पहाड़ में छह दिन

Untitled collage11

अगर कोई जुझारू लड़की घर में तीन-तीन दारुण त्रासदियां सह कर भी दो नन्हे बच्चों का हाथ पकड़ कर, पति भवानी शंकर थपलियाल के मासिक ‘रीजनल रिपोर्टर’ पत्रिका निकालने के स्वप्न को साकार करने के लिए कमर कस कर खड़ी हो जाए और पत्रिका के दस साल पूरे हो जाने के बाद अपने दम-खम से स्कूली बच्चों के लिए शहर में बाल मेला आयोजित करने का निश्चय करके आपको फोन करे कि ताऊ जी आपको बाल मेले में आना ही है, तो बताइए, आप क्या करेंगे? जाएंगे ना?

मैंने भी यहीं किया। श्रीनगर, गढ़वाल से उस हिम्मती लड़की गंगा असनोरा का फोन आया और मैंने फौरन कह दिया, “मैं जरूर आऊंगा गंगा, मेहमान की तरह नहीं, तुम्हारी टीम के ही एक सदस्य की तरह।” इसके बाद रेल का आरक्षण करा लिया। श्रीनगर, गढ़वाल की यात्रा थोड़ी लंबी है इसलिए तय किया कि एक रात देहरादून में रहूंगा और अगली सुबह श्रीनगर को चल दूंगा।

गंगा यहां-वहां भाग-भाग कर अपनी टीम के साथियों के साथ बाल मेले के इंतजाम में जुट गई। पौड़ी से उनकी मासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक और पत्रकार ललित मोहन कोठियाल के फोन आते रहे कि क्या-क्या इंतजाम हो गए? वे मेरे भी मित्र थे और मेले में मेरे आने की बात सुन कर, पता लगा बहुत खुश हुए थे। लेकिन, नियति ने शायद अभी गंगा की एक परीक्षा और लेनी थी। अक्टूबर 2018 में अचानक वज्रपात हुआ। बिलकुल ठीक-ठाक और चलते-फिरते ललित मोहन कोठियाल चल बसे। सभी साथियो के लिए यह बहुत बड़ा आघात था। फिर भी उन्होंने निश्चय किया कि बाल मेला तो लगाना ही है। पत्रिका के संस्थापक-संपादक भवानी शंकर थपलियाल जी का सपना था कि पत्रिका के दस साल पूरे हो जाने पर एक बाल मेला लगाएंगे। तय किया गया कि उसे ललित मोहन कोठियाल जी के जन्मदिन 10 अप्रैल को आयोजित किया जाए। फिर तैयारियां शुरू हुईं लेकिन उन्हीं तारीखों में उत्तराखंड में चुनाव सिर पर आ गया। बाल मेले की तारीख फिर आगे बढ़ानी पड़ी और एक बार फिर पक्का निश्चय किया गया कि अब 24 मई को श्रीनगर, गढ़वाल में बाल मेले का आयोजन किया जाए।

20190522_183509मैंने फिर रेल आरक्षण कराया और 22 मई को दिन में देहरादून पहुंच गया। गंगा ने वहां बीजापुर राजकीय अतिथि गृह में रहने की व्यवस्था करवा दी थी। स्टेशन पर जीवन सिंह जी लेने आए और उन्होंने मुझे बीजापुर अतिथि गृह के कमरे में पहुंचा दिया। एकाध घंटा उनके साथ पहाड़ की बातें कीं। उनके जाने के बाद थोड़ा विश्राम करके उठा तो पश्चिम की ओर खुलने वाली खिड़कियों से देखा कि हरे-भरे, ऊंचे पेड़ों के पार क्षितिज की ओर उतरते सूरज ने सुबह आने का वायदा करके शब्बाखैर कहा और अस्त हो गया। एकांत में बहुत दिनों बाद मेरी खुद से मुलाकात हुई थी इसलिए काफी देर तक अपने आप से बातें करता रहा। फिर रात का खाना खाकर, मन में पहाड़ों के सपने संजो कर सो गया।

