आबिद मेरे हीरो

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दादा का पानी के जहाजों का करोबार डूब जाए और अचानक पूरा परिवार फुटपाथ पर आ जाए। ताप्ती नदी की भीषण बाढ़ में बहता पांच साल का बच्चा बाल-बाल बच जाए और उसे लेकर पूरा परिवार बंबई के पिछड़े, भीड़ भरे डोंगरी इलाके में आकर एक कमरे के घर और फुटपाथ पर जीवन बिताने लगे। यह सब कुछ देखकर पिता सदमे में शून्य में ताकते-ताकते बीमार पड़ कर जिंदगी को अलविदा कह दें।

मां परिवार पालने के लिए आसपास के घरों में काम करने लगे। बाढ़़ से बचा बच्चा फुटपाथ के अपने दोस्तों के साथ यहां-वहां चीजें मांगने लगे। डौकयार्ड के पास से वी.टी. स्टेशन की ओर जाते फ़िरंगी फौज़ियों से चलती ट्रेन के साथ-साथ दौड़ते फुटपाथ के बच्चों की वह टोली फौजियों से चाकलेट और पैसे मांगने लगे और उनके फैंके खाए ब्रैड-बिस्किटों पर झपट पड़े। किसी फ़ौज़ी की फैंकी एक कॉमिक्स पर वह टोली टूट पड़े और फटे पन्ने हाथ लगें। उस छीना-झपटी में बाढ़ में बचे बच्चे के हाथ भी कॉमिक्स का एक पन्ना लग जाए और घर आकर वह उसमें बने चूहे ‘मिकी माउस’ को देखे और उसे लगे कि ‘लो, यह तो मैं भी बना सकता हूं।’ फटे-पुराने कागजों पर वह अपनी कलम से मिकी माउस के चित्र बनाता जाए और इस कवायद में चूहों के सौ से ज्यादा चित्र बना डाले! सहसा उसके मन में विचार  आया कि वह भी तो चिक्की और खट्टी-मीठी गोलियों के साथ-साथ इन्हें बेच कर मां की मदद के लिए दो पैसे कमा सकता है। उसके भीतर का चित्रकार जाग जाए और वह जुनून के साथ चित्र बनाने लगे।

फिर वह फिल्म स्टूडियो में स्पाट बाय की मामूली नौकरी करने के साथ ही जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में एडमिशन लेकर चित्र कला में डिप्लोमा हासिल कर ले। चित्रकला का जुनून उसे एक सुप्रसिद्ध चित्रकार बना दे। शरतचंद्र को पढ़ते-पढ़ते उसे लगे कि उपन्यास तो वह भी लिख सकता है। यह शब्द-साधना उसे एक अप्रतिम साहित्यकार बना दे। जिं़दगी के विद्रूप उसे एक व्यंगकार, नाटककार, काटूनिस्ट, पटकथा लेखक और समाजसेवी बना दें। और, यह सब कुछ मिल कर एक नया अलबेला आदमी रच दे- आबिद सुरती यानी मेरे हीरो।

लोग मन में अपना कोई हीरो चुन लेते हैं और उसके फैन हो जाते हैं। अधिकतर लोगों का हीरो फिल्मों का नायक होता है, लेकिन कई लोग किसी खिलाड़ी, सफल अभिनेता, व्यापारी, समाज सेवी या बहादुर फौजी आदमी को अपना हीरो चुन लेते हैं और उनके मुरीद हो जाते हैं।     

मगर, मैं मन ही मन अपने हीरो आबिद का फैन हो गया। सच तो यह है कि साठ-सत्तर के दशक में कुछ कहानियां, उपन्यास और ‘धर्मयुग’ का कार्टून कोना पढ़ते-पढ़ते न जाने कब आबिद मेरे हीरो बन गए, पता ही नहीं चला। आबिद? हां, वही ‘ढब्बू जी’ वाले कार्टूनिस्ट, कथाकार, उपन्यासकार, चित्रकार, नाटककार आबिद सुरती। जब तक मुझे यह पता लगा, मैं जु़नून की हद तक उनका फैन बन चुका था। दोस्तो से उनकी कहानियों की चर्चा करता, उनके बारे में ‘धर्मयुग’ में पढ़े किस्से  सुनाता। ढब्बू जी के एक से एक चुटकुले सुना कर साथियों को हंसाता। गर्ज़ यह कि उनसे जुड़ी हर खबर मेरे लिए बड़ी खबर होती।

