आषाढ़ में पहाड़-7

डोला
डोला

पीछे-पीछे डंगरिए और लोगों की लंबी कतार और उनका जयकारा…लोहाखाम देवता की जै! गुरु गोरखनाथ की जै! भगवती मइया की जै! गांव की जागा (मंदिर) की परिक्रमा करके जातुरि के साथ डोला आगे बढ़ चला। ऊपर बांज-बुरोंज का जंगल पार करके धूरा की धार में, वहां से पल्वाक-पानि पार कर लोहाखाम मंदिर तक। बीच-बीच में वर्षा की छमक आती जा रही थी। डोला लोहाखाम मंदिर की धार में पहुंचा तो वर्षा की हलकी फुहारों के साथ तेज हवा बह रही थी। सुबह की बेला में वह सांय-सांय का नैसर्गिक संगीत सम्मोहित कर रहा था। ग्राम देवता के जयकारे के साथ चौकी लोहाखाम मंदिर के चबूतरे पर उतार दी गई। पुजारी और पुरोहित चबूतरे पर बैठ कर पूजा अनुष्ठान करने लगे। लोग आते, पैसों की भेंट चढ़ाते या पाठ पढ़वाते। मंदिर के सामने मैदान में और ऊंची धार पर लोग जमा होते गए।

हुड़का, मशकबीन की धुनों के साथ गाते-बजाते, नाचते लोग आते रहे। वे मंदिर की परिक्रमा करके मैदान में आ जाते। चबूतरे के सामने छपेली के शौकीनों ने दो-तीन मशकबीनों, हुड़कों, ताली और बांसुरी की धुन पर गीत के ‘जोड़’ लगा-लगा कर टेक पर नाचना शुरु कर दियाः

गोबिंदी घास काटैंछी औंस बेडुली

पुल बादेंछी कम

गोबिंदी त्यारा मैत को जोगि यै रौछ

चिमटा छमाछम!

(गोविंदी ओंस-बेडुली घास काटती है/पूले बांधती है कम/गोविंदी तेरे मायके का जोगी आया है/चिमटा छमाछम!)

और, यह भी:

माया नसि गै, मोटर में भै बेर

देबुवाऽ किकरछै, र्वे बेर!

(माया तो मोटर में बैठ कर चली गई है/देबुवा क्या करता है रोकर)

बीच मैदान में, रात भर गाकर भी न थके गौंन्यारौ के नारायन सिंह भ्वैनी की चाल में चलते,  झूमते, गाते लोगों से भ्वैंनी शुरु करने के लिए कह रहे थे। गा-गा कर सुना रहे थे- ‘हो क्या गया है तुम लोगों को? थक गए क्या? बुशी गए हो क्या? तो आते क्यों नहीं भ्वैंनी गाने के लिए? ’ ‘आओ ना, आओ ना’ कहते हुए मुझसे भी कहा, “आओ शाब, भ्वैंनी गाते हैं।” मैं बोला,  ”चलो शाब” और नारायन सिंह की बांह पकड़ कर, उनके सुर में सुर मिलायाः

बांज नैं काट बांज लछिमा

बांज नैं काट बांज

कासा हैगीं हाल लछिमा,

बांज नैं काट बांज!

एक-एक, दो-दो करके लोग जुड़ते गए और धीरे-धीरे 60-70 लोगों का घेरा बन गया। नारायन सिंह गीत को आगे बढ़ाते गए और जम गई भ्वैंनी। फिर तो एक के बाद एक भ्वैंनी गाई जाती रहीं। लोग ऐसा रम गए कि कोई छोड़ने को तैयार नहीं।

उधर कछ लोग चूल्हों पर खाना बनाते जा रहे थे। कई लोग पूड़ियां तल रहे थे तो कुछ लोग आटा गूंधने में व्यस्त थे। कुछ बड़े-बड़े कड़ाहों में हलुवा घोट रहे थे। दो-तीन बड़े-बड़े चूल्हों पर भारी-भरकम देगों में आलू की सब्जी पक रही थी। पूरा भोजन शाकाहारी था।

धार में आसपास से बकरों के मिमियाने की आवाजें आने लगी थीं। लोग दूर-दूर से बलि के लिए बकरे लेकर चले आ रहे थे। वहां लाकर उन्हें किसी पेड़-पौधे के सहारे रस्सी से बांध देते और परिणाम से अनजान बकरे आसपास की घास-पत्तियां चरने लगते। एक-दो, एक-दो करके बलि के बकरों की संख्या बढ़ती जा रही थी। तभी, एक आदमी ने हाथ में पकड़े भौंपू से खाने की घोषणा की,  ”सुनिए, हम अपने अतिथियों को बताना चाहते हैं कि भोजन तैयार है। बलि का कार्यक्रम चल रहा है। पूरा होते ही हम खाना खिलाना शुरु कर देंगे।”

