दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-10

फिर हम पहुंचे चोटी पर
फिर हम पहुंचे चोटी पर

अब तक हम चोपता से तुंगनाथ शिखर पर चढ़ने की थकान तो भूल ही चुके थे। सब लोग प्रांगण में आए। उसकी दीवाल पर बैठ कर चारों ओर की दृश्यावली पर दृष्टि फेरी। अलौकिक था वह अनुभव। दूर हिमालय की चौखंबा और केदारनाथ चोटियों को कोहरा अपने आगोश में ले रहा था। इधर-उधर, चारों ओर नीले पहाड़ थे। पहाड़ों के पार भी पहाड़ थे। दूर नीचे गहरी घाटियां दिखाई दे रही थीं। हम तुंगनाथ शिखर में 12, 750 फुट की ऊंचाई पर बैठे हुए थे।

शेखर ने अभी-अभी दूसरी ओर की तीखी ढलान पर घास के बीच से आती हुई पुरानी पगडंडी दिखाई थी। किसी साथी ने कहा, “कैसे आए होंगे लोग इतनी दूर इतने कठिन रास्ते से? जान हथेली पर लेकर? ”

किसी और ने कहा, “आस्था। आस्था कराती है ऐसी कठिन यात्रा।”

प्रकाश की आवाज आई, “मैं तो नहीं मानता कोई आस्था। मैं यह देखने के लिए आता हूं कि कौन रहे होंगे वे दुस्साहसी लोग जिन्होंने सदियों पहले तमाम खतरे उठा कर ऐसी विकट यात्राएं की होंगी और ऐसे दुर्गम स्थानों में आकर ऐसे निर्माण किए होंगे? चढ़ावे से धन कमाना तो उनका लक्ष्य बिलकुल नहीं रहा होगा। मैंने और भी प्राचीन मंदिर देखे हैं। मैं उनकी प्राचीनता से आकर्षित होकर उन्हें देखने जाता हूं।”

सामने से तुंगनाथ का प्राचीन मंदिर
सामने से तुंगनाथ का प्राचीन मंदिर

मैं मंदिर के सामने के द्वार पर गया। एकांत में कुछ देर तक आंखें बंद कीं और प्रकाश की बात याद करके सोचता रहा कि सचमुच कौन रहे होंगे वे लोग, हमारे वे पुरखे जिन्होंने बिना किसी लालच के कठिन परिस्थितियों में यहां पहाड़ की चोटी पर आकर यह मंदिर बनाया होगा।….सामने तीखी, पथरीली कटान के साथ आगे बढ़ता पहाड़ बुग्याल में तब्दील हो गया था। कटान के बीच से दूर तक घाटी का मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा था।

साथियों ने वापसी का निर्णय लिया। एक बार फिर भर आंख मंदिर को देख कर और चारों ओर के नयनाभिराम दृश्यों को स्मृति में समेट कर हम ढलान पर नीचे उतरने लगे। सी-सी सड़क के दोनों ओर नन्हे पीले वनफूल खिलखिला रहे थे। उनके आसपास तितलियां इठला रही थीं। लाल चमकीली पीठ पर काली बिंदियों से सजी कुछ लेडी बर्ड भी यहां-वहां पहरा दे रही थीं। हमारे साथी नीचे उतर कर चाय की दूसरी दूकान पर इंतजार करने लगे। नीचे उतरते समय मोहन सिंह की दूकान पर हमें राजेश जोशी  सपरिवार मिल गए। वे मंदिर की ओर जा रहे थे।

तुंगनाथ में 12,750 फुट की ऊंचाई पर इस वीराने में ये कव्वे यहां क्या कर रहे हैं? उन्हें देख कर आश्चर्य हो रहा था। इधर-उधर सैकड़ों फुट गहरी खाई और उसके ऊपर हवा में पर तौलते, गोता लगाते ये काले, चमकीले कव्वे! लगता है ये हमारे आम पहाड़ी कव्वे (कोर्वस राइंकास) नहीं बल्कि रेवन (कोर्वस कोरेक्स) हैं। बचपन में मां कहती थी, कव्वे लाटे होते हैं। साफ नहीं बोल पाते। पर ये तो उनसे भी ज्यादा लाटे लग रहे हैं। रेवन ही होंगे ये। गर्मियों में इन्होंने यहां धूनी रमाई हुई है! यहीं किसी फर या मोरू के पेड़ की ऊंची शाखाओं अथवा तीखी खड़ी चट्टानों पर घोंसला बना कर अंडे देते होंगे। एक बात इनसे जरूर सीखनी चाहिए कि कठिन परिस्थितियों में भी कैसे जीया जा सकता है और यह भी कि उम्र भर पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ इनकी तरह कैसे निभा सकते हैं।