सुबह सूरज निकला। पेड़ों के बीच से झांकते सूरज से कुछ देर बातें कीं और श्रीनगर जाने के लिए तैयार हो गया। गंगा ने देहरादून से श्रीनगर तक जाने के लिए कार और सारथी की व्यवस्था की थी। सारथी जीतेंद्र सुबह आठ बजे कार लेकर आया और हम मसूरी के किनारे-किनारे पहाड़ों से होते हुए श्रीनगर की ओर निकले। मैंने उससे स्थानीय पेड़-पौधों और पक्षियों के बारे में पूछना शुरू किया तो पता लगा कि उसे अधिक मालूम नहीं है क्योंकि वह मूल रूप से गुड़गांव, हरियाणा के पास के किसी गांव का निवासी है। इसलिए पेड़ों, पहाड़ों को देखते हुए धनौल्टी, कानाताल से होते हुए श्रीनगर की ओर चलते रहे। सारथी शायद चाय का शौकीन नहीं था, इसलिए ‘रुक कर कहीं चाय पीएंगे’ कहने पर भी वह लगातार चलता रहा। आखिर उसने टिहरी बांध से थोड़ा पहले एक छोटे-से ढाबे पर गाड़ी रोकी और वहां हम दोनों ने नमकीन के साथ चाय पी। वहां से चले तो उसने श्रीनगर पहुंच कर ही दम लिया। शहर में प्रवेश करने पर गंगा को फोन किया तो वह अगवानी करने के लिए अपनी स्कूटी में वहां आ गई। उसने स्कूटी के पीछे-पीछे आने का इशारा किया और थोड़ा चढ़ाई पार करके हमें लोक निर्माण विभाग के अतिथि गृह में पहुंचा दिया।

20190524_162938श्रीनगर शहर से थोड़ा ऊंचाई पर होने के कारण वहां से अलकनंदा नदी और शहर का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। मेरे कमरे के ठीक बाहर आम का बहुत ऊंचा पेड़ था जिसने अपने पड़ोसी सुरई के पेड़ से टहनियों की बांहें मिलाई हुईं थीं। आसपास भी कई हरे-भरे पेड़ थे। अतिथि गृह के केयरटेकर डिमरी जी जैसे प्राचीनकाल से वर्तमान काल में आए हुए थे। पता लगा, वे पांच दिन बाद रिटायर होने वाले हैं। बगल के बरामदे में कुर्सी में बैठ कर वे जैसे चुपचाप भविष्य को देख रहे थे। वह शांत-एकांत कमरा अब मेरा रैनबसेरा था।

“रात को आपने घर का बना खाना खाना है, आठ-साढ़े आठ बजे तक जितेंद्र दे जाएंगा,” कह कर गंगा चली गई। मैं शाम के धुंधलके में आम के चबूतरे पर आकर बहुत देर तक बैठा रहा। अच्छी हवा चल रही थी। कुछ दूर आसपास की महिलाएं आकर सांयकालीन गप-शप में व्यस्त हो गईं और बच्चे खेलने लगे। लोहे का गेट खुला पाकर दो-एक गाएं भी चुपचाप क्यारियों में चरते हुए किनारे की ओर चली गईं। अलकनंदा घाटी में पक्षी घरों को लौट रहे थे। अंधेरा घिर आने पर महिलाएं और बच्चे चले गए। पक्षियों की आवाजें भी बंद हो गईं। वे शायद आसपास के पेड़ों पर रात्रि विश्राम करने लगी थीं। तभी बिजली की रोशनी से अलकनंदा घाटी जगमगाने लगी। अतिथि गृह के ठीक सामने, नीचे घाटी में अलकनंदा के किनारे पर बने बिजली घर के बाहर कतार में कई रोशनियां तेज चमकने लगीं। कमरे में गया ही था कि सारथी जीतेंद्र एक बड़े टिफिन में घर से खाना ले आया। खाना खाने के बाद वह बर्तन लेकर लौट गया। अब फिर मैं था और मेरा एकांत। काफी देर खुद से बातें करता रहा। फिर न जाने कब नींद आ गईं।

सुबह बुलबुल ने उठाया। पांच बजे के आसपास वह जोर-जोर से ‘पी…पिडगुल! पी…पिडगुल!’ बोलने लगी।

