बाबा अरुण कौल और धूमकेतु

 

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मार्च माह का अंतिम सप्ताह था। वर्ष 1997। उन दिनों आकाश में हेल-बॉप धूमकेतु आया हुआ था जिसे लोग कोरी आंख से भी देख सकते थे। मैं भी दिल्ली के आसमान में अक्सर उसे देखा करता था और उसके बारे में तरह-तरह की कल्पनाएं किया करता था।

एक दिन दफ्तर में बैठा काम कर रहा था कि एक फोन आया:

“देवेंद्र भाई, मैं मोहन गुप्त।”

मैंने नमस्कार किया और पूछा, “ भाई साहब, कैसे याद किया?”

“आपको फिल्मकार अरुण कौल जी का फोन आएगा। उनसे बात कर लेना।”

मैंने पूछा, “किस बारे में बात करनी है?”

वे बोले, “वह भी बताता हूं। हुआ यह कि उन्होंने गुणाकर मुले का फोन नंबर मांगा। मैंने उनसे पूछा- मुले जी से क्या काम पड़ गया? उन्होंने बताया, वे कॉमेट यानी धूमकेतु पर एक स्क्रिप्ट लिखाना चाहते हैं। एक डाक्यूमेंटरी फिल्म बनानी है। मैंने उनसे कहा- क्या सचमुच बनानी है? वे बोले, अरे, भाई हां। इसीलिए फोन नंबर मांग रहा हूं। मैंने कहा- तब मैं आपको एक दूसरा नंबर देता हूं। यह नंबर देवेंद्र मेवाड़ी का है। आप उनसे बात कर लीजिए। आपका काम हो जाएगा।”

गुप्त जी ने फोन पर यह भी बताया कि गुणाकर मुले इन दिनों एक पुस्तक के काम में बहुत व्यस्त हैं और मैं जानता हूं आप यह काम जरूर कर देंगे।

उसी दिन, 27 मार्च को शाम को फिल्मकार अरुण कौल साहब का फोन आया:

“क्या देवेंद्र मेवाड़ी बोल रहे हैं?”

मैंने कहा, “जी हां, मैं बोल रहा हूं।”

“मैं अरुण कौल प्रोडक्शंस से अरुण कौल बोल रहा हूं।” दुआ-सलाम के बाद मैंने पूछा कि उन्होंने कैसे याद किया? वे बोले, “हमें कॉमेट पर एक अच्छी स्क्रिप्ट चाहिए। क्या आप हमारे लिए यह काम कर देंगे? आपके बारे में मुझे राजकमल प्रकाशन के मोहन गुप्त जी ने बताया। मेरे मित्र हैं वे।”

बातचीत में उन्होंने यह भी बताया कि असल में किसी संस्था के लिए उन्होंने एक स्क्रिप्ट तैयार तो करवाई थी, लेकिन संस्था को वो पसंद नहीं आई। इसलिए मैं एक अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश में हूं।

मैंने कहा, “एक बात जानना चाहता हूं। आप जो डाक्यूमेंटरी बनाएंगे, वह इसी विषय पर किसी अंग्रेजी या विदेशी फिल्म से कैसे अलग होगी? धूमकेतु में तो वही तीन भाग होंगे- सिर, जटा और पूंछ। फिर अंग्रेजी फिल्म से आपकी फिल्म में अंतर क्या होगा?”

“हां, यह तो सोचने की बात है। आप क्या सोचते हैं?”

“मैं आपसे चाय या कॉफी पर एकाध घंटा बात करना चाहता हूं। उस बातचीत से आपको भी यह पता लग जाएगा कि क्या मैं सचमुच आपके लिए आपकी पसंद की स्क्रिप्ट का काम कर सकता हूं या नहीं, और मुझे भी मालूम हो जाएगा कि क्या मैं आपके लिए वह काम कर सकता हूं। आप मुझे मिलने का समय दे दीजिए।”

