पहाड़ में वसंत

Di2cMJiWwAE_p1p

दूर पहाड़ों में आ गया होगा वसंत। शायद इसीलिए कई दिनों से मन बैचेन है।

इन दिनों महान प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन याद आ रहे हैं। दुनिया उन्हें विकासवाद के जनक के रूप में याद करती है लेकिन अगर चिड़ियां उनकी बात समझ सकतीं तो वे उन्हें बताते कि वे उन्हें कितना प्यार करते थे। उनकी जिंदगी की तमाम बातों को वे लोगों को बताना चाहते थे। वे जानते थे कि समय आने पर प्रवास पर आने और घर लौटने के लिए वे कितना बैचेन हो जाती हैं। उन्होंने उनकी एक पुरखिन बत्तख पर अपना प्रयोग किया था। उसे पिंजरे में रख दिया। दाना-पानी देते रहे। सोचा, उसे प्रवास पर न जाने दें तो देखें क्या होता है? हर साल की तरह ऋतु बदली और प्रवास पर जाने के दिन आ गए। पिंजरे के भीतर पुरखिन बत्तख की बैचेनी बढ़ने लगी। वह उड़ने के लिए पंख फड़फड़ाती। पंख पिंजरे से टकराते। उड़ने की उस कोशिश में बत्तख घायल हो गई लेकिन फिर भी वह बाहर आकर उड़ने के लिए छटपटाती रही। आखिर डार्विन ने पिंजरा खोल दिया। बौराई सी बत्तख बाहर निकली और प्रवास की लंबी यात्रा पर निकल गई।

वसंत आने पर घर वापस लौटने के लिए भी उनका यही हाल हो जाता है। वसंत की  गुनगुनी गर्माहट महसूस करते ही प्रवासी पंछी दूर पहाड़ों में अपने घर-धोंसलों की ओर लौटने के लिए बैचेन हो जाते है। वसंत उनमें प्यार की उमंग भी भर देता है और वे निकल पड़ते हैं सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर अपने घर-घोंसलों की ओर। वे जानते हैं, पहाड़ की चोटियों, उनकी ढलानों और चैरस मैदानों पर बर्फ पिघलने लगी होगी। उसके नीचे सोई हुई घास और कीड़े-मकोड़े भी जाग उठे होंगे। वसंत ऋतु के स्वागत में हजारों-हजार रंग-बिरंगे फूल खिल गए होंगे। उनके रस-कलश भर गए होंगे। उन पर कीट-पतंगे मंडराने लगे होंगे। और, बर्फ से जमी नदियों और झील-तालाबों की बर्फ भी धूप की गर्माहट से गल गई होगी। सैकड़ों-हजारों मीलों दूर छूटे उनके घर-घोंसले उनका इंतजार कर रहे होंगे।

और यहां, सीमेंट-कंक्रीट के इस विशाल जंगल में हर साल मैं भी वसंत की आहट पाकर वही बैचेनी अनुभव करने लगता हूं, पिंजरे में बंद डार्विन की उसी बत्तख की तरह। लेकिन, जानता हूं, एक बार जो महानगर में इस सीमेंट-कंक्रीट के पिंजरे में फंस गया, बाल-बच्चों को पालते-पोसते वह सालों-साल इसी में फंसा रह जाता है। नौकरी की पगार से साल भर उसे भोजन मिलने लगता है और बच्चे भी पढ़-लिख कर किसी बेहतर नौकरी की तलाश में दूसरे शहरों और देश-विदेश की उड़ान भरने के लिए पंख तौलने लगते हैं।

बैचेेन हूं क्यों कि जानता हूं, दूर पहाड़ में वसंत आ गया होगा। नदी-घाटियों और पहाड़ों के पैताने माल-भाबर से लेकर ऊंचे-ऊंचे डाने-कांठियों तक वसंत की बहार छा गई होगी। कभी मैं भी अपने माता-पिता और जानवरों के बागुड़ के साथ सर्दी के मौसम में पहाड़ों से उतर कर अपने माल-भाबर के गांव में आ जाते थे और वसंत आने पर फिर पहाड़ की ओर लौट जाते थे।

