पहाड़ में ‘मेरी यादों का पहाड़’

DSCN0486

नराई यानी खुद, मतलब किसी का शिद्दत से याद आना। तो, इस बार ‘मेरी यादों का पहाड़’ की नराई लगी अल्मोड़ा में उत्तराखंड सेवा निधि को। और, एक दिन दूर पहाड़ से दिल्ली में कमल का फोन आया, “उत्तराखंड सेवा निधि, अल्मोड़ा से बोल रहा हूं, कमल कुमार जोशी। हमारे निदेशक डा. ललित पांडे जी चाहते हैं कि अल्मोड़ा में मिल-बैठ कर विचार-विमर्श के लिए संगोष्ठी की शुरूआत की जाए। पहली संगोष्ठी 29 सितंबर को रखी गई है। तय किया गया है कि इसमें आपको बुलाया जाए और आप अपनी पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ के साथ ही कल और आज के पहाड़ की अपनी यादों पर विस्तार से बातें करें।”

सुन कर मन भावुक हो उठा, होना ही था। एक अरसे बाद फिर ‘मेरी यादों का पहाड़’ को याद किया गया था। आज भी पाठक इस किताब को इतना प्यार दे रहे हैं। मैंने तुरंत हामी भरी और ‘मेरी यादों का पहाड़’ को हाथ में लेकर उससे कहा- सुनो, अल्मोड़ा शहर ने फिर याद किया है, चलना है।

सत्ताइस सितंबर को अल्मोड़ा की राह पकड़ी। पूरी यात्रा में अपने बचपन के दिनों से उम्र के इस पचहत्तरवें पड़ाव तक की यादों में भटकता रहा। अल्मोड़ा शहर में जाखनदेवी रोड पर ‘उत्तराखंड सेवा निधि’ के पटाल जड़े आंगन में पहुंचा तो एक बार फिर बचपन जीवंत हो उठा। मेरे बचपन का वैसा ही आंगन, सामने ढालूदार पाथरछायी छत, शिल्पियों के हाथ से तराशे गए देहरी के द्वार और खिड़कियों से सजा, पत्थर-चिना तिमंजिला घर! सेवा निधि का कार्यालय, जिसमें प्रवेश करना जैसे पर्वतीय शिल्प और संस्कृति के संसार में प्रवेश करना था। देहरी पर सहज-सरल पद्मश्री डा. ललित पांडे से भेंट हो गई। उत्तराखंड निधि के निदेशक। इस बीच दीवान मेरा रकसैक लेकर बगल में साफ-सुथरे अतिथि गृह के कमरे में रख आया और फिर गर्मागर्म चाय पिलाई।

सुहानी शाम थी, मैं सेवा निधि के साथी कमल कुमार जोशी के साथ सीढ़ियां चढ़ कर छत पर चला गया। तभी डा. ललित पांडे भी वहां आ गए। उन्होंने वहां से चारों ओर की चोटियों की जानकारी दी कि वहां पश्चिम में वह स्याही देवी की चोटी है, उत्तर में वहां कसार देवी, घोड़े की पीठ जैसे इस ऊंचे पहाड़ के पार पूर्व में बानड़ी देवी और यहां इस पहाड़ पर नंदादेवी। इसी पहाड़ के दोनों ओर फैला है हमारा यह प्राचीन अल्मोड़ा शहर। पांडे जी ने कहा, “यहां छत से सूर्यास्त का बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है।”

DSCN0510तभी पश्चिम के आकाश में स्याही देवी की चोटी के ऊपर सूर्यास्त के मंचन के लिए रंगमंच सजने लगा। यहां-वहां से टुकड़ा-टुकड़ा बादल आकर जमा होने लगे और उन्होंने धीरे-धीरे सूरज को अपने आगोश में ले लिया। फिर उन पर लालिमा छा गई। मैंने डा. पांडे से कहा, “एक बार हम जाने-माने फिल्मकार श्री अरूण कौल के साथ ‘धूमकेतु’ वृत्तचित्र बना रहे थे। पटकथा मैंने लिखी थी। फिल्म की शुरूआत गोधूलि वेला और सूर्यास्त से होती है। सूर्यास्त का दृश्य देखते ही कौल साहब को कवि-अभिनेता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय की कविता याद आ गई- ‘सूर्य अस्त हो गया, गगन मस्त हो गया!’ हमने उसे समवेत स्वर में गाया। वह दृश्य ऐसा ही था,” मैंने पश्चिम में सूर्यास्त के दृश्य की ओर संकेत करके कहा।