नीचे उतर ही रहे थे कि किसी साथी ने कहा, “वो, वहां चट्टान के पास उडियार में कौन रहता होगा? ”

हमने दाहिनी ओर देखा। सी-सी सड़क के दूसरी ओर पहाड़ पर चट्टानों के नीचे एक खोह थी। वहां दो-तीन लोग नजर आ रहे थे।

“बाबा रहते हैं, जटाओं वाले। उनकी जटाएं पैरों तक लंबी हैं बल,” किसी और साथी ने कहा।

“मिथ क्रिएट करने में हम शायद दुनिया में सबसे आगे हैं, ” प्रकाश की आवाज आई।

लेकिन, कमल जोशी  को तो शायद कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था। उसकी नजरें और कैमरे की आंख उडियार पर टिकी थी। वह कैमरा साधे बुग्याल की घास पर हिरन की तरह कुलांचें भरता उसी ओर चला गया। किसी ने कहा, “कमल बाबा का फोटो खींचने चला गया है। वह देखो, वहां से वे लोग हाथ हिला रहे हैं।”

हम उतराई में घुटनों पर शरीर का सारा बोझ साधे उतरते रहे और नीचे देवदर्शनी में आलम सिंह राणा की दूकान में चाय पीने के लिए इंतजार करते साथियों के बीच जाकर बैठ गए। बहुत प्यास लगी थी, रावत जी फटाफट ऊंचाई में काफी दूर तक गए और वहां लगे पतले-से नल से तुड़-तुड़ टपक रहा पानी भर लाए। आह, कितना शीतल और तीस (प्यास) बुझाने वाला पानी था! पानी पीकर मैं आलम सिंह राणा से मुखातिब हुआ, “आलम सिंह हमारे गांव में भी होते है और सयाने कहते थे हम भी राणा हुए। राजस्थान से आए।”

“हम भी राजस्थान से ही आए कहते हैं।”

ऊपर को जाते समय उन्होंने हमारे साथी को फोटो खींचने से मना किया था। मेरा मन था, उनका फोटो लूं। पूछा, “आपने फोटो लेने से मना क्यों किया था पहले? ””

बोले, “क्या होगा इतने फोटो से? अब तक हजारों लोग खींच चुके हैं।”

मैंने कहा, “मैं खींच लूं? आपकी भट्टी और बर्तनों का फोटो खींच लूं? ”

बोले, “ठीक है।”

चाय पीकर हम लोग नीचे उतरने लगे। शरीर का भार सहते-सहते पिंडलियों की पेशियां शायद फिर परेशान हो गईं। मरोड़ उठी। मैं रुका। पीछे से चली आ रही गीता ने कहा, “आप फिक्र मत कीजिए। दवाखाना और डाक्टर साथ-साथ चल रहे हैं?

मैंने पूछा, “कौन?” ”

बोलीं, “ये रावत जी। देखते ही देखते मरोड़ को ठीक कर देंगे।”

रावत जी ने मेरी पिंडली पर अपनी दोनों हथेलियां फिराईं, अंगुलियां चलाईं और लीजिए मरोड़ गायब। उन्हें धन्यवाद दिया तो बोले, “मैं साथ ही चल रहा हूं। कोई दिक्कत नहीं होगी।”

चमाचम चल रहे मेहता जी भी मेरी चाल-ढाल देख कर पछी (पिछड़) गए और साथ-साथ चलने लगे। गीता और रीना भी साथ ही थीं। रीना चुप-चुप सी दिखाई दे रही थी। गीता ने धीरे से बताया, पता नहीं क्यों चुप और सकुचाई हुई-सी रहती है। यह जान कर मैंने कहा, “गीता, रीना सामने खड़े हो जाओ। फोटो खींचता हूं।”

वे सामने खड़ी हुई और मैंने उनका फोटो खींच कर कहा, “अब एक फोटो रीना खींचेंगी। आओ बेटी, देखो इस बटन को दबाना।”

रीना ने उत्साहित होकर कैमरा लिया और हमारा फोटो खींचा। मेहता जी भी समझ गए। उन्होंने भी अपना कैमरा देकर हम लोगों का फोटो खिचवाया। हम हरे-भरे बुग्याल के करीब पहुंच गए थे। मैंने कहा, “रीना बेटे, तुम बुग्याल में जाओ हम यहां दूर से फोटो खींचेंगे। बहुत अच्छा लगेगा।”

वह खुश होकर बुग्याल के बीच में जाकर खड़ी हो गई। मैंने फोटो खींचा और आवाज देकर सड़क पर आने को कहा। हमें देर हो रही थी। देखा सभी साथी नीचे तेजी से उतरते जा रहे थे। आज ही अपनी-अपनी जगहों को लौटना भी तो था।

(जारी है)

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