पहाड़ लौटने पर बांज-बुरांश के जंगल से निकलते रास्ते में सर्दियों की बची-खुची सफेद बर्फ दिखाई देती थी। उसे हाथों में लेने पर हाथ कठीन (ठंडे) हो जाते थे। आसपास बुरांश खिल गए होते। भीड़ों-दीवारों पर यहां-वहां प्यूली के चटख पीले फूल खिले रहते।

Flower-of-Kachnar-tree-Kohlan-Morni-hillsअब फिर वसंत गया होगा। मन में लोक गीत के बोल गूंज रहे हैं- आई गैन ऋतु बौड़ी दांईं जसौ फैरो/फूली गैंन बण बीच ग्वीराल बुरांश! हां, पहाड़ में बुरांश के खिले लाल-लाल फूलों ने वनों में लाल रंग बिखेर दिया होगा। थोड़ा गर्म जगहों पर वसंत के स्वागत में श्वेत और गुलाबी क्वैराल (कचनार) खिल गए होंगे। खिले हुए कचनार को देखते ही रहने का मन करता था। बाद में वनस्पति विज्ञान पढ़ा तो पता लगा, वनस्पति विज्ञानी इसे बौहुनिया कहते हैं। जानते हैं क्यों? क्योंकि पौधों का नामकरण करने वाले स्वीडन के महान वनस्पति विज्ञानी कार्ल लिनियस ने भारत के अपने इस वृक्ष का नाम दो फ्रांसीसी भाइयों-जीन बौहीन और गस्पार्ड बौहीन के सम्मान में उनके नाम रखा था। वे दोनों भाई स्विट्जरलैंड के निवासी थे और उन्होंने सोलहवीं सदी में पेड़-पौधों की प्रजातियों को पहचानने तथा उनका वर्गीकरण करने की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया था। कार्ल लिनेयस ने पेड़-पौधों की द्विनाम पद्घति ईजाद की तो हमारे देश के कचनार यानी क्वैराल के वंश का नाम बौहिनिया रख दिया। कचनार के वंश को उनका नाम क्यों दिया होगा? क्योंकि उन दोनों भाइयों ने समर्पित रूप से पेड़-पौधों के वर्गीकरण पर काम किया। लिनेयस को लगा, जैसे कचनार के पत्ते के दो बराबर भाग होते हैं, वैसे ही उन दोनों बौहिनिया भाइयों ने भी समान रूप से काम किया। उसने कचनार के पत्ते को बौहिनिया भाइयों का प्रतीक मान लिया।

Red Silk-Cotton / Red Cotton Treeक्वैराल के साथ ही घाटियों, तराई-भाबर और पहाड़ों के गर्म इलाकों में यहां-वहां कंटीले सेमल के लाल-सिंदूरी फूल भी खिल गए होंगे। पंछियों को इस बात का पता लग गया होगा। इसलिए मैनाएं, तोते, बुलबुलें, कौवे और गौरेयां सेमल के कटोरीनुमा फूलों के रस कलशों का मधुपान करने आ रही होंगी। हमारा यह फूलदार वृक्ष भारत में ही जन्मा और संस्कृत भाषा में शाल्मलि कहलाया। लेकिन, वनस्पति विज्ञानी कभी इसे बोम्बैक्स मालाबारिकम, कभी साल्मलिया मालाबारिका तो कभी बाम्बैक्स सीबा कहते रहे। बाम्बैक्स इसके वंश का नाम और मालाबारिकम या सीबा इसकी प्रजाति का नाम है। लेकिन, बाम्बैक्स क्यों? क्योंकि, लिनेयस ने यह नाम ग्रीक मतलब यूनानी भाषा से लिया। और, यूनानी में बाम्बैक्स का अर्थ है- रेशम का कीड़ा। तो, समझे आप? रेशमी रुई के कारण कहलाया यह बाम्बैक्स। पहाड़ में हम इसे सिमल या सेमल कहते हैं। इसके बीजों पर लिपटी मुलायम, रेशमी रुई के कारण अंग्रेज इसे सिल्क कॉटन ट्री या कॉटन ट्री कहने लगे। वसंत की आहट सुन कर सेमल जनवरी माह के अंत या फरवरी की शुरूआत में अपनी पत्तियां गिरा कर शाखों की बांहें फैलाए जैसे किसी संन्यासी की तरह खड़ा हो जाता है। दिन-ब-दिन बढ़ते तापमान की गरमाहट से उसकी कलियां जाग जाती हैं और मांसल फूलों के रूप में खिल उठती हैं।

DSCN1114ओहो, वसंत आ गया है जान कर घाटियों और निचले पहाड़ों पर वनों में पांगरी के सुर्ख लाल फूल भी तो खिल गए होंगे! मुंबई के लोग इसे पंगरा तो बंगाल के लोग रक्त मंदार कहते हैं। उत्तराखंड का हमारा कवि-कथाकार मित्र अनिल कार्की इसे घाटियों का बुरोंज (बुरोंश) कहता है। वैसे पहाड़ में इसे लोग रणेल या रण्यो कहते हैं। अनिल इससे जुड़ी एक मजेदार लोककथा भी बताता है कि पहाड़ की चोटी (धुर) की ओर रहने वाला एक धुरियाल युवक घाटी में रहने वाले अपने बगड़िया दोस्त से मिलने गया बल। उसे देने के लिए धूरे से बुरोंज के लाल-लाल सुंदर फूल ले गया जिनमें पंखुड़ियां ही पंखुड़ियां थीं। वह सोचने लगा दोस्त तो बुरोंज के सुंदर लाल फूल लाएगा लेकिन मैं उसे क्या दूंगा? सोचा, सेमल के लाल फूल दे दूंगा, लेकिन उसमें तो बस पांच ही पंखुड़ियां होती हैं। क्या दूंगा, क्या दूंगा सोच कर उसी फिक्र में रणेल के पेड़ के नीचे बैठ गया। रणेल ने उससे पूछा तो उसने अपनी पूरी परेशानी उसे बता दी। तब रणेल ने उसकी मदद करने की बात सोची। अनिल कहता है, और लो! बर्र से उसमें टक्क लाल फूल खिल गए!

प्रकृति ने इस प्यारे पेड़ को भी सेमल की तरह सुरक्षा के लिए तेज कांटे दिए हैं। जब इसकी सोई हुई कलियां अंगुलियों जैसे टक्क लाल फूलों के रूप में खिल जाती हैं, तब पत्तियों की कलियां सोई रहती हैं। जैसे रणेल अपनी पुष्प कलियों से कहता हो कि प्रिय कलियो जागो, वसंत आ गया है। अपने फूलों की अनुपम छटा बिखेर दो। और, रणेल खिल जाता है। पर्णविहीन पौधों पर सुर्ख फूलों की यह बहार देखने वालों को सम्मोहित कर देती है। फूलों की बहार आ जाने के बाद धीरे से पत्तियों की सुप्त कलियां भी जाग जाती हैं और सुंदर, सजीली हरी-भरी, तिपतिया पत्तियों में बदल जाती हैं।

हां दोस्तो, पहाड़ों में वसंत आ गया होगा और बुरोंश, प्यूली, पलाश, क्वेराल, सिमल और रणेल के साथ ही वन में मेहल के पेड़ भी सफेद फूलों से लद गए होंगे।शकिना और आड़ू  के गुलाबी फूल खिल रहे होंगे। पहाड़ की ढलानों में ठौर-ठौर पर धौल के लाल फूलों की बहार आ गई होगी जिन पर मधुमक्खियां मंडरा रही होंगी। वहां वसंत की बहार में:

झपन्याली डाल्यों मा, घुघुती घुरैली

गैरी-गैरी मा, म्योलड़ी बोलली

ऊंचि-ऊंचि डांड्यों मा, कफू बासलो!

 

और, यहां….यहां सीमेंट-कंक्रीट के पिंजरे से मैं पहाड़ के वसंत का स्वप्न देख रहा हूं।

 

×××

(देवेंद्र मेवाड़ी)

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *