ऐ सरज़मीं तुझे सलाम 

13015154_10205948307898339_7638101663022060172_nस्याह रातों में कभी तारों भरा आसमान देखा है आपने? अगर हां तो आसमान में आरपार फैली कहकशां और उसके चमकते बेशुमार तारों को भी जरूर देखा होगा। उन्हीं तारों में से एक तारा हमारा है। हमारा आफ़्ताब, हमारा सूर्य। इसके गिर्द जो आठ प्लेनेट घूम रहे हैं, उनमें से एक प्लेनेट है- हमारी अनोखी सरज़मीं, हमारी पृथ्वी। अनोखी इस मायने में कि साइंसदानों ने अब तक कायनात में जहां तक खोजबीन की है, उससे पता लगा है कि सिर्फ हमारी सरज़मीं में ही ज़िंदगी की शमा रौशन है। बाकी कहीं ज़िंदगी के निशां नहीं पाए गए हैं। इसीलिए तो अनोखी है हमारी यह सरज़मीं। 
मगर ऐसी क्या बात है कि ज़िंदगी का चिराग बस यहीं रौशन हो गया? इसकी वजह क्या है? वजह यह कि हमारी सरज़मीं सूरज से ठीक इतनी दूरी पर है कि न यहां बेतहाशा गर्मी पड़ती है और न बेहद सर्दी, कि जिसमें ज़िंदगी पनप ही न सके। दूसरी वजह है- इसका एटमास्फियर। यानी, इसके चारों ओर 800 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैली हवा की परत। यह हमारी सांसों का खज़ाना है। कुदरत ने इसमें हमारी सांसें बड़ी हिफाजत से जमा की हुई हैं। हम दिन-रात इसी हवा में सांस लेते हैं। इस हवा में नाइट्रोजन गैस है, आक्सीजन है, थोड़ी आर्गन और कार्बन डाइआक्साइड गैस भी है। ओज़ोन और नियान गैस भी है। साथ ही पानी की नन्हीं बूंदें भी इसमें हैं। कुदरत ने इन्हें एटमास्फियर की हवा में नाप-तौल कर सही मिकदार में रखा था। हम ज़िंदा हैं तो इसी हवा में सांस लेकर ज़िंदा हैं। 
ये तो रहीं दो वजहें कि इस सरज़मीं पर ज़िंदगी की शमा क्यों रौशन है। एक और बड़ी वजह है इसकी। वो यह कि ज़िंदगी के पनपने के लिए और ज़िंदा रहने के लिए बाकी जरूरतें हमारी मादरे-ज़मीं पूरा कर देती है। यह हमें हमारे खाने की चीजें मुहैया कराती है, पीने के लिए पानी देती है और हिफाजत से रहने के लिए हम इसी पर अपना आशियाना बनाते हैं। इस तरह मादरे-ज़मीं हमें हवा, पानी, खाना और रहने की जगह देकर हमें ज़िंदा रखती है। 
‘हमें’ से हमारा मतलब यहां सिर्फ आदमजात से नहीं है बल्कि इस पूरी खूबसूरत सरज़मीं पर जी रहे लाखों-लाख जानवरों, परिंदों, बेशुमार कीट-पतंगों, ज़मीं और नदी-तालाबों व समंदरों में रहने वाले जानवरों से भी है। ये सभी लाखों-करोड़ों जानवर और हम कुदरत के आगोश में रहते और पनपते हैं। 
पर यह कुदरत क्या है? कुदरत का मतलब है- वह सब कुछ जो हमारे चारों ओर है। यानी, हमारे चारों ओर की दुनिया। वह दुनिया जो हमारा माहौल बनाती है और उस माहौल में हम महफूज रहते हैं। यही माहौल ‘एंवायरनमेंट’ यानी पर्यावरण कहलाता है। इसमें हरे-भरे दरख्त हैं, ऊंचे-नीचे पहाड़ और गहरी घाटियां हैं। दलदल और रेगिस्तान हैं। दरिया, चश्मे, हरदम बहते झरने और झील-तालाब हैं, खारे पानी से भरे नीले समंदर हैं। और, सांस लेने के लिए हवा है। 
अगर कुल मिला कर यह माहौल सही-सलामत रहेगा तो इसमें ज़िंदगी भी खूब पनपेगी और आदमजात के साथ-साथ बाकी सभी जानवर भी महफूज रहेंगे। हम सभी का वज़ूद बना रहेगा। 
शुरूआत में हुआ भी यही। इंसान तब जंगलों में रहता था। फल-फूल खाकर और शिकार करके अपना पेट भरता था। कुदरत का सारा खज़ाना उसके सामने था। वह कुदरत के साथ जीने लगा, ठीक वैसे ही, जैसे बाकी जानवर जी रहे थे। मगर आदमी अधिक होशियार था। उसने नई-नई तरकीबें ईज़ाद कीं और अपनी मर्जी से कुदरत का इस्तेमाल करने लगा। अपना परिवार और कुनबा बना कर वह ज़मीन पर कब्जा करने लगा। 
ज्यादा से ज्यादा जमीन हथियाने के लिए आदमी दरख्तों, जंगलों को काटने लगा। शौक के लिए जंगली जानवरों का शिकार करने लगा। उसने गांव बसाए, नगर बसाए और फिर कंकरीट की इमारतों के जंगल खड़े कर दिए। आदमी का लालच बढ़ता गया। आगे और आगे बढ़ने की कोशिश में आदमी ने जंगलों को बुरी तरह उजाड़ दिया। दरख्तों की हरियाली घटती और घटती चली गई। शहरों के क़दम आगे बढ़ने से खेती की ज़मीन का रक़बा भी घटता चला गया। गोया, हरियाली गायब होती चली गई।

हवा का हाल भी बिगड़ने लगा। असल में जब इंसान ने भाप का इंजन ईजाद कर लिया तो आगे चल कर भाप बनाने के लिए कोयले की जरूरत आन पड़ी। तब पेड़ों को काट कर कोयला बनाया जाने लगा। इस तरह पेड़ों का बड़े पैमाने पर सफाया शुरू हो गया। जमीन से पत्थर का कोयला खोज लिया गया तो वह भी भाप बनाने के काम आने लगा। रेलगाड़ियां दौड़ने लगीं। भाप का इंजन हवा में धुवां उगलने लगा। पेट्रोलियम और डीजल की खोज हो गई तो उनसे बड़ी-बड़ी मशीनें चलने लगीं। फैक्ट्रियां और कारखाने चल निकले। कोयला, पेट्रोलियम और डीजल ईंधन से कारखानों में मशीनों के अलावा सड़कों पर लाखों मोटरगाड़ियां दौड़ने लगीं। कारखानों और फैक्ट्रियों की मशीनें, और सड़कों पर दौड़ती मोटरगाड़ियां भी हवा में दिन-रात धुवां उगलने लगीं। इस जहरीले धुएं ने हमारी साफ-सुथरी हवा में जहर घोल दिया। आज हालत यह हो गई है कि दुनिया के बड़े शहरों में सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। जहरीली हवा से सांस की बीमारियां फैल रही हैं। हमारे मुल्क की राजधानी दिल्ली के अलावा भी दुनिया के कई मुल्कों की राजधानियों और दूसरे शहरों में यह इतनी बड़ी मुसीबत बन गई है कि सड़कों पर मोटरगाड़ियां ‘औड’ और ‘ईवन’ के हिसाब से चलाई जा रही हैं। साइंसदानों का कहना है कि कल-कारखानों और मोटरगाड़ियों से निकले धुएं में कई जहरीली गैसें और पार्टिकल होते हैं।

हवा में दिन-रात फैल रहे धुएं में जहरीली गैस कार्बन डाइऑक्साइड की मिकदार भी बढ़ती जा रही है। इसकी वज़ह से हमारी सरजमीं पर गर्मी बढ़ रही है। साइंसदानों का कहना है कि खुद इंसान की करतूतों ने पिछले 250 सालों में हवा में कार्बन डाइ ऑक्साइड तकरीबन 30 फीसदी बढ़ा दी है। मीथेन गैस 145 फीसदी और नाइट्रस ऑक्साइड गैस 15 फीसदी बढ़ चुकी है। साइंसदानों की जुबान में ये ‘ग्रीनहाउस गैसें’ हैं। इनमें हमारे एयर कंडीशनरों और फ्रिज वगैरह से निकलने वाली क्लोरोफ्लुओरोकार्बन यानी सी एफ सी नामक गैसें भी शामिल हैं।