उन्होंने मालवीय नगर में अपने स्टूडियो का पता बता कर मिलने का समय दे दिया। मैं अगले दिन उनके स्टूडियो में पहुंचा। वे मेरा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने अपनी टीम के अन्य लोगों को भी बुला लिया। उनसे परिचय कराया। टीम के मीडिया प्रमुख प्रोफेसर मदान थे। स्पेशल इफेक्ट्स के लिए शायद पुणे से कंप्यूटर विशेषज्ञ पारेख बुलाए गए थे। उनकी टीम के सभी लोग कौल साहब को आदर के साथ ‘बाबा’ कह रहे थे। गरमा-गरम ब्लैक कॉफी के साथ हमारी बातचीत शुरू हुई।

मैंने कहा, “वैज्ञानिक नजर से देखें तो कॉमेट यानी धूमकेतु में जो कुछ भी होता है, वह अंग्रेजी या हिंदी फिल्म में एक समान ही होगा। हमारी फिल्म उनसे तब अलग होगी जब वह एक भारतीय फिल्म होगी।”

उन्होंने पूछा, “भारतीय किस तरह?”

मैंने कहा, “जैसे, हमारी फिल्म गोधूली वेला से शुरू होगी जब गाएं घर को लौट रही होंगी, दृश्य में उनके खुरों से उड़ती हुई धूल दिखाई देगी और उनकी गल-घंटियों की टुन-टुन की आवाज सुनाई देगी। पृष्ठभूमि में सूर्य अस्त हो रहा होगा। फिर आसमान में कहीं एक तारा निकलेगा, फिर दूसरा, फिर तीसरा और फिर असंख्य। पूरी कायनात में सब कुछ नियम और अनुशासन से चल रहा होगा कि तभी कहीं से लंबी पूंछ लहराता हुआ कोई धूमकेतु हमारे सौरमंडल में आ धमकेगा, जैसे इन दिनों हमारे आसमान में हेल-बॉप धूमकेतु आया हुआ है।”

वे लोग चुपचाप सुन रहे थे। मैंने आगे कहा, “इस तरह आसमान में धूमकेतु आ जाएगा। अर्थववेद संहिता की एक ऋचा के स्वर में प्रार्थना गूंज रही होगी कि ‘उल्काओं और धूमकेतुओं से हमारी रक्षा करो। सातवीं सदी में वराहमिहिर अपने ग्रंथ ‘वृहदसंहिता’ में ‘अथ केतुचाराध्यायः’ लिखते हुए धूमकेतुओं का वर्णन कर रहे होंगे। उधर महाराष्ट्र में दूर अतीत में कभी कोई उल्का पिंड या धूमकेतु धरती से टकराया होगा जिससे लोणार झील बन गई होगी। सोलहवीं सदी में मुगल बादशाह जहांगीर के वाकया नवीस तुजु़क-ए-जहांगीरी में धूमकेतु का जिक्र कर रहे होंगे, सन् 1689 में भारत में पांडिचेरी से फ्रांसीसी खगोलविद् फादर रिशाओ पहली बार दूरबीन से धूमकेतु को देख रहे होंगे और सन् 1910 में जब आसमान में हेली धूमकेतु आया होगा, तब राष्ट्रकवि सुब्रमणियम भारती हेली धूमकेतु पर कविता लिख रहे होंगे।”…

बाबा ने खामोशी तोडी और कहा, “यह तो सब भारतीय है! हमारी फिल्म भारतीय दिखाई दे रही है।”

“बट ह्वैर इज साइंस इन द फिल्म?” एक युवक ने कुछ तेज आवाज में पूछा। पता लगा वह उनका बेटा इंद्रनील है जो स्वयं भी फिल्म निर्माण में मदद कर रहा है।

बाबा ने कहा, “लिसन, पहले पूरी बात सुन लो।”

तब मैंने कहा, “इसके अलावा फिल्म में सारा साइंस है। यह जानकारी फिल्म को रोचक बनाएगी और भारतीय पहचान देगी। फिल्म में बताया जाएगा कि धूमकेतु क्या हैं, वे कहां से आते हैं, किस चीज के बने होते हैं, उनकी दो तरह की पूंछें क्यों बनती हैं, अब तक पृथ्वी के आसमान में कौन-कौन से प्रमुख धूमकेतु आ चुके हैं, धूमकेतुओं के बारे में लोग अंधविश्वास क्यों करते थे, धूमकेतु हमारे सौरमंडल में आते तो हैं लेकिन वे जाते कहां हैं, वगैरह-वगैरह।”