शायद बलि का कार्यक्रम पूरा हो चुका था। उस ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई। अब कहीं से भी ‘मेंऽ मेंऽ की आवाज नहीं आ रही थी। फिर घोषणा हुई,  ”सबसे पहले स्त्रियों, बालिकाओं और बच्चों से प्रार्थना है कि वे मैदान में आकर कतारों में बैठ जाएं। इसके बाद हम दो-दो, तीन-तीन ग्राम सभाओं के हिसाब से अपने अतिथियों को बुलाएंगे। ग्रामसभा कालाआगर, क्वेराला-कालाआगर और ककोड़ के हम सभी मेजबान लोग सबसे अंत में खाना खाएंगे। सभी ध्यान रखें कि मेहमानों को कोई तकलीफ न हो। सभी सहयोग दें।”

महिलाओं और बच्चों की भारी भीड़ को खाना खिलाने के बाद ग्रामसभा चमूली, बड़ौन, गलनी, गरगड़ी आदि तमाम ग्रामसभाओं से आए हुए अतिथियों को खाना परोसा गया। हम लोगों ने अंत में खाना खाया। एक-डेढ़ घंटे में अनुशासन के साथ हजारों लोगों को खाना खिला दिया गया। खाना खाकर लोग गांव की ओर वापस लौटने लगे। भौंपू पर घोषणा करके उन्हें अगले दिन बाखली में सिर-खुरी के भोज में जरूर शामिल होने का न्योंता दिया गया।

‘सिर-खुरी’ यानी ‘सिर’ और खुर। खुर मतलब ‘सापड़ी’ (टांग)। मंदिर में शाकाहारी भोज और अगले दिन बाखली में मांसाहार? समझ में नहीं आया। जानकारों से पूछा तो उन्होंने बताया, “नैं,  नैं,  लोहाखाम देवता का तो बकरों की बलि से कुछ लेना-देना ही नहीं हुआ। उनसे तो ओट (परदा) करके बकरों की बलि दी जाती है।”

“ओट करके क्यों?”

“क्यों उनको दिखाई न दे करके, और क्यों? उनको तो यह चढ़ाया नहीं जाता।”

“अरे, तो फिर बकरे चढ़ाए किसे जाते हैं? ” मैंने बैचेन होकर पूछा।

“देवता के गणों को। उन्हें भी तो खुश करना हुआ! है कि नहीं? ”

“नहीं, ये गण तो फिर आदमी ही हुए। गणों की क्या, सच बात तो यह है कि आदमियों की ही जीभ मांगती होगी बकरा।”

“ऐसा ही समझ लें। अब, पुराना रिवाज ठैरा क्या कहा जाए, ” उन्होंने कहा।

वध-स्थल लोहाखाम के चबूतरे के इस ओर मड़्यौ की बगल में सुरई के पेड़ के सामने था। वह चबूतरे की ओट में था। भीड़ में कुछ लोग बलि के बाद तीन टांगें पकड़ कर, बिना सिरी के बकरे का शरीर ले जा रहे थे। हर बकरे का सिर और एक टांग‘सिर-खुरि’ के भोज के लिए रख ली जाती है। शेष भाग बकरा लाने वाले को दे दिया जाता है। युवा पतिया बकरे काटने का सिप्याला (सिद्धहस्त) माना जाता है। पता लगा, इस बार भी उसी ने बकरे काटे। मैंने शाम को आंगन की मेड़ पर बैठ कर शांति से उससे पूछा, “कितने बकरे थे?”

“पता नहीं,” वह जरा उखड़ कर बोला।

“तुमने काटे, तुम्हें ही पता नहीं है?” मैंने कहा।

“शायद 44”

“चवालीस? मैंने चौंक कर कहा। फिर उसकी ओर गौर से देख कर पूछा, “तुमने यह काम सीखा कहां?”

“समझ लीजिए देवता का ही आदेश हुआ। अलाई-बलाई भगाने के लिए देवता के गणों को ही दी जाती है बलि,” कहते हुए वह वहां से उठ कर चला गया।

उस दिन भी बाखली के आंगन में रात भर जम कर भ्वैंनी-छपेली गाई गईं। पुरुषों और महिलाओं की भ्वैंनियां अलग-अलग जमीं।

(जारी है)

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