प्यार का राग सुनो रे ऽऽ

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दो और दो आंखें चार होने पर जब मन ही मन उनमें एक-दूसरे पर न्योछावर हो जाने की अनुभूति जाग उठती है तो लगता है शायद प्यार के गणित को समझने का समय आ गया है। और, इसके साथ ही किशोरावस्था में प्यार के तमाम गुणा-भाग के सवालों को सुलझाने का समय शुरू हो जाता है। यह तो किशोर और किशोरी को असल में बहुत बाद में जाकर पता लगता है कि प्यार गणित का खेल नहीं बल्कि गूढ़ रसायनशास्त्र है!

उम्र की सीढ़ियां चढ़ते तेरह-चौदह साल के किशोर को तब भला क्या पता कि क्यों उसकी मसें भीगने लगती हैं और क्यों कंधे चौड़े होने लगे हैं। मांसपेशियों की उभरती मछलियों को देख कर वह ‘सिक्स पैक’  तक के सपने संजोने लगता है। अपनी भारी आवाज और सीने पर उगते बालों को देख कर वह पहले हैरान होता है और फिर धीरे-धीरे उसे पौरुष का प्रतीक मान कर मन ही मन खुश होने लगता है।

उधर किशोरी को प्रकृति धीरे-धीरे कामिनी में बदल रही है। चपल चितवन के साथ उसके खंजन नयन एक जगह नहीं टिकते। कोई अदृश्य शिल्पी वसा की परतें बिठा कर उसके शरीर को तराशने लगता है। शरीर में गोलाइयां और उभार उभरने लगते हैं। ताड़-सी बढ़ने लगती है किशोरी। लजीली, शरमीली किशोरी क़दम-दर-क़दम यौवन की दहलीज की ओर बढ़ रही है।

किशोर और किशोरी का बचपन विदा हो रहा है। शरीर के रासायनिक हरकारे ‘हार्मोन’ उन्हें यौवन का संदेश देने लगे हैं कि सुनो, अब प्यार का मौसम आ रहा है। मां प्रकृति आशीर्वाद देती है कि पगलो चलो अब प्यार करो और प्रजनन करके अपनी मानव जाति को आगे बढ़ाओ! फिर चाहे कोई इन भावनाओं को दबा कर संन्यासी या संन्यासिन बन जाए, या फिर प्यार की पेंगें भर कर मन पसंद साथी की खोज में जुट जाए। प्रकृति के प्यार के इस खेल में हम तो महज कठपुतलियां होते हैं। वही रसायनों की भाषा में हमें प्यार का राग अलापने के लिए उकसाती है। जब कोई प्यार में पागल हो जाता है या किसी के सिर पर प्यार का भूत सवार हो जाता है, तो सच यह है कि वह यौन रसायनों या कहिए यौन हार्मोनों के इशारों पर नाच रहा होता है। वैज्ञानिक तो यहां तक कहते हैं कि प्यार में पागल हो जाना एक तरह से मानसिक रोग के ही समान है। यानी, अगर फिल्मी त़र्ज पर प्रेम रोग कहा जाता है तो कुछ गलत नहीं कहा जाता। 

इतना अचूक निशाना होता है इन रसायनों का कि महज साढ़े पांच मिनट लगते हैं प्यार का इजहार करने में और बस मन प्यार के रंग में रंग जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इसमें से 55 प्रतिशत समय लगता है शरीर के हाव-भाव जताने में जिसे वे ‘बॉडी लैंग्वेज’ कहते हैं, 38 प्रतिशत समय प्यार के बोल बोलने की तैयारी में और 7 प्रतिशत समय ‘मुझे तुमसे प्यार है’ की बात कहने में। सच यह है कि जब हम किसी की ओर आकर्षित होते हैं तो अवचेतन में हम उसके जीनों को पसंद कर रहे होते हैं। हम जिसकी ओर तहे-दिल से आकर्षित होते हैं, शक्ल-सूरत और रूप-रंग ही नहीं, उसकी गंध भी हमें मोहित करती है।

