवेश करते समय खूब खिले हुए नीली गुलमोहर के पेड़ ने स्वागत किया। सुबह सवा नौ बजे की धूप में उसके नीले-जामुनी रंग के फूल स्वप्निल सौंदर्य बिखेर रहे थे। बाजार के अंत में भी नीली गुलमोहर के पेड़ पर बहार आई हुई थी।

हम द्वाराहाट की दूसरी तरफ पहुंचे तो शेखर के इशारे पर फिर रुके। चारों ओर देखा। सचमुच अब हम किसी दूसरे ही लोक में आ गए थे। जो कुछ अब तक देखा था,  वह उत्तर में पीछे छूट चुका था- पहाड़, पेड़, गांव, नदी सब कुछ। यहां दूर पूर्व से लेकर दक्षिण और वहां से पश्चिम तक नई पर्वतमालाएं फैली हुई थीं। पूर्व में ऐड़ादेव की चोटियां, पश्चिम में मानीला पर्वतमाला और दक्षिण में रानीखेत व चिलियानौला की पहाड़ियां। शेखर ने बताया, “सामने यह गगास नदी का जलागम क्षेत्र है। गगास हमें आगे जाकर मिलेगी।”

तभी,  शेखर ने सामने उगी लैंटाना यानी कुरी की झाड़ी पर से उसके नन्हे, रंग-बिरंगे फूलों का छोटा-सा गुच्छा तोड़ा और आकर मेरी वास्कट की जेब पर सजाते हुए कहा, “देवेनदा, इसे देख कर आपको कुछ याद आएगा। देखिए क्या याद आता है? ”याद आए, बुजुर्ग चंद्रशेखर लोहुमी जी याद आए जिन्होंने कभी कुरी के कीड़े पर किसी सिद्धहस्त वैज्ञानिक की तरह काम किया था। उस काम के लिए उन्हें खूब सम्मानित भी किया गया था। मैंने उनसे भेंट के आधार पर लेख लिखे थे। पंतनगर विश्वविद्यालय में वे प्रायः मेरे घर पर आते थे और हम घंटों बातें किया करते थे।

“कुछ याद आया? ”थोड़ी देर बाद शेखर ने पूछा।

मैंने कहा, “यह तो कुरी है। इसके कीड़े पर लोहुमी जी ने जो काम किया था उस पर मैंने ‘धर्मयुग’ में लेख लिखे थे। दो अंकों में छपे थे।”

“मेरे पास उन लेखों की कतरनें आज भी सुरक्षित हैं, ”शेखर ने मुस्कुरा कर कहा तो बहुत खुशी हुई।

रामगंगा पीछे छूट चुकी थी और गगास आगे आने वाली थी। हम उनके बीच के पहाड़ पार कर रहे थे। तभी, इन दोनों नदियों के बारे में एटकिंसन के गजट में छपी वह किंवदंती याद हो आई…एक बार देवताओं ने निश्चय किया कि द्वारा में रहें। इसके लिए पवित्र प्रयाग का होना जरूरी था। तो, उन्होंने तय किया कि गगास और रामगंगा आकर द्वारा में मिलें। वहां इनका संगम हो जाए। आदेश दे दिया गया। गगास ने रामगंगा को रैबार भेजना था कि वह गनाई से आगे आ जाए। उसने रेबार देने की जिम्मेदारी सेमल के पेड़ को दी। वह छानी तक आया और वहां खड़ा हो गया। सोचा, मैं इतना ऊंचा हूं, मुझे आगे जाने की क्या जरूरत? रामगंगा आएगी तो यहीं से देख लूंगा। उधर, रामगंगा मेहलचैरी से पूर्व की ओर मुड़ कर घूमते हुए गनाई पहुंची और वहां से पश्चिम की ओर बढ़ गई। सेमल ने रामगंगा का सुसाट-भुभाट सुना तो चौंक कर बोला- अरे, रामगंगा गनाई से सीधे आगे आ जाओ। लेकिन, ‘अब तो बहुत देर हो गई’ कह कर रामगंगा आगे बढ़ गई। इसलिए वहां उनका संगम नहीं हो पाया। गगास अपनी जगह से ही आगे बहती चली गई। देर से रैबार देने वाले रैबारी को लोग तब से ‘सेमल जैसा रैबारी’ कहने लगे।

हां, तो हम चीड़ वनों के बीच से नीचे घाटी की ओर उतरे। लेकिन, उतरते-उतरते देखा, एक पहाड़ की पूरी ढलान पर युकिलिप्टस ही यूकिलिप्टस के पेड़ उगे हैं। उनके नीचे न कोई घास, न बेलें, न झाड़ियां, न छोटे पौधे। सूखी उजाड़-सी धरती। हैरान हुए कि यह किसके दिमाग की उपज होगी? पूरे पहाड़ पर स्थानीय पेड़-पौधों का नामो-निशान भी नहीं रह गया है। उसमें पशु-पक्षी और कीड़े-मकोड़े भी नहीं रह सकते। हम लोग पहाड़ पर यूकिलिप्टस का वह एकल रोपण देख कर बहुत दुखी हुए।

सड़क घूमते हुए नीचे और नीचे जा रही थी। नीचे कफड़ा गांव था। यहां भी कहीं कोयल कूक रही थी। बीच-बीच में पेड़ों की शाखों पर चमकीली हरी-नीली सन बर्ड दिखाई दे जातीं। कहीं कीड़ों की ताक में बैठी पतली लंबी पूंछ वाली काली चिड़िया (भुजंगा)  नजर आ जाती। सड़क किनारे अचानक काफी सिल्वर ओक के लंबे, ऊंचे पेड़ दिखाई देने लगे जो पीली, सुनहरी मंजरियों से लदे हुए थे।

(जारी है)

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