आषाढ़ में पहाड़-8

भ्वैंनी गाती महिलाएं
भ्वैंनी गाती महिलाएं

अगले दिन यानी ‘सिर-खुरी’ की सुबह से ही आंगन में महिलाएं बहुत बड़े घेरे में झूमते हुए भ्वैंनी गा रही थीं। उनमें अब लगभग सभी साड़ी-ब्लाउज, सलवार-कमीज और नई पीढ़ी की कुछ बालिकाएं जींस व टाॅप में थीं। घाघरी-आंगड़ी अब गांव से गायब हो चुकी हैं।

मैं नेपाल जानद्य हो जमना साली

मैं हनऽ कि लाला हो, गोख्र्य भिना!

नाखै की नथूलि लोंलो हो, जमना साली

लटी को धम्याला लाया हो, गोख्र्य भिना!

(मुझे नेपाल जाने दे जमना साली/मेरे लिए क्या लावोगे हो गोरखिया जीजा/नाक की नथुली लाऊंगा हो जमना साली/चोटी का धमेला लाना हो गोखिया जीजा।)

आदमी भी पीछे नहीं थे। गीतों में दूर धारचुला तक की उड़ान भर रहे थेः

ओ साली गोपुली साली,

हिट दे साली धारचुला

ओ भिना गोपाल भिना

गाड़ि चलाला धारचुला

(ओ साली, गोपुली साली, धारचुला चल दे/ओ जीजा, गोपाल जीजा, गाड़ी चलाओगे धारचुला)

साली पर तो कैसी-कैसी जो चुटकियां ले रहे थे, या त लिजा आफू संग बालिपाऽ/ या जहर दिजा साली बालिपाऽ

(या तो अपने संग ले जा साली बालिपा, या फिर जहर दे जा साली बालिपा।)

एक भ्वैंनी खत्म होती और गायक दूसरी भ्वैंनी के बोल उठा देतेः

छाजि रौछ, छाजि रौछ

माऽया तेरी लटि में रिबन छाजि रौछ!

(सुंदर लग रहा है, सुंदर लग रहा है/ माया तेरी चोटी में रिबन सुंदर लग रहा है)

इन नई भ्वैंनियों के बीच कुछ पुरानी भ्वैंनियां को जीवित देख कर बहुत खुशी हुई। लोग वर्षों बाद अब भी बड़े मन से गा रहे थेः

राजा भैटौ गद्दी में, सिपाही रन में

बाड़ा-बाड़ा राजा न्हैंगै तपोवनों में!

(राजा बैठता है गद्दी में/सिपाही जाते हैं लड़ाई में/बड़े-बड़े राजा चले गए तपोवनों में)

और

देवन्या लौंडा द्वारहाटै का

तीले धारो बौला

जैंतुलि बौरारौ की जैंता

तीले धारो बौला।

(द्वाराहाट का दीवान लड़का, तीले धारो बौला/बौरारौ की जैंता, तीले धारो बौला)

उधर आंगनों में भ्वैंनी के चुट्टे (धूम) मच रहे थे। इधर घर भीतर सिर-खुरी की पूजा शुरु हो गई। जगरिया गणेशराम और ईश्वरीराम ने आंखें मूंद करके, हाथ जोड़ कर ढोल बजाना शुरु कियाः

किन किन किन….द धंग! द धंग!

द धंग धंग धंग! किन किन किन

द धंग!

पुजारी और डंगरियों ने बाजे पर ध्यान लगाया। गणेशराम ने गरज कर कहा, “भोर भाब्बा!” और बिनती गाने लगा। ढोल दमदमाता रहा….द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग! गाते-गाते बीच-बीच में गणेश की आवाज गूंजती, “भोर भाब्बा! ” और बिनती के बोल सुनाई देतेः

तब तैंतीस करोड़ द्याप्तां कैं न्योंत पड़िगै

तब सतजुगी ब्रह्मा ले

तब यश्मीर यज्ञ सुजै

जैलि सुजै चार धाम, चार खाम

फटी खंबा, तिरजुगा धूनी!…

भोर भाब्बा!

तब कांछैं तुमार ज्यठै धाम?

हरी हरिद्वार, कनखला पैड़ी

जै में रनी सौ संन्यासी

बारसौ बैरागी

नंगा निर्बानी, ठाड़ा तपेश्वर

जैक संग में चलैंछ

बमौर्य टांकी, रेशम का चोला

पोलतिया पाग,

बगल में दबौंनीं  बगौमार छाला!