मैंने अपने मिनी ट्रेवल किट में से केटल निकाल कर पानी गर्म किया और निंबू पानी पिया। बाद में एक प्याली गर्मा-गर्म रेडीमेड चाय बनाई और उसे लेकर आम के चबूतरे पर आकर धीरे-धीरे पीता रहा। वह चिड़ियों की हलचल का समय था। दो बुलबुलें तो बोल ही रही थीं, एक पेड़ की ऊंची शाख पर ओरिएंटल मैगपाइ रोबिन भी आकर मधुर आवाज में गाने लगी। सुबह की उस शीतल हवा में कुछ अबाबीलें भी हवा में गोते लगा रही थीं। तभी सामने दीवार पर एक सतभैया आई और शायद उसका इशारा पाकर उसके पीछे-पीछे दो-तीन सतभैया और आ गईं। वे क्यारियों में यहां-वहां भोजन खोजती हुई आगे बढ़ती गईं। घाटी में कहीं दूर से आवाज आ रही थी- न्याहो! न्याहो! न्याहो! शायद पपीहा बोल रहा था।

20190524_100559आज बाल मेले में जाना था। मैं नहा-धोकर तैयार हुआ ही था कि जीतेंद्र घर से चाय और दलिया लेकर आ गया। उसके जाते ही वरिष्ठ वैज्ञानिक और साहित्यकार डा. अरुण कुकसाल और सीताराम बहुगुणा जी मिलने आ गए। उनसे विज्ञान लेखन, साहित्य, पहाड़ की यात्राओं और प्रकृति के बारे में बहुत सारी बातें हुईं। इन तमाम विषयों पर उनका गहरा अध्ययन है। वे निरंतर लिखते और यात्राओं पर जाते रहते हैं। समय हो रहा था इसलिए हम बाल मेले में भाग लेने के लिए राजकीय बालिका इंटर कालेज की ओर चले। नीचे उतरते हुए लगातार बातें करते रहे। कालेज में पहुंचने से पहले श्रीनगर की एक समृद्ध किताबों की दूकान में ट्रांस मीडिया के भट्ट जी से भेंट हुई। वे पुस्तकों के पारखी हैं और उनके पास विभिन्न विषयों की चुनी हुई पुस्तकें मौजूद थीं। कांच के शो-केस में सजी वर्ष 2014 की नोबेल पुरस्कार विजेता पाट्रिक मोदियानो की पुस्तक ‘गुमनामी से परे’ देख कर बहुत खुशी हुई। तीन दिन पहले ही साथी अनवर जमाल और मोनिका सिंह घर आए थे। इस पुस्तक का अनुवाद मोनिका सिंह ने ही किया है। उन्होंने उस दिन इस पुस्तक की एक प्रति मुझे भेंट की थी। वहीं पता लगा कि भट्ट जी डा. अरुण कुकसाल के यात्रा संस्मरणों की भी एक पुस्तक प्रकाशित कर रहे हैं।

60826774_1929386327167618_3749937333412036608_n11राजकीय बालिका इंटर कालेज में बाल मेला शुरू हो गया था। वहां पता लगा कि उस मेले में श्रीनगर, श्रीकोट, घसिया महादेव, बिलकेदार, बेलकंडी और खिर्सू क्षेत्र के बारह विद्यालयों के 200 से भी अधिक विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। बच्चों ने वहां कई तरह से अपनी रचनात्मक प्रतिभा दिखाई। लेखन तथा चित्र कला के लिए उन्हें विषय दिया गया था ‘हमारे आसपास’। बच्चों ने अपनी कविता, कहानियों और चित्रों में अपने आसपास को अपनी अलग-अलग दृष्टि से अभिव्यक्त किया। उन्होंने कविता और कहानियां लिखीं, चित्र बनाए और विज्ञान के माडल तथा क्राफ्ट माडल प्रदर्शित किए। वे अपने-अपने माडलों के बारे में बहुत उत्साह से जानकारी भी दे रहे थे। बच्चों को चित्र बनाते हुए देखकर मुझे प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की ‘बच्चों की चित्रकला प्रतियोगिता’ की पंक्तियां याद आ रही थीं:

60855389_1929387320500852_4923588454723354624_n‘उन्होंने बनाए बहुत नीले आसमान

फिर सूरज, चांद और सितारों को

अलग-अलग जगह रखा

पेड़ इतने हरे बनाए उन्होंने

जितना हरा उन्हें होना चाहिए

या जितने हरे रहे होंगे वे

कभी हमारी धरती पर

फिर पहाड़ों, नदियों और झरनों को..’

61539160_1929385457167705_8694750605979156480_11nअब बच्चों से बात करने की बारी मेरी थी। मैंने अपनी बातचीत के लिए वही विषय चुना जो बच्चों को दिया गया था- ‘हमारे आसपास’। मैंने बच्चों से कहा कि अक्सर हम यहां-वहां आते-जाते इस बात पर अधिक ध्यान नहीं देते कि हमारे आसपास क्या है? हमारे आसपास हमारी पूरी दुनिया है जिसमें हम रह रहे हैं। पेड़, पहाड़, चहचहाती चिड़ियां, कल-कल बहती नदियां, झरने, सांय-सांय चलती हवा और ऊपर तारों से जगमगाता आसमान! कितना कुछ है ना हमारे आसपास? हम कहीं जा रहे होते हैं और हमारे सामने पेड़ की शाख पर कोई चिड़िया बोल रही होती है- कुरू रू! कुरू रू! क्या कह रही होती है वह? हमें सोचना चाहिए। शायद वह अपने संगी-साथी को बुला रही हो। या, हो सकता है वह अपने बच्चों को बता रही हो कि वह उनके आसपास ही है। कभी हमें सुबह-सुबह एक चिड़िया की आवाज सुनाई देती थी- ‘तीन तोला तित्तरी! तीन तोला तित्तरी!’ यह आवाज देने वाले तीतर कहां गए? गर्मियां आती हैं और हमारे वनों में कुक्कू चिड़िया आकर बोलने  लगती है- ‘कुक्कू! कुक्कू! कुक्कू!’ फिर जब काफल पकते हैं तो एक और चिड़िया बोलने लगती है – ‘काफल पाक्को! काफल पाक्को’। जानते हो दोस्तो, प्रकृति ने न कुक्कू को घोंसला बनाना सिखाया और न उसकी बिरादर काफल पाक्को को। न कोयल को, न चातक और पपीहे को। ये कुक्कू बिरादरी की चिड़ियां हैं और दूसरी चिड़ियों के घोंसलों में अंडे देती हैं। तो देखा, कितनी सारी चीजें हैं हमारे आसपास जिनके बारे में हमें जानना चाहिए।

इसी तरह हमारे वनों में कई तरह के वन्य जीव हैं। हमारे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और हमारी नदियां प्रदूषित हो रही हैं। झरने सूख रहे हैं। यह सब कुछ क्यों हो रहा है, हमें इनके बारे में भी सोचना चाहिए। और दोस्तो, हमारे आसपास की हरियाली घटती जा रही है। तुम जानते हो, अगर पेड़-पौधे नहीं रहेंगे तो हम सांस कैसे लेंगे? वे हमारी सांस के लिए प्राण वायु ऑक्सीजन बनाते हैं। इसलिए हमें उन्हें बचाना चाहिए। आजकल पहाड़ों में चारों ओर जंगलों में आग लगी हुई है। इससे हरियाली तो खत्म हो ही रही है, तमाम चिड़ियां, उनके अंडे और जीव-जंतु भी नष्ट हो रहे हैं। हमें इस विनाश को रोकने के लिए अपने जंगलों को आग से बचाना चाहिए।

बड़े शहरों में आसमान में प्रदूषण फैल जाने के कारण तारे देखना कठिन हो गया है। लेकिन, यहां के शुभ्र आकाश में तुम तारों की बारात देख सकते हो। उन्हें पहचान सकते हो। मैंने कल रात सप्तर्षि के सातों तारे देखे। आगे के दोनों तारों को मिला कर सीध में देखा तो मुझे ध्रुव तारे का पता लग गया। इसी तरह हम ओरायन यानी व्याध तारामंडल को देखकर आसमान के सबसे चमकदार व्याध तारे को पहचान सकते हैं। आद्र्रा और रोहिणी नक्षत्र का भी पता लगा सकते हैं। इस तरह धीरे-धीरे तुम आसमान के तारों और तारामंडलों को पहचानने लगोगे। सबसे बड़ी बात तो यह है दोस्तो कि तुम्हारे मन में हर चीज को जानने की जिज्ञासा होनी चाहिए। ऐसी जिज्ञासा कि यह क्या है? क्यों है? कैसे है? किसलिए है? ये सवाल मन में उठते रहने चाहिए। जब ध्यान से प्रकृति की किताब पढ़ोगे तो तुम्हें इन सवालों के जवाब भी मिलने लगेंगे।

बाल मेले में उप शिक्षा अधिकारी प्रेमलाल भारती, राजकीय बालिका इंटर कालेज की प्रधानाचार्य सुमनलता पंवार, डा. अरुण कुकसाल, ‘रीजनल रिपोर्टर’ के संपादक पुरुषोत्तम असनोड़ा, कार्यकारी संपादक गंगा असनोड़ा थपलियाल, रेनबो पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य रेखा उनियाल और ‘रीजनल रिपोर्टर’ के संपादकीय सहयोगी जी.एस नेगी, सीताराम बहुगुणा, साहित्य संपादक उमा घिड़ियाल के साथ ही अंजना घिड़ियाल, उपासना भट्ट, देवानंद भट्ट और महेश गिरि आदि से भी भेंट हुई। श्रीनगर बाजार के ही भंडारी जी ने आईवी रिजार्ट के रेस्त्रां में हमें बड़ी आत्मीयता के साथ रात का भोजन कराया। वह स्थान ऊंचाई में पहाड़ी पर है जहां से जगमगाती अलकनंदा घाटी का मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा था।

61209400_1353302698172142_853422719113363456_n facebookसुबह साढ़े सात-आठ बजे हम श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर खिर्सू की ओर निकले। हम यानी ‘रीजनल रिपोर्टर’ के संपादक पुरुषोत्तम असनोड़ा, श्रीमती असनोड़ा, गंगा असनोड़ा, उनके दोनों प्यारे बच्चे एकाग्र तथा चेतना और मैं। पता था कि खिर्सू में काफी ठंड होगी इसलिए मैं दिल्ली से ही गर्म कपड़े ले आया था। ऊंचाई पर चीड़ वनों के बीच से निकलते हुए नीचे अलकनंदा, उसके इस पार बसा श्रीनगर शहर और उस पार  चौरास में हेमवती नंदन केंद्रीय विश्वविद्यालय, गढ़वाल का खूबसूरत परिसर दिखाई दे रहा था। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए, विकास के चरण पीछे छूटते गए इसलिए आगे प्रकृति की अनुपम छटा मन मोहती रही। जिस घुमावदार पहाड़ी रास्ते पर हम जा रहे थे, उससे ऊपर पहाड़ों की चोटी तक बांज, बुरांश, उतीस और तमाम हरे-भरे पेड़ों का घना वन फैला हुआ था। उस घने वन की बदौलत रास्ते से नीचे दूर तक फैले हुए सीढ़ीदार खेतों के बीच-बीच में बसे साफ-सुथरे मकानों को देखकर साफ पता लग रहा था कि वे पहाड़ के खुशहाल गांव हैं। वन था तो वहां पानी के स्रोत भी होंगे और घने वन से जानवरों के लिए चारे के अलावा ईंधन के लिए लकड़ियां और खाद के लिए भरपूर पात-पतेल भी मिल जाता होगा। हरियाली को आंखों में और शीतल हवा को फेफड़ों में भरते हुए हम 1700 मीटर की ऊंचाई पर खिर्सू पहुंच गए।

IMG-20190525-WA0003वहां पर्यटक आवास गृह की मुख्य इमारत में सभी कमरे भरे हुए थे इसलिए हमें इमारत से कुछ नीचे पर्यटक हट्स में कमरे दिए गए। हट जंगल से लगी हुई थीं। हम श्रीनगर घाटी की गर्मी में पसीना-पसीना होकर निकले थे लेकिन खिर्सू पहुंचते ही गर्म कपड़े पहनने पड़े। पर्यटक आवास गृह के परिसर में गुलाब की एक ही किस्म के बेहद खूबसूरत फूल खिले हुए थे। क्यारियों में कई अन्य तरह के फूल भी मुस्करा रहे थे। चारों ओर का प्राकृतिक दृश्य सम्मोहित कर रहा था। धीरे-धीरे सूरज पश्चिम में पहाड़ के पीछे डूब गया तो अंधेरा गहराता चला गया। हमने रात का भोजन अपनी हट से थोड़ा चढ़ाई चढ़ कर ऊपर पर्यटक आवास गृह के भोजनालय में किया। टार्च के सहारे नीचे उतर कर चुपचाप अपनी-अपनी हट में गए। ठंड इतनी थी कि मुझे रात में दो रजाइयां ओढ़नी पड़ीं।

