केवल हम ही नहीं हंसते

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हंसते-मुस्कराते मन में कई बार ख्याल आता है कि क्या इस धरती पर केवल हम ही हंसते हैं? या, जानवर भी हंसते हैं? हंसने की बात तो यह है कि खुद जानवर होते हुए भी हम अपने-आप को किस सफाई के साथ अलग कर लेते हैं और पूछते हैं- क्या जानवर भी हंसते हैं। जी, हंसते हैं। सच यह है कि इस बिरादरी में खुद हम भी शामिल हैं, भले ही लाखों वर्ष लंबी विकास यात्रा में चैपाए से दोपाए होकर हम सभ्यता के शिखर पर पहुंच गए। इस यात्रा में हम ओरंगुटान, गोरिल्ला, बोनोबोस औस चिम्पैंजी जैसे अपने दूर के महा कपि रिश्तेदारों को पीछे छोड़ आए। हमने इसी विकास यात्रा में उनकी ही तरह हांफते-हांफते, हंसना सीख लिया और सभ्यता की दौड़ में हंसने-मुस्कराने के मामले में भी उनसे आगे निकल गए। वैज्ञानिक आज उन बिरादरों की हांफने और घुरघुराने की खासियतों का खुलासा करके हम मनुष्यों के हंसने के गूढ़ रहस्य का पता लगा रहे हैं। उनका कहना है कि विकासक्रम में हमारे वे बिरादर तो घुरघुराते ही रह गए और हम हंसना सीख कर उनसे आगे निकल गए। इतना कि हमने हंसी को भी सशक्त भाषा बना लिया और बिना बोले भी हंसते-हंसाते बहुत-कुछ कहने की कला सीख ली।

यहां बता दें कि प्रसिद्ध शायर और व्यंग्यकार इब्ने इंशा को कोई मुगालता नहीं था कि आदमी भी एक जानवर ही है। अपनी पुस्तक ‘उर्दू की आखिरी किताब’ में उन्होंने इस दोपाए जानवर के बारे में क्या खूब लिखा है – “दूध देने वाले जानवरों में पालने के लिए सबसे अच्छा यही है। ये नौकरी करता है, दुकान करता है, तनख्वाह लाता है, बच्चे खेलाता है। उन्हें पीठ पर बैठाता है। अजीब शक्लें बना-बनाकर हंसाता है, बहलाता है।”

और यह भी कि “अपनी मादा की खि़दमत में जितनी दौड़-धूप यह करता है, कोई और जानवर नहीं करता। इसीलिए तो इसके सींग गायब हो गए हैं, खुर घिस गए हैं और दुम झड़ गई है।”

खैर, यह तो व्यंग्यकार की बात है लेकिन वैज्ञानिक एक अरसे तक जानवरों के हाव-भाव को गौर से देखने और उनके गले और बगलें गुदगुदाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमारे कपि बिरादर हंसते तो हैं मगर अपनी तरह। हम मनुष्यों की भाषा से उनकी हंसी की भाषा और व्याकरण अलग है। इसी से वैज्ञानिकों को यह पता लगा कि उनकी घुरघुराहट की तरह हमारे पुरखे भी घुरघुराते रहे होंगे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने उस घुरघुराहट को अपने पेट के पर्दे यानी डायफ्राम, गले तथा चेहरे की मांसपेशियों को कुछ इस तरह साध लिया कि हम मुस्कराने और ठठा कर हंसने लगे। आज हालत यह है कि हम जब हंसते हैं तो हमारे चेहरे की 43 मांसपेशियां हरकत में आ जाती हैं।

xoJPkzGNFuXhRjWZPAQbeE-320-80हमारे अलावा प्राणि जगत में जिनकी हंसी का पता लगा है, वे हैं- महाकपि यानी चिम्पैंजी, बोनोबोस, ओरंगुटान और गोरिल्ला। हमारी तरह के चेहरे-मोहरे वाले चिम्पैंजी तो दांत दिखा कर भी हंस देते हैं, हालांकि अपने साथी चिम्प के साथ मजे से खेलते समय वे कुछ इस तरह हंसते हैं कि लगता है वे हांफ रहे हैं। साथी भी मुंह दबा कर हंसते-घुरघुराते उसकी हंसी का जवाब देता या देती है। बोनोबोस चिम्पैंजियों की बौनी प्रजाति है, मगर वे हंसने में बड़े चिम्पैंजियों से पीछे नहीं हैं। वे भी उनकी ही भाषा में हंसते हैं।

विकासक्रम में चिम्पैंजियों से थोड़ा पीछे चल रहे गोरिल्ला भी हंसते हैं मगर उनकी हंसी वे ही समझ सकते हैं जो उनके बहुत करीब रहते हैं। यों, यह बात सभी जानवरों के लिए सच है। हम उनके सुख-दुख उनके करीब रह कर ही समझ सकते हैं।

एक थी मादा गोरिल्ला ‘कोको’। उसका पूरा नाम था हानाबिको कोको। कैलिफोर्निया, अमेरिका के सैन फ्रैंसिस्को चिड़ियाघर में 4 जुलाई 1971 को उसका जन्म हुआ था। उसने अमेरिकी सांकेतिक भाषा के कम से कम 1000 संकेत सीख लिए थे। इतना ही नहीं, वह अंग्रेजी के 2,000 शब्दों के मायने भी समझती थी। इतना कि एक बार जब उससे अंग्रेजी में ‘हार्ड’ का मतलब पूछा गया तो उसने कहा – “पत्थर और कार्य।” एक बार तो उसने मजाक-मजाक में खाली बैठे अपने प्रशिक्षक के जूतों के फीते बांध कर संकेत किया- “चलो, मेरा पीछा करो!”

कोको के संकेत समझ कर और हांफने के स्वर सुन कर पता लगा कि उसकी हंफ-हंफी ही उसकी हंसी है। गोरिल्ला ऐसे ही हंसते हैं। गोरिल्ला ही क्यों, चिम्पैंजी, बोनोबोस, ओरंगुटान और बंदर भी एक-दूसरे से छेड़छाड़ करके, इशारों से ध्यान आकर्षित करके और तरह-तरह की मुख-मुद्राएं बना कर अपनी भाषा में ठठा कर हंस लेते हैं। इसलिए बंदरों की अजीब हरकतें देख कर हंसते समय यह भी याद रखें कि हो सकता है, वे भी आप पर हंस रहे हों।

कपि परिवार के ही हम मुस्करा भी लेते हैं, दबी हंसी हंस सकते हैं, हो-हो कर खुल कर हंस सकते हैं, प्रसिद्ध साहित्यकार मोहन राकेश की तरह अट्टहास कर सकते हैं! इतना ही नही, हम किसी की ओर तिरस्कार की नजर से देख कर व्यंग्य भरी हंसी भी हंस सकते हैं तो कुछ गलत कर देने पर खिसियानी हंसी भी हंस लेते हैं।

यहां तक कि हम मजबूरी की लाचार हंसी भी हंस सकते हैं और दर्द की हंसी को भी हमारे चेहरे पर पढ़ा जा सकता है। जनाब जिगर मुरादाबादी कह ही गए हैं, “एक ऐसा भी वक्त होता है, मुस्कराहट भी आह होती है।”

यों, हंसने के लिए हम दोपायों ने तमाम एक से एक मजेदार चुटकले ईजाद किए हैं-खुद पर भी और अपने पालतू जानवरों पर भी। कुत्ते का ही उदाहरण ले लें। कहते हैं, हमारे लाल बुझक्कड़ की तरह उजबेकिस्तान की तरफ भी एक खलीफा थे। उनसे एक बार किसी ने पूछ लिया, “हुजूर, कुत्ता अपनी दुम क्यों हिलाता है?”

उनकी पेशानी पर बल पड़े, कुछ देर सोचा और फिर संजीदा होकर बोले, “इसलिए, क्योंकि कुत्ता अपनी दुम की बनिस्पत अधिक ताकतवर है। अगर दुम ताकतवर होती तो वह कुत्ते को हिलाती!”

imagesकुत्ते की बात चली है तो यह बता दें कि कुत्ते भी हंसते हैं। कुत्तों से प्यार करने और उन्हें पालने वाले लोग इस बात को बखूबी जानते हैं। उन्हें खूब पता होता है कि कब उनका कुत्ता खुश है, कब नाराज है, कब उदास है और कब वह मुस्करा या हंस रहा है। चेहरे के हाव-भाव और उसकी हंफ-हंफी से, उसकी पूंछ हिलाने के तरीके से हंसी का साफ पता लग जाता है। बल्कि वैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि कई बार हलकी हंफ-हंफी और घुरघुराहट ही नहीं, जोर से हांफने पर भी कुत्ता हंस रहा होता है। अगर कुत्ते का मूड़ खराब है और उसे दूसरे कुत्तों की हंफ-हंफी हंसी सुनाई दे जाए तो उसका मूड ठीक हो जाता है। एक प्रयोग में लाउडस्पीकर से हंफ-हंफी और हांफने की हंसी सुन कर बुरी तरह भौंकते, बौखलाए पंद्रह कुत्तों का झुंड मुस्करा कर शांत हो गया।

