दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-8

हमें चौखंबा की चोटियां दिखाई दीं
हमें चौखंबा की चोटियां दिखाई दीं

घने जंगल में अचानक काला कुत्ता देख कर मैं चौंक पड़ा। “कुत्ता? यहां? ”मुंह से निकला। तब तक पेड़ों के बीच से एक और कुत्ता निकल आया। फिर एक और, फिर एक और। चार कुत्ते और सभी काले रंग के। सोचा, शायद कोई जानवर मरा होगा। उसे खाने आ गए होंगे। मगर बस्ती? बस्ती-बसासत तो कोई है नहीं यहां। तब तक देखा, उनके गले में लोहे का कांटेदार पट्टा बंधा है। यानी, पालतू कुत्ते हैं। सड़क से नीचे नजर गई तो देखा ढलान पर तमाम भेड़ें चर रही हैं। अच्छा, तो भेड़ों की देखभाल करते हुए पहरा दे रहे हैं! भेड़ों के साथ गड़रिए भी होंगे।

मैंने कुत्तों के बारे में साथियों से कहा तो उनमें से किसी की आवाज आई, “भोटिए कुत्ते हैं। क्या मजाल कोई भेड़ इधर से उधर हो जाए। सभी भेड़ों को काबू में रखते हैं ये। ”

गाड़ियां आगे बढ़ चलीं। चोपता के रास्ते में चलते-चलते एक जगह पहाड़ की ओट से सामने आए तो अचानक हिमालय की सुंदर धवल चोटियों का दृश्य देख कर चकित रह गए। आगे की गाड़ी में से शेखर रुकने का इशारा कर रहा था। गाड़ियां रुकीं। बाहर निकले। शेखर ने हाथ से इशारा करके बताया, “दाहिनी ओर वे चौखंबा”की चोटियां हैं। और, बांई ओर “केदारनाथ की चोटियां”। हम लोगों ने उस अद्भुत दृश्य को अपने-अपने कैमरे में समेटा।

शेखर की आवाज फिर आई, “जिस-जिस को झाड़-पेशाब होना है, हो लो।” हम लोग झाड़ियों और पेड़ों की ओट में हो लिए।

रास्ते में एकाध जगह नीचे भेड़पालकों की छानी भी दिखाई दी। बाकी जंगल था, जंगल की हवा थी, चिड़ियों की चहचहाने की आवाजें थीं और कहीं-कहीं शाखों पर कूदते, हैरान होकर हमें देखते लंगूर थे। वे ऐसे देखते थे मानो हमसे पूछ रहे हों- यहां इस जंगल में क्या कर रहे हो?

जंगल के बीच से जाते-जाते अचानक सड़क के दोनों ओर चाय-पानी की दूकानें दिखाई देने लगीं। हम चोपता पहुंच चुके थे।

गोपेश्वर से खाली पेट चले थे। यहां तक कि रास्ते में कहीं चाय भी नहीं पी थी। केवल फेफड़े जम कर जंगल की ठंडी और आॅक्सीजन से भरपूर शुद्ध हवा का आनंद ले रहे थे। इसलिए उतरते ही साथियों ने छोले, आलू पराठे और चाय का आर्डर दिया। दूकान के आगे खड़े होकर चारों ओर नजर फिराई तो जंगल की हरियाली ने मन मोह लिया। हम लोग वनविद् मेहता जी से पेड़ों के नाम पूछने लगे। तुंगनाथ शिखर की ओर ऊपर जहां तक नजर जाती थी, शान से खड़े हरे-भरे पेड़ ही पेड़ दिखाई देते थे। कभी-कभी हवा के झौंकों से बांज के पेड़ों की पत्तियां उलटतीं तो अपनी सफेद उजास दिखा देतीं। वहां बांज, बुरांश, खर्सू, रागा, कांचुला और मोरु आदि के पेड़ थे। बाकी पेड़ तो ठीक लेकिन यह मोरु क्या है? मेहता जी से पूछा। बोले,“बांज के ही वंश  का पेड़ है। आप तो वनस्पति विज्ञान के छात्र रहे हैं। आपको पता होगा, बांज के वंश  में हमारे यहां पांच प्रजातियां हैं- बांज, रयांज, खर्सू, मोरू और फणियाट जिसे यहां हरिंज कहते हैं।”

“तो तिलोंज कहां गया?”