ये गैसें जमीन से आसमान की ओर वापस भेजी गई सूरज की गर्मी को रोक लेती हैं। नतीजा यह होता है कि इन गैसों की चादर से ढकी हमारी सरजमीं में गर्मी बढ़ती जाती है। पिछले तमाम वर्षों में इसी वज़ह से गर्मी बढ़ गई है। इसे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहा गया है। इतनी गर्मी पहले कभी नहीं पड़ी। अगर इन गैसों में कमी नहीं की गई तो गर्मी और अधिक बढ़ती जाएगी।

गर्मी और अधिक बढ़ेगी तो जानते हैं, उसका नतीजा क्या होगा। सुकून से जीना मुहाल हो जाएगा। बर्फीले इलाकों की बर्फ पिघलने लगेगी। इसकी वजह से दरियाओं में जबरदस्त सैलाब आएगा जिससे जान-माल का भारी नुकसान होगा। दरियाओं का पानी समंदरों में पहुंच कर उनका लेवल बढ़ा देगा। तब समंदरों के किनारे बसे शहर पानी में डूबने लगेंगे। सूखा पड़ जाएगा, खेतों में फसलें सूख जाएंगीं। अनाज की कमी हो जाएगी। अकाल और भूख का मंजर सामने आ जाएगा। दरिया और झील तालाब सूखने लगेंगे और पीने के पानी की किल्लत बढ़ती जाएगी।

गर्ज़ यह कि ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया भर में भारी तबाही मच जाएगी। नामचीन शायर बशीर बद्र की बात याद आती है कि: अब यहां प्यासे परिंदे आएंगे किसलिए, झील को सूखे हुए कितने ज़माने हो गए।’

आप समझ ही रहे होंगे, यह सब कुछ कुदरत के साथ छेड़खानी करने, यानी माहौलयात के बिगड़ने के कारण होगा। इसकी शुरूआत हो चुकी है। खौफ़नाक गर्मी का आलम हम देख ही रहे हैं। इसके साथ ही मौसम के बदलते मिजाज को भी बखूबी महसूस कर रहे हैं। वे दिन तो बस अब ख्वाब हो गए हैं, तब समय पर मौसम बदलते थे। मौसमे-बहार आती थी, गर्मी का मौसम जमीं को तपा देता था और फिर झमाझम बारिशें लेकर बरसात का मौसम आ जाता था। फसलें लहलहा उठतीं। बारिश में नहा कर दरख्त तरोताजा हो जाते। ज़मीं सरसब्ज हो जाती। बरसात का मौसम अलविदा कहता तो गुनगुना मौसम आ जाता। धीरे-धीरे सर्दी क़दम बढ़ाती और पूरे माहौल को सर्द बना देती। और एक बार फिर, मौसमे बहार का आग़ाज  हो जाता। माहौल के बिगड़ने के साथ न जाने कहां गए वे दिन!

अगर हमारे कल-कारखाने माहौल में इसी तरह धुवां उगलते रहे, हमारी कारों, मोटरगाड़ियों, फ्रिज और एयरकंडीशनरों से जहरीली गैसों के निकलने का सिसिला बदस्तूर जारी रहा और हम अपने हरे-भरे जंगलों का इसी तरह सफाया करते रहे तो कुदरत हमें कभी माफ नहीं करेगी। इस सरज़मी पर हमारा वजू़द ही खतरे में पड़ जाएगा। इसकी शुरूआत हो चुकी है। साल-दर-साल दुनिया भर में लाखों लोग अकाल, भूख, बेतहाशा बारिश और सैलाब, खौफनाक गर्मी और नाकाबिले बर्दाश्त सर्दी के शिकार हो रहे हैं। हर साल इस सरज़मी से जानवरों की न जाने कितनी जातियों का वज़ूद खत्म होता जा रहा है।

लिहाजा, हमें इससे सबक सीखना होगा। तहे-दिल से महसूस करना होगा कि यह सरज़मीं, यह खूबसूरत प्लेनेट जिसमें ज़िदगी की शमा रौशन है, बची रहे। इसे बचाने के लिए हमें कुदरत से छेड़छाड़ बंद करनी होगी। इसके माहौल को सुधारना और उसका तहफ़्फुज़ करना होगा। तभी हमारा और इस सरज़मी पर हमारे हम सफर जानवरों और दरख्तों का वज़ूद बचा रहेगा। जैसा कि मैंने  शुरू में कहा था- हमारा यह प्लेनेट पूरी कायनात में अनोखा है। यह खरबों तारों और कहकशांओं के रेगिस्तान में एक नखलिस्तान है। हमें इसे बचाना होगा।

 

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