तब मैं पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में था और ‘धर्मयुग’ आबिद सुरती के बारे में लेख वगैरह छापता रहता था। मुझे ‘धर्मयुग’ से ही पता लगता था कि जापान में आयोजित प्रथम इंडिया फैस्टिवल की एक पूरी दीवार की डिजायन परिकल्पना आबिद सुरती की है और यह भी कि भारत सरकार के फिल्म डिवीजन ने इस अनोखे चित्रकार पर एक लघु फिल्म बनाई है। फिल्म की शुरूआत में पद्मासन में बैठे आबिद ज्ञान मुद्रा में धरती की कोख से बाहर आते। फिर उनकी चित्रकारी के रंग और दृश्य दिखते।

उन्हीं दिनों ‘धर्मयुग’ ने एक बार बाकायदा यह सचित्र सूचना भी दी कि बंबई (अब मुंबई) में जहां आबिद रहते हैं, वहां लोग आशंकित हैं कि कहीं अपने दरवाजे से बाहर निकल कर वे उनके घरों-दीवारों पर भी चित्र बनाना शुरू न कर दें। हुआ यह था कि मुफ़लिसी के उन दिनों में न राशन के लिए पैसे होते थे, न कैनवस के लिए। इसलिए आबिद ने अपने घर की दीवारों, फर्नीचर और बाकी चीजों पर पेंटिंग करना शुरू कर दिया। इस तरह चित्र बनाने की अपनी धुन में वे चित्रांकन करते हुए दरवाजे तक पहुंच गए।

उन दिनों ‘धर्मयुग’ आते ही हम उस पर टूट पड़ते और उसे पीछे से पढ़ना शुरू करते क्योंकि हमारे प्रिय ढब्बू जी पत्रिका के आखिरी पेज पर होते थे। पढ़ने में ‘पहले मैं, पहले मैं’ इसलिए होती ताकि पढ़ कर ढब्बू जी का वह चुटकुला सबसे पहले खुद सुना दिया जाए। उन्हीं दिनों पढ़े ढब्बू जी के ये मजेदार चुटकुले:

लेखकः मेरा उपन्यास छप गया है।

चंदूलाल: अरे वाह। कुछ बिक भी रहा है?

लेखक: हां, सब कुछ बिक गया है, बस बदन पर के ये कपड़े बाकी हैं!

और यह भी:

ढब्बू जीः डॉक्टर साहब, मेरी आंखों कमजोर हो गई हैं, चैक कर दीजिए।

डॉक्टर: ठीक है। सामने दीवाल पर कितने अक्षर पढ़ सकते हो?

ढब्बू जी: सभी पढ़ सकता हूं। यह तो बताइए, दीवाल कहां है?

और यह भीः

भिखारी: अंधे को दो पैसे दे दो।

ढब्बू जीः इस बात का क्या सबूत है कि तुम अंधे हो?

भिखारी: वो दूर पहाड़ी पर आपको एक छोटा-सा पेड़ दिखाई दे रहा है?

ढब्बू जी: हां दिखाई दे रहा है।

भिखारीः मुझे नहीं दिखाई दे रहा है!

उन्हीं दिनों ‘धर्मयुग’ में उनकी गुजराती कहानी का अनुवाद छपा- ‘तीसरी आंख’। हमने उसे पढ़ा और मन बाग-बाग हो उठा। घर का एक बुजुर्ग कबाड़ी से एक पुराना ऐनक खरीदता है जिसे पहनते ही उसे कबाड़ी के मन की बात सुनाई देने लगती है।

 

बुजुर्ग उसे लेकर घर पहुंचता है और फिर क्या था, ऐनक पहन कर वह अपनी पत्नी, दोनों बेटों, बेटी, बहू, सभी के विचार सुन लेता है। तब उसे बाहर से दिखाई देने वाले रिश्तों की खोखली असलियत का पता लग जाता है। बहुत मार्मिक कहानी थी वह।

उन्हीं दिनों उनका उपन्यास छपा- ‘काली किताब’। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में ‘काली किताब’ पहुंचते ही हम दोस्तो ने उसे हाथों-हाथ लिया और पढ़ कर आबिद सुरती की कलम का नया रंग और व्यंग्य देखा। यहां-वहां उनकी कहानियों के अनुवाद भी पढ़ते रहे।

सन् सत्तर के दशक में बच्चों और किशोरों की मासिक पत्रिका ‘पराग’ में उनका अद्भुत उपन्यास ‘बहत्तर साल का बच्चा’ धारावाहिक छपने लगा। हम पति-पत्नी और बच्चे उसके मुरीद हो गए। हर माह अंक आता और घर की इस टोली को मैं उपन्यास की नई किस्त सुनाता। बीच-बीच में हम पेट पकड़ कर हंसते भी रहते। दादा जी के बारे में मार्मिक अंश पढ़ने पर आंखें भी भीगतीं। कलकत्ता से ट्रक में बैठ कर बंबई में अपने नौकरीशुदा बेटे-बहू के अपार्टमेंट में पहुंच कर वे अपने पोते के साथ जो उधम मचाते, जो कारनामे कर दिखाते, वे पूरे दिलो-दिमाग को गुदगुदा देते।

Untitledहर हफ्ते, हर माह और हर साल लगातार छपने वाले ढब्बू जी को हम साल-दर-साल पढ़ते और हंसते रहे। यह तो वर्षों बाद पता लगा कि ढब्बू जी ‘धर्मयुग‘ में 30 साल तक छपते रहे! बहरहाल हम जब पंतनगर छोड़ कर नई नौकरी शुरू करने के लिए लखनऊ शहर को गए तो ढब्बू जी भी हमारे साथ चले। ‘धर्मयुग’ के उन तमाम अंकों में से हमने उन्हें कतरनों के रूप में साथ ले लिया। जब कभी उदास होते या हंसने का मन करता, फाइल से उन्हें निकाल कर पढ़ लेते। मैंने जीवन में कभी न कभी उनसे मिलने की ख्वाहिश मन में पाल ली थी। ढब्बू जी के तमाम किस्से सुनते-सुनाते लोग मुझे ही ढब्बू जी कहने लगे।

कई साल बाद तबादले पर शहर लखनऊ को अलविदा कहा और सपरिवार दिल्ली पहुंचा। दफ्तर के संगी-साथियों में वहां भी जल्दी ही ढब्बू जी का सिक्का जम गया। दफ्तर की पार्टी वगैरह में ‘ढब्बू जी को बुलाओ’ कहा जाने लगा। आंखों और दांतों के डाक्टर भी ढब्बू जी के उनसे संबंधित चुटकुले सुन कर खुश हो जाते।

सन् 2013 में जब मेरी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ की हलचल के दिन चल रहे थे तभी 24 अगस्त को मोबाइल पर लखनऊ से दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के संपादक और कथाकार श्री नवीन जोशी का संदेश झलका: ‘मैं ढब्बू जी के सृजक के साथ बैठा हूं। आपको याद कर रहा हूं।

मेरे मुंह से निकला, “हद है। मैं वहां क्यों नहीं हूं?”

मैंने उन्हें लिखा, “अरे वाह। काश मैं भी वहां पर होता। कैसे लगे आबिद सुरती? कभी उनके साथ एक प्याली चाय पीने का मेरा भी मन है।”

Untitledउत्तर मिला, “बहुत आनंद आया। वह आजकल पानी बचाओ अभियान में लगे हैं। एक प्लंबर लेकर मुंबई से घर-घर घूमते हैं और टपकते नलों को ठीक करते हैं। कितनी सुंदर बात है। मैंने आपका ज़िक्र किया कि कितने ही ढब्बू जी आपको याद हैं।” मैं सोचता रहा, न जाने मेरी भेंट कब होगी उनसे।

दो-तीन बार विश्व पुस्तक मेले में मैंने उन्हें देखा लेकिन परिचय न होने के कारण संकोचवश उनसे मिल न सका। एक बार तो वहीं किसी चाय-कॉफी की दूकान के सामने धूप में मेज पर कुहनियां टिकाए अकेले बैठे देखा, फिर भी जाकर मिलने की हिम्मत न जुटा सका मगर उनसे मिलने की ख्वाहिश बनी रही।

और, एक दिन दूर कौसानी, उत्तराखंड में एक साथी से यों ही इस ख्वाहिश का ज़िक्र कर बैठा।

वर्ष 2015। जून माह की 10 तारीख ‘बाल प्रहरी’ मासिक और बाल साहित्य संस्थान की ओर से आयोजित बाल साहित्य सम्मेलन के होटल कौसानी में अनाशक्ति आश्रम के आंगन की दीवार पर हम दो-तीन दोस्त बैठे थे। बातचीत में मैंने कहा, “बहुत ख्वाहिश थी कि कभी कौसानी देखें। आज देख लिया।”

साथी रजनीकांत शुक्ल ने हंस कर उत्सुकता से कहा, “और क्या-क्या ख्वाहिशें हैं आपकी?”