भोर भाब्बा!…

जगरिया गणेशराम गाता चला जा रहा है। और, इधर डंगरिया नाचने लगे हैं। नाचते-नाचते बाहर ‘खोलीखांड’ (आंगन) में आ गए हैं। अंगीठे की धूनी के चारों ओर नाचने लगे हैं। चारों ओर लोगों की भारी भीड़ जमा है। ढोल बज रहा है…द दुंग दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग!

डंगरियों के आशीर्वचन
डंगरियों के आशीर्वचन

दुलैंच के पास परात में चावल भरे हुए हैं। डंगरिए अक्षतों से दिशाएं मार रहे हैं। फलों और अक्षतों की भेंट देते हुए आशीर्वचन   कह रहे हैं….“इनऽ मोतिकाऽ दानाऽ, त्वै हन दयालि हैऽ जाला… ”। वे चौंरीगाई की पूंछ से दुःख-तकलीफ, रोग- शोक झाड़ रहे हैं। डंगरिए अब दिन-दोपहर आंगन में नाचते-नाचते तसले में से गेहूं लेकर चारों ओर फैंकते हुए ‘ताड़’ मारने लगे हैं। बाजे बज रहे हैं- पू ऊ ऊ ऊ ह! टन्न् टन्न्! झन्न्! टिन-टिन, टुनटुन! द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग!

बाजों की आवाज तेज हो जाती है। भीड़ में कई लोगों को औतार आ जाता है। वे भी थर्रा कर नाचना शुरु कर देते हैं। डंगरियों का नाचना, झाड़ना, टीका बांधना अब चरम पर पहुंच गया है। गणेश और ईश्वरीराम के हाथ ढोल पर बिजली की तरह तेज चल रहे हैं….द दुमलि दुमलि दुमलि दुम! द दुमलि दुमलि दुंम! द दुमलि दुमलि दुंम!

और, यह क्या? नाचते-नाचते लोग कपड़े उतार कर जगरियों को देने लग गए हैं। मैंने बगल में बैठे आदमी से पूछा, “कपड़े क्यों दे रहे हैं? ”

“नंगर्वांत कर रहे हैं,”  उसने मेरे कान में कहा, “मतलब वस्त्र दान हुआ ये।

‘अंगझाड़’ भी कहते हैं। जिसके जो मन हुआ वह कपड़ा उतार कर जगरियों को दान दे देता है।”

सभी डंगरिया जगरियों से आशीर्वचन  कह रहे हैं। गोरखनाथ के डंगरिया ने गणेशराम को नया टांका (सांफा) पहना दिया है। कोई स्वेटर उतार कर दे रहा है, कोई वास्कट, कोई कमीज, कोई टी-शर्ट। पुजारी नकद रुपए पकड़ा रहे हैं। कुछ डंगरिए चादर जैसे पटुवे दान दे रहे हैं। पच्चीसों कपड़े जमा हो चुके हैं। जगरिए ढोल बजाने में व्यस्त हैं….द दुंग दुंग दुंग! द दुंग दुंग दुंग!

बगल में बैठा आदमी मुझे बता रहा है, “गेहूं भी ताड़ मारने के बाद जितना बचेगा, जगरियों को ही दान दे दिया जाएगा। दोनों को एक-एक क्विंटल से तो बाकी ही मिलेगा।”

धीरे-धीरे डंगरिए शांत होते हैं। बाजा थमता है। गुड़ और घी की ‘शिरनी’ बांटी  जाती है। प्रसाद के रूप में दूध और चावल का बना‘खिर-खाजा’ बंटता है।

सिरखुरी के भोज में हलुवा, पूरी, सादे पुए, सब्जी और बलि के बकरों के सिर व टांग का पका हुआ मांस परोसा जाता है। शाकाहारी लोगों को केवल शाकाहार कराया जाता है। लोगों ने आंगन में कतारों में बैठ कर पत्तलों पर खाना खाया और, खा-पीकर फिर से भ्वैंनी गाने में जुट गएः

टपि गैछै, टपि गैछै

किसना डडवालि चेली, होऽ सिता

टपि गैछै!

तीन दिन से थके-थकाए लोग आषाढ़ के बादलों को देख कर बारिश का अनुमान लगा रहे हैं कि चल पड़ें या आज रात रुक कर जाएं? हमने भी आसमान की ओर देखा और मौसम ठीक रहने पर अगली सुबह चलने का मन बनाया।

 

 

 

 

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