उन्होंने मूंछों पर हाथ फेर कर मुस्कुराते हुए कहा,“वही, वही तो है मोरू। अल्मोड़ा, नैनीताल की तरफ इसे तिलोंज कहते हैं।”

मेहता जी ने यह भी बताया कि यहां कोटोनिएस्टर के पेड़ भी होते हैं। ये रवैंश  कहलाते हैं। इसके अलावा यहां के जंगलों में कांचुला यानी एसर, अंयार आदि तमाम प्रजातियों के पेड़ हैं। कांचुला को अंग्रेजी में मेपल कहते हैं।

हमने पहले नाश्ता किया
हमने पहले नाश्ता किया

पहाड़ की चोटी से आकर दूकान के आगे फैली हुई गुनगुनी धूप में मेज के चारों ओर दूकानदार ने कुर्सियां लगा दीं। झोपड़ीनुमा दूकान की दीवाल पर डबलरोटी, बिस्किटों के पैकेटों के साथ ही लौकी, करेला, खीरा, बैंगन आदि भी सजाए हुए थे। पराठे बनने शुरु हो गए। तवे पर उनका सफेद धुवां उठ कर हमारे आसपास उड़ने लगा। प्रकाश इस बात का ध्यान रख रहे थे कि पराठे बनाने वाला पराठे रिफाइंड तेल में नहीं, घी या मक्खन में बनाए। कुछ साथियों ने हिदायत दी- “हमें बिना घी का सामान्य पराठा चाहिए।”

जब तक पराठे आते, हम लोग धूप का आनंद लेने लगे। गुनगुनी धूप में दुष्यंत कुमार की पंक्ति याद आईं-‘‘कहीं धूप की चादर बिछा कर बैठ गए!’

तभी किसी ने कहा,“यहां का फोटो तो ले लो।”

हम लोगों ने कुर्सियों के आसपास सिमट कर फोटो खिंचवाया।

राजू की आवाज आई,“मेरा फोटो आया? मेहता जी की मूंछों से ढक तो नहीं गया?”

“नहीं ढका। साफ फोटो आया है।”

असल में वनविद् मेहता जी की कड़क मूंछें पहली बार देख कर लगता था- मूंछें हों तो मेहता जी जैसी! उनके फौजी होने का भ्रम होता था। लेकिन, बात करने पर उनमें फौजी कड़कपन के बजाय सहज आत्मीयता दिखाई दी। इसीलिए उम्र के अंतर के बावजूद सभी साथियों के साथ उनके यारी-दोस्ती के संबंध बन गए थे।

तभी किसी ने पूछ लिया, “मेहता जी आपकी उम्र कितनी है? ”

“78 वर्ष”

“लेकिन, लगता तो नहीं। आप तो हम लोगों में सबसे युवा लग रहे हैं।”

मेहता जी हंस दिए। मुझसे कहने लगे, “आप जब नैनीताल में पढ़ रहे थे, तब मैं सेंट्रल होटल की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में वन विभाग के आंकड़ों पर काम कर रहा था। आप लोगों ने कोई क्रैंक्स एसोसिएशन बनाई थी।” मैं इतनी पुरानी बात सुन कर हैरान रह गया।

पराठों की पहली खेप आई तो वे गोविंद राजू, शेखर, शांतचित्त समीर और मेरे सामने परोस दिए गए। मेरे मस्तिष्क ने धीरे से आंतों से पूछा- क्यों चलेगा क्या?  दिक्कत तो नहीं होगी? पेट भूख से कुनमुनाया।

