मौसमयाती तब्दीली का नवातात पर असर (रेडियो वार्ता)

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शेर-ओ-शायरी में तो मौसम की बातें हम न जाने कब से करते आ रहे हैं मगर अब मौसम की खुशगवारी या इसकी बेदर्दी का ज़िक्र ज़्यादा किया जाने लगा है। वे दिन भी थे जब साल भर, यही समय पर मुसल्सल मौसम आते थे और अपने-अपने वक्त पर चले जाते थे। यही वजह थी कि कभी मौसमे बहार आ जाती थी तो उसके पीछे-पीछे गरमाहट लेकर मौसम गर्मा के दिन शुरू हो जाते थे। उनके जाते-जाते आसमान में बादल घिर आते और मौसमे बारां की बरसातें शुरू हो जातीं। उसके जाने पर मौसमे खज़ा के दिन शुरू होते और फिर कड़ाके की सर्दी के साथ मौसमे सर्मा की शुरूआत हो जाती। इस तरह सदा बातरतीब मौसमों की आवाजाही जारी रहती थी। सदियों से मौसमों का यही सिलसिला चला आ रहा था।
मगर फिर आखिर आबोहवा को ऐसा क्या हो गया कि मौसम हमसे नाराज़ हो गया ? मौसमे बहार में जब वक्त पर गुल खिल जाते थे तभी खामोशी से कहीं किसी पत्थर, किसी दरख़्त या किसी दरो-दीवार पर खामोशी से प्यूपा के ज़िरहबख्तर में सोई तितलियां दस्तक-ए-बहारां सुन कर अपने पंख फड़फड़ाती हुई बाहर निकल आती थीं और दर-दर फूलों पर उनका पराग फेर कर, उनका निकाह रचाती थीं। फिर उनके बीज बनते और बीज उग कर नई जेनरेशन को जनम देते। गोया, मौसमों से नबातात का सीधा रिश्ता था। मौसमे गुल में बीज बने, मौसमे गर्मा में तपे और मौसमे बारां में ज़मीन से सर उठा कर बाहर निकल आए। इस तरह नई फ़सल तैयार हो जाती थी।
काश्तकारों ने कुदरत की तरकीब को समझ लिया और मौसमों के बूते पर खेती-किसानी करने लगे। मौसमे गर्मा में ज़मीं जितना अधिक तपती, मानसून के साथ उतना ही पानी लेकर बादल घिर आते और बरस-बरस कर धरती को शराबोर कर देते। तब काश्तकार खरीफ़ के मौसम की फसल बोता था। मौसमे बारां में वे फ़स्लें तैयार होती थीं। और, फिर जब जाड़े शुरू हो जाते तो रबी मौसम की फ़स्लें बो दी जातीं। मौसमे गर्मा में रबी और खरीफ के बीच ज़ायद की फ़स्लें भी उगाई जाती थीं।
क़तील शिफ़ाई की जुबां में कहूं तो अब तो यह हाल है कि:
दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था
इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था

बरसात की ही क्या कहें, मौसमे बहार भी बहुत देर से आने लगी है जिसकी वजह से तितलियां और दूसरे कीट-पतंगे बाहर आ ही नहीं पाते। प्यूपा के ज़िरहबख़्तर में ही दम तोड़ देते हैं। अब सोचिए जरा, अगर तितलियां और कीट-पतंगे ही नहीं होंगे तो फिर फूलों में निकाह की रस्म कौन निभाएगा? लिहाजा, नबातात में बीज बहुत कम बनते हैं और इसका उनकी पैदावार पर बुरा असर पड़ता है।
समझ रहे हैं न आप? इसका मतलब है कि उधर मौसम रूठा और इधर फ़सलों की पैदावार घट गई। मौसमयाती तब्दीली भले ही हमें मामूली लगे मगर नबातात पर उसकी बड़ी मार पड़ती है। बात इतनी सी नहीं है। मौसम का मिज़ाज बिगड़ने की वजह से सारी दुनिया में हमें ही नहीं, नबातात को भी इसका कहर भुगतना पड़ रहा है। पता है आपको, दुनिया में हमसे कहीं ज्यादा तादाद में हैं नबातात। समंदरों से लेकर इस सरज़मीं पर पहाड़ों, मैदानों, दलदलों और रेगिस्तानों में, सभी जगहों पर नबातात मौजू़द हैं। इंसान और जानवर उन्हीं के बूते पर ज़िंदा रहते हैं। इसलिए कि वे एक तरफ तो इस ज़मीं पर मौजू़द सभी इंसानों और छोटे-बड़े बेशुमार जानवरों के सांस लेने के लिए जरूरी आॅक्सीजन गैस बनाते हैं और दूसरी तरफ खाने के लिए अनाज, फल-सब्जी वगैरह मुहैया कराते हैं।
मौसमयाती तब्दीली का इस पर बहुत बुरा असर पड़ता है। मौसम वक्त पर न आने, या सूखा पड़ने या लगातार भारी बरसात होने की वजह से नबातात की बढ़वार और पैदावार घट जाती है। इसलिए सब्जखोरों को पूरा खाना मुहैया नहीं होता। फिलवक़्त दुनिया के कई मुल्कों में मौसमयाती तब्दीली के कारण इस तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। मौसमयाती तब्दीली का सबसे बुरा असर एग्रीकल्चर पर पड़ रहा है।
इनवायरमेंट, जंगलात और मौसमयाती तब्दीली मिनिस्ट्री की एक हालिया रिपोर्ट से पता लगा है कि हमारे मुल्क में मौसमयाती तब्दीली से 2020 तक धान की पैदावार में चार से छह फीसदी, आलू में 11 फीसदी, मक्का में 18 और सरसों की पैदावार में तकरीबन 2 फीसदी तक की कमी हो जाएगी। अगर सरजमीं का माहौल इसी तरह तपता, गरमाता गया और टैम्प्रेचर में एक डिग्री सेल्सियस तक का इज़ाफा हो गया तो गेहूं की पैदावार सालाना 60 लाख टन तक गिर जाएगी। यही नहीं, सब्ज़ाए चमन भी सूखने लगेंगे। निचले पहाड़ों पर सेब वगैरह फलों के बागों पर गर्मी का काफी बुरा असर पड़ेगा और इस वजह से निचले इलाकों में सेब के बाग सूखने लगेंगे। गर्ज़ यह कि हिमाचल प्रदेश में आज जहां 1250 मीटर की ऊंचाई तक सेब के बाग लहलहा रहे हैं, मौसमयाती तब्दीली से वे सूखते जाएंगे और वहां सेब के बाग सिर्फ 2500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में ही सरसब्ज हो पाएंगे। यानी, सेब की बागवानी ऊंचे पहाड़ों की ओर खिसक जाएगी।
ताज्जुब की बात यह है कि एक तरफ जहां सेब के बागों को निचले पहाड़ी इलाकों में नुकसान पहुंचेगा, वहीं दक्कन में मौसमयाती गर्मी से नारियल की पैदावार में काफी इजाफा हो जाएगा। नारियल के दरख्तों की बढ़वार बेहतर हो जाएगी।
जब नबातात पर बुरा असर पड़ेगा तो ज़ाहिर है, जानवरों के लिए चारे की भारी कमी हो जाएगी। इस वजह से दूध की पैदावार काफी घट सकती है। मिनिस्ट्री की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक दूध की पैदावार में शायद मौज़ूदा पैदावार को देखते हुए तकरीबन 15 मीट्रिक टन की कमी हो सकती है।
यह तो सिर्फ हमारी फ़स्लों, बागों और दूध की पैदावार की बात है। मौसमयाती तब्दीली का सारे सब्ज़खेज इलाकों पर बुरा असर पड़ेगा। तमाम जंगलों में नबातात की बढ़वार रुकेगी और वे सूखने लगंेगे। बड़े दरख्तों ही नहीं, ज़मीन पर उगी झाड़ियों और घासों की हरियाली भी मिटने लगेगी। जरा सोचिए, अगर हरियाली ही न रही तो जीना कितना मुश्किल हो जाएगा? क्या हाल हो जाएगा? सय्यदा शान-ए-मिराज़ की जुबां में कहूं तो:
हाल मौसम का ही पूछेगा वो जब पूछेगा
मुझसे कब मेरी उदासी का सबब पूछेगा

साइंसदान तो कह रहे हैं कि जनाब, मौसमयाती तब्दीली से इस सारी सरज़मीं पर नबातात की मुश्किलात शुरू भी हो चुकी है, फिर चाहे वे समंदर में हों या साहिल पर, या फिर जमीं के किसी भी कोने में हों। फ़स्लों और बागों पर इनका असर साफ दिखाई देने लगा है।
एक बात और। आखिर मौसम में इस क़दर यह तब्दीली आखिर हो क्यों रही है? इसकी वज़ह है, दुनिया भर में जंगलों का बेरहमी से सफाया, कल-कारखानों का हवा में ज़हरीला धुवां उगलना और हमारी सड़कों पर दिन-रात दौड़ती बेशुमार मोटरगाड़ियों से निकला धुवां। हर रोज दुनिया में तकरीबन फुटबाल के एक मैदान के बराबर जंगल का सफाया कर दिया जाता है। यानी, हर साल करीब एक करोड़ 30 लाख हैक्टेयर इलाके से दरख्त गायब हो रहे हैं। हम सीमेंट और कंक्रीट के जंगलों में रहते-रहते शायद दरख्तों की अहमियत को भूलते जा रहे हैं। ज़हरीली हवा में सांस लेते-लेते शायद हम जां बख्शने वाली साफ हवा को भूलते जा रहे हैं। वरना क्या वजह है कि दरख्तों को बेदर्दी से काटते वक्त हमें यह याद क्यों नहीं रहता कि इनका सीधा रिश्ता मौसम से है। ये बादलों को बुलाते हैं, जो आकर बरसते हैं। सारे नबातात, सारे दरख्त इस सरजमीं पर हमारे हम सफर हैं। ये रहेंगे, तो हम रहेंगे। ये तो बड़े बुजुर्गों की दस्ते-दुआ की तरह हैं। नामचीन शायर जनाब बशीर बद्र साहब ने ठीक ही कहा है:
सर पे साया सा दस्ते-दुआ याद है
अपने आंगन में इक पेड़ था याद है

यकीन मानिए, नबातात रहेंगे तो मौसम भी खुशगवार रहेंगे। वे वक्त पर आएंगे और हमारी ज़िंदगी को भी आसान और खुशगवार बनाएंगे।

देवेंद्र मेवाड़ी

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