20190525_070935सुबह उठ कर बाहर आया तो चारों ओर सुनहरी धूप छिटक रही थी। उस खुशनुमा सुबह को मैं जिस ओर भी देखता, प्रकृति का अनुपम सौंदर्य मोहित कर लेता। दूर उत्तर में बादलों के बीच कहीं-कहीं हिमालय की धवल चोटियों की झलक भी दिखाई दे जाती थी। तभी धूप में लॉन पर सुबह का भोजन खोजते सुंदर हुदहुद से भेंट हुई। पीठ पर काली जेब्रा लाइनें और सिर पर भूरी कलगी! मन उसे ही देखते रहना चाहता था लेकिन हमें बच्चों को विज्ञान की कहानियां सुनाने के लिए निकलना था।

फटाफट तैयार होकर राजकीय इंटर कालेज, खिर्सू की ओर निकले। यह बहुत पुराना इंटर कालेज है और शायद आजादी से भी पहले से चल रहा है। पुरानी इमारतों के बीच एक लंबे-चौड़े खेल के मैदान को पार करके हम इंटर कालेज की नई इमारत के पास पहुंचे। इंटर कालेज एक पहाड़ी पर होने के कारण वहां से एक ओर घने जंगल से घिरे पहाड़ दिखाई दे रहे थे और उत्तर दिशा में नीले पहाड़ों के पार, विशाल हिमालय की चोटियां बादलों से ढकी हुईं थीं। हमें सुबह की एसेंबली के समय ही पहुंचना था ताकि उसके तुरंत बाद हम हाईस्कूल तथा इंटर के विद्यार्थियों के साथ विज्ञान की बातें कर सकें। सुबह ही कार्यक्रम करना इसलिए जरूरी था क्योंकि इंटर कालेज के प्रधानाचार्य शिव प्रकाश सिंह उसी दिन रिटायर हो रहे थे। बाद में उनकी भावभीनी विदाई का कार्यक्रम आयोजित किया जाना था।

IMG-20190525-WA0006कतारों में बैठे उन छोटे-छोटे 88 बच्चों को देखकर मुझे पूछना पड़़ा कि वे किस कक्षा के विद्यार्थी हैं? सुन कर मैं हैरान हुआ कि वे हाईस्कूल और इंटर के वरिष्ठ विद्यार्थी हैं। चारों ओर गुनगुनी धूप खिली हुई थी। दांहिनी ओर ऊंचे पहाड़ों पर बांज, बुरांश के घने, हरे-भरे जंगल को देखकर मन हुआ कि उन बच्चों को पर्यावरण की कहानी सुनाऊं। इसलिए मैंने उन्हें अपनी ‘लौटे हुए मुसाफिर’ कहानी सुनाई जिसमें मैं उन्हें गजानन अंकल की टाइम मशीन में बैठा कर अतीत में ले गया। उन्होंने वहां जंगलों को कटते-उजड़ते, वन्य जीवों के घरों को बरबाद होते और शिकार के नाम पर निर्ममता से मारे जा रहे वन्य जीवों को देखा। वर्तमान में चिड़ियाघरों में बंद वन्य जीवों के बारे में सोचकर वे बहुत दुखी हुए। बाद में मैं उन्हें गजानन अंकल की उसी टाइम मशीन में बैठा कर भविष्य में ले गया जहां उन्होंने भविष्य का चिड़ियाघर देखा। उस चिड़ियाघर में प्रवेश द्वार के पास बैठे चिंपैंजी मनुष्यों की भाषा बोल रहे थे। भीतर तमाम तरह के वन्य जीवों और उनके शिशुओं को देखकर बच्चे चकित तो हुए लेकिन उन्हें वह सब मशीनी लगा। अंकल गजानन ने उन्हें बताया कि वे मशीनें ही हैं क्योंकि असली वन्य जीव तो अब रहे ही नहीं। फिर उन्होंने बच्चों से पूछा- क्या तुम्हें ऐसी दुनिया चाहिए? बच्चों ने कहा- नहीं, हमें अपनी हरी-भरी दुनिया चाहिए जिसमें सभी वन्य जीव भी हों। तब हम सभी ने अंकल गजानन के साथ जीवन का गीत गाया।