शेखर की आवाज आई,“साथियों, तुंगनाथ तक फिर कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए सभी लोग इसे नाश्ता और दोपहर का भोजन समझ कर खाएं। रास्ते में मत कहना कि भूख लग गई।”

मेरा मस्तिष्क और आंतें चुप। पेट फिर कुनमुनाया-“एक तो ले लो। भूख लगी है! ”

मस्तिष्क ने कहा, “चुप दिल्ली से श्रीनगर तक तो तीन टोस्ट, तीन चाय में आ गया था।”

पेट ने कहा, “एक ही बात है। एक पराठा उसी के बराबर तो होगा।”

बहरहाल, चह बातचीत मेरे अलावा किसी और को नहीं सुनाई दी। मैंने फटाफट जायकेदार छोलों के साथ पराठे का आनंद लिया। दूसरी खेप आई। रहा नहीं गया, एक पराठा और ले लिया। हिसाब लगाया, तीन-चार किमी. की खड़ी चढ़ाई चढ़ने और उतरने में इतनी जरूरत तो पड़ेगी ही। लेकिन, बाकी  हिम्मत नहीं की।

शेखर की फिर आवाज आई, “मन हो तो आप लोग यहां दिशा- शौच भी जा सकते हैं। चोपता का पानी इतना ठंडा है कि कहते हैं यहां का पानी शौचने से रोग का इलाज भी हो जाता है! ”

हम लोग हंस पड़े।

दूकान के आगे भारी-भरकम भोटिया कुत्ता लेटा था जो कभी एक और कभी दोनों आंखें खोल कर हमारी ओर देख लेता था। डर लग रहा था कि खाने के बाद अचानक खड़ा होकर पूछने न लगे- “खा लिया? क्यों मेरा हिस्सा कहां है? ”

किसी ने बिस्किट दिखा कर हवा में हाथ उठाया। वह उछला। दो-तीन बार उछल कर फिर लेट गया। मेरी नजर उसके गले में बंधे तेज कांटों वाले लोहे के पट्टे पर पड़ी। रास्ते में जो कुत्ते देखे थे, उनके गले में भी ठीक ऐसे ही पट्टे पड़े हुए थे। माजरा समझ में आ गया। पहाड़ों में तेंदुए कुत्तों और बकरियों का बहुत शिकार करते हैं। तेंदुवा कुत्ते की गर्दन पर झपटता है और उसमें दांत गड़ा कर उसे मार देता है। लोहे के इस कांटेदार पट्टे से कुत्ता बच जाता होगा। यह छोटा-सा आविष्कार किसके दिमाग की उपज होगा?

भोटिया कुत्ते से दस-बारह कदम दूर एक बकरा बंधा था जो बीच-बीच में मिमिया रहा था- में S में S। उसे वहां क्यों बांधा गया था पता नहीं। उसकी क्वेंरी आंखों में नहीं देख पाया।

मैं दूकानों से थोड़ा आगे निकला और नीचे जंगल की ढलान की ओर देखा। वह प्लास्टिक के कचरे से अटा पड़ा था। दूकानों के आगे साफ सड़क और उनके पिछवाड़े इतनी गंदगी! पाॅलीथीन की थैलियां, पैकेट, प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे। बुरी तरह प्रदूषित जंगल। नीचे जहां तक नजर जाती थी, प्लास्टिक का वही कचरा दिखाई दिया। इससे जंगल का नैसर्गिक सौंदर्य तो नष्ट हो ही रहा था, वहां बीजों को उगने और पेड़-पौधों के पनपने के लिए धरती भी बेकार हो रही थी। मैं दूकानों की ओर लौट आया। आसपास पेड़ों पर पक्षी चहक रहे थे।

“तो साथियो चलें? सबने खा-पी लिया?” शेखर की आवाज थी।

किसी ने कहा,”ऊपर ठंड लगेगी। स्वेटर, जैकेट वगैरह जरूर रख लें।“

(जारी है)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *