विज्ञान सरल-सहज और रोचक भाषा में लिखा जाना चाहिए – देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी और डा. सुबोध महंती

देवेंद्र मेवाड़ी से वरिष्ठ विज्ञान लेखक डा. सुबोध महंती की बातचीत

सुबोध महंतीः मेवाड़ी जी, यह तो आपका हीरक जयंती वर्ष है, हार्दिक बधाई! आपने मई माह में अपने जीवन के पचहत्तर वर्ष पूरे किए और यह जानकर खुशी होती है कि आप पिछले चौवन वर्ष से विज्ञान लिख रहे हैं।

देवेंद्र मेवाड़ीः बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद महंती जी। असल में मेरा प्रमाण पत्र का जन्मदिन तो सात मार्च है लेकिन असली जन्मदिन सत्रह मई है। इसलिए हम मानते हैं कि मई में ही मैंने पचहत्तर वर्ष पूरे किए। हिंदी विज्ञान लेखन के वर्तमान सन्नाटे में आपने मुझे याद किया, इसके लिए तहेदिल से आपका आभार। हां मैं पिछले चौवन वर्षों से निरंतर विज्ञान लिख रहा हूं। मेरा लिखा विज्ञान का पहला लेख अप्रैल, 1965 में विज्ञान परिषद् प्रयाग की मासिक पत्रिका ‘विज्ञान’ में छपा था। मई, 1965 में ‘विज्ञान जगत’ में भी मेरे दो वैज्ञानिक लेख छपे।

सुबोध महंतीः नौकरियां बदलीं, शहर बदले लेकिन आपका विज्ञान लेखन नहीं रूका। यह बताइए कि आप के मन में हिंदी में विज्ञान लेखन का यह जुनून कैसे पैदा हुआ? आपको विज्ञान लेखन के लिए कौन-सी चीज प्रेरित करती रही?

देवेंद्र मेवाड़ीः जहां तक विज्ञान लेखन की धुन या जुनून की बात है तो मैं विज्ञान का विद्यार्थी था और हाईस्कूल-इंटर से ही साहित्य खूब पढ़ता था। विज्ञान की पढ़ाई से मुझे नई-नई रोचक बातों का पता लगा। तब मेरा मन उन बातों को अपने संगी-साथियों और अन्य लोगों को बताने के लिए मचलता था। मैं उन दिनों कहानियां लिखने लगा था तो मन हुआ कि विज्ञान की रोचक बातें भी लिखूं। बस, इसी ललक ने मुझे विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित कर दिया। तरह-तरह की नौकरी करने पर भी निरंतर विज्ञान लिखते रहना उसी ललक का फल है।

इस ललक को ‘विज्ञान जगत’ के संपादक प्रोफेसर आर. डी. विद्यार्थी ने और भी बढ़ा दिया। हुआ यह कि ‘विज्ञान जगत’ को मैंने दो लेख भेजे, ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’ और ‘शीत निष्क्रियता’। उनके साथ संपादक प्रोफेसर आर डी विद्यार्थी को पत्र भी लिखा था कि मैं हिंदी में विज्ञान के लेख लिखना चाहता हूं लेकिन उन्हें छापेगा कौन? तब उनका पत्र मिला कि ‘विज्ञान के लेख लिखते रहना, उन्हें मैं प्रकाशित करूंगा। और, यह याद रखना कि हो सकता है कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।’ उनके इस पत्र ने मेरे मन में विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। मैं उनके इन शब्दों को कभी नहीं भूला, न आगे भूलूंगा। यह लौ कुछ ऐसी जगी कि बस मैं विज्ञान लिखता गया और एक विज्ञान लेखक बनने का स्वप्न देखता रहा। मैंने अपने विज्ञान के लेखों का पहला संकलन उन्हीं को समर्पित किया है। नौकरियां बदलीं, नौकरी के कई तरह के तनाव झेले, तरह-तरह का काम किया लेकिन यह कभी नहीं भूला कि मुझे एक विज्ञान लेखक बनना है। इसी इच्छा शक्ति ने मुझे लगातार विज्ञान लिखते रहने की ताकत दी।

सुबोध महंतीः लगभग आधी सदी से विज्ञान लेखन के दौर में आप कई पड़ावों से गुजरे होंगे। आप तो उस दौर के चश्मदीद गवाह रहे हैं। इस बारे में कुछ बताइए?

देवेंद्र मेवाड़ीः आज की तुलना में उस दौर में लेखन और पत्र-पत्रिकाओं का परिदृश्य बिलकुल अलग था। तब पत्रिकाएं बहुत थीं और समाचारपत्र भी काफी पठनीय रविवारीय परिशिष्ट प्रकाशित किया करते थे। इसलिए पत्र-पत्रिकाओं में लिखने की गुंजाइश बहुत थी। बस, शर्त यह थी कि आप ऐसा लिखें जो उन पत्रिकाओं के स्तर का हो। यह इसलिए कि पत्र-पत्रिकाओं के संपादक तब स्वयं जाने-माने पत्रकार और लेखक होते थे। एक विशेष बात यह थी कि तब व्यावसायिक पत्रिकाएं विज्ञान भी बड़े मन से प्रकाशित करती थीं। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, रविवार, नवनीत और कादंबिनी जैसी सर्वाधिक पढ़ी जानी वाली सभी पत्रिकाएं विज्ञान प्रकाशित करती थीं। धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान में तो विज्ञान की लेखमालाएं भी छपती थीं। आप समझ सकते हैं कि तब लेखकों के लिए विज्ञान लिखने की कितनी संभावनाएं थीं।