61036474_1353837411452004_4883464410682621952_facebooknचारों ओर हरे-भरे जंगलों से घिरी उस प्राकृतिक सेटिंग में जैसे पर्यावरण की वह पूरी कहानी जीवंत हो उठी। हम बच्चों और शिक्षकों का आभार व्यक्त कर वापस लौटे। कपड़े बदलने का वक्त नहीं था इसलिए गर्म कपड़ों में ही श्रीनगर की ओर रवाना हुए। हमें वहां से ग्यारह किलोमीटर दूर बेलकंडी में शैमफोर्ड फ्यूचरिस्टिक स्कूल के बच्चों को कहानियां सुनानी थीं। ज्यों-ज्यों घाटी की ओर बढ़े, गर्मी बढ़ती गई। हम सीधे बेलकंडी पहुंचे और शैमफोर्ड स्कूल का पता लगा कर वहां गए। स्कूल की प्रधानाचार्य शशिकला नेगी से मिले। हाॅल में कक्षा 9 और 10 के बच्चे जमा हो जाने के बाद हमें उनसे मिलने का मौका मिला। थोड़ी देर बातचीत करने के बाद पता लगा कि वे सौरमंडल से परिचित हैं और ग्रहों के बारे में उनकी काफी जिज्ञासा है। मैंने तय किया कि उन्हें बातों-बातों में सौरमंडल की सैर पर ले जाऊं। इसलिए अमीर खुसरो की पहेली ‘एक थाल मोती भरा, सबके सर पर औंधा धरा…’ पूछ कर मैंने उन्हें अपने कल्पना अंतरिक्ष यान में बैठाया और अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरी।

तारों की छांव में आगे बढ़ते-बढ़ते बच्चों ने मेरे साथ तारों का गीत गाया और तभी हम विशाल सूरज के पास पहुंच गए। अब बच्चे सब कुछ अपने सामने, मन की आंखों से देख रहे थे। सूरज से हम उसके परिवार के सदस्यों यानी ग्रहों और चंद्रमाओं की ओर आगे बढ़े। उस यात्रा में हमने बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून को बहुत करीब से देखा। बुध और शुक्र ग्रह के आकाश में कोई चांद नहीं दिखाई दिया। बाकी ग्रहों के चंद्रमा भी देखे। हम सौरमंडल के सीमांत तक गए। वहां ऊर्ट क्लाउड की विशाल पट्टी में बड़े-बड़े पहाड़ों के बराबर बर्फीर्ली गेंदें देखीं जो सौरमंडल बनते समय बचे-खुचे मलबे से बनी थीं। जब हम वापस लौटे तो उनमें से एक विशाल बर्फीली गेंद हमारे सौरमंडल की ओर चली आई। हमने उसका सिर, जटा और लाखों किलोमीटर लंबी नीली-हरी पूंछ बनते हुए देखी। बच्चे उसे देखकर खुशी से चिल्लाए, “धूमकेतु! धूमकेतु!” हम उल्काओं और क्षुद्र ग्रहों से बचते हुए पृथ्वी की ओर आए और वायुमंडल में प्रवेश किया। बच्चों ने अंतरिक्ष से हमारी प्यारी और निराली पृथ्वी को देखा। वह एक नीले गोले की तरह दिखाई दे रही थी। हम और नीचे आए तो हमें अपना प्यारा भारत देश दिखाई दिया। धीरे-धीरे हमारा अंतरिक्ष यान बेलकंडी में शैमफोर्ड फ्यूचरिस्टिक स्कूल के हाॅल में उतरा। वहां हम सभी ने मिलकर जीवन का गीत गाया।  कल्पना यान में की गई इस सैर से बच्चे बहुत खुश हुए।

उस रात मैं श्रीनगर बाजार के पास सम्राट होटल के एक कमरे में रुका और सुबह सारथी जीतेंद्र के साथ देहरादून की ओर चल पड़ा।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *