दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-11

हम बातें करते-करते उतरते रहे। गीता महिला समाख्या की जिला निदेशक हैं। उन्होंने नैनीताल जिले के विभिन्न इलाकों में महिलाओं की स्थिति के बारे में तमाम बातें बताईं। उनके जीवन संघर्ष के अनुभव सुनाए। साथ ही साहस जुटा कर या संगठित होकर अन्याय का विरोध करने के उदाहरण भी दिए। यह सुन कर बहुत अच्छा लगा कि महिलाओं को कापी और कलम देकर उन्हें अपने विचार लिखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हम लोगों ने चलते-चलते बेबी हालदार और उसकी किताब‘‘आलो आंधारी’ पर भी बातचीत की।

हम लोग बातों में ही खोए थे कि देखा चोपता पहुंच गए हैं। साथी हमारा इंतजार कर रहे थे। वहां चाय पी। कुछ लोगों ने भोजन भी किया और वापसी यात्रा शुरु की। थोड़ा ही आगे आए थे कि एक मोड़ पर से ठीक सामने पहाड़ पर तीन बड़ी-सी गुफाएं दिखाई दीं। उनमें से एक तो बहुत बड़ी थी। वहां कौन रहता होगा? चिड़ियों के अलावा वहां पहुंच भी कौन सकता है? कहीं चिड़िया-खोड़ यही तो नहीं?

चोपता से गोपेश्वर चमोली होते हुए सायं लगभग 6-30 बजे कर्णप्रयाग पहुंचे। तय कर चुके थे कि अधिकतम जहां तक भी जा सकेंगे, जाएंगे और फिर रात्रि विश्राम करके सुबह-सुबह अपने गंतव्य की ओर निकल पड़ेंगे। शेखर रात्रि विश्राम और भोजन की व्यवस्था में जुट गया। लौट कर कहा, “खुशी का समाचार यह है कि गैरसैंण में कुमाऊं मंडल विकास निगम के विश्राम गृह में कमरे बुक हो गए हैं। भोजन का भी आर्डर दे दिया गया है। जब हम वहां पहुंचेंगे तो गर्मा-गरम भोजन मिलेगा। बस, करीब इकत्तीस किलोमीटर और।”

कर्णप्रयाग घाटी में हमारे आसपास ही कहीं किसी पेड़ पर ‘ कुहू….कुहू’ कोयल बोल रही थी हालांकि शाम के 7 बज रहे थे। ठीक सवा सात बजे हम गैरसैंण की ओर रवाना हो गए। हमें 15 किमी. दूर आदिबद्री से होकर जाना था। घाटी में तेजी से अंधेरा घिरने लगा और अंधेरे में पहाड़ों पर बसे गांवों की रोशनियां जगमगाते तारों का अहसास कराने लगीं।

हम अंधेरे में कर्णप्रयाग-गैरसैंण मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। दिन भर की यात्रा से थक चुके थे। बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। इसलिए गाड़ी के भीतर बैठे-बैठे यों ही इधर-उधर की चर्चा करने लगे। मैं साथियों को पहले ही बता चुका था कि इस मार्ग से मैं पहले भी जा चुका हूं और यह हमें नीचे पिंडर घाटी से पहाड़ पर ऊपर और ऊपर ले जाकर बांज-बुरांश के जंगल से होता हुआ दिवालीखाल पहुंचा देगा। रामू बहुगुणा काफी उत्सुक होकर प्रकाश से पूछते जा रहे थे, “अच्छा, यहां से यह रास्ता कहां-कहां होकर जाएगा? प्रकाश अपनी याददाश्त के आधार पर जगहों के नाम बता रहे थे। बता रहे थे कि आदिबद्री में थोड़ी देर जरूर रुकेंगे। उस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है। वहां प्राचीन मंदिर हैं, उनका वास्तु- शिल्प देखेंगे।” लेकिन, जब वे यह चर्चा कर रहे थे, उससे काफी देर पहले आदिबद्री पीछे छूट चुका था। अंधेरे में अंदाज नहीं आया या शायद यह चर्चा ही देर में शुरु हुई। हां, हम वहां रुकते तो सोलह प्राचीन मंदिरों का वर्तमान जरूर देख सकते थे। वहां बद्रीनारायण का मंदिर भी देखते। शायद वहां कोई उस किंवदंती के बारे में भी बताता कि एक समय आएगा जब पहाड़ों के आपस में मिल जाने के कारण जोशीमठ-बद्रीनाथ मार्ग बंद हो जाएगा और तब यही बद्रीनारायण मुख्य मंदिर हो जाएगा। लेकिन, कौन किसे बताता?  हम तो गैरसैंण मार्ग पर घूम-पर-घूम पार करते हुए पहाड़ में ऊपर जा रहे थे। नीचे पिंडर घाटी में अब रोशनियों के बिंदु छोटे और छोटे होते जा रहे थे।

रामू बार-बार शीशे से बाहर देखने की कोशिश करते हुए बुदबुदा रहे थे, ‘‘शेखरदा ने कहा था वहां बांज और देवदार के पेड़ हैं। घना जंगल है। शायद आपने भी कहा था?’ उन्होंने मेरा नाम लेकर पूछा।

“हां, मैंने कहा था। कहा था, यहां बांज-बुरांश का घना वन था। घाटी के पार भी पूरे पहाड़ पर बांज का घना वन था। अब भी होगा। शीशे पर आंख लगा कर देखिए, वहां घुप्प अंधेरा दिखाई दे रहा है। इसका मतलब वहां आज भी वन मौजूद हैं। अन्यथा, पहले देखे हुए कई पहाड़ तो नंगे हो चुके हैं।”