कुत्ते अपनी मौज़ में हंसते हैं लेकिन कभी-कभी उनका प्रतीक लेकर कवि हम मनुष्यों के दर्द को भी शब्द दे देते हैं। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना अपनी कविता ‘हंसी’ में कहते हैं:

भयानक होती है रात

जब कुत्ते रोते हैं

लेकिन, उससे भी भयनक होती है रात

जब कुत्ते हंसते हैं

सुनो क्या तुम्हें सुनाई देती है

किसी के हंसने की आवाज

 

हंसती तो बुद्धिमान डाल्फिनें भी हैं लेकिन उनका चेहरा देख कर आप उनकी हंसी को नहीं भांप सकते। मगर यह सच है कि उनमें हंसोड़पन होता है। वे मनुष्यों और मछलियों के साथ तैरते-तैरते ऐसे करतब और शरारत करती रहती हैं कि लगता है वे खुश हैं और अपने ही तरीके से हंस-हंसा रही हैं।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि चूहे भी हंसते हैं! इनकी हंसी पर बहुत प्रयोग किए गए हैं। वाल्ट डिज्नी ने चूहे की अजीबोगरीब हरकतें देख कर मिकी माउस का किरदार गढ़ दिया जो आज सारी दुनिया के लोगों को हंसा रहा है। उन दिनों चूहों पर इतने प्रयोग नहीं किए गए थे इसलिए वाल्ट डिज्नी ही चूहे की हरकतों पर अकेले हंसे होंगे। अगर वे आज होते तो वैज्ञानिकों की बात सुन कर उन्हें जरूर लगता कि हो न हो, जिस चूहे को देख कर वे कई दिनों तक हंf37b394ee722bf078ae084bc1a58e331सते रहे, वह उन्हें चकमा दे देकर उन पर भी हंसता रहा होगा!

अब इस बात पर मत हंसिएगा कि हंसी का पता लगाने के लिए दुनिया में कई वैज्ञानिक, कई वर्षों से चूहों की गर्दन और पेट में गुदगुदी कर रहे हैं। इस तरह गुदगुदी करने पर चूहे मुंह से 50 किलोहर्टज तक की चुह-चुह की अल्ट्रासोनिक आवाज़ निकालते हैं भले ही हम उसे नहीं सुन सकते। खुश होकर मस्ती में एक-दूसरे का पीछा करते समय भी वे ऐसी ही तेज चुह-चुह करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है, खुशी की यह चुह-चुह ही चूहों की हंसी है। प्रयोग में वे इस हंसी-खुशी के लिए गुदगुदी करने वाले वैज्ञानिकों की अंगुलियां इस अंदाज से पकड़ने लगे, मानो कह रहे हों “और कीजिए ना गुदगुदी।” वे तो उस बटन को भी खिसकाने की कोशिश करने लगे जिससे 50 किलोहर्टज की चुह-चुह की आवाज़ आ रही थी।

वैज्ञानिक केवल चूहों के पेट में गुदगुदी ही नहीं मचा रहे बल्कि इस बहाने आदमी के खुश रहने की ‘पिल’ भी खोज रहे हैं। वे चूहों को एक अवसादरोधी दवा दे रहे कि देखें क्या इससे भी चूहों की हंसी-खुशी बढ़ती है। अगर नतीजे अच्छे आए तो कल दिलो-दिमाग को खुश रखने वाली इस दवा का प्रयोग मनुष्यों पर भी किया जा सकता है।

main-qimg-6b516de6e8e08e0a134d528e496c5300वैज्ञानिकों की नजर घोड़ों, गधों, ऊंटों, उल्लुओं और पेंग्विन पक्षियों पर भी है। उन्हें लगता है कि ये जीव भी हंसते-हंसाते हैं। हालांकि, रात के सन्नाटे में लकड़बग्घे की मनुष्यों जैसी हंसी की आवाज़ कतई हंसी नहीं है। इसी तरह आस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली किंगफिशर बिरादरी की सबसे बड़ी चिड़ियां कूकाबुर्रा भी सुबह-शाम हम मनुष्यों की तरह हंसी की आवाज में चहकती हैं मगर वे हंसती नहीं बल्कि अपनी ही पक्षी-जुबान में चहचहाती हैं।

हम दोपायों से तो रघुवीर सहाय कह गए हैं:

हंसो पर चुटकलों से बचो

उनमें शब्द हैं

कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों

(‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’ से)

देवेंद्र मेवाड़ी

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