“अजीब-सी हैं मित्र, सुनेंगे तो चौंक जाएंगे।”

“ऐसी क्या बात है, आप बताइए तो सही।”

“तो सुनिए। मेरी पहली ख्वाहिश है कि कभी जाने-माने लेखक-चित्रकार आबिद सुरती के साथ बैठ कर एक प्याली चाय पियूं।”

“और?”

“और यह कि कभी पेरू में इंका साम्राज्य के प्राचीन शाही नगर माचू-पिचू के अवशेष देखूं और उसके सामने के विशाल पवित्र पहाड़ को प्रणाम कर सकूं, और पैदल हिमाचल प्रदेश में ऊंचे धौलाधार पहाड़ों के पार जा सकूं, और….”

“चलिए, आपकी पहली ख्वाहिश तो हम पूरी करा देंगे। आबिद सुरती दिल्ली आते रहते हैं और उनसे मेरी भेंट होती रहती है। अब वे आएंगे तो मैं आपको बुला लूंगा।”

“बहुत आभारी रहूंगा आपका मित्र,” मैंने कहा और दो-चार दिन बाद दिल्ली लौट आया।

बच्चों के लिए रचनात्मक विज्ञान लेखन विषय पर अक्टूबर प्रथम सप्ताह में मुंबई में एक सेमीनार था, जिसमें भाग लेने की तैयारी कर रहा था कि 29 सितंबर को नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से संपादक श्री द्विजेन्द्र कुमार का फोन आया।

“आपको उदयपुर के पुस्तक मेले में चलना है।”

मैंने कहा, “लेकिन, मैं तो एक सेमीनार में मुंबई जा रहा हूं। वहां से 5 अक्टूबर की फ्लाइट से लौटूंगा।”

“नो प्राब्लम, आप 7 अक्टूबर की फ्लाइट से उदयपुर चल सकते हैं।”

“वहां मुझे क्या करना होगा?”

“‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में भाग लेना है, बच्चों को विज्ञान की कहानी लिखना सिखाना है और जुगलबंदी करनी है।”

मैंने पूछा, “जुगलबंदी? जुगलबंदी किसके साथ?”

“जाने-माने लेखक-चित्रकार आबिद सुरती के साथ।”

मुझे सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। दुबारा पूछा, “किसके साथ?”

“आबिद सुरती के साथ।”

अब शको-शुबहे की कोई गुजांइश नहीं थी। मन खुश हो गया यह सोच कर कि वर्षों बाद ही सही लेकिन इस बार आबिद सुरती से मिलने की मेरी ख्वाहिश पूरी हो जाएगी। मैंने कहा, “मैं जरूर आऊंगा।”

DSCN4522पांच अक्टूबर को मुंबई से लौटा और अगले दिन द्विजेन्द्र जी और डॉ. शेखर सरकार के साथ उदयपुर की उड़ान भरी। वहां पहुंच कर राजस्थान पर्यटन के कजरी होटल में रुके। उदयपुर पुस्तक मेले में बच्चों के साथ कहानी और कहानी लेखन पर चर्चा की। द्विजेंद्र जी ने बताया कि आबिद सुरती अगली सुबह की उड़ान से उदयपुर पहुंच रहे हैं। अगले दिन मैं और डा. शेखर सरकार उन्हें लेने हवाई अड्डे पहुंचे। मैं पहली बार उनसे मिलने के लिए बहुत रोमांचित था। पता लगा कि उड़ान पहुंच चुकी है। सरकार बोले, “मैं उनसे पहले मिला हूं, इसलिए पहचान लूंगा।”

मैंने कहा, “दूर से मैंने भी उन्हें देखा है। यों भी उनकी इतनी तस्वीरें देख चुका हूं कि देखते ही उन्हें भी पहचान लूंगा।”

तभी हवाई अड्डे के गेट से बाहर बाईं ओर हमें अलबेले आबिद सुरती नजर आ गए। दुआ-सलाम के बाद गाड़ी में बैठ कर हमने कजरी होटल की राह पकड़ी। मैंने उनसे कहा कि मैं उनका बहुत पुराना फैन हूं। डाक्टर सरकार ने भी उन्हें बताया कि अब तक ये आपकी ही बातें कर रहे थे और आपसे मिलने के लिए बहुत बेताब थे। इनका कहना है कि न जाने कब से इनकी ख्वाहिश रही है कि आपके साथ एक प्याली चाय पीएं।

आबिद जी हंस कर बोले, “चाय ही क्या, सब कुछ पिएंगे!”

तब तक हम कजरी होटल पहुंच गए। गाड़ी से उतरते ही मैंने अपने हीरो आबिद जी से अनुरोध किया कि सबसे पहले आपके साथ एक फोटो खिंचवाना चाहता हूं। वे बोले, “जरूर, आइए और जाकर होटल की सीढ़ियों पर बैठ गए।” डाक्टर सरकार ने हमारा फोटो खींच लिया।

बाद में होटल से तैयार होकर पुस्तक मेले में पहुंचे। जब भी मौका मिला मैं आबिद जी से बातें करने की कोशिश करता रहा। बातचीत में पता लगा कि पिछले कई वर्षों से वे पानी बचाने की मुहिम में लगे हैं। और अब तक लाखों लीटर पानी बचा चुके हैं। इसके लिए उन्होंने ‘ड्रॉप फाउंडेशन’ बनाया है जो ‘वन मैन एनजीओ’ है। वे हर इतवार के दिन एक प्लंबर और एक महिला वालेंटियर को लेकर घरों में दस्तक देते हैं और टपकते नलों को मुफ्त में ठीक करते हैं। मैंने उनसे कहा कि मैं सन् साठ के दशक से ही ढब्बू जी और उनकी कहानियां पढ़ता रहा हूं। ढब्बू जी की तीस-चालीस साल पुरानी कतरनें मैंने अब भी संभाल कर रखी हैं। उस शाम हमने ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में श्रोताओं से बातचीत की।

DSCN4493अगले दिन सुबह एक हाल में जुगलबंदी कार्यक्रम था जिसमें मैंने बच्चों को कहानी सुनाई और आबिद जी ने उन्हें चित्र बनाना सिखाया। एक बड़े बोर्ड पर उन्होंने देखते ही देखते आदमियों के तरह-तरह के चेहरे और उनकी कद-काठी बना डाली जिन्हें देख कर बच्चे बहुत खुश हुए। शाम को बच्चों के लिए लेखन पर परिचर्चा हुई जिसमें हमारे अलावा राजस्थान की बाल साहित्यकार विमला भंडारी, पंचशील जैन और ‘बच्चों का देश’ पत्रिका के संपादक और कई अन्य स्थानीय साहित्यकार शामिल हुए। सभी ने एक मत होकर कहा कि बच्चों के लिए सरल-सहज और रोचक भाषा में लिखा जाना चाहिए।

देर शाम को हम पिचौला झील की ओर निकले और अंधेरे में उसके किनारे खड़े होकर दूर झील में रोशनी से जगमगाते हुए सिटी पैलेस को देखा। फिर हरी दास जी की मागरी, मुल्ला तलाई में केसर विलास की छत पर उसके युवा रसोइयों के हाथ का बना ताजा, स्वादिष्ट भोजन किया। वहां से रात के अंधेरे में दूर-दूर तक जगमगाती रोशनियां दिखाई दे रही थीं।

अगली सुबह मैंने बच्चों को किस्सागोई के अंदाज में सौरमंडल की सैर कराई और जीवन का गीत गाया। उसी दिन आबिद जी और मुझे लौटना भी था। होटल में खाना खाकर हम दोनों हवाई अड्डे की ओर निकले। रास्ते भर मैं उनसे उनकी किताबों, कहानियों, चित्रकारी और कार्टूनों पर बातचीत करता रहा। उन्होंने सहसा पूछा, “आप कहां से हैं? घर कहां है आपका?”

मैंने कहा, “नैनीताल।”

वे बोले, “बहुत पहले मैं भी वहां गया था। तब जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से डिप्लोमा कर रहा था।”

“आप घूमने गए थे नैनीताल?”

MADHUMATI-13“नहीं, ‘मधुमती’ फिल्म की शूटिंग के लिए चित्र बनाने। बिमल राय की उस फिल्म की शूटिंग हुई थी, नैनीताल के आसपास। एक कोठी भी थी वहां….”

“घोड़ाखाल में, भुवाली से आगे।” मैंने कहा, “यह तो बहुत पुरानी बात हुई।”

वे बोले, “हां, 1956 की बात है। दिलीप कुमार और बैजयंती माला थे उसमें।”

मैंने चहक कर कहा, “मैंने देखी है वह फिल्म। बहुत ही प्रसिद्ध फिल्म थी वह। अब आज का नैनीताल देखने आइए कभी।” वे मुस्कराए।

मैंने कहा, “एक बार इंडिया फेस्टिवल में आप जापान भी तो गए थे?”

“हां, मुझे उस फेस्टिवल में एयर इंडिया ने एक पूरी दीवार अपनी विशेष तकनीक ‘मिरर कोलाज’ से चित्रित करने की जिम्मेदारी दी थी।”

मैंने उन्हें यह भी बताया कि मैंने फिल्म्स डिवीजन, भारत सरकार की ओर से उन पर बनाई हुई फिल्म भी देखी थी और, यह भी कि ढब्बू जी के साथ-साथ उनके ‘धर्मयुग’ के लिए बनाए गए विज्ञापन भी मुझे बहुत पसंद थे। उनमें से एक विज्ञापन में ढब्बू जी जंगल में धर्मयुग पढ़ रहे हैं। एक शेर आता है, उन पर झपटता है- भड़ाम! धड़ाम! और, फिर ‘धर्मयुग’ के कुछ पन्ने ढब्बू जी पढ़ रहे हैं और कुछ शेर! एक और विज्ञापन में ढब्बू जी बस की लंबी कतार में ‘धर्मयुग’ पढ़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं और वे पढ़ते-पढ़ते भीतर जाने के बजाए बस पर बनी सीढ़ी से छत पर पहुंच कर आगे से नीचे उतर कर आगे चले जाते हैं!

उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘काली किताब’ के बारे में भी मैंने बात की। बातचीत में उनके बनाए ‘बहादुर’ कॉमिक्स की चर्चा भी हुई। तब मैंने उनसे कहा कि तमाम कारनामों पर कॉमिक्स तैयार किए जाते हैं लेकिन हिंदी में विज्ञान कथाओं पर कॉमिक्स नहीं हैं। क्या आपने इनके जरिए विज्ञान की बातें बताने की भी कोशिश की है? उन्होंने एक कॉमिक्स निकाल कर मुझे देते हुए कहा, “मैं ‘डाक्टर चिंचू के कारनामे’ के जरिए विज्ञान की जानकारी देता हूं।” फिर मुझे उन्होंने अपनी ‘सूफी और कुछ अन्य किताबों के बारे में भी बताया और ‘काली किताब’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘द ब्लैक बुक’ की एक प्रति भेंट की। मैंने कहा, इस पर सप्रेम भेंट लिख दीजिए तो वे बोले, “हवाई अड्डे में आराम से बैठ कर लिखेंगे।”

आबिद जी की उड़ान पहले थी। हवाई अड्डा पहुंच कर मुंबई की उड़ान के बारे में पता किया तो पता लगा कि उसका चैक-इन हो रहा है। आबिद जी और मैं कतार में खड़े हो गए। सुरक्षाकर्मी ने उन्हें जाने दिया और मेरी उड़ान बाद में होने के कारण मुझसे इंतजार करने को कहा। चैक-इन शुरू होने के बाद मैं तेजी से ऊपर वेटिंग लाउंज में पहुंचा। तब तक आबिद जी की उड़ान जा चुकी थी। मैं मायूस होकर हाथ में ‘ब्लैक बुक’ को देखता रहा जिसके पहले पन्ने पर उन्होंने सप्रेम भेंट लिख कर अपने हस्ताक्षर करने थे। खैर, किताब को अपने रकसैक में डाला और अपनी उड़ान का इंतजार करने लगा। मन को समझाया कि कोई बात नहीं, अगली बार सही।

शाम 5ः20 बजे हमारे उड़नपंछी ने दिल्ली की उड़ान भरी। जाहिर है, दो घंटे की उस उड़ान के दौरान भी मैं अपने हीरो आबिद जी और उनकी रचनात्मक दुनिया के बारे में ही सोचता रहा।

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