दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ-5

सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना

सुबह के केवल 7-30 बजे थे। हमने गाड़ी में से ही गलबहियां भरतीं पिंडर और अलकनंदा को देखा। बाजार में पूछ कर उन राजकीय इंटर कालेजों का पता लगाया जहां हमें व्याख्यान देना था। कमल को राजकीय इंटर कालेज, कर्णप्रयाग में छोड़ा, चंदन को राजकीय बालिका इंटर कालेज में और प्रकाश, डॉ. आर्य और मुझे कर्णप्रयाग से लगभग साढ़े पांच किमी. आगे राजकीय इंटर कालेज, सिमली में। बहुगुणा सत्ताईस-अट्ठाईस किमी. आगे राजकीय इंटर कालेज, नारायणबगड़ में व्याख्यान देने चले गए। लौटते समय उन्हें हमें साथ लेकर नागनाथ-पोखरी पहुंचना था।

मैदान में बैठे 200-300 बच्चे हमारा इंतजार कर रहे थे। वंदेमातरम, शारदा वंदना और ‘स्वागतम शुभ स्वागतम, आनंद मंगल अति शुभम्’ गीत गायन के बाद बच्चों से बातचीत हो सकी। मैंने जीवन में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के बारे में बताया, डॉ. आर्य ने जीवन में सफलता पाने के लिए सुझाव दिए और प्रोफेसर प्रकाश ने जीवन में किताबों की भूमिका के बारे में समझाया। खुले मैदान में बच्चे धूप से खूब तपते रहे। बातचीत खत्म हुई तो प्रधानाचार्य महेंद्र सिंह सजवाण के आग्रह पर रोटी-सब्जी का नाश्ता करके हम गाड़ी का इंतजार करने लगे।

घने डेंकण की छांव में बैठे गाड़ी का इंतजार कर ही रहे थे कि मेरे मोबाइल की कोयल ने कूक कर बताया कि कोई एस एम एस संदेश आया है।‘यहां कौन याद कर रहा है’? सोचते हुए संदेश खोला तो लिखा था- ‘क्या आप भी पहाड़ समारोह में आए हैं? मैं नंदप्रयाग इंटर कालेज में हूं- नवीन जोशी।’ यानी, लखनऊ से पत्रकार-संपादक साथी नवीन भी आया है! तुरंत जवाबी संदेश भेजा, “अरे वाह ! मैं सिमली में हूं। नागनाथ में मिलते हैं। ”

गाड़ी आई और हम ठीक 11-30 बजे 28 किमी. दूर पहाड़ की चोटी पर स्थित नागनाथ-पोखरी की ओर चल पड़े जहां 12-30 बजे पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरु होना था। कर्णप्रयाग घाटी से सर्पीली सड़क हमें पहाड़ पर ऊपर और ऊपर ले जा रही थी। काफी ऊपर पहुंच कर दूर नीचे कर्णप्रयाग शहर के साथ ही पिंडर व अलकनंदा का संगम दिखाई दे रहा था। हम लोग चलती गाड़ी में व्याख्यानों और अगले कार्यक्रमों की चर्चा कर रहे थेः

“जोरदार प्लानिंग है। सुबह 7 से 9 बजे के बीच 32 इंटर कालेजों के लगभग 15,000 बच्चों से बातचीत हो गई।”

“वह भी केवल 2 घंटे के भीतर।”

“शेखरदा की ही प्लानिंग हो सकती है ऐसी।”

“और, देखो व्याख्यान देने वाले कौन हैं? कितनी दूर-दूर से आए हैं ! पर्वतारोही, पत्रकार, प्रशासक, पर्यावरणविद्, वनविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रबंधन विशेषज्ञ, पुरातत्वविद्, मुख्य सूचना आयुक्त, वैज्ञानिक, विज्ञान लेखक, प्रोफेसर, चिकित्सक, छायाकार, फिल्मकार….और भी न जाने कौन-कौन।”

“हद है ! और देखो, सब आए हैं। अपने खर्चे पर चले आए हैं।”

“सच्चे मन से जुड़ना यही तो हुआ।”

“असली काम इसी तरह हो सकता है।”

“इसीलिए तो खाली जेब, पहाड़ को समझने के लिए केवल चार विद्यार्थियों द्वारा शुरु की गई एक पैदल यात्रा इतने बड़े अभियान में बदल गई है।”

संजय आड़े-तिरछे रास्ते से गाड़ी को पहाड़ की ऊंचाई में ले आया था । अब रास्ता पहाड़ के दूसरी ओर मुड़ गया। रास्ते में कई गांव पड़े। पहाड़ की ऊंचाई से नीचे दूर घाटी में बसे गांव की भी झलक दिखाई दे रही थी। कहीं-कहीं तो पहाड़ पर ऊपर से नीचे तक केवल करीने से कटे हुए सीढ़ीदार खेत ही दिखाई देते थे। शायद उन खेतों में चौमास की फसल बोने के लिए बारिश का इंतजार हो रहा था। एक जगह से दूर नीचे घाटी में गोचर की हवाई पट्टी भी दिखाई दी। बहुत सुंदर दृश्य था।

नागनाथ पोखरी जाते हुए
नागनाथ पोखरी जाते हुए

आखिर हम 12-30 बजते-बजते नागनाथ-पोखरी पहुंच गए। चारों ओर बांज, बुरांश और काफलों के हरे-भरे पेड़ थे। वहां भोजन किया। स्वादिष्ट पर्वतीय व्यंजन बने थे। कार्यक्रम राजकीय इंटर कालेज, नागनाथ-पोखरी में आयोजित किया गया था। यहां इसी पर्वत-प्रदेश में जन्मे, पले-बढ़े और इसी इंटर कालेज में पढ़े चार पर्वतपुत्रों की अतीत से खोज कर लाई गई रचनाओं को सहेज कर छापी गई इन दुर्लभ पुस्तकों का विमोचन किया गयाः ‘इतने फूल खिले’ (चंद्रकुँवर बर्त्वाल) , स्नो बॉल्स आॅफ गढ़वाल’ (नरेंद्र सिंह भंडारी) ,‘उत्तराखंड रहस्य’( शालिग्राम वैष्णव) और‘गढ़वालः एंशियंट एंड रीसेंट’ (पातीराम परमार)।

प्रांगण में तने लंबे-चौड़े शामियाने में सैकड़ों स्थानीय आबाल-वृद्धों के साथ बाहर से आए अतिथि भी बैठे हुए थे जिनमें फ्रांस की कैथरीन, बंगलुरु के समीर बनर्जी और दिल्ली, लखनऊ के तमाम साथियों के साथ ही उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों से आए हुए साथी भी थे। उत्तराखंड के मुख्य सूचना आयुक्त डॉ. आर. एस. टोलिया की अध्यक्षता में पुस्तक विमोचन के बाद प्रांगण की ठंडी हवा में गीत-लोकगीत गूंजने लगे। बांज-बुरांशों से आती उस ठंडी हवा में, चंद्रकुँवर बर्त्वाल की सद्यः विमोचित पुस्तक ‘इतने फूल खिले’ में संकलित ‘नागनाथ’ कविता की पंक्तियों को पढ़ना एक अद्भुत अनुभव थाः

ये बांज पुराने पर्वत से

यह हिम से ठंडा पानी

ये फूल लाल संध्या से

इनकी यह डाली पुरानी।

इस खग का स्नेह काफलों से

इसकी यह कूक पुरानी….

डॉ. योगाम्बर सिंह बर्त्वाल अभी-अभी बता चुके थे कि काफलों पर कूकने वाली ‘‘काफल पाक्कू’चिड़िया पर लिखी चंद्रकुंवर बर्त्वाल की रस भीगी कविता पढ़ कर राहुल सांकृत्यान ने उनका नाम ही‘काफल पाक्कू’ रख दिया था!

(जारी है)

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