सचमुच सम्मोहक दृश्य था। कभी बादलों के किसी झरोखे से सूरज अचानक झांक लेता और फिर उनकी ओट में छिप जाता। कभी अपनी तेज किरणों की सर्च लाइट नीचे पहाड़ों पर फेंकता। कहीं बादलों की लालिमा सिंदूरी रंग में रंग जाती। और, फिर देखते ही देखते सूरज का लाल गोला पर्वतमाला की एक चोटी पर आ बैठा! अंततः दिन भर का थका-मांदा सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पार ओझल हो गया।

सूरज क्या ओझल हुआ कि सामने घाटियों में अंधेरा घिरने लगा। पेड़-पौधे, पहाड़, गांव, मकान सब अंधेरे में अदृश्य होने लगे। तभी दूर, यहां-वहां रोशनी के लट्टू जगमगा उठे। लगा, जैसे सहसा तारे उग आए हों। आसपास मकानों में भी बिजली जगमगा उठी। यात्रा के कारण थका हुआ था, इसलिए खाना खाकर सो गया।

DSCN0518साढ़े पांच बजे सुबह उठा और धीरे से कांच की चौड़ी खिड़की का पर्दा हटा कर देखा। अभी हल्का अंधेरा था और पेड़, पहाड़ सभी सो रहे थे। आधे घंटे बाद बाहर का दृश्य बदल गया। घाटियों में कोहरा जाग उठा था और खरामा-खरामा ऊपर पहाड़ों की ओर बढ़ रहा था। एक नजर देखने पर लगता था जैसे घाटियों में भरे दूध में उबाल आ गया हो। कुछ देर बाद घना कोहरा अल्मोड़ा के आसपास की चोटियों को छूने के लिए निकल पड़ा। सामने देवदार और दूसरे ऊंचे पेड़ कोहरे में डूबने लगे।

मैं कोहरे और पेड़ों की लुकाछिपी का खेल देखने के लिए छत पर चला गया। छत की मुंडेर पर ऐन सामने बैठे दो बंदर भी चुपचाप यही खेल देख रहे थे। मेरे कदमों की आहट से उनका ध्यान भंग हुआ और वे मुझे इस तरह जिज्ञासा से देखने लगे, मानो पूछ रहे हों- यहां तुम कैसे? मैंने उनसे कहा- बैठो, बैठो, कोई बात नहीं। वे शायद समझ गए और बड़ा बंदर अपने साथी से सट कर सामने कोहरे को देखने लगा।

DSCN0540जाखन देवी ऊंचे अल्मोड़ा रिज की पश्चिमी ढाल पर है। पूर्वी ढाल के सामने दूर बानड़ी देवी की चोटी से शायद सूरज झांकने लगा होगा क्योंकि अब कोहरा चारों ओर से धीरे-धीरे नीचे घाटी की ओर सिमटने लगा। छत के दूसरे सिरे से नीचे नजर गई तो देखा मार्निंग ग्लोरी की घनी बेल पर बहार आई हुई है। मार्निंग ग्लोरी के नीले, जामुनी फूल सम्मोहित कर रहे थे।

चारों ओर शांति थी। मैं सेवा निधि के समृद्ध पुस्तकालय में गया और विविध विषयों की पुस्तकों को देखता रहा। बाद में अनुराधा जी मिलने आईं। उनसे उत्तराखंड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान की विभिन्न योजनाओं पर बातें हुईं। खुशी हुई यह जानकर कि सेवा निधि पूरे उत्तराखंड के कई दूर-दराज गांवों में महिलाओं और बच्चों के लिए सक्रिय और समर्पित रूप से काम कर रही है। आज का दिन अध्येता डा. कपिलेश भोज के साथ विस्तृत चर्चा का दिन था। वे आए मेरे लेखन के बारे में उनके साथ लंबी बातचीत हुई। मेरी अधिकांश पुस्तकें उनके पास हैं जिन्हें उन्होंने गंभीरता से पढ़ा है।

अगले दिन सायं चार बजे से ‘मेरी यादों का पहाड़’ पर मेरा व्याख्यान होना था। उससे पहले साढ़े दस बजे आकाशवाणी, अल्मोड़ा के साथी नीरज भट्ट आकर मुझे अपनी बाइक में बैठा कर आकाशवाणी के स्टूडियो में ले गए। इंटरव्यू लिया। इंटरव्यू ये पहले पूछा, “दाज्यू हिंदी में या कुमाउंनी में?” मैंने कहा, “आप जिसमें भी चाहें।”

फिर एक घंटे से भी अधिक समय तक मेरी दुदबोली कुमाउंनी में बातचीत हुई- पहाड़ के बारे में, मेरे बचपन, पढ़ाई-लिखाई के बारे में। हमारी संस्कृति और संस्कारों के बारे में। नीरज ने मेरे मुंह से चिड़ियों की आवाजें और लोकगीत के बोल भी सुने। आकाशवाणी में साथी नीरज पांगती और महादेवी सृजनपीठ के शोधार्थी डा. मोहन सिंह रावत दम्पति से भी भेंट हुई। फिर हाल ही में विदा हुए संघर्ष के पर्याय साथी शमशेर सिंह बिष्ट के परिवार से भी मिलना हुआ।

लौटते हुए राह में अल्मोड़ा की विशेष पहचान विशाल बोगेनविलिया के पेड़ से भी चलते-चलाते हाई-हैलो हुई। सेवा निधि पहुंचा तो वहां अल्मोड़ा की एक और खास पहचान रिटायर्ड युवा वन अधिकारी जीवन सिंह मेहता जी से मुलाकात हो गई। वे व्याख्यान सुनने के लिए आए थे।

पता नहीं था कि कितने लोग आएंगे लेकिन आते-आते लगभग साठ लोग आ गए। शुरू में निदेशक डा. ललित पांडे ने कहा कि शहर के कुछ लोगों ने समय-समय पर मिल-बैठ कर पहाड़ और पहाड़ के सरोकारों पर बात करने की इच्छा जताई थी। उसे ही ध्यान में रख कर यह संगोष्ठी आयोजित की गई है। यह पहली संगोष्ठी है और आगे भी इसी तरह हम मिल-बैठ कर बातें कर सकेंगे। साथी कमल कुमार जोशी ने मेरा परिचय दिया और मुझसे ‘मेरी यादों का पहाड़’ के बहाने पहाड़ के बारे में बात शुरू करने के लिए कहा।

श्रोताओं में से काफी लोग ‘मेरी यादों का पहा़ड़’ पढ़ चुके थे और जानना चाहते थे कि मेरे बचपन का वह पहाड़ किस तरह किताब के पन्नों पर उतरा। मैंने कहा, मेरी इस किताब के शुरूआती पन्ने पर दो पंक्तियां नहीं छप पाई हैं। अगले संस्करणों में उन्हें छापने की कोशिश की जाएगी। वे पंक्तियां हैं:

जांठी का घुंगुर, जांठी का घुंगुर

कैथें कनों दुख-सुख, को दिछ हुंगुर!

लेकिन, आभारी हूं कि आज आप इतने सारे लोग मेरे दुख-सुख सुनने के लिए यहां आए हैं। तो, आइए सुनाना शुरू करता हूं ‘मेरी यादों का पहाड़’ के इस शुरूआती पन्ने के इन शब्दों सेः

मेरी यादों का पहाड़। हां, इजू, मेरी यादों का पहाड़ ही तो है यह। द, कितनी जो यादें हुईं! उन्हें कैसे भूल सकता हूं…

वह मेरा गांव, मेरे लोग, ढालूदार पाथर छांई छत वाला वह मेरा मकान, वह घर-आंगन जिसमें मेरा बचपन बीता, वह गोठ जिसमें बंधी हमारी गाय-भैंसें हमारे कदमों की आवाज सुन कर अड़ा पड़ती थीं- अ मांऽऽ, वे सीढ़ीदार खेत जिनमें हमारी फसलें लहलहाती थीं, हमारे वे ठंडे पानी के नौले-धारे, वे चहचहाती चिड़ियां, वनों में बासते (बोलते) जानवर, अगाश (आकाश) में उमड़ते बादल, वह झमाझम बरसती बारिश, वे छ्वां-छ्वां बहते गाड़-गधेरे (नदी-नाले), वह घाटियों से उठता हौल (कोहरा), वे शीतल हवा के झौंके, वे वन-वन खिले बुरोंज (बुरांश), वे सुरीले लोकगीत, हुड़के की वे थापें- दुम्हल्या तुतुम….दुम्हल्या तुतुम, वे ढोल के बोल- दुंग दुदुंग दुंग दुंग! वे बांसुरी की धुनें, वे जागाएं, वे नाचते डंगरिए, वे ब्या-काज, त्यों-त्यार (त्योहार), वे मेले, वे गाय-भैंसों के गले की टुनटुनाती घंटियां, घोडों के गले में बंधे खन्-खन् खनकते खांकर (घुंघरु), दूर खड़े वे नीले पहाड़, फिर पहाड़, उनके पीछे चमकता वह साफ-सुकीला हिमालय! पहाड़ से नीचे माल-भाबर को उतरते वे गाय-भैंसों के बागुड़ (झुंड) और बागुड़ की मुखिया भैंस के गले में लटके और रह-रह कर बज उठते मयल (घंटा) की घन-मन…घन-मन की आवाज।

गांव की मेरी वह पाठशाला जिसके आंगन में हम पहाड़े रटते थे, वे संगी-साथी, पढ़ने के लिए गांव से दूर दूसरे पहाड़ तक ले जाने वाली वह कच्ची सर्पीली सड़क, लंफू-लालटेन के उजाले में पढ़ाई के वे दिन, और फिर मेरे सपनों का वह शहर!

वे दिन वे लोग। उन्हीं दिनों के सुख-दुख सुनाना चाहता हूं मैं। लेकिन, किसे सुनाऊं? अपनी यादों के पहाड़ को मन में बिठाए भटकता रहा हूं। गांव से शहर और शहर-दर-शहर।“

वे शब्द मुझे मेरी यादों के गलियारे में साठ-पैंसठ वर्ष पीछे ले चले और मैं अपने उसी बचपन से वहां मौजूद श्रोताओं से बातें करता रहा। उनके ही सुझाव पर किताब के कुछ पन्ने पढ़ कर सुनाए। मेरी यादों के उस पहाड़ की विरासत यात्रा की बात भी हुई कि चलें, एक बार फिर उसी रास्ते पर चलें और देखें कि अब कैसा है वह पहाड़। कुछ उत्साही युवकों ने उस विरासत यात्रा में शामिल होने की इच्छा भी जताई।

IMG_8684उस संगोष्ठी हाल में मेरे बचपन का पहाड़, मेरा गांव जीवंत हो उठा। हृदय से आभार, उत्तराखंड सेवा निधि कि आपको और अल्मोड़ा शहर के आप लोगों को मेरी इस किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ की नराई लगी और, आप सभी ने आज मुझे मेरे बचपन के दिनों में लौटने का यह बेशकीमती मौका दिया। पुनः आभार।

अगला दिन रविवार था, मेरा अपने-आप से मिलने का दिन। वर्षों बाद इस तरह निपट एकांत में अपने आप से खूब बातें कीं। बीते हुए समय की बहुत सारी बातों को याद किया और आने वाले समय की ओर झांक कर देखा। अगली सुबह फिर कोहरे में लिपटी हुई थी। कोहरा छटा और शाहिद गाड़ी लेकर आ गया। पांडे जी, कमल और अन्य साथियों ने बड़ी आत्मीयता के साथ मुझे विदा किया। लगा जैसे घर से दूर देस जा रहा हूं। मैं मन में वहां की यादों को लेकर लौट आया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *