आषाढ़ में पहाड़-6

द दुंग… दुंग….दुंग द दुंग…दुंग…दुंग !

बीच-बीच में बाजा बदलताः

दनकि…दनन…दनकि…दनन !

दनकि…दनन…दनकि….दनन !

द दुंग… दुंग….दुंग द दुंग…दुंग…दुंग !

इसके साथ ही शंख बज उठा, “पू ऊ ऊ ऊ ह्” और फिर वहीः

द दुंग…दुंग…दुंग द दुंग…दुंग…दुंग !

लोहाखाम पुजारी जगरियों को चौंरीगाई की पूंछ से झाड़ कर आर्शीवाद दे रहे हैं…भलो है जालो तुमरो हे गुरु! सतगुरु आदेश ! आदेश !

द दुंग…दुंग…दुंग…दुंग…दुंग !

डंगरिए मुट्ठी में अछेत (अक्षत) लेकर लोगों की ओर छिटक रहे हैं। किसी के माथे पर अछेत भरी हथेली टिका कर आशीष दे रहे हैं…. “भलोऽ है जालोऽ है शौकारो…इनऽ मोती का दाना, त्वै हनऽ दयालि है जालाऽ…आदेश! गोठ माई, पांड़ा माई, सबों कै भलऽ है जालो…आदेश! यककि यकासि है जालि, पांचकि पचास है जालि…खाक चुटकिक लाखकरि द्यूंल…समगुरु आदेश! ””

एक और डंगरिया किसी और आदमी से…“अलख निरंजन! खाक का ओढ़ना, खाक का बिछौना…ड्यौढ़ आसन भै म्यर…त्वै हन दयालि है जाल…अखंड दीयाकि जागरिति त्वै हन दयालि है जालि…आदेश! आदेश! आदेश! ”

अंगीठा धुधक रहा है। डंगरिए नाचते जा रहे हैं। चारों ओर, यहां तक कि मकानों की छत पर भी भारी भीड़ जमा है। भीड़ में अचानक किसी को औतार आता है। सारा आंग (शरीर) थर्राने लगता है। और, वह कमीज-स्वेटर उतार कर, धोती पहन कर धूनी में नाचने पहुंच जाता है। धुरमंडल (धूम) मच गई है। कुछ नए-नवेलों के आंग में भी नौताड़ (कंपकंपाहट) आ रहा है। डंगरिए उनके सिर पर हाथ या चौंरीगाईं की पूंछ रख कर उन्हें शांत कर रहे हैं।

भीड़ बीच-बीच में जयकारा लगा रही है…लोहाखाम देवता की जै! भगवती माता की जै! अब तक 17 डंगरिए नाच चुके हैं।

द दुंग दुंग दुंग

द दुंग दुंग दुंग!

‘पू ऊ ऊ ऊ ह’ शंख बज रहा है। कसासुरी थाल झन्न्ऽ झनझना रहा है। भ्वां करके पंचमुखी शंख बज उठा है। ताली की खिन-खिन के साथ ही घांट (घंटियां) टुन-टुना रही हैं। बीच-बीच में घंटे की टन्न…टन्न सुनाई दे जाती है। सभी वाद्यों ने हवा में एक सम्मोहक संगीत घोल दिया है।

द दुंग दुंग दुंग!

द दुंग दुंग दुंग!

डंगरिए नाचते जा रहे हैं। रात भर नाचेंगे।

रात का दूसरा पहर है। इधर अंगीठे के चारों ओर डंगरियों के नाचने की धुरमंडल मची हुई है तो उस पार आंगन से भ्वैनी गाने की आवाजें हवा में तैर कर आ रही हैं। वहां बांहों में बांह डाले सत्तर-अस्सी लोग गोल घेरे में, झूम-झूम कर भ्वैनी गा रहे हैंः

दानि शौकाऽ
दानिपुरै को दानि पीपल, बालिपाऽ
दानि शौका, हिंगोली का खामा सालि बालिपाऽ
दानि शौका, सबौं हन दयालि है जौ बालिपाऽ
लोपचुली-लोखाम साली बालिपा!…
हम कुछ देर सोने के लिए चले गए ताकि सुबह लोहाखाम मंदिर के लिए डोला उठते समय जातुरी में शामिल हो सकें। लेकिन, नींद किसे आनी थी? अल्मोड़ा से आए हरीश बोरा और मैं तीन बजे झनमना कर उठे। बाहर हलका द्यौ (वर्षा) छिंटा रहा था। दिशा-शौच जाकर नहाने के लिए पानी टटोला लेकिन पानी था नहीं। टार्च की रोशनी में ऊपर पुश्तैनी धारे पर पहुंचे। मैंने हाथ-मुंह धोया। हरीश ने स्नान किया। उस ठंड में पहाड़ से निर्मल और गुनगुना पानी निकल रहा था। उस ब्राह्म मुहूर्त में नहाने का अलग ही आनंद था। तभी, एक-एक कर डंगरिए भी स्नान के लिए आने लगे। पुजारी हरीश चंद्र भी स्नान कर रहे थे। मंदिर के लिए प्रस्थान करने से पहले स्नान करना जरूरी था। स्नान करके हरीश बोरा ने कहा, “शायद भ्वैंनी गा रहे हैं बाखली में। आपकी रुचि की चीज है। चाहें तो आगे-आगे चलिए, मैं आता हूं।”
मैं तेज कदमों से बाखली में पहुंचा। लोग बारिश के छींटों में खड़े सुबह के कार्यक्रम का अनुमान जरूर लगा रहे थे कि कितनी देर में चलना ठीक रहेगा। मैं कमरे में जाकर पुजारी, पुरोहितों और जगरियों के पास जाकर बैठ गया। तभी छम्म से बारिश बरसने लगी। लोग‘‘आब कि ह्वल, आब कि ह्वल’ (अब क्या होगा) के अंदाज में एक-दूसरे को ताकने लगे।
एक आदमी भागता हुआ भीतर आया और पुजारी-पुरोहितों से पूछने लगा, “आब कि करला? ”
मोतीराम पुरोहित बोले, “किलै, जो देवता कहेंगे! ”
“तो चलें फिर? शुरु करें? ”
“शांति रखिए। सबसे बड़ी बात है ‘ओम शांति’। थोड़ी देर रुकिए। देखें बारिश ने क्या सोच रखा है, ” मोतीराम शांति से बोले।
कुछ देर बाद बाहर से जयकारा उठा, “लोपचुली-लोहाखाम देवता की जै! सच्चे दरबार की जै! पंचनाम देवों की जै! ”
वर्षा झमाझम बरसी और थोड़ी देर बाद चौड़ी गई (कम हो गई)। पुजारी जी ने जगरियों से कहा, “चलो, शुरु कर दो। हलकी वर्षा तो चलती रहेगी। इसी में निकल लेते हैं।”
गणेश और ईश्वरी ने हाथ जोड़े और ढोल पर बाजा लगायाः
किड़ किड़ किड़ किड़ किड़
द धंग, द धंग!
द दुंग दुंग दुंग
द दुंग दुंग दुंग!
जगरिया गणेश जोर-शोर से बिनती कर रहा थाः
तबेत बाबा!
क्षीर सागर छैं
जै में बिश्नु अवतार छैं
जैकी नाभी में अमरित छ
नाभी नली बटी, पैद बनि गीं सुर्ज कमल
सुर्ज कमल में सतजुगी ब्रह्मा छैं…

डंगरिए नाचने लगे। बाहर बहुत हलकी वर्षा जारी थी। अचानक देखा, ऊपर ठींग के ऊंचे पहाड़ से पश्चिम में गलनी के धूरे तक आसमान में सुंदर सतरंगी इंद्रैंणी (इंद्रधनुष) खिंची हुई थी। अद्भुत दृश्य था। नीचे से घना सफेद हौल (कोहरा) तेजी से ऊपर उठता जा रहा था। लोहाखाम के पुजारी को कंधों पर बिठा कर मंदिर तक ले जाने के लिए सजी-धजी चौकी आ चुकी थी। उस पर लाल पटुवा ओढ़ा कर उसे रंगीन पन्नियों से सजाया गया था।
जगरियों के पीछे-पीछे नाचते हुए डंगरिया घर-भीतर से बाहर आए। शंख-घंट, कसासुरी थाल बजे। घंटियां टुनटुनाईं। पुजारी चौकी में बैठे और चार लोगों ने उन्हें चौकी सहित कंधों पर उठाया और नंगे पैर चल पड़े, तीनेक किलोमीटर दूर जंगल में लोहाखाम मंदिर की ओर।
पू ऊ ऊ ऊ ह
टन्न्….टन्न्….टन्न्
झन्न्….झन्न्
द, डिंग डिंग डिंग
द, डिंग डिंग डिंग!

(जारी है)

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