अंधेरे में चले जा रहे थे। देखने को कुछ था नहीं, इसलिए काफी देर तक चुप्पी छाई रही। उस चुप्पी को तोड़ने के लिए मैं एक अलग विषय छेड़ बैठा, “कहते हैं, नैनीताल में भी अंग्रेजों के जमाने में ऐसे सेठ थे जो नवाबों की जैसी शान-शौकत दिखाते थे। एक बार ऐसे ही एक सेठजी रेल से काठगोदाम आ रहे थे। लाव-लश्कर साथ था। चाय की तलब लगी। बोले, ‘‘हम चाय पीएंगे।’ सेवकों ने कहा,‘‘हुजूर चाय का सामान तो है मगर कोच में अंगीठी नहीं जला सकते।’ सेठ जी ने नोटों की एक मोटी गड्डी सामने डालते हुए कहा, ‘ये तो जला सकते हो? इसे जला कर चाय उबालो।’ चाय बनी और उनकी चहेती ने उन्हें पेश की।”

“ये सब गढ़े हुए किस्से हैं। हम लोग मिथ बनाने में माहिर हैं। मैं नहीं मानता कि इस तरह नोट जलाए गए होंगे,” प्रकाश की तल्ख आवाज आई।

“वरिष्ठ पत्रकार और लेखक थे कैलाश साह जी। भुवाली के। कभी उन्होंने सुनाया था यह किस्सा। नैनीताल के अतीत पर उपन्यास या संस्मरण लिखने का उनका बड़ा मन था। कहते थे, शुरू यहां से करूंगा- जून की भीषण गर्मी। दिल्ली के एक मकान की बरसाती में बैठा लेखक अपने शहर नैनीताल के अतीत को याद करता हुआ लिख रहा है कि….।”

“नहीं, नहीं ये मैं तो ऐसे किस्सों पर विश्वास नहीं करता।”

मैं सतर्क हो गया। बाकी बात मन में ही समेट ली। सुनाता तो उनके उखड़ने का डर था। फौरन विषय बदलना जरूरी था। बदला, अपने डी एन ए परीक्षण के बारे में बताने के लिए अंतरराष्ट्रीय जीनोग्रेफिक परियोजना का जिक्र कर बैठा, “विश्व भर में आधुनिक मानव के माइग्रेशन का अध्ययन करने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय प्राॅजेक्ट चल रही है- जीनोग्रेफिक प्राॅजेक्ट। इसमें एक लाख लोगों  के डी एन ए का परीक्षण करके पता लगाया जा रहा है कि मानव के पुरखे अफ्रीका से कहां-कहां और कैसे पहुंचे। इस परियोजना में मैंने भी अपने वाई-क्रोमोसोम के डी एन ए का परीक्षण कराया है।”

“क्या पता लगा? ” शायद कमल ने पूछा।

“यही कि मेरे आदि पुरखे के अधिकांश वंशज आज स्केंडेनेविया के दक्षिणी भागों और उत्तर-पूर्वी एशिया में रह रहे हैं। खानाबदोश सामी जनजाति के लोग भी उसी के वंशज हैं। आधुनिक मानव का विकास करीब दो लाख वर्ष पहले अफ्रीका में हुआ था और लगभग 60,000 वर्ष पहले हमारे पूर्वज ने वहां से बाहर कदम रखे, ”मैं उत्साह में बोलता जा रहा था।

“दो लाख वर्ष पहले नहीं। मानव का विकास उससे भी बहुत पहले हो चुका था, ”” प्रकाश ने असहमत होते हुए कहा।

मैं बोला, “लूसी का कंकाल सबसे पुराना माना जाता है। वह 32 लाख वर्ष पुराना है।”

“उस पर बहुत विवाद है।”

“अब इथियोपिया में 44 लाख वर्ष पुराना कंकाल मिला है। उसे आर्डी नाम दिया गया है।”

“उसकी क्या विश्वसनीयता है? ”

“यह खोज अठारह देशों के करीब 70 वैज्ञानिकों ने लगभग पंद्रह वर्षों में की है। इसका शोधपत्र 2 अक्टूबर 2009 की ‘‘साइंस’ पत्रिका में छपा है।”

“कई जेनेटिसिस्ट मानव के विकास की ऐसी तारीखों से सहमत नहीं हैं।  इन खोजों में कई तरह के हेर-फेर किए जाते हैं….।” प्रकाश जिरह कर रहे थे।

मेरा माथा ठनका। मैं भूल रहा था कि हम सब बहुत थक चुके हैं। फिर भी यह मैं क्या विषय छेड़ बैठा? हम मुंह-जुबानी तारीखों का हिसाब किए जा रहे हैं। इस तरह तो जिरह बढ़ती जाएगी। इसलिए मैंने तुरंत कहा, “मैं इस बहस से अपने आपको अलग करता हूं।”

“यही ठीक रहेगा, ” प्रकाश ने भी शांति से कहा।

फिर चुप्पी छा गई। गाड़ी दिवालीखाल को पार करने लगी तो सामने वे चंद चाय-पानी की दूकानें दिखाई दीं जिनमें से किसी एक दूकान में कभी मैंने और नवीन ने गरमा-गरम चटपटे काले चने खाए थे। इस समय अंधेरे में वे दूकानें बंद हो चुकी थीं।

(जारी है)

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