कैसी हो किसान भारती

 

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याद करता रहता हूं मैं तुम्हें प्रिय ‘किसान भारती’ और दुआ भी मांगता करता हूं कि तुम्हें खूब लंबी उम्र मिले। तुम्हें तो याद भी नहीं होगा कि कैसे थे, तुम्हारे बचपन के दिन। याद होगा भी कैसे, पचास साल पहले की जो बात है। पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय तब खुद नौ साल का था। वह देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय था और उसे खेती-किसानी में नई राहें बनानी थीं। किसानों को नई वैज्ञानिक खेती की बातें बतानी थीं। लेकिन, ये बातें किसानों तक उनकी भाषा में कैसे पहुंचाई जाएं? तब कुलपति डॉ. ध्यानपाल सिंह ने तय किया था कि किसानों के लिए हिंदी में एक मासिक पत्रिका प्रकाशित की जाए। जानती हो, उन्होंने तुम्हारे पहले अंक में लिखा था, ‘यह स्पष्ट है कि अगर हमारे किसान नवीनतम टैक्नोलॉजी का लाभ उठाना चाहते हैं और अनुसंधानों का फल पाना चाहते हैं तो उन्हें अनुसंधान केन्द्रों से अटूट सम्पर्क बनाए रखना होगा ताकि सारी दुनिया में हो रही कृषि संबंधी खोजों की उन्हें खबर लगती रहे। ‘किसान भारती’ अनुसंधान केंद्रों और किसानों के बीच की खाई पाटने का काम कर सकती है।’ 

तुम्हारे जन्म की जिम्मेदारी अनुवाद तथा प्रकाशन निदेशालय को सौंपी गई। प्रधान संपादक बने निदेशक, प्रोफेसर हरिदत्त और संपादक जाने-माने विज्ञान लेखक रमेश दत्त शर्मा। नाम रखा गया ‘किसान भारती’ और लक्ष्य ‘अन्नं बहुकुर्वीत तद्व्रतम’ यानी अन्न की पैदावार बढ़े यही हमारा लक्ष्य है।  2 अक्टूबर, 1969 को गांधी जयंती के दिन तुम्हारा जन्म हो गया।

बहुत कठिन दिन थे वे ‘किसान भारती’। आज तो तुम सोच भी नहीं सकती कि तब तुम्हारा एक-एक अक्षर और मात्राएं उंगलियों से उठा कर कंपोजिटर तुम्हारे लेखों को कंपोज किया करते थे। लगता था जैसे उनकी अंगुलियों में आंखें हों। सीसे के बने उन अक्षरों यानी फोंट को ट्रे में मजबूत सूती धागे से बांध कर वे गैली बनाते थे। उनके गैली प्रूफ निकाल कर देते थे। फोटो और रेखाचित्रों के विशेष फोटो तकनीक से जिंक प्लेट पर फोटो उतारे जाते थे। वे उल्टे होते थे ताकि प्रिंट करने पर फोटो सीधा छपे। फिर जिंक प्लेट को काट कर, माउंट करके ब्लाक बना लिया जाता था। वह ठीक गेली के एक कालम या डबल कालम की नाप का होता ताकि मैटर के बीच में उसे फिट करके पेज के मैटर को कसा जा सके। वह कसा हुआ पेज फर्मे में कसा जाता था और तब प्रिंटिंग मशीन में उससे छपाई की जाती थी। तुम्हारा जन्म इसी विधि से हुआ। छपाई का यह सारा काम विश्वविद्यालय के प्रिंटिंग प्रेस में ही किया जाता था।

काफी समय तक प्रिंटिंग की इसी विधि से तुम छपती रहीं। उसके बाद एक दिन सुना, प्रेस में ऑटोमेटिक प्रिंटिंग मशीन आ गई। कहते थे, वह सवा लाख रूपए की मशीन है। उसमें कंपोजिटर अपनी केबिन में बैठ कर पांडुलिपि के मैटर को टाइप करता जाता था और बगल की केबिन में पिघले हुए सीसे के अक्षर ढलते जाते थे। वे कालम की लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से लाइन-दर-लाइन सेट होते जाते। उस मैटर के पेजों को कस कर फर्मे में जमा दिया जाता और प्रिंटिंग कर ली जाती।

उन दिनों हम वैज्ञानिकों, शिक्षकों के पास जा-जा कर उनसे किसानों के लिए सरल भाषा में लेख लिखने के लिए अनुरोध करते थे। हम यानी मैं और मेरा साथी प्रमोद जोशी। वैज्ञानिक बड़े मन से तुम्हारे लिए लिखते थे। वे ऐसे वैज्ञानिक और शिक्षक थे जिन्होंने बाद में दुनिया के अनेक देशों में ऊंचे पदों पर जाकर पंतनगर का नाम रौशन किया। जो वैज्ञानिक तुम्हारे लिए लिखते थे उनमें से कुछ नाम बताऊं तुम्हें? डॉ. जितेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव, डॉ. वाई. एल. नेने, डॉ. मोहन चंद्र सक्सेना, डॉ. तेज बहादुर सिंह, डॉ. ब्रजनंदन प्रसाद घिल्डियाल, डॉ. संतराम, और कई अन्य वैज्ञानिक। वैज्ञानिकों, शिक्षकों की कलम जब लेख लिख देती थी तो उसके बाद मैं उन्हें टाइपराइटर पर टाइप करवाता था, फिर उनकी कापी एडिटिंग करता और करैक्शन कराता। उसके बाद कापी फाइनल करके पांडुलिपि तैयार करता और उसमें प्रिंटिंग के लिए निर्देश देता था। साथ ही, संचार केंद्र के किसी कलाकार साथी से कवर डिजाइन बनवाता। फोटो सैक्शन से ब्लाक बनाने के लिए फोटो चुनता। फिर कवर डिजाइन, फोटो और रेखाचित्रों के पीछे आकार के निर्देश देकर प्रिंटिंग प्रेस को भेजता। प्रेस से मैटर और चित्रों के प्रूफ मिलते तो उन्हें पढ़ कर करैक्शन लगाता। प्रेस उन करैक्शंस को ठीक करता और दुबारा प्रूफ भेजता। मैटर और चित्रों के प्रूफ काट कर तुम्हारी डमी बनाता। वह डमी फाइनल प्रिंटिंग के लिए भेज देता।

और, एक दिन तुम छप कर हंसती-मुस्कराती मेरे पास आ जाती। तुम्हारी बाकी प्रतियां व्यवसाय सेक्शन में भेज दी जातीं। वहां से उन्हें विभिन्न प्रदेशों के कई हजार ग्राहक किसान भाईयों को भेज दिया जाता। उन दिनों नेपाल के कई किसान भाई भी तुम्हें मंगवाते थे। पता है, मैंने तुम्हारे जन्म की यह पूरी कहानी यानी लेख लिखने से लेकर तुम्हारे छपने तक की कहानी का एक-एक चरण अपनी केबिन की दीवार पर नमूनों के साथ प्रदर्शित की हुई थी। उसके ऊपर लिखा था- ‘किसान भारती के जन्म की कहानी’। जो भी मेरे केबिन में आता, वह तुम्हारे जन्म की कहानी को पढ़ता और देखता। तब पता लगता था कि तुम्हारा जन्म कैसे होता है।

जब मुझे तुम्हारी पूरी जिम्मेदारी दे दी गई तो मैं संपादक के रूप में तुम्हें लेकर संचार केन्द्र में आ गया था।  वहां जाने-माने संचार विशेषज्ञ और सह निदेशक डा. अब्दुल वहीद खान प्रधान संपादक बने। संचार विषय के ही होने के कारण वे पत्रिका की बेहतरी के लिए मेरा खूब उत्साह बढ़ाते थे। मैं तब जानकारी को कभी लेख के रूप में छापता था, कभी इंटरव्यू और परिचर्चा के तो कभी जीवनी और आत्मकथा के रूप में। किसी विषय पर विशेष जानकारी देने के लिए विशेषांक तैयार करता था। किसानों के प्रश्नों के उत्तर ‘प्रश्न पिटारी’ में तो स्वादिष्ट व्यंजनों की बात ‘ज्योनार’ में की जाती थी। ‘कृषि वाणी’ में खेती के नए-नए समाचार, हर माह ‘अंगना फूली कचनार’ में बागवानी और ‘खेतों में अगले माह’ में खेती के कामों की जानकारी देता था। अपने साथी तीर्थराज मिश्र से तराई क्षेत्र के तमाम प्रगतिशील किसानों के इंटरव्यू लेकर छापता था ताकि उनकी सफलता कथाएं पढ़ कर बाकी किसानों को भी प्रेरणा मिले।

IMAG1370 blogकिसान भाई तुम्हें बहुत स्नेह देते थे। कृषक चर्चा मंडलों से आए दिन तुम्हारे नाम चिट्ठियां भेजा करते थे। किसान मेले के दौरान कई किसान मुझसे मिलने मेरे केबिन में आ जाते थे और तुम्हारे बारे में पूछा करते थे, तुम्हारा हाल-चाल जानना चाहते थे। एक बार इसी तरह किसान मेले के दौरान इंद्रासन मिलने आ गए। मैं चौंका। पूछा, इंद्रासन तो यहां धान होता है? वे बोले, मैं वही हूं! धान की वह किस्म मैंने ही तैयार की है। किसान भाइयों ने खुश होकर मेरे नाम पर उस किस्म का नाम ‘इंद्रासन’ रख दिया है। मैंने उनके इस काम के बारे में एक लेख छापा। पता है, आगे चल कर उनके इस काम के लिए उन्हें ‘नेशनल इन्नोवेशन फाउंडेशन’ ने सम्मानित किया। राष्ट्रपति ए.पी. जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें यह सम्मान दिया। उस मौके पर तुम्हें भी याद किया गया कि सबसे पहले इंद्रासन की कहानी लोगों को ‘किसान भारती’ ने सुनाई।

इसी तरह जब लैंटाना बग पर लोक वैज्ञानिक चंद्रशेखर लोहुमी के शोध कार्य को देख कर आई सी ए आर तथा कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें सम्मानित किया तो लोगों को पता लगा कि उनकी यह कहानी भी तुम्हीं ने सबसे पहले सुनाई थी। याद है, तुम्हारे कई अंकों में मैंने वह कहानी लिखी थी?

IMAG1367 blogऔर हां, तुम्हें मैं यह बात जरूर याद दिलाना चाहता हूं कि 1977 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने दिल्ली के प्रगति मैदान में देश भर के कृषि प्रकाशनों-पत्रिकाओं की एक प्रतियोगिता आयोजित की थी। उसमें तुम्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तुम तो तेरह साल तक मेरे हाथों से पली-बढ़ी हो ‘किसान भारती’। कितना प्यार करता था मैं तुमसे, तभी तो तुम बार-बार याद आती रहती हो।

ये तो पचास साल पुरानी बातें हैं ‘किसान भारती’। क्या-क्या याद करूं? वे दिन अब भी याद आते हैं। अरे हां, एक बात और बताता हूं। जिस दिन कुलपति विश्वविद्यालय से विदा हुए, उन्होंने मुझे अपने आफिस में बुलाया और कहा, “आप जिस लगन और मेहनत से ‘किसान भारती’ निकाल रहे हैं, उसके लिए आपको बधाई देता हूं। आपने इसका स्तर काफी बढ़ा दिया है। मैं आपको आशीर्वाद देता हूं कि आपका भविष्य बहुत उज्जवल होगा।” उनका आशीर्वाद आज भी मेरे साथ है। और, तुम्हारे लिए मैं कामना करता हूं कि तुम दीर्घजीवी बनो, किसानों तक खेती-किसानी की नई-नई जानकारी पहुंचाती रहो और अपने इस लक्ष्य की ओर लगातार आगे बढ़ती रहो- ‘अन्नं बहुकुर्वीत तद्व्रतम’।

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