बढ़ती आलूदगी और हमारी जिम्मेदारी

 

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बढ़ती आलूदगी और हमारी ज़िम्मेदारी

आलूदगी में हमारा भला कोई क्या मुक़ाबला करेगा! हमारे कई शहर दुनिया में पिछले तमाम बरसों से आलूदगी का परचम फहरा रहे हैं। दिल्ली शहर ने तो गैस चैम्बर का खिताब हासिल कर लिया है। ऐसे माहौल में जब आकाशवाणी की उर्दू मजलिस से जनाब फासिहज़्ज़मान साहेब का फ़ोन आया तो बहुत खुशी हुई। खुशी इस बात की कि अपनी टॉक के ज़रिए बहुत लोगों तक आलूदगी के बारे में अपनी बात पहुंचा सकूँगा।

अपनी टॉक में मैंने कहा :

अल्लामा इकबाल ने भी क्या खूब कहा है- ‘सितारों से आगे जहां और भी हैं!’ साइंसदान भी यह तो मानते हैं कि जहां और भी हो सकते हैं सितारों से आगे, मगर जनाब सारी कायनात में हमारी सरज़मीं से ज्यादा खूबसूरत शायद ही कोई जहां होगा। हमारी यह सरजमीं तो सच मानिए, हमारे लिए परवरदिगार की एक बेशकीमती सौगात है। अगर हमारे आबा-ओ-अजदाद आज महज पांच सौ साल पहले से भी लौट कर आ सकते तो वे बताते हमें कि उन दिनों वाकई कितनी खूबसूरत थी हमारी यह सरज़मीं। नीचे पेड़ों, पहाड़ों, घाटियों, दलदल और रेगिस्तानों से सजी जमीन। पहाड़ों से बहते खूबसूरत दरिया और झरने। घने जंगलों में फिरते तरह-तरह के जानवर और यहां-वहां उड़ते चहचहाते, रंग-बिरंगे परिंदे।

पानी से लबालब भरे तालाब, ठाठें मारते समंदर। ऊपर साफ नीला आसमान और सांस लेने के लिए साफ-सुथरी हवा। मौसम बदलते, कभी फस्ले बहार आती तो कभी मौसमे बारां तो कभी मौसमे खजां। मौसमे सर्मा की सर्दी जिस्म को कंपा देती।

हां, अगर आते तो यही बताते हमारे पुरखे। सुन कर आज हमें शायद उनकी बातें किसी ख्वाब की तरह लगतीं।

सचमुच ख्वाब ही बन चुकी है, हमारी वह निराली सरजमी़ं। कहां गई वह साफ-सुथरी आबो-हवा, मां की तरह अपनी गोद में हमें, जानवरों और कीट-पतंगों को पालने वाली वह हमारी उपजाऊ जमीन, वे साफ पानी के दरिया और तालाब, वे समंदर। सारी तस्वीर बदल गई है सरजमी़ं का।

ऐसा क्यों हुआ? वह सरजमीं तो हमारी विरासत थी। पुश्त-दर-पुश्त वह विरासत आगे सौंपी जानी थी। लेकिन, महज पांच सौ साल में तबाही से इसकी तस्वीर इतनी ही बदल गई। बढ़ती आलूदगी से जमीन, आकाश और समंदरों में जहर घुल गया है। आलूदगी का आलम यह है कि आज न पीने का पानी साफ रहा, न हमारा भोजन और न हवा ही साफ रही। ज़मीन में जहर घुलने से हमारे अनाज, फल-फूल और सब्जियों में भी जहर घुल गया है। बारिश के पानी के साथ बह कर यह ज़हर नदी-तालाबों में भी घुलता गया और दरिया के पानी के साथ वह समंदरों में पहुंच गया। नतीजा यह कि आए दिन दरिया-तालाबों में बड़ी तादाद में मछलियां मर रही हैं। साग-सब्जियों और फलों में जहर पहुंचने से लोगों की तंदुरुस्ती पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। और तो और मां के दूध तक में यह जहर पहुंच चुका है। इसके अलावा सारी दुनिया में प्लास्टिक भी कहर ढा रहा है। 

इंसैक्टिसाइडों के इस जहर के बारे में समंदरी जानवरों पर काम करने वाली अमेरिका की एक साइंटिस्ट राशेल कार्सन ने बहुत पहले ही आगाह कर दिया था। उसने 1962 में एक किताब लिखी ‘साइलेंट स्प्रिंग’ और दुनिया को बताया कि इन जहरीले कैमिकल्स का असर पूरी कुदरत में फैल जाएगा और उसे जहरीला बना देगा। जाहिर था, पैस्टिसाइड और इंसैक्टिसाइड बनाने वाली दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इस बात पर बहुत एतराज जताया। उनका कहना था कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए इन कैमिकल्स को काम में लाना बहुत जरूरी है। मगर बहुत लोग खतरे को भांप गए और उन्हें लगा कि सचमुच कल ये जहरीले कैमिकल्स कहर ढा सकते हैं। उनकी आवाज बुलंद हुई और दुनिया भर में जहरीले कैमिकल्स के खिलाफ आवाज उठने लगी।

यह वह दौर था जब दुनिया में फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए इन कैमिकल्स और कैमिकल फर्टिलाइजर्स को काम में लाना जरूरी समझा जा रहा था। पैदावार बढ़ी भी और बौने गेहूं की किस्मों के साथ ही दूसरी नई फसलों की किस्मों से दुनिया भर में अनाजों के भंडार भरने लगे। कैमिकल्स के खिलाफ आवाज उठती रही लेकिन नई खेती के नाम पर साइंटिस्ट इनकी मुखालफत करते रहे। उसी दौर में ग्रीन रिवोल्यूशन हुआ और दुनिया के करोड़ों लोगों को भूख से छुटकारा दिलाने के लिए बौने गेहूं की किस्मों को ईजाद करने वाले एग्रीकल्चर साइंटिस्ट नार्मन बोरलाग को 1970 के अमन के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

हरित क्रांति के शोर में रासेल कार्सन की ‘साइलेंट स्प्रिंग’ से शुरू हुई मुहिम बंद नहीं हुई बल्कि दुनिया भर में फैल गई। लोग जहरीले कैमिकल्स के बारे में शिद्दत से सोचने लगे। और, धीरे-धीरे इनके जहर का असर दिखाई देने लगा। जहां-जहां खेती-बाड़ी में पैस्टिसाइड्स का इस्तेमाल हो रहा था वहां वक्त गुजरने के साथ जमीन की हालत बिगड़ने लगी। जहरीले कैमिकल्स ने फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगों को ही नहीं, जमीन में रहने वाले फायदेमंद कीड़े-मकोड़ों और बैक्टीरिया को भी खत्म कर दिया। नतीजा यह हुआ कि जहां पहले पैदावार बढ़ी थी, वहीं वह रूक गई या कम होने लगी। इसलिए सन् साठ और सत्तर के दौर के बाद जमीन की माली हालत को सुधारने की आवाज उठी। पैस्टिसाइड और कैमिकल फर्टिलाइजर्स के बदले गोबर की खाद, कंपोस्ट और हरी खाद जैसी रिवायती आर्गेनिक खादों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाने लगा। इसे आर्गेनिक खेती-बाड़ी का नाम दिया गया।

यह तो जमीन की आलूदगी का आलम था मगर जमीन के भीतर जमा पानी के खजाने और नदी-तालाबों का क्या किया जाए?

उनमें सिंचाई और बारिश के पानी से कैमिकल फर्टिलाइजर्स और पैस्टिसाइड का जहर पहुंच रहा था। इसलिए आगाह किया जाने लगा कि आर्गेनिक खादों का इस्तेमाल करके इस जहर से जमीन के भीतर के और दरिया-तालाबों के पानी को बचाया जा सकता है। मगर मुल्क के बड़े-बड़े दरियाओं के किनारे लगी चमड़ा साफ करने की फैक्ट्रियों और आलूदगी फैलाने वाली दूसरी यूनिटों का क्या किया जाए? इसके लिए रूल और कानून बनाए गए। उन पर सख्ती बरतने के लिए कहा जाता रहा। फिर भी, नदी-तालाबों के पानी में आलूदगी फैलती रही और आज भी उनके हालात खराब हैं। जहां तक समंदरों की बात है तो उनमें भी आलूदगी से किनारों पर रहने वाले समुद्री जानवरों की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इसके कारण समुद्री जानवरों की जान जा रही है। कई मुल्कों में समंदरों के किनारे दुनिया के सबसे बड़े जानवर ह्वेल भी मरी हुई पाई गई हैं। दिन-रात इस्तेमाल किया जाने वाला प्लास्टिक भी समंदरों तक पहुंच रहा है जो समंदर के जानवरों के लिए बेहद नुकसानदायक है। यह भी उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

यह तो रही बात जमीन और पानी की। कुदरत ने हमें सांस लेकर ज़िंदा रहने के लिए एक नायाब चीज दी है, वह है हवा। कुदरत ने हमें ऐसी हवा मुहैया कराई जिसमें हम बखूबी सांस ले सकें और हमारी सेहत बनी रहे। हमारे ज़िंदा रहने के लिए उसने हवा का जो मिक्स्चर बनाया उसमें 78 फीसदी नाइट्रोजन मिलाई, 21 फीसदी आक्सीजन, 0.9 फीसदी आर्गन और बहुत ही कम मिकदार में यानी महज 0.038 फीसदी कार्बन डाइआॅक्साइड। कुछ दूसरी गैसें और पानी की भाप भी बहुत कम मिकदार में मिलाईं। और, बस हमारी सांस का नुस्खा तैयार हो गया। हमारे पुरखे कुदरत की बनाई इसी साफ हवा में सांस लेते रहे। लेकिन, आदमी की फितरत! व्ह जंगलों को काटने लगा, उन्हें जला कर जमीन हथियाने लगा। उसका जरूरत से ज्यादा जमीन का लालच बढ़ता गया लिहाजा वह जमीन पर कब्जा करता चला गया। उसने जंगल काट-काट कर गांव बसाए, कस्बे बनाए, शहर बसाए और महानगरों में सीमेंट व कंक्रीट के घने जंगल खड़े कर दिए। शहरों-महानगरों में कल-कारखाने लगा दिए। वे कल-कारखाने कोयला खाकर दिन-रात आसमान में कार्बन डाइआक्साइड और दूसरी जहरीली गैसों का धुवां उगलने लगे।

हमने दौड़ती-भागती जिंदगी में रफ्तार बढ़ाने के लिए अपने शहरों में मोटरकारों की तादाद बढ़ा दी। एक-एक शहर में सड़कों पर लाखों कारें दौड़ने लगीं। वे भी पेट्रोल-डीजल का धुवां आसमान में उगलने लगीं। इस तरह कारों, मोटरगाड़ियों, कल-कारखानों, फैक्ट्रियों से लगातार जहरीला धुवां हवा में भरने लगा। लोग यह भूल गए कि हमारी दुनिया के गोले के चारों तरफ जो हवा है, वह एक बैलून की तरह है। उसमें कुदरत की दी हुई हवा भरी हुई है जिसमें हम सांस लेते हैं। अगर हम उसमें जहरीला धुवां भरेंगे तो वह धुवां सांस में हमारे फेफड़ों में पहुंचेगा और हमें बीमार बना देगा। यही हुआ, शहरों की हवा खराब हो गई और लोग बीमार पड़ने लगे।

आज आलूदगी का यह आलम है कि दुनिया के सबसे जहरीले शहरों में हमारे अपने मुल्क के दस से भी अधिक शहर शामिल हैं। मुल्क की राजधानी दिल्ली और कुछ दूसरे शहरों में आलूदगी से लोगों का दम घुटने लगा है। दिल्ली में तो तमाम लोग मुंह पर मास्क पहन कर बाहर निकल रहे हैं। मगर मास्क से भी भला कितना बचाव हो सकेगा? यहां आॅड-ईवन का भी एक्सपरिमेंट किया गया है जिसकी वजह से उस दौरान शहर की 30 लाख कारों की तादाद आधी रह जाती है। यानी, उन दिनों हवा में आधा ही जहरीला धुवां पहुंचता है।

पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली से लगे सूबों यानी हरियाणा और पंजाब में धान की पराली जलाने से फैले धुएं को भी दिल्ली में आलूदगी की बड़ी वजह माना गया है। यह बात सही है क्योंकि इस धुएं का एक-एक जर्रा जब आसमान में पहुंचता है तो कल-कारखानों और मोटरकारों से उठे जहरीले कैमिकल्स के जर्रे धुएं के जर्रों से जा मिलते हैं। इस तरह पराली के धुएं के जर्रे जहरीले कैमिकल्स के जर्रों को पनाह देते हैं और वे हवा में यहां-वहां फैल जाते हैं। सुबह-शाम के सर्द मौसम में जहरीला जर्रा-जर्रा नीचे झुक आता है और सांस में सीधे फेफड़ों में पहुंच जाता है। पहले तक सिर्फ पानी की बारीक बूंदों से कोहरा बनता था जिसे अंग्रेजी में फाॅग कहते हैं। लेकिन, जहरीले रसायनों के जर्रों से मिला कोहरा, कोहरा नहीं रह जाता है- वह स्माग कहलाता है। इसमें सांस लेना बहुत नुकसानदायक होता है।

तो, कहां गई वह उपजाऊ जमीन, साफ-सुथरा सेहतमंद पानी और जिंदगी देने वाली वह साफ हवा? हवा, पानी और जमीन को आलूदगी से किसने भर दिया? क्या जंगलों में घूमते जानवरों और चहचहाते परिंदों ने? या फिर दरिया-समंदरों में रहने वाली मछलियों ने? नहीं, ये सभी जानवर तो कुदरत की इस नायाब सरजमीं में अब भी जीने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। तो कौन है इस आलूदगी का जिम्मेदार? सच यह है कि यह करतूत हम इंसानों की है। हमने ही हवा, पानी और जमीन में जहर घोला है। आगे बढ़ने की बेतहाशा दौड़ में हम भूल गए कि यह सरजमीं हमारे पुरखों ने हमें सौंपी थी और हमें इसे अपनी आने वाली पुश्तों को सौपना है। अब भी वक्त है, हमें कुदरत के साथ रह कर फिर से अपनी सरजमीं को संवारना होगा।

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