पिछली सदी में सातवें-आठवें दशक के बाद धीरे-धीरे व्यावसायिक पत्रिकाएं बंद होने लगीं। आठवें दशक में टेलीविजन के आ जाने से लोगों का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो गया। उन्हें लगता था, वे टेलीविजन की आभासी दुनिया में विज्ञान देख कर बहुत कुछ सीख और समझ सकते हैं। कुछ सीखा और समझा भी लेकिन आप ही बताइए, फूलों को छुए बिना, बारिश में भीगे बिना और तितलियों के पीछे भागे बिना क्या इनका सही अहसास हो सकता है? खैर, व्यावसायिक संस्थानों ने पत्रिकाएं बंद कीं तो लिखने और छपने के अवसर कम होते गए। कई विज्ञान लेखक रेडियो, टेलीविजन जैसे इलैक्ट्रानिक मीडिया की ओर आकर्षित हुए और इन माध्यमों के लिए वार्ताएं तथा पटकथाएं तैयार करने लगे। परिदृश्य बदला लेकिन विज्ञान लेखन चलता रहा। मैं स्वयं समय के साथ चला और प्रिंट माध्यम के साथ ही इलैक्ट्रानिक माध्यमों के लिए भी लिखने लगा। 21 वीं सदी में इलैक्ट्रानिक मीडिया के अलावा डिजीटल यानी सोशल मीडिया जैसा एक और साधन सामने आ गया। आज के दौर में हिंदी के कई विज्ञान लेखक न केवल सोशल मीडिया पर निरंतर लिख रहे हैं बल्कि विज्ञान के ब्लाग और पोर्टल भी सफलतापूर्वक चला रहे हैं। एक बात और, पत्र-पत्रिकाओं की कमी और डिजीटल मीडिया के कारण कई लेखक पुस्तक लेखन की ओर भी अधिक ध्यान देने लगे हैं।

सुबोध महंतीः आश्चर्य यह है कि तब न इंटरनेट था, न फेसबुक, न ब्लाग और आपकी नौकरी भी विज्ञान लेखन जैसे विषय से नहीं जुड़ी थी। उस दौर में विज्ञान लिखने के लिए आपके पास विज्ञान की जानकारी के स्रोत क्या थे?

देवेंद्र मेवाड़ीः आप ठीक कह रहे हैं, इन चीजों की तो तब कल्पना भी नहीं कर सकते थे। हमारे पास तब केवल पत्र-पत्रिकाएं थीं और था रेडियो। केवल यही सूचना के माध्यम थे। विज्ञान की जानकारी के लिए तब हम पुस्तकालयों में बहुत जाते थे। मैं भी अपने आस-पास के पुस्तकालयों के साथ ही ब्रिटिश लाइब्रेरी और अमेरिकन लाइब्रेरी से भी पुस्तकें लेता था। पुस्तकालयों में बैठ कर देश-विदेश की पत्रिकाएं भी पढ़ी जाती थीं। अच्छे संदर्भ स्रोतों की तलाश में किताबों की दूकानों के चक्कर काटते थे और अपनी मनपसंद किताबें खरीद कर अपने संग्रह में शामिल करते थे। किताबें खूब पढ़ी जाती थीं ताकि विज्ञान की दुनिया में जो कुछ नया हो रहा है, उसकी ताजा जानकारी मिल सके। इसके अलावा रेडियो का भी सहारा था। मैं नियमित रूप से बीबीसी, वायस आफ अमेरिका और वायस आफ जर्मनी सुना करता था। मानव के चांद पर उतरने से पहले अपोलो-8 अंतरिक्षयान की रोमांचक यात्रा ने लोगों में चंद्र विजय की आस जगा दी थी। मैंने तब अपने देश के समाचारपत्रों के साथ ही कुछ बड़े विदेशी समाचारपत्रों की खबरें तथा संपादकीय पढ़े और लगातार बीबीसी तथा वायस आफ अमेरिका सुन कर नोट्स लेता रहा। उस जानकारी के आधार पर मैंने अपोलो-8 की रोमांचक यात्रा का एक रिपोर्ताज लिखा था।

सुबोध महंतीः आप अक्सर बताते हैं कि आपके लेखन को संपादकों ने बहुत प्रोत्साहित किया। यह प्रोत्साहन आपको किस तरह मिला?