images-of-love-images-for-love-free-pc-wallpapers-saxony-blue-clip-art-for-studentsजब हम प्यार में पागल हो जाते हैं तो अपने जैव रसायनों के हाथों में खेल रहे होते हैं। कवि घनानंद के शब्दों में भले ही उलाहना मिले कि ‘कौन सी पाटी पढ़े हो लला, मन लेहु पै देहु छटांक नहीं’, लेकिन जमाने के साथ नाप-तौल के मानक भले ही बदल गए हों, प्यार की रासायनिक रीति बदस्तूर चली आ रही है। अमेरिका में न्यू जर्सी स्थित रुटगेर यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता और ‘ह्वाई हिम? ह्वाई हर’ पुस्तक की लेखिका हेलन फिशर ने प्यार की इस रीति का खुलासा किया है। उनका कहना है, प्यार का आकर्षण असल में रसाकर्षण है। जब दो लोगों की ‘कैमिस्ट्री’ का मिलान होता है तभी उनका मिलन होता है। इस कैमिस्ट्री के किरदार हैं एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरान, सेरोटोनिन और डोपामीन रसायन। प्यार के रसाकर्षण में एक रसायन दूसरे रसायन को आकर्षित करता है। मसलन, अगर किसी नारी में एस्ट्रोजेन नामक हार्मोन रसायन की मिकदार अधिक है तो वह टेस्टोस्टेरान  रसायन की अधिक मात्रा वाले पुरुष को अपनी ओर अधिक आकर्षित करती है। इसमें मनचाहे गुणों की चाहत भी अहम भूमिका निभाती है। गुणों की यह चाहत हम बचपन से अपने मन में संजो रहे होते हैं, जैसे मां की मुस्कराहट और निश्छल प्यार, पिता की विनोद-वृत्ति यानी सेंस आफ ह्यूमर, वगैरह। जब हम किसी को प्यार का साथी चुनना चाहते हैं तो मन ही मन उसे चाहत के इन चंद गुणों की कसौटी पर भी कस लेते हैं। हेलन फिशर कहती हैं, इस काम में ज्यादा नहीं, तीन मिनट से भी कम समय लगता है। और हां, कसौटी पर कसने की यह कवायद मनोविज्ञान का हिस्सा है।

यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया, लास एंजिलीस में संचार अध्ययन तथा मनोविज्ञान विभाग के शोधकर्ता मार्टी हसेल्टन का कहना है कि मनोविज्ञान तो ठीक लेकिन सुगंध विज्ञान भी प्यार के इस खेल में बड़ी भूमिका निभाता है। इसलिए प्यार के खिलाड़ियों की घ्राण शक्ति भी बहुत मायने रखती है। शरीर की नैसर्गिक सुगंध एक-दूसरे को मोहित करती है। शरीर की यह सुगंध फेरोमोन रसायनों की देन है। फैशन की दौड़ में भले ही अधिकांश लोग आज कृत्रिम सेंट और इत्र छिड़क कर भले ही शरीर को सुवासित करने की कोशिश करते हों, लेकिन यौन आकर्षण के लिए शरीर को सर्वोत्तम सुवास प्रकृति प्रदत्त फेरोमोन ही देते हैं। इस नैसर्गिक सुवास में माता-पिता से मिले जीनों का हाथ होता है और संतान को यह भीनी सुवास माता-पिता से विरासत में मिलती है।

चलिए, फिर सीधे प्यार की बात पर लौटते हैं,…..

हालांकि यह कवि का बताया ‘सूधो सनेह को मारग’ नहीं है। हेलन फिशर कहती हैं कि मोटे तौर पर प्यार की तीन अवस्थाएं होती हैं: लालसा यानी चाहत, आकर्षण और आसक्ति।

लालसा किसी को पा लेने की उद्दाम इच्छा है। यह इच्छा क्षण भर देखने से भी जाग सकती है और पहली ही नजर में प्यार की मिसाल बन सकती है। इस लालसा के जगने में सैक्स हार्मोनों का हाथ होता है। ये हार्मोन हैं टेस्टोस्टेरान और एस्ट्रोजन। ये हमारे मस्तिष्क में स्थित नलिकाविहीन मास्टर ग्रंथि ‘पिट्यूटरी’ यानी पीयूषिका से भेजे गए गोनेडोट्राफिक यानी जननग्रंथि प्रेरक हार्मोन रसायनों के इशारे पर हमारी जनन ग्रंथियों में बनते हैं। हमारे वृषणों में टेस्टोस्टेरॉन और स्त्रियों की ओवरी यानी दोनों डिंब ग्रंथियों में एस्ट्रोजन सैक्स हॉर्मोन बनता है। जरा यौन हार्मोन के असर का अनुमान लगाइए। डिंब ग्रंथियां प्रति दिन मात्र चीनी के कण के बराबर एस्ट्रोजन रसायन बनाती हैं लेकिन यह सूक्ष्म मात्रा धीरे-धीरे एक अबोध किशोरी को कामिनी बनाने में समर्थ है। इन दोनों हार्मोनों की बदौलत किसी को पा लेने की लालसा जाग उठती है।

प्यार की दूसरी अवस्था है- आकर्षण। प्यार में पगला जाने की यही अवस्था है, जब प्यार के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं। प्यार के मारों की भूख, प्यास और नींद तक गायब हो जाती है। गोया, मंजरी शुक्ला के शब्दों में, “नींद, सुकून, हसरतें सब तो मिटा दिया/अब और क्या खो दूं तुझे पाने के लिए।“

वे हर समय अपने प्यार के दिवा स्वप्नों में डूबे रहते हैं। इस अवस्था में शरीर के तीन तंत्रिका-संचारी रसायन सक्रिय हो जाते हैं और मुस्तैदी से अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। ये तीनों रसायन हैं- ऐड्रिनलीन, डोपामीन और सेरोटोनिन। प्यार की शुरूआत में शरीर में तनाव बढ़ जाता है और रक्त में ऐड्रिनलीन तथा कार्टिसोल हार्मोनों की मात्रा बढ़ जाती है। तभी तो जनाब, अचानक उनसे भेंट हो जाने पर आप पसीना-पसीना हो उठते हैं, दिल तेजी से धक-धक धड़कने लगता है और मुख सूखने लगता है!

डोपामीन का दिमाग पर वही असर होता है जो कोकेन या निकोटीन का होता है। यानी, यह रसायन दिमाग में प्यार का नशा भर देता है। आपने प्यार किया होगा तो डोपामीन का असर भी जरूर अनुभव किया होगा क्योंकि प्यार की इस दूसरी अवस्था में यह आपको ‘उन्हें’ पाने की लालसा बढ़ा देता है और दिलो-दिमाग में एक अजब आनंद की अनुभूति भर देता है। साथ ही नींद और भूख-प्यास गायब!

और, अब रहा तीसरा रसायन सेरोटोनिन। यह रसायन आनंद की अनुभूति कराते हुए आपको प्यार में पागल बना देता है। मन में बस प्यार के विचार कौंधते रहते हैं।

इसके बाद आती है आसक्ति की तीसरी अवस्था। यह अवस्था आने पर ही प्यार की परिणति पूरी होती है। यही प्यार का वह रासायनिक बंधन है जो आपको मिलन के बाद उनसे जोड़े रखता है और आप जनम-जनम तक उनका ही साथ पाने का सपना संजोते हैं। प्यार के इस बंधन में मुख्य रूप से आक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन नामक दो रसायनों का हाथ होता है। ये भी हार्मोन हैं और रासायनिक भाषा में संदेश पहुंचाते हैं।

ये दोनों हार्मोन हमारे मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस नामक ग्रंथि में बनते हैं। यूनानी भाषा में आक्सीटोसिन का अर्थ है- शीघ्र प्रसव। यह रसायन गर्भाशय की दीवारों को संकुचन का संदेश देता है ताकि आसानी से प्रसव हो सके। स्तनों में दूध उतारने में भी इसका हाथ रहता है। मां और बच्चे ही नहीं वयस्कों के बीच भी प्यार का मजबूत बंधन यही बनाता है। वैज्ञानिकों ने प्रेयरी मूषकों पर किए गए प्रयोगों में देखा है कि वैसोप्रेसिन हार्मोन भी प्यार के अटूट बंधन के लिए जिम्मेदार है। भला मूषक ही क्यों? इसलिए कि मध्य और उत्तरी अमेरिका के घास के मैदानों में बहुतायत से पाए जाने वाले प्रेयरी मूषकों के नर-मादा के बीच जीवन भर का अटूट बंधन होता है और वे सैक्स के भी बड़े खिलाड़ी माने जाते हैं। तो, क्या मूषक और क्या मानव! वैज्ञानिक कहते हैं, यौन संसर्ग की चरम अवस्था में शरीर में आक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन दोनों हाॅर्मोनों का स्राव होता है जिसके कारण पति-पत्नी के बीच प्यार का बंधन बढ़ता है। यानी, जितना अधिक अंतरंग संसर्ग, उतना अधिक अटूट बंधन।

लुब्बे-लुबाब यह कि प्यार के गणित का जोड़-तोड़ भले कोई कितना ही जमा ले, लेकिन प्यार के अटूट बंधन को जानने के लिए उसे प्यार के रसायन शास्त्र को पढ़ना ही होगा। इसे अच्छी तरह पढ़ और समझ लिया तो फिर कोई नहीं पूछेगा कि ‘कौन-सी पाटी पढ़े हो लला?’

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(देवेंद्र मेवाड़ी)

 

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