दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-7

चोपता के जंगल में सभी साथी
चोपता के जंगल में सभी साथी

साढ़े छह बजे हम तुंगनाथ के लिए चल पड़े। हमारे दल में थेः शेखर, जे.एस. मेहता, समीर बनर्जी, मैं, प्रकाश, कमल, रामू बहुगुणा, नवीन जोशी, गोविंद राजू, हरीश पंत, महेश पांडे। कमल जोशी, गीता गैरोला, रीना, रावत जी और राजेश जोशी परिवार दूसरे दल में थे। हमने उनका इंतजार किया मगर जवाब आया कि वे पीछे-पीछे आ रहे हैं। हम गोपेश्वर से पश्चिम की ओर चले जा रहे थे। पहाड़ ऊपर ऊंचाई तक फैला हुआ था जिस पर घने पेड़ थे। तमाम पेड़ों के बीच यहां भी ढलान पर नीली गुलमोहर का खिला हुआ पेड़ देख कर हैरानी हुई। ग्वाड़-देवलधार गांव पार कर रहे थे कि सड़क किनारे छोटे-बड़े स्कूली बच्चों को बस्ता लटकाए स्कूल जाते देखा। उनके चेहरे पर हंसी थी। बड़े बच्चे छोटे-छोटे बच्चों के हाथ थामे हुए थे। उन्हें देख कर हम भी अपने बचपन में लौटे। कभी हम भी इसी तरह तख्ती-दवात या बस्ता लटकाए स्कूल जाते थे।

रामू बहुगुणा ने बटन दबा कर खिड़की का शीशा नीचे सरकाया और बगल से निकलते हुए बच्चों से गढ़वाली में प्यार से पूछा, “ बेटा स्कूल जा रहे हो?”

बच्चों ने चहकते हुए कहा,”हां स्कूल जा रहे हैं।”

“खूब पढ़ना बेटा, खूब मेहनत करना। कुछ बन के दिखाना, हां,” रामू बोले। दिल की गहराई से निकली उनकी आवाज भीगी हुई थी।

“जी हां ,” बच्चों की आवाज आई।

“शाबाश बेटा! ”रामू पीछे मुड़ कर उन्हें देख रहे थे। कुछ देर बाद शीशा बंद करके बोले, “देखा, यहां किसी बच्चे के चेहरे पर तनाव या परेशानी नहीं है। कितने खुश होकर स्कूल जा रहे हैं।”

“हां, अपने-आप जा रहे हैं। मां-बाप हाथ पकड़ कर पहुंचाने नहीं आए हैं। इससे इन बच्चों में आत्मविश्वास आ गया है। अपने से छोटे बच्चों को खुद संभाल रहे हैं, ”यह प्रकाश की आवाज थी।

“स्कूल दिखाई नहीं दे रहा है। जाने कितनी दूर है। हो सकता है, गोपेश्वर तक ही जा रहे हों। लेकिन, कोई फिक्र नहीं, ”कमल ने कहा और हम कुछ देर चुप रह कर अपने-अपने बचपन में जाकर लौट आए।

क्यार्की गांव में तिम्ला (फाइकस राॅक्सबर्गाइ), अंखोड़ (जुगलेंस रेजिया) , डेंकण और टूनी आदि के हरे-भरे पेड़ दिखाई दिए। इस गांव में भी नीली गुलमोहर के पेड़ों पर बहार आई हुई थी। रास्ते में ही एक गांव में शेखर ने किसी से मिलना और हमें उनसे मिलाना था, लेकिन वे किसी काम से गोपेश्वर गए हुए थे। उनके मकान के आसपास सुंदर खेत थे, साग-सब्जियां लगी हुई थीं, फलों के पेड़ थे और बीच-बीच में हरे-भरे पेड़ भी थे। उन्होंने अपने लिए एक छोटी-सी दुनिया रच ली थी और सुकून के साथ वहां रह रहे थे।

चारों ओर देखते हुए हम गाड़ी में बैठे और गाड़ी चल पड़ी।

“क्या रखा है यार दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ भरे शहरों में जहां दिन-रात कभी चैन नहीं मिलता। ऐसी ही किसी जगह पर घर हो और आदमी शांति से रहे, ” पीछे शायद रामू ने कहा।

मुझे कहीं पढ़ा हुआ तस्कीन अजमेरी का शेर बेसाख्ता याद हो आयाः

याद आ जाती है जब अपने नशेमन की मुझे,

देखा करता हूं क़फ़स से मैं गुलिश्तां की तरफ।

यानी, जब मुझे अपने घर की याद आती है तो पिंजरे से फूलों की बगिया की तरफ देखा करता हूं!

कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर आवाज आई,  “ शेखरदा ने बिल्कुल सही निर्णय लिया है।” यह प्रकाश की आवाज है।

“क्या?” रामू ने पूछा है।

“अपने घर गंगोलीहाट लौट जाने का निर्णय। इट्स अ वाइज डेसिजन। मकान ठीक-ठाक करा रहे हैं वहां।”

“यह तो वे सचमुच अच्छा कर रहे हैं। ”

“लेकिन, सब कुछ से दूर एकांत में भी तो आदमी बोर हो जाता है।”

“नहीं, वह सब से जुड़ा रहे। पढ़े-लिखे और अपने घर व बगिया में काम करे।”

काफी देर खामोशी रही। शायद हम सभी पहाड़ की गोद में किसी ऐसे छोटे से, प्यारे से घर की कल्पना कर रहे थे जहां शांति से रह सकें।

तभी मंडल गांव का मील का पत्थर दिखाई दिया। एक गधेरे के ऊपर से पुल पार कर घने जंगल के रास्ते पर आगे बढ़ने लगे। जंगल घना और घना होता जा रहा था। उसमें कोई आबादी नहीं थी। गाड़ी की खुली खिड़की से कभी-कभी घने जंगल की भीगी-भीगी खुशबू भीतर आ जाती थी। चलते चले जा रहे थे कि आगे की गाड़ी रुकी। शेखर और साथी बाहर निकले। शेखर ने पास आकर कहा, “आप लोग भी आइए। यहां थोड़ा जंगल और पेड़ों की बात करते हैं। यादगारी के लिए ग्रुप फोटो भी ले लेते हैं।”

हम लोग भी उतरे। ग्रुप फोटो लिया। वनविद् मेहता जी आसपास के जाने-अनजाने पेड़-पौधों का परिचय कराने लगे, “ये बांज, वह बुरांश, वह सामने देखिए अंयार और वह कांचुला। एसर भी कहते हैं इसे।“ तभी, रामू उत्साह से बोले, “ये देखो-हिंसालु” हम सभी ने चौंक कर पूछा-क्या हिंसालू? कहां है? ”कुछ साथी हिंसालू के त्वाप (फल) टीपने में जुट गए। छोटा-सा ही पौधा था, फिर भी कुछ त्वाप मिल ही गए। वे बहुत छोटे और लाल-लाल रंग के थे। काला हिंसालू था, रुबस की ही कोई जाति थी। एक-एक या आधा-आधा फल सभी को मिल गया। हरेक के चेहरे पर इस बात का संतोष झलकने लगा कि चलो लंबे अरसे बाद हिंसालू तो खाया।

“काफल तो अब तक नहीं मिला, चलो हिंसालू मिल गया, ” मैंने कहा।

नवीन ने मेरी ओर आश्चर्य से देख कर कहा, “क्या काफल नहीं मिले? हमें तो रानीखेत से गैरसैंण तक खूब काफल मिले। इस बार खूब फले हैं।”

हम हैरान! “हमें तो ऋषिकेश से चंबा, श्रीनगर, कर्णप्रयाग और नागनाथ तक में भी देखने को नहीं मिले।”

“टोलिया जी की कार में तक छापरी भर काफल रखे थे। आप लोगों को कहीं क्यों नहीं मिले? ” किसी ने कहा।

बाद में फोन पर चंदन ने बताया, “हम टोलिया जी की गाड़ी में गए। उन्होंने हमें खूब काफल खाने को दिए। बचे-खुचे काफल भी हमें ही सौंप दिए। हम तो उन्हें दिल्ली तक ले आए हैं।”चलने लगे तो राजू ने भरोसा दिलाते हुए कहा, “चलिए, लौटते समय आप लोगों को रानीखेत में काफल मिल जाएंगे। जितना मन हो, उतने खा लीजिए।”

काफल चर्चा में पिछली शाम सम्मानित हुए बुजुर्ग कवि चंद्र बल्लभ पुरोहित जी की कवि सम्मेलन में काफल पर सुनाई गई पंक्तियां याद हो आईंः

हम भी काश कुंवारे होते,

डाडर के पत्तों में हम भी

काफल लूंण मिला कर खाते!

तभी, शेखर ने अपने खास अंदाज में कहा, “अच्छा, सभी साथी पास आ जाएं और कान लगा कर सुनें। जरूरी बात है। यहां हम खाली नहीं रुके। यहां रुकने का खास मतलब है। जिस जंगल में हम खड़े हैं, सच कहें तो चिपको आंदोलन की शुरुआत यहीं से हुई। चिपको का बीज यहीं पड़ा। 1973 में वन विभाग ने इलाहाबाद की साइमन कंपनी को टेनिस के रैकेट बनाने के लिए इसी जंगल के 300 ‘अंगार’ (अंगू) के पेड़ काटने का ठेका दिया था। तब 24 अप्रैल 1973 को यहीं मंडल गांव के निवासियों और दशौली ग्राम स्वराज संघ के सदस्यों ने ढोल-नगारे बजा कर और नारे लगा कर पेड़ काटने का विरोध किया था। भारी विरोध के कारण पेड़ काटने वाले आदमी भाग गए।”

“लेकिन, लोगों की आंखों में धूल झौंक कर गोपेश्वर से करीब 80 किलोमीटर दूर फाटा के जंगल में और भी ज्यादा पेड़ काटने का ठेका दे दिया गया। वहां भी जम कर विरोध हुआ। फाटा और तरसाली के निवासियों ने जंगल में पहरा देना शुरु कर दिया। पेड़ काटने वाले वहां से भी भगा दिए गए।”

“हद तो तब हो गई जब सरकार ने जनवरी 1974 में रैंणी गांव के जंगल में 2500 पेड़ों को काटने का ठेका दे दिया। जिन चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ हम पिछले दो दिनों से थे, उन्होंने गांवों में जाकर लोगों को इस बारे में बताया। लोगों से कहा, पेड़ों को अंग्वाल बांध कर बचाएं। उन्हें काटने न दें।…और, आप में से कई साथियों को याद होगा, 26 मार्च 1974 को जब गांव के सभी पुरुष मुहावजे के बहाने से गोपेश्वर बुला लिए गए तो ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने रैंणी पहुंच गए। तब गौरा दीदी गांव की 27 महिलाओं को लेकर जंगल में गई। उन्होंने पेड़ नहीं कटने दिए। रात में भी पहरा दिया। अगले दिन गांव के पुरुष भी आ गए। वही आंदोलन ‘चिपको आंदोलन’ बन कर इतिहास में दर्ज हो गया। ठीक छू? तो आब हिटा। बैठिए अपनी-अपनी गाड़ी में।”

(जारी है)

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