देवेंद्र मेवाड़ीः यह बात सच है। आज वे संपादक याद आते हैं। वे ऐसे संपादक थे जो लेखक तैयार करते थे। जिस लेखक में भी संभावना दिखाई दी, उसे लेखन का अवसर देकर आगे बढ़ाते थे। मैं तो कहूंगा, कि जिस तरह माली बाग में पौधों को संवारता है, उसी तरह वे भी अपनी पत्रिका के माध्यम से विज्ञान लेखकों के लेखन को संवारते थे। मैंने पहली बार अपना एक वैज्ञानिक लेख नवनीत के मनीषी संपादक नारायणदत्त जी को भेजा। कुछ दिनों बाद ‘नवनीत’ से एक लिफाफा आया। मुझे लगा, मेरी रचना वापस आ गई है। लिफाफा खोल कर देखा तो उसमें मेरे लेख की संपादित प्रति के साथ ही नई टाइप की हुई प्रति भी रखी थी। साथ में नारायणदत्त जी ने सस्नेह लिखा था- ‘प्रिय भाई, मैंने यह लेख पढ़ कर संपादित तो कर दिया है लेकिन मुझ अविज्ञानी व्यक्ति से कहीं कोई गलती न हो गई हो। लेख को पढ़ कर लौटती डाक से वापस भेज देना।’ मैं संपादित लेख को पढ़ कर हैरान रह गया। उसमें मेरे लिखे लंबे वाक्य छोटे और सरल हो गए थे। व्याकरण की छिटपुट भूलें दूर कर दी गई थीं। मेरा वह लेख अब सरल, सुबोध भाषा में लिखा एक रोचक लेख बन गया था। इस तरह उन्होंने मुझे लेखन की दीक्षा दे दी। आप विश्वास करेंगे, धर्मयुग के संपादक डा. धर्मवीर भारती खास मौकों पर खुद पत्र लिख कर लेख मंगा लेते थे? विश्व में पहला परखनली शिशु पैदा हुआ तो डा. भारती का कार्ड मिला- ‘परखनली शिशु पैदा हो गया है। नवंबर अंक के लिए तुरंत लेख भेजें।’ इसी तरह साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक मनोहरश्याम जोशी लेख के लिए स्वयं फोन कर देते थे। एक बार उनका फोन आया- ‘दो अक्टूबर को साप्ताहिक हिंदुस्तान का गांधी जयंती विशेषांक प्रकाशित कर रहा हूं। उसके लिए वैज्ञानिक जेबीएस हाल्डेन पर लेख भेजो। उनकी कुछ किताबों के नाम भी नोट कर लो। इन्हें पुस्तकालय से लेकर पढ़ लेना।’ उन्होंने फोन पर ही प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेबीएस हाल्डेन की दो-तीन पुस्तकों का नाम लिखवाया। उस दौर के उन संपादकों के पास इतना समय होता था अपने लेखकों के लिए। सुप्रसिद्ध कवि और लेखक मंगलेश डबराल ने भी मेरे विज्ञान लेखन को बहुत प्रोत्साहित किया। जब मैं लखनऊ में था तब उन्होंने ‘अमृत प्रभात’ में मेरी कई रचनाएं प्रकाशित कीं। उसमें मैं बच्चों के लिए ‘विज्ञान वाटिका’ कालम में भी लेख लिखता था जिनमें मेरी बेटी मानसी के रेखांकन होते थे। ‘जनसत्ता’ तथा ‘सहारा समय’, दिल्ली में भी उन्होंने मेरे वैज्ञानिक लेख और विज्ञान कथाएं प्रकाशित कीं। भूख, गरीबी और प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए भी जिन वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी, उन पर लेखमाला लिखने के लिए भी उन्होंने प्रेरित किया।

सुबोध महंतीः क्या विज्ञान लेखन की राह पर आपको अपने समकालीन विज्ञान लेखकों और साहित्यकारों की भी मदद मिली? उनकी संगत का क्या आपके लेखन पर प्रभाव पड़ा? इसे इस तरह भी कहना चाहूंगा कि क्या समकालीन लेखकों से किसी तरह की कम्पटीशन की भावना से भी लिखने में आपकी सक्रियता बढ़ी?

देवेंद्र मेवाड़ीः सच कहूं तो महंती जी, मेरी लेखन यात्रा ‘एकला चलो रे’ की तर्ज पर चली है। लेकिन, यह भी सच है कि मेरे समकालीन साहित्यकारों और विज्ञान लेखकों के लेखन ने मुझे बहुत प्रेरित किया। वह इस तरह कि मैं निरंतर अपने समकालीन लेखकों की रचनाएं और उनकी पुस्तकें पढ़ता रहा जिससे मेरी रचनात्मक ऊर्जा बढ़ती रही। उनकी अच्छी रचनाएं पढ़ कर मैं सोचा करता था कि क्या मैं भी कभी इतना अच्छा लिख सकूंगा? इससे मुझे बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती थी। सन् साठ-सत्तर के दौर में गुणाकर मुले और रमेश दत्त शर्मा पत्रिकाओं में खूब विज्ञान लिख रहे थे। उनके लेखन में एक स्पष्ट अंतर था। गुणाकर मुले का लेखन बहुत गंभीर और विद्वतापूर्ण था तो रमेश दत्त शर्मा बहुत सरस और रोचक भाषा में लिखते थे। वहीं ‘दिनमान’ में रमेश वर्मा के विज्ञान लेखन की एक अलग पहचान थी। आपको एक बात बताऊं, एक बार मैं मनोहरश्याम जोशी से मिला। तब मैं नवोदित लेखक था। उन्होंने पूछा, क्या इन दिनों जो लोग विज्ञान लिख रहे हैं, उन्हें पढ़ते हो? मैंने कहा, जी हां। तब उन्होंने नाम लेकर कहा, “गुणाकर मुले, रमेशदत्त शर्मा और रमेश वर्मा को पढ़ा करो और देखो कि उनके लेखन में क्या अंतर है।” यह भी एक दीक्षा थी। मैं समकालीन साहित्यकारों की संगत में भी रहा और उनकी रचनाएं भी गंभीरता से पढ़ता रहा। भीष्म साहनी और शैलेश मटियानी से मुझे बहुत आत्मीयता मिली। उनकी संगत में लिखने का एक नया जज़्बा पैदा हुआ। जहां तक कम्पटीशन की बात है तो मेरे लेखन में किसी के साथ कभी कोई कम्पटीशन नहीं रहा। मैं तो अपनी राह पर वही ‘एकला चलो रे’ गुनगुनाता और लिखता हुआ अकेला ही चलता रहा हूं।

सुबोध महंतीः आप कहते हैं कि आपने लेखन की शुरूआत कहानियां लिखने से की। फिर विज्ञान लेखन की ओर रूझान कैसे बढ़ा?

देवेंद्र मेवाड़ीः आप ठीक कह रहे हैं, मैंने अपने लेखन की शुरूआत कहानियों से की। मेरी पहली कहानी आगरा से छपने वाली पत्रिका ‘युवक’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद मैंने अपने इंटर कालेज के बगल की एक छोटी सी धुंआती चाय की दूकान के मालिक पर दूसरी कहानी लिखी ‘खड़कदा’। यह कहानी उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क प्रभाग की साहित्यिक पत्रिका ‘त्रिपथगा’ में छपी। उसके बाद मेरी कई कहानियां ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘उत्कर्ष’ और ‘नई कहानियां’ आदि प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। उसके बाद मैं विज्ञान पढ़ता और लिखता गया, और आज भी चौवन वर्ष बाद यही कर रहा हूं।

सुबोध महंतीः अच्छा, एक बात बताइए, साइंस फिक्शन यानी विज्ञान कथाओं में आपकी रूचि कैसे जगी?

देवेंद्र मेवाड़ीः कहानियां लिखते हुए एक ऐसी घटना हुई कि मैंने निर्णय लिया- अब केवल विज्ञान पर लिखूंगा, फिर चाहे वे लेख हों या कहानियां। घटना कुछ इस तरह थी कि मैंने इलाहाबाद से शैलेश मटियानी जी के संपादन में छपने वाली पत्रिका ‘विकल्प’ के कहानी विशेषांक के लिए उनके कहने पर बड़ी मेहनत से एक लंबी कहानी लिखी और पत्रिका को भेज दी थी। वहां से मेरे परिचित सहायक संपादक साथी ने वह कहानी लौटाते हुए लिखा कि कोई और कहानी भेजें। तत्काल दूसरी कहानी लिखना संभव नहीं था। बाद में मटियानी जी मिले तो उन्होंने बताया कि उन्होंने कहानी लौटाने से मना किया था। मुझे आघात लगा। बहरहाल, मुझे लगा कि अब मुझे कुछ ऐसा लिखना चाहिए जो केवल मैं लिख सकता हूं और मैंने केवल विज्ञान लिखने का निर्णय ले लिया।

जब मैं नैनीताल में पढ़ रहा था तो मालरोड पर घूमते हुए एक दिन विज्ञान कथाकार यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ ने मुझे अपनी विज्ञान कथाओं के बारे में बताया। वे कहने लगे, आप विज्ञान के विद्यार्थी हैं और कहानियां लिखते हैं। आपको विज्ञान कथाएं भी लिखनीं चाहिए। उनकी बात मेरे मन में बैठ गई। मैंने तब दो विज्ञान कथाएं लिखीं: ‘प्रेतलीला’ और ‘शैवाल’। ‘प्रेतलीला’ त्रिपथगा में छपी और ‘शैवाल’ नैनीताल के साप्ताहिक ‘पर्वतीय’ में। नौकरी के लिए दिल्ली आया तो एक बार विज्ञान कथा लेखक रमेश वर्मा से भेंट हुई। वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि विज्ञान कथाएं लिखने में मेरी रूचि है। कहने लगे, आपको विज्ञान कथाएं लिखनीं चाहिए, इस क्षेत्र में बहुत संभावनाएं हैं। बाद में मैंने कुछ विज्ञान कथाएं पढ़ीं तो मुझे लगा कि विज्ञान कथाएं लिख कर मेरी भी कहानी लिखने की कल्पना साकार हो सकती है। यह सोच कर मैंने बहुत रोमांच अनुभव किया।