कॉफी के दूसरे दौर के साथ हमने फिल्म के वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की। इस लंबी बातचीत से धूमकेतु पर फिल्म का मुक्कमल खाका तैयार हो गया। बाबा ने बातचीत में जितनी रुचि ली, उससे मुझे पता लग गया कि मैं उनके लिए यह स्क्रिप्ट लिख सकता हूं। उन्हें भी शायद यह महसूस हो गया कि जैसी फिल्म वे चाहते हैं, वैसी स्क्रिप्ट लिखने वाला पटकथा लेखक मिल गया है। मैंने स्क्रिप्ट लिखने के लिए दो-तीन दिन का समय मांगा।

उन्होंने भी धूमकेतु फिल्म को भारतीय फिल्म का स्पर्श देने के लिए दृश्यों की फुटेज पर बातचीत की। वैदिक उच्चारण के साथ अर्थवेद संहिता की ऋचा का पाठ करने के लिए उन्होंने किन्हीं वैदिक पंडितजी को फोन किया और अगले दिन स्टूडियो में बुला लिया। वराहमिहिर के ‘अथ केतुचाराध्यायः’ के लिए संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति से बात की और बृहतसंहिता के बारे में पूछा। फिर खुश होकर कहा कि इस अध्याय की फोटो कापी करके कूरियर से तुरंत उन्हें भेज दें। लोणार झील के बारे में पूछने पर मैंने उन्हें बताया कि हाल ही में सिद्धार्थ काक ने ‘सुरभि’ कार्यक्रम में लोणार झील के दृश्य दिखाए थे। उन्होंने तुरंत सिद्धार्थ काक को फोन मिला कर उनसे कहा कि शूटिंग का बचा हुआ फुटेज उन्हें भेज दे। सुब्रमणियम भारती की कविता के लिए उन्होंने जेएनयू के किसी तमिल शोध छात्र को फोन किया और हेली पर भारती की मूल तमिल कविता के साथ-साथ उसके हिंदी अनुवाद को लेकर दो-एक दिन में स्टूडियो में आने को कहा। गोधलि की वेला के बारे में मैंने उनसे कहा कि तुगलकाबाद किले के सामने अरावली की पहाड़ियों के पास अच्छा दृश्य मिल सकता है। और, यह भी कि बुद्ध जयंती गार्डन के पास से सूर्यास्त का बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है। हेल-बॉप धूमकेतु तो इन दिनों आसमान में है ही। वह रुई के फाहे की तरह दिखाई दे रहा है। उसे भी शूट किया जा सकता है।

उन्होंने अपनी कैमरा टीम को इन दृश्यों की शूटिंग का सुझाव दिया और फिर खुश होकर सूर्यास्त के बारे में कहने लगे, “हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने सूर्यास्त पर बहुत सुंदर कविता लिखी है। हम हिंदी में उसे गाया करते थे – ‘सूर्य अस्त हो गया, गगन मस्त हो गया!’ रिकार्डिंग के लिए स्टूडियो में हम सभी मिलकर इसे गाएंगे।”

मैंने तीन दिन बाद उन्हें हाथ से लिखी बेस स्क्रिप्ट सौंप दी। उन्होंने उसे टाइप कराने के बाद जमा करा दिया। दो अप्रैल को उन्होंने बताया कि स्क्रिप्ट पास हो गई है। साथ ही पूछा, “क्या आप वर्किंग स्क्रिप्ट में भी हमारे साथ काम करना चाहेंगे?”

“जी हां, जरूर करना चाहूंगा। उससे मेरा ही अनुभव बढ़़ेगा। लेकिन, यह तो बताइए कि स्क्रिप्ट जमा कहां की थी, किस संस्था में?”

मैंने अब तक इस बारे में उनसे कुछ नहीं पूछा था। वे बोले, “विज्ञान प्रसार में। डायरेक्टर विज्ञान प्रसार को दे दी थी।”

बाबा अरुण कौल, प्रोफेसर मदान और मैंने मिल कर वर्किंग स्क्रिप्ट तैयार की। कुछ दृश्यों की शूटिंग की गई और तमाम दृश्यों के फुटेज खोजे गए। तब बाबा ने कहा, “कमेंट्री के लिए अविनाश कौर सरीन को बुला लेते हैं। कुछ दृश्यों का विज्ञान समझाने के लिए प्रोफेसर यश पाल से भी बात करता हूं। दो-तीन वैज्ञानिकों के स्टेटमेंट भी ले लेते हैं।” इसके लिए जाने-माने वैज्ञानिक डाक्टर देसाई और प्रोफेसर भट्टाचार्य से संपर्क करने का निश्चय किया गया।

तीन अप्रैल को सुबह 10 बजे कंधे में झोला लटकाए प्रोफेसर यश पाल स्टूडियो में पहंुच गए। उन्होंने एक चौड़ी ट्रे में पानी भर कर झोले में से रामदाने के जैसे बीज निकाले और पानी में डाल दिए। फिर बच्चों की तरह खुश होकर बोले, “लो, देखो, तारों भरा आकाश। इस तरह उन्होंने आकाश और धूमकेतु के बारे में कुछ बातें समझाईं। स्टूडियो में भी बाइट दी।” पांच अप्रैल को दूरदर्शन की सुपरिचित समाचार वाचक अविनाश कौर सरीन आईं और कमेंट्री रिकार्ड कर ली गई। इस बीच पारेख स्पेशल इफेक्ट्स पर काम करते रहे।

अब संपादन का काम बाकी रह गया था। इसलिए मैं कुछ दिन कौल साहब के स्टूडियो में नहीं गया। कुछ दिनो ंके बाद मोहन गुप्त जी का फोन आया कि धूमकेतु फिल्म के प्रमोशन के लिए एक पैम्फलेट बनाना है। मैंने अपनी बेटी मानसी से सिंगल फोल्ड का पैम्फलेट डिजाइन कराया। उसके कवर पर उसने धूमकेतु का चित्र बनाया। मैंने टेक्स्ट लिखकर बाबा के पास भिजवा दिया। बाद में मोहन गुप्त जी ने उसकी प्रतियां छाप दीं।

मई की पहली तारीख को कौल साहब का फोन आया, “देवेंद्र जी, धूमकेतु पर फिल्म तैयार है। अपनी यह फिल्म आप कब देखेंगे?” यह आत्मीय बात थी। मैं अगले दिन उनके स्टूडियो में गया और फिल्म देखी। फिल्म के टाइटिल देख कर चौंक गया। उसमें लिखा था- कॉमेट, ए फिल्म बाइ प्रोफेसर मदान, पारेख एंड देवेंद्र मेवाड़ी! मैं तो सोच रहा था कि पटकथा में मेरा नाम दिया गया होगा। यह सब देख कर बहुत अच्छा लगा। मेरी बेस स्क्रिप्ट की कल्पना की फिल्म साकार हो उठी थी। मैंने स्क्रिप्ट के अंतिम भाग में कल्पना की थी कि जब हेल-बॉप धूमकेतु 2400 वर्ष पहले हमारे आसमान में आया होगा तो उसे मुअन-जोदड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा, लोथल और कालीबंगा के प्राचीन भव्य नगरों के निवासियों ने देखा होगा। अब जब 2400 वर्ष बाद वह लौटेगा तो कोई नहीं जानता कि तब हमारी दुनिया कैसी होगी।

आश्चर्य की बात यह थी कि फिल्म में विज्ञान के बारे में पूछने वाले युवा इंद्रनील ने इस कल्पना को बहुत ही खूबसूरती से साकार कर दिया था। उसने राष्ट्रीय संग्रहालय में जाकर आदिवासी मानव प्रतीकों को फिल्मा कर 2400 वर्ष बाद की एक काल्पनिक दुनिया रच दी थी।

मैंने कौल साहब और अन्य साथियों के प्रति आभार व्यक्त किया और चलने लगा। तभी प्रोफेसर मदान ने एक लिफाफा देकर कहा- यह आपका पारिश्रमिक। मैंने उसे जेब में रख लिया। कौल साहब देख रहे थे। बोले, “देखेंगे नहीं कि पारिश्रमिक ठीक है या नहीं?”

मैंने कहा, “मेरा सबसे बड़ा पारिश्रमिक आपके और आपकी टीम के साथ प्रोफेशनल काम का अनुभव अर्जित करना है। आपके साथ इस नए फील्ड में काम करने का नया तजुर्बा हुआ, इसके लिए आपका बहुत आभारी हूं।” उन्होंने मेरी लगन और मेहनत देख कर मुझे अपने टर्निंग प्वाइंट कार्यक्रम से भी जुड़ने का आफर दिया। लेकिन, मैंने विनम्रता से यह कह कर मना कर दिया कि मैं नौकरी के काम में बहुत व्यस्त रहता हूं इसलिए समय नहीं दे पाऊंगा।

सन् 1997 में दूरदर्शन से वह फिल्म कई बार प्रसारित हुई। शायद कुछ भाषाओं में उसका अनुवाद भी हुआ। हेल-बॉप धूमकेतु के लौटने के साथ ही धूमकेतु की चर्चाएं धीमी पड़ गईं और शायद धूमकेतु फिल्म भी भुला दी गई।

बाबा अरुण कौल के साथ साइंस फिल्म का क्रिएटिव काम तो किया, लेकिन तब इतना कहां पता था जिनकी संगत में एक फिल्म की कल्पना को साकार होते देख रहा हूं, वे स्वयं एक क्रिएटिव फिल्म डायरेक्टर, प्रोड्यूसर तथा पटकथा लेखक हैं। उन्होंने प्रसिद्ध लेखक यू.आर. अनंत मूर्ति की कहानी पर ‘दीक्षा’ फिल्म बनाई जिसने बालीवुड में नए सार्थक सिनेमा की दस्तक दी। ‘दीक्षा’ को सन् 1991 में सर्वोत्तत भारतीय फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार ‘रजत कमल’ मिला। जिन्होंने ‘टर्निंग प्वाइंट’ और ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसे यादगार सीरियल बनाए, कला-संस्कृति और संग्रहालयों पर बेहतरीन डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई और कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भागीदारी की। ‘चांदनी’ जैसी हिट फिल्म की पटकथा तो लिखी ही, कई अन्य सफल फिल्मों की भी पटकथाएं लिखने में सहयोग दिया।

‘धूमकेतु’ बनाने के बाद कभी उन्हें विज्ञान के प्रोग्राम बनाने के लिए मेरी जरूरत महसूस हुई होगी, लेकिन मुझसे संपर्क नहीं हो पाया। मैं दिल्ली से चंडीगढ़ जा चुका था। साढ़े तीन साल बाद दिल्ली लौटा तो एक बार डाक से उनका ख़त मिला। लिखा था, “आपको कहां खोजूं? धरती, आकाश, पाताल में कहां? बड़ी कठनाई से राष्ट्रीय सहारा के ब्रजेश्वर मदान से आपका यह पता मिला। उन्होंने भी किसी से पूछा। मिल सकेंगे तो अच्छा लगेगा।”

लेकिन, नौकरी की अस्त-व्यस्तता में मिल नहीं पाया। तभी सन् 2006 में हिंदी अकादमी, दिल्ली के पुरस्कार वितरण समारोह में उनसे अचानक भेंट हो गई। मेरे मित्र डाक्टर सुबोध महंती को भी हिंदी की सुविख्यात साहित्यकार कृष्णा सोबती जी और मनु भंडारी जी के हाथों से पुरस्कार प्राप्त करना था। सभागार में बैठे ही थे कि आवाज आई, “कहां-कहां खोजने के बाद आखिर यहां मिले आप। मैं कुछ समय पहले एक साइंस प्रोग्राम के लिए आपको खोज रहा था।”

मैंने उनको अपनी परिस्थितियों के बारे में बताया। उनसे मेरी वही आखिरी मुलाक़ात थी। इस साल सन् 2020 में आसमान में ‘नियोवाइज’ धूमकेतु के आने और कोरी आंख से दिखाई देने पर अपनी वह ‘धूमकेतु’ फिल्म फिर याद हो आई। लेकिन, वह दौर गुजर चुका था और उसी बीच 21 जुलाई 2010 को बाबा अरुण कौल ब्रह्मांड की अनंत यात्रा पर चले गए। उनकी स्मृति को नमन।

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