सन् सत्तर के मध्य में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की ओर से वाएजर-1 और वाएजर-2 अंतरिक्षयान अंतरिक्ष की अनंत यात्रा पर भेजे गए। उनमें प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक कार्ल सैगन के सुझाव पर ऐसा रेकार्ड रखा गया था जिसमें पृथ्वी की तमाम ध्वनियां और दृश्य थे। मकसद यह था कि अगर अनंत अंतरिक्ष में कभी कहीं किसी अन्य सभ्यता के बुद्धिमान जीवों को वह रेकार्ड मिले तो उसे प्ले करके वे पृथ्वी और मानव सभ्यता के बारे में जान सकें। मैं बहुत दिनों, महीनों बल्कि साल-डेढ़ साल तक दिन-रात यही सोचता रहा कि वह रेकार्ड किस तरह के जीवों को मिलेगा? वे कीट-पतंगों, पक्षियों या बंदरों जैसे भी तो हो सकते हैं। उनके लिए वह बेकार होगा। लेकिन, अगर वह सचमुच बुद्धिमान जीवों को मिल गया तो वे क्या करेंगे? और, अगर उस अनजान लोक में कोई सभ्यता भौतिक विकास के चरम पर पहुंच चुकी हो और वहां सब कुछ स्वचालित हो तो क्या होगा? बस, यहां मुझे विज्ञान कथा का वह बीज मिल गया जिसके आधार पर मैंने अपनी कल्पना से एक लंबी विज्ञान कथा लिखी- ‘सभ्यता की खोज’। वह विज्ञान कथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के 25 मार्च, 1979 अंक में भरपूर चित्रों के साथ लघु उपन्यासिका के रूप में प्रकाशित हुई। उस विज्ञान कथा को पाठकों ने बहुत पसंद किया और मुझे भी साइंस फिक्शन लिखने के लिए नया ब्रेक मिल गया। नब्बे के दशक में जब प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार डा. बाल फोंडके ‘विज्ञान प्रगति’ के संपादक बने तो उन्होंने विज्ञान कथाएं लिखने के लिए मुझे बहुत प्रोत्साहित किया। वे मेरी विज्ञान कथाएं पढ़ते भी थे और उन पर अपनी बेबाक राय देते थे। डा. बाल फोंडके के संपादन में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित भारतीय भाषा की विज्ञान कथाओं के संकलन ‘बीता हुआ भविष्य’ में भी मेरी कहानी संकलित हुई। उस दौर में मैंने कई विज्ञान कथाएं लिखी जो प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। मेरी उन कहानियों के दो संकलन प्रकाशित हुए- ‘भविष्य’ और ‘कोख’। बाद में मेरा एक और संकलन प्रकाशित हुआ ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’ जिसमें इन दोनों संकलनों की कहानियों के साथ ही मेरी नई विज्ञान कथाएं भी संकलित हैं।

सुबोध महंतीः आप और हम काफी समय से इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि विज्ञान और साहित्य के संबंध पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इस बारे में विचार गोष्ठियां आयोजित की जाएं, व्याख्यान दिए जाएं ताकि विज्ञान और साहित्य, इन दोनों क्षेत्रों से जुड़े लोग यह महसूस कर सकें कि साहित्य और विज्ञान की जुगलबंदी भी हो सकती है। इस बारे में आपका क्या कहना है?

देवेंद्र मेवाड़ीः महंती जी, इसके मेरे पास दो बड़े उदाहरण हैं- रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिंम चंद्र चटर्जी। मैंने पिछले साल आपके पास बंगला भाषा में छपी बंकिंम चंद्र चटर्जी की ‘बिज्ञान रहस्य’ और टैगोर की ‘ठाकुर बाड़ीर बिज्ञान’ पुस्तकें देखी थीं। यह जान कर मैं हैरान रह गया था कि इन दोनों प्रसिद्ध साहित्यकारों ने विज्ञान लेखन में भी कितना काम किया था। ‘विज्ञान रहस्य’ में बंकिंम चंद्र चटर्जी के वैज्ञानिक लेखों का संकलन किया गया है। टैगोर ने स्वयं विज्ञान की ‘विश्व परिचय’ पुस्तक लिखी और उनके परिवार के सभी लोग विज्ञान लेखन से जुड़े थे। स्वयं टैगोर ‘बंग दर्शन’ पत्रिका में विज्ञान के लेख लिखते थे।

असल में विश्व के कई प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने साहित्य में योगदान दिया है तो अनेक जाने-माने साहित्यकारों ने विज्ञान लेखन भी किया है। मैं विज्ञान और  साहित्य के इस संबंध के बारे में बहुत गंभीरता से सोचता रहा हूं और पिछले दिनों मैंने इस विषय पर आइसेक्ट यूनिवर्सिटी, मध्य प्रदेश और मुंबई विश्वविद्यालय के बिड़ला कालेज के साथ ही कुछ अन्य संस्थाओं में भी व्याख्यान दिए। मैं समझता हूं कि साहित्य और विज्ञान में एक अटूट रिश्ता है और यह भी कि आज हमारे जीवन में विज्ञान जितना दखल दे चुका है, उसके कारण आने वाले समय की कहानियां विज्ञान कथाएं ही होंगी। वे कहानियां मनुष्य के जीवन और समाज से जुड़ी तमाम समस्याओं पर बुनी जाएंगीं और उन में विज्ञान के दखल का गहरा प्रभाव दिखाई देगा। हिंदी में कुछ साहित्यकार और विज्ञान कथाकार ऐसी गंभीर कहानियां लिख रहे हैं। कथाकार-उपन्यासकार संजीव की ‘इंकाउंटर’ कहानी और ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ तथा ‘फांस’ उपन्यास हमारे जीवन में विज्ञान के प्रभाव को बड़ी शिद्दत से सामने रखते हैं। महुआ माजी का उपन्यास ‘मरंगगोड़ा नीलकंठ हुआ’ पाठकों को विकिरण की विभीषिका से रूबरू कराता है। बंगला और मराठी भाषा में तो विज्ञान के प्रभाव पर आधारित बेहतरीन कहानियां और उपन्यास लिखे ही गए हैं। अन्य भारतीय भाषाओं में भी विज्ञान कथाएं लिखी जा रही हैं।

सुबोध महंतीः क्या हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में विज्ञान को समुचित स्थान मिला है? हिंदी के साहित्यिकारों ने भी क्या इस दिशा में योगदान दिया है?

देवेंद्र मेवाड़ीः शुरूआत में तो हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों ने विज्ञान को भी काफी महत्व दिया और छापा। इसका उदाहरण है- हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’। इस पत्रिका का प्रकाशन सन् 1900 में शुरू हुआ और इसमें विज्ञान के लेख तथा कहानियां प्रकाशित होती थीं। केशव प्रसाद सिंह की विज्ञान कथा ‘चंद्रलोक की यात्रा’ सन् 1900 में इसी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद सन् 1908 में सत्यदेव परिव्राजक की कहानी ‘आश्चर्यजनक घंटी’ भी प्रकाशित हुई। ‘उसने कहा था’ जैसी कालजयी कहानी के लेखक चद्रधर शर्मा गुलेरी ने ‘सरस्वती’ में आंखों पर पांच लेखों की श्रृंखला लिखी थी। इसके अलावा श्याम सुंदर दास, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बनारसीदास चतुर्वेदी, हरिवंश राय बच्चन, बाबू गुलाबराय, राहुल सांकृत्यायन और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने भी विज्ञान पर लिखा। निराला ने तो बेहतर विज्ञान लेखन के लिए विज्ञान पत्रकार और पत्रकारिता पर ‘सुधा’ में मार्गदर्शक लेख भी लिखा। वरिष्ठ विज्ञान लेखक डा. शिवगोपाल मिश्र ने विज्ञान प्रसार के सहयोग से इस विषय पर एक शोधपूर्ण पुस्तक लिखी है- ‘विज्ञान लेखन के सौ वर्ष’ जिसे विज्ञान प्रसार ने प्रकाशित किया है।

पिछली सदी की शुरूआत से हिंदी की साहित्यिक और बहुपठित व्यावसायिक पत्रिकाओं में जिस तरह विज्ञान को प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा था, दुर्भाग्य से पिछली सदी के अंत की ओर इसमें कमी आई।

सुबोध महंतीः किसी भी भाषा के साहित्य में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। हमने विज्ञान प्रसार में माइकल फैराडे, डार्विन, जेबीएस हार्डेन और जार्ज गैमो जैसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक-विज्ञान संचारकों की पुस्तकों के अनुवाद कराए जिनका पाठकों ने काफी स्वागत किया। स्टीफन हाकिंग की पुस्तक ‘ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम’ और युवाल नोआह हरारी की ‘सेपिंयस’ का भी अनुवाद हुआ है। भारतीय भाषाओं में बंगला और मराठी भाषा में कई विज्ञान लेखकों की पुस्तकों का भी हिंदी में अनुवाद हुआ है। हाल ही में विज्ञान परिषद प्रयाग ने बंकिंम चंद्र चटर्जी की पुस्तक ‘विज्ञान रहस्य’ का भी अनुवाद प्रकाशित किया है।

मैं जानना चाहता हूं कि हिंदी में क्या अन्य भाषाओं के विज्ञान साहित्य का अनुवाद किया गया है?

देवेंद्र मेवाड़ीः हां, अनुवाद तो किया गया है लेकिन बहुत कम पुस्तकों का अनुवाद हुआ है। मराठी और अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक तथा वैज्ञानिक डा. जयंत विष्णु नार्लीकर के उपन्यासों और विज्ञान कथाओं का हिंदी में अनुवाद किया गया है। विज्ञान प्रसार ने भी उनकी अनूदित कहानियों का संकलन प्रकाशित किया है। साहित्य अकादमी से सम्मानित उनकी आत्मकथा ‘चार नगरांतले माझे विश्व’ का हिंदी अनुवाद हो चुका है। लक्ष्मण लौढे तथा चिंतामणि देशमुख के उपन्यास ‘देवांसि जिवें मारिले’ का अनुवाद ‘संभवामि युगे युगे’ भी मैंने पढ़ा है। इसी तरह सत्यजित रे की तेरह विज्ञान कथाओं का भी हिंदी अनुवाद हुआ है। लेकिन, कुल मिला कर यह बहुत कम है। भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनुवाद की बहुत गुंजाइश है। इस दिशा में काफी काम किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। मैंने भी अपनी लेखन यात्रा में कुछ पुस्तकों के अनुवाद किए हैं जैसे: मार्स बिकोंस इंडिया (मंगल बुला रहा है), स्टोरी आफ कैमिस्ट्री (कहानी रसायन विज्ञान की), कामन बर्ड्स आफ इंडिया (हमारे पक्षी), जींस एंड मींस (जीन और जीवन) तथा अन्य। इसके अलावा अमेरिकी दूतावास की पत्रिका ‘स्पैन’ के लिए एक सौ से अधिक लेखों का, ‘ड्रीम 2047’ तथा ‘विज्ञान प्रकाश’ के लिए भी अंग्रेजी से हिंदी के कई लेखों का अनुवाद किया है। मेरा मानना है कि सबसे अच्छा अनुवाद वह है जो अनुवाद न लगे। यानी, उसे पढ़ने पर ऐसा लगे जैसे वह मौलिक रूप से उसी भाषा में लिखा गया हो।

सुबोध महंतीः विज्ञान लेखन में लेखक पारिभाषिक शब्दों से जूझते रहते हैं। क्या आपको भी अपने दीर्घ लेखन काल में इस तरह पारिभाषिक शब्दों से जूझना पड़ा? इस बारे में आपके विचार जानना चाहूंगा।

देवेंद्र मेवाड़ीः आप तो जानते ही हैं कि विज्ञान की अपनी एक भाषा होती है। विज्ञान की तमाम गूढ़ बातें उसी भाषा में लिखी और पढ़ी जाती हैं। उस भाषा में विज्ञान के पारिभाषिक शब्द होते हैं और वह तकनीकी भाषा होती है। मेरा मानना है कि उस भाषा को वैज्ञानिक और विज्ञान के बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी ही समझते हैं। सवाल यह है कि विज्ञान की वह गूढ़ जानकारी आम लोगों को ऐसी भाषा में कैसे मिले जिसे वे आसानी से समझ सकें। मैं समझता हूं कि ऐसी समझने लायक भाषा रचने के लिए विज्ञान लेखक को विज्ञान की गूढ़ जानकारी को समझ कर आम लोगों की भाषा में बदलना होगा। यानी, विज्ञान लेखक वैज्ञानिको की भाषा में लिखी विज्ञान की उस जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए एक पुल का काम करता है। मेरा अनुभव यह है कि अंग्रेजी में उपलब्ध विज्ञान की जानकारी को उस भाषा और उसके पारिभाषिक शब्दों में समझ कर विज्ञान लेखक उसे सरल, सहज भाषा में बदल सकता है। इसलिए अपने लेखन के शुरूआती दौर में मैंने पारिभाषिक शब्दों का काफी प्रयोग किया लेकिन फिर उन्हें समझा कर सरल भाषा में ढालने लगा। इससे मेरी विज्ञान की भाषा सरल, सहज और रोचक बन गई। लेकिन, जहां तक वैज्ञानिक पुस्तकों के अनुवाद की बात है, उनमें पारिभाषिक शब्दों की आवश्यकता बनी रहती है। हिंदी में आज पारिभाषिक शब्दावली उपलब्ध है, जिसके आधार पर अच्छा वैज्ञानिक अनुवाद करना संभव है। हमारे दौर में तो विज्ञान की विविध शाखाओं की पारिभाषिक शब्दावलियां बन ही रही थीं।

सुबोध महंतीः आप अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की पहल पर उत्तराखंड के दूर-दराज इलाकों में शिक्षकों और विद्यार्थियों से मिले। गैर सरकारी संस्था प्रथम की ओर से भी आप राजस्थान के दूर-दराज गांवों में बच्चों से मिलने गए। शहर से दूर उन बच्चों में आपने विज्ञान को पढ़ने और विज्ञान की बातें जानने की कितनी ललक देखी?

देवेंद्र मेवाड़ीः  बहुत अधिक, बल्कि उनसे बातें करते समय मुझे लगता रहा कि शहर से दूर गांव के उन बच्चों के मन में आखिर कितने सारे सवाल भरे हुए हैं। वे लगातार सवाल पूछते थे और तमाम चीजों के बारे में जानना चाहते थे। जब मैं स्टोरीटेलिंग यानी किस्सागोई के जरिए उन्हें विज्ञान की कोई कहानी सुनाता था तो वे चकित होकर बड़े मन से सुनते रहते थे और बाद में कहते थे कि इस तरह विज्ञान कितना मजेदार लगता है! मैं विभिन्न राज्यों में अब तक करीब 40,000 से अधिक बच्चों को विज्ञान की ऐसी कहानियां सुना चुका हूं। पिछले दिनों मैंने मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाके के विद्यालयों में भी कहानियां सुनाईं। बच्चों की आंखों में चमक देख कर मुझे बार-बार उनके पास जाकर कहानियां सुनाने का मन करता है। इसलिए मैं उनके पास जाता रहता हूं।

सुबोध महंतीः बच्चों के साथ सीधा संवाद करने के लिए आपने एक केंद्रीय चरित्र ‘देवीदा’ गढ़़ा। आपको इसकी जरूरत क्यों हुई और यह विचार कैसे आया?

देवेंद्र मेवाड़ीः आपको देवीदा याद आ गए, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है। असल में सन् 1991 में ‘नवभारत टाइम्स’, दिल्ली की रविवार्ता के संपादक डा. गोविंद सिंह ने मुझे रविवार्ता में बच्चों के लिए विज्ञान लिखने को कहा। तब मैंने सोचा कि मैं बच्चों के लिए ये लेख कुछ अलग तरह से लिखूं। मन में विचार आया कि बच्चों को किसी केन्द्रीय चरित्र के मुंह से विज्ञान की बातें बताऊं। समस्या यह थी कि अगर मैं किसी वैज्ञानिक के मुंह से बच्चों को विज्ञान बताता तो वह चरित्र विज्ञान की भाषा बोलता। उस भाषा को समझने में बच्चों को कठिनाई होती। तभी यह सूझा कि अगर कोई ऐसा व्यक्ति हो जो खूब पढ़ता हो, पुस्तकालयों में जाता हो, प्रयोगशालाओं में भी जाता हो और वहां वैज्ञानिकों से बातें करता हो। इसके साथ ही वह इंटरनेट पर भी विज्ञान की जानकारी खोजता हो। और, सबसे बड़ी बात तो यह कि वह बच्चों का दोस्त हो और उनसे बच्चों की ही भाषा में बात करता हो। इसलिए वह चरित्र वैज्ञानिक नहीं बल्कि विज्ञान को समझने वाला एक आम व्यक्ति हो। यह विचार आते ही मैंने उसका नाम रखा ‘देवीदा’ और आठ-दस बच्चे गढ़ कर बच्चों के लिए पहला लेख लिखा, ‘हरे साथी’। इसमें मैंने मतलब देवीदा ने बच्चों को सुबह की सैर पर पर्यावरण की मजेदार बातें बताईं। उसके बाद कभी जुगनुओं की तो कभी प्रकाश की और दूसरे विषयों की बातें बताईं। नवंबर-दिसंबर 1992 में सौरमंडल की नई जानकारी देने के लिए जब मैंने ‘विज्ञान प्रगति’ में ‘सूरज के आंगन में’ लेखमाला लिखने का निश्चय किया तो लगा कि बच्चों के साथ देवीदा की बातचीत से मैं इस विषय को अच्छी तरह समझा सकूंगा। मैंने यही किया। बाद में मैंने देवीदा और बच्चों के चरित्र को लेकर कई रचनाएं लिखीं। मेरी बाल विज्ञान की पुस्तक ‘सौरमंडल की सैर’ और ‘विज्ञान बारहमासा’ इसी शैली में लिखी गई हैं।

सुबोध महंतीः आप विज्ञान के व्याख्यान देने के लिए भी तो देष के विभिन्न भागों में जाते रहते हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः जी हां, कई संस्थाएं व्याख्यान देने के लिए समय-समय पर बुलाती रहती हैं। अब तक मैं आई आई टी रूड़की, होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केंद्र (मुंबई), बिड़ला महाविद्यालय (मुंबई), आईसेक्ट विश्वविद्यालय (मध्य प्रदेश), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय, मेरठ विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (दिल्ली), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (दिल्ली), प्रकाशन विभाग (भारत सरकार), हरियाणा साहित्य अकादमी आदि अनेक संस्थाओं में विज्ञान और विज्ञान लेखन पर व्याख्यान दे चुका हूं। इसके अलावा नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया की ओर से विभिन्न प्रदेशों में आयोजित पुस्तक मेलों और विश्व पुस्तक मेले में भी बोलने का अवसर मिला है।

सुबोध महंतीः विज्ञान लेखन का एक दौर वह था जब आपने विज्ञान लिखना शुरू किया? एक दौर अब है, जब नई पीढ़ी के कई लेखक विज्ञान लिख रहे हैं। उस पुराने दौर को याद करते हुए क्या यह बता सकेंगे कि विज्ञान लेखन के इच्छुक युवा लोगों के लिए इस क्षेत्र में क्या-क्या अवसर हैं?

देवेंद्र मेवाड़ीः  आज तो अवसर ही अवसर हैं महंती जी, क्योंकि हमारे दौर में हमारे पास केवल प्रिंट मीडिया था जबकि आज इलैक्ट्रानिक मीडिया के साथ-साथ डिजीटल मीडिया भी मौजूद है। इंटरनेट के कारण दुनिया भर की जानकारी कीबोर्ड की कुंजी दबाते ही मिल सकती है। मुझे लगता है, आज तो केवल विज्ञान लिखने की प्रबल इच्छा होनी चाहिए, उसके छपने और प्रसारित होने की अपार संभावनाएं हैं। एक अच्छा विज्ञान लेखक आज कई संचार माध्यमों के लिए लिख सकता है। इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकता है। बस, शर्त यह है कि विज्ञान लेखक बहुश्रुत-बहुपठित होना चाहिए। वह खूब अध्ययन करे और विभिन्न शैलियों में विज्ञान लिखे।

सुबोध महंतीः क्या ऐसा नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखकों के बीच संपर्क और संवाद की काफी कमी है, जबकि आपसी संपर्क और एक-दूसरे के लेखन पर चर्चा करके लेखन में सक्रियता बढ़ सकती है?

देवेंद्र मेवाड़ीः निश्चित रूप से बढ़ सकती है। जितना ही अधिक आपस में संपर्क और संवाद होगा, उतना ही अधिक लिखने के लिए प्रेरणा मिलेगी। अपनी दीर्घ लेखन यात्रा में मैंने यह बहुत शिद्दत से महसूस किया है। आज भी अगर समकालीन विज्ञान लेखक अक्सर मिल-जुल कर विज्ञान लेखन के बारे में चर्चा करें और एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ें तो विज्ञान लेखन अधिक होगा और उसका स्तर भी बढ़ेगा।

डा. सुबोध मंहती

पूर्व वैज्ञानिक ‘जी’ एवं मानद निदेशक, विज्ञान प्रसार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार

निवास: डी-410, क्रिसेंट अपार्टमेंट्स, सेक्टर-18 ए, द्वारका, नई दिल